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नसीबन
नसीबन
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© Anwar Suhail

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शहडोल जाने वाली बस आज लेट है।

नसीबन बस-स्टैंड के यात्री-प्रतीक्षालय में बैठी बस का इंतज़ार कर रही थी। उसका चार वर्षीय बेटा बार-बार मूंगफली खाने की ज़िद कर रहा था। सुबह थोड़ा बासी टूंगा है, भुखा गया होगा अब तक!

लेकिन क्या किया जाए? नसीबन उसे डांटने लगी।

वह जानती है कि बस का यही आलम रहा तो शहडोल पहुंचते-पहुंचते शाम हो जाएगी।

मुसुआ सुबह उठा तो शहडोल जाने की उमंग में झटपट तैयार हो गया। हां, इतनी सुबह उसे पैखाना कहां से उतरता। रात नाना के घर दावत हुई तो जम कर ‘गोश्त-पुलाव’ खाया गया था। फिर टीवी पर ‘निकाह’ पिक्चर दिखाई जाने लगी, तो सभी बैठ गए। पाकिस्तानी अभिनेत्री सलमा आग़ा का इसमें ज़बरदस्त रोल था।

नसीबन को ‘निकाह’ का वो गाना कभी नहीं भूलता जिसे सलमा आग़ा ने नकियाती आवाज़ में गाया था...‘‘दिल के अरमां आंसुओं में बह गए’’

कितनी दिलकश आवाज़ है सलमा आग़ा की...

उसी गाने के कारण नसीबन ‘निकाह’ खासकर देखना चाहती थी।

अब्बा को पिक्चर में कोई दिलचस्पी नहीं । वह ईशा (रात की आखिरी नमाज़) की नमाज़ अदा करने मस्जिद गए तो फिर काफी रात गए वापस आए। अम्मा ने कह भी दिया था कि चूंकि आज गोश्त-पुलाव का कार्यक्रम है, इसलिए मग़रिब (सूर्यास्त पर पढ़ी जाने वाली नमाज़) के बाद खाना मिलने का सवाल ही नहीं। इत्मीनान के साथ ईशा के बाद खाना मिलेगा।

नसीबन के दो बार निकाह हुए किन्तु उसने इससे पहले कभी ‘निकाह’ पिक्चर देखी न थी। नसीबन ने ‘तलाक’ का दर्द झेला था। नसीबन सिसकियां ले-लेकर पिक्चर देखती रही।

बीच-बीच में आने वाले विज्ञापन थोड़ा विघ्न ज़रूर डालते, लेकिन इससे नसीबन को कोई फर्क न पड़ता। नसीबन की अम्मा ने समझाया कि उस मरदूद पर न रो बेटी, उसके जिस्म पर तो कीड़े पड़ेंगे। एड़ियां रगड़-रगड़ कर मरेगा जुम्मन समझे !उसने मेरी फूल सी बेटी को बहुत तकलीफ दी है। खुदा उसे कभी माफ़ न करेगा।

नसीबन को फिल्म में तब जाकर सुकून मिला जब कि दूल्हे-मियां काज़ी के पास जाकर रोते गिड़गिड़ाते हैं। तलाक के बाद सलमा आग़ा से दुबारा निकाह कैसे हो सकता है इसके लिए मसला जानना चाहते हैं।

काज़ी साहब समझाते हैं - ‘‘इसीलिए कहा गया है कि बिना सोचे समझे तलाक लफ्ज़ न बोला जाए। क़ुरआन-शरीफ़ में तलाक की मज़म्मत की गई है।’’
तब तक अब्बा भी आ गए थे । वे मसला-मसायल में दिलचस्पी रखते हैं, इसलिए वह भी बैठ कर फिल्म देखने लगे।

इसी सब में काफी रात गुज़र गई।

उसे सुबह पहली बस से जाना भी था। अम्मा ने कहा कि रात बहुत हो गई है, इसलिए अब नसीबन चाहे तो दूसरी बस से शहडोल चली जाए। दूसरी बस आठ बजे सुबह जाती है। लेकिन नसीबन ने कहा कि वह पहली बस से ही जाएगी। वरना शहडोल पहुंचने में बहुत देर हो जाएगी। इधर पंचायत का चुनाव होने वाला है और दूसरे मनेंद्रगढ़ से शहडोल के बीच सड़क की हालत बहुत ज्यादा खस्ता हो चुकी है। एक सौ तीस किलोमीटर के सफर में पूरे आठ से नौ घण्टे लग जाते हैं। सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढे इतने कि बसों का पट्टा-कमानी जवाब दे जाता। पूरी ‘बॉडी’ झनझना जाती। कई बसें कबाड़ा हो गई हैं। वह तो सवारियां मिल जाती हैं , वरना बस-मालिक बस खड़ी रखते। इस रूट में बस चलाना एक घाटे का सौदा है।

इसीलिए नसीबन चाहती थी कि दिन रहते वह घर छोड़ दे ।

मुसुआ की ज़िद से परेशान होकर वह स्टैंड पर भुनी-मूंगफली के ठेले पर गई और पचास ग्राम मूंगफली खरीदी। मूंगफली वाले ने अढ़ाई रुपए मांगे।

‘‘एक छंटाई मूंगफली के अढ़ाई रुपए?’’ वह चीखी।

‘‘चिल्लाती काहे हैं, पूरे मनेंद्रगढ़ में यही दाम है। लेना हो तो लीजिए?’’ ठेले वाला बिगड़ कर भूत हो गया।

‘‘दो रुपया दूंगी, लेना हो तो लो वरना सामान वापस...’’ कहने को तो कह दिया उसने किन्तु मुसुआ की जिद के आगे हार मानकर वह बोली --‘‘ अच्छा ऐसा कर कि मुझे दो रुपये की मूंगफली ही दे दो। थोड़ा कम कर लो और क्या?’’

मूंगफली पाकर मुआफ़ झूम उठा। वह अपनी तोतली आवाज में गाना गाने लगा ।

‘‘कहो न प्याल है...’’

नसीबन वात्सल्य रस से ओत-प्रोत हो उठी। ममता उसकी आंखों से छलकने लगी। वह मुसुआ को मूंगफली के दाने छील-छील कर देने लगी। नसीबन मुसुआ को जान से भी ज्यादा चाहती है। अपने सीमित साधनों के बीच वह मुसुआ की हर ज़िद पूरा करने का प्रयास करती। वह हमेशा गौस-पाक के मार्फत अल्लाह पाक परवर दिगार का शुक्रिया अदा किया करती।

मुसुआ के अब्बा भी मुसुआ को बहुत प्यार करते। आखिर अधेड़ावस्था में बाप बनने का एक अलग ही सुख है। मुसुआ के अब्बा का ध्यान क्या आया कि वह बेचैन हो उठी।

नसीबन का दूसरा पति गुलज़ार खान, फोरमैन... उम्र पचपन वर्ष... ढेर सी पैत्रिक और व्यक्तिगत सम्पत्ति के स्वामी... किन्तु आल-औलाद की खुशी से महरूम! जब तक पहली पत्नी जीवित रही, दूसरी शादी का ख़्याल भी मन में न लाया। उसकी की मृत्यु मलेरिया से हुई।

छत्तीसगढ़ के इस सुदूर स्थित क्षेत्र सरगुजा में आदिवासी आज भी भूख से मरते हैं। कस्बाई लोग, मलेरिया से। सेठ-महाजन, अफ़सरान और नेताओं जैसे बड़े आदमियों का इलाज सरगुजा में नहीं हो पाता। वे लोग भिलाई, बिलासपुर, रायपुर या दिल्ली जाकर इलाज करवाते हैं। मरते भी सस्ते में नहीं। एक-डेढ़ लाख का बजट बनवाकर मरते हैं। मतलब ये कि मरते सभी हैं। चाहे वह खाकपति हो या करोड़पति!

गुलज़ार खान की बीवी भी मरी और घरवालों के दबाव में आकर उन्होंने दूसरा निकाह किया नसीबन से। नसीबन की ख़ाला ने ये रिश्ता लगाया। उसने ही उन लोगों को राज़ी किया। गुलज़ार खान कोयला खदान में मैकेनिकल फोरमैन थे। इज़्ज़तदार नौकरी, बी-टाइप क्वार्टर, बनी-बनाई गृहस्थी। घर में फ्रिज़, टीवी, वाशिंग मशीन, स्कूटर सब कुछ था। कमी थी तो सिर्फ औलाद की।

वह कमी उसने दूर कर दी। नसीबन बांझ न थी। उसकी कोख की धरती पर बीज पड़ा ही न था।

बस-स्टैंड के पूरब में बने शेड पर बैठे अनांउसर की आवाज़ लाउडस्पीकर पर गूंजी। - ‘‘शहडोल जाने वाले यात्री ध्यान दें... मनेंद्रगढ़ से बिजुरी, कोतमा, अनुपपुर, अमलाई, बुढ़ार से होकर शहडोल जाने वाली बस आने वाली है। आप लोग अपने सीट नम्बर और टिकट काउंटर पर बैठे एजेंट से ले लें।’’

नसीबन की तंद्रा भंग हुई। उसने मुसुआ से चाहा कि वह चुपचाप सामान के पास बैठे तो टिकट खरीद ले आए। मुसुआ नहीं माना। नसीबन झुंझला कर उसे धीरे से चपत लगाई। मुसुआ रोने लगा। मुसुआ एकदम पिन्ना है। मां-बाप के अत्यधिक दुलार-प्यार से वह ज़िद्दी भी हो गया है। नसीबन उसका रोना बरदाश्त नहीं कर सकती। नसीबन ने गोद में उसे उठाया और दूसरे हाथ से प्लास्टिक की डोलची उठा ली।

टिकट लेकर वह पुनः प्रतीक्षालय में आ गई। वह जहां बैठी थी वहां एक महिला बैठी थी। वह गोरे रंगत की एक जवान महिला थी। मांग पर सिंदूर की जगह सफेद चमकीली सी एक लकीर... ‘अफसन’ की लकीर। यानी यह महिला भी मुसलमान ही है।

उसके साथ तीन बच्चे थे। दो बेटियां और एक बेटा। छोटी बेटी अभी गोद में है। वह मां का दूध पीने को बेचैन है। महिला ने सलवार सूट पहन रखी है। सफर में सलवार सूट में बच्चे को दूध पिलाने में दिक्कत होती है। बच्ची की चीख-पुकार से तंग आकर महिला ने उसे दो चपत जमा दी। बच्ची और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।

मुसुआ को मूंगफली खाते देख, उस महिला का चार वर्षीय बेटा भी कुछ खाने की ज़िद करने लगा। महिला ने लाचार होकर पहले तो गोद की बिटिया का मुंह ज़बरदस्ती दुपट्टे के अंदर करके चुस्त कुर्ते का दामन इस तरह से समेटना चाहा कि बदन भी न उघड़े और बच्ची दूध भी पी ले।

इस कोशिश में उसकी दूध-भरी गोरी छातियों की एक झलक नसीबन ने पाई। नसीबन मुस्कुरा उठी। उस महिला ने छाती में बच्ची का मुंह ठूंस कर बेटे की तरफ घूर कर देखा। बेटा बदस्तूर मूंगफली खाने की ज़िद मचाए हुए था।

नसीबन से अब चुप न रहा गया। उसने मुसुआ से कहा कि वह मूंगफली के चार दाने उस रोते बच्चे को भी दे दे। मुसुआ मान गया। महिला ने कृतज्ञता प्रकट की। दोनों महिलाएं मुस्कुरा उठीं।

कुछ मामले में मुसुआ बाप पर गया है। गुलज़ार भी इसी प्रकृति के हैं। भले ही भूखे रह जाएं लेकिन मेहमान की ख़िदमत में कोई कमी न करेंगे। बड़े दरियादिल हैं गुलज़ार ...ईद मिलने उसे मैके आना पड़ गया, वरना वह मियां एक दिन भी अकेला छोड़ती नहीं। इतनी जिंदगी गुजरने के बाद तो वह मियां-वाली हुई है। पहला मियां तो बस नाम का मियां था। नसीबन को मुंह में कुछ कड़वा कसैला सा महसूस हुआ। पहले शौहर जुम्मन का तस्ववुर उसे भयभीत कर देता। जाने क्या-क्या चाहता था जुम्मन अपनी बीवी से।

वह चाहता था कि उसकी नामर्दी की बात किसी भी तरह से समाज में न आने पाए।

वह चाहता था कि चाहे जैसे भी हो नसीबन उसके लिए औलादों की लाइन लगा दे।

वह चाहता था कि नसीबन उसकी अंधी मां और नकारा देवर की ख़िदमत में राई-रत्ती की कमी न करे। ठीक उसी तरह जुम्मन की मां अपनी बांझ बहू को रात-दिन ताने मारा करती।

बेटे से झूठी शिकायतें करती कि बहू ने ढंग से खाना दिया न पानी... दिन भर बस मुझसे लड़ती रहती है। बांझ-निपूती रांड़ सब ऐसी ही होती हैं। मेरे बेटे पर ‘टोनाहिन’ ने जाने कैसा टोना कर दिया है कि यह किसी की सुनता ही नहीं।

देवर अलग अपना राग अलापता। वह एक सेठ का डम्पर चलाता था। रेत-गिट्टी आदि की ढुलाई में वह डम्पर लगा था। रेत-गिट्टी की लोडिंग-अनलोडिंग में गांव की रेजाएं और मज़दूर लगा करते हैं। उसका चाल-चलन भी ठीक न था। देवर के कई रेजाओं से सम्बंध थे। वह पूरे समाज में बदनाम हो चुका था। इसीलिए कोई अपनी बेटी उसे देने को तैयार न होता। एक जगह बात चल रही थी। लड़की वाले इस लिए झुककर आए थे कि उनकी बेटी में कई दोष थे। लड़की भैंगी और काली -कलूटी थी। बदसूरत कहें तो कोई हर्ज़ नहीं। उसी समय ऐसा हुआ कि रेजाओं की बस्ती में मार-पीट और शराब पीकर हुड़दंग मचाने के अपराध में देवर को जेल हो गई। लड़की वालों ने खुदा का शुक्र अदा किया कि समय रहते उनकी आंखें खुल गईं। उनकी बेटी बरबाद होने से बच गई। क्या हुआ कि बेटी बदसूरत है किंतु बदकिरदार तो नहीं।

देवर अक्सर भौजाई को छेड़ता -‘‘भइया से कुछ न हो पाएगा भौजी। एक बार इस बंदे को आजमा कर देखो तो...शर्तिया लड़का होगा। जाने कितनी जगह मैंने आजमाया है। एक मौका खिदमत का हमें भी तो देकर देखो।’’

वह बदतमीजी से हंसता। एक बेहद अश्लील हंसी... जिसमें निगाहों से कपड़े उतारने की ताकत हो। नसीबन अपना दुख किससे कहती? उसका मन करता कि वह आगे बढ़कर देवर का मुंह अपने तेज़ नाखूनों से नोच ले! या कि अपनी बदनसीबी पर दहाड़ें मार-मार कर रोए।

समाज देवर-भौजाई के बीच मज़ाक को बुरा नहीं समझता। जुम्मन से कहे तो उसकी मार खाए। सास ठहरी अंधी-बहरी, पुत्र-मोह से उसमें भला-बुरा समझने का जज़्बा भी ख़त्म हो गया था। वह किसी भी तरह उस घर में बच्चे की किलकारी सुनना चाहती थी। इस मामले में वह हक-नाहक, भला-बुरा, नैतिक-अनैतिक कुछ भी न मानती थी। बस पानी पी पीकर वह बहू को कोसती और बेटे को उकसाती कि वह एक और निकाह कर ले। वरना इस वंश का क्या होगा?


अनांउसर ने पुनः हांक लगाई - ‘‘शहडोल जाने वाली बस अब आने ही वाली है। आप लोग अपने टिकट और सीट नम्बर ले लें।’’

नसीबन की तंद्रा भंग हुई। उसने मुसुआ के हाथ से मूंगफली का पूड़ा छीन कर डोलची में रख लिया। वह प्रतीक्षालय से बाहर निकल आई। उसने देखा कि वह महिला भी उठ गई है। शायद उसे भी यही बस पकड़नी हो। दूर कहीं बस की घुरघुराहट सुनाई दी।

एजेंट और अनांउसर सजग हुए। देखते ही देखते बस आ गई। नसीबन को खिड़की के पास वाली महिला-सीट का नम्बर मिला था। नसीबन बस के सफर में खिड़की के पास की सीट चाहती है। उसे हमेशा ताजा हवा चाहिए। बस में सवारियां बीड़ी-सिगरेट का सेवन करती हैं तो उस गंध से उसे मितली आने लगती है। जाड़े में भी सफर के दौरान वह खिड़की खुला रखना चाहती। यदि अन्य लोग विरोध करते तो वह खिड़की बंद करती। थोड़ा सा फांक वह फिर भी बचा लेती। ताज़ा हवा का स्पर्श मिलता रहे बस!

अभी वह बस में बैठी ही थी कि उसकी बगल में वह महिला आकर बैठ गई। अपने तीनों बच्चों के साथ। उसे कोई आदमी बैठाने आया था। वह आदमी जाने लगा तो महिला ने बच्चों से कहा - ‘‘मामू को सलाम करो!’’

नसीबन ने जाना कि ये भी अपने मैके आई लगती है। शायद ईद मिलने आई हो। ख़ैर उसे

क्या ?

वह महिला बगल सीट में आ गई ।

नसीबन ने मुस्कुराकर परिचय की पेशकश की। वह भी जवाबन मुस्कुराई। उसका बेटा अभी भी रो रहा था। लड़कियां बेचारी चुप थीं। नसीबन ने सोचा कि लड़कियां अमूमन चुप ही रहती हैं। अगर ये कहें कि बेजुबान होती हैं, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। यही बेजुबानी उन्हें ज़ुल्म सहने और सिसकने के लिए प्रेरित करती है। नसीबन भी तो इसी चुप्पी की शिकार थी। यदि वह जुबान वाली होती तो ज़रूर जुम्मन के आरोपों का विरोध करती।

कितना सहा था उसने! बुढ़िया अंधरी सास तक एक स्त्री होते हुए भी उसे पाप के लिए मजबूर करती। माना कि जुम्मन सीधे कुछ न कहता किन्तु अप्रत्यक्ष रूप से उसका इशारा यही होता कि उसे औलाद चाहिए। किसी भी कीमत पर उसे औलाद चाहिए थी।

बाकी बात सास स्पष्ट कर देती। कहती - ‘‘रंडी! सती-सावित्री बनती है। अपने देवर पर इल्जाम लगाती है। अरे घर की बात सड़क पर लाती है। तू जा तो सही, देखना जुम्मन को कैसे औलाद वाला बनाती हूं।’’

नसीबन लड़ती - ‘‘ आपके बेटे से कुछ भी न हो पाएगा, वह बच्चा पैदा करने लायक तो क्या किसी औरत के ही लायक नहीं।

वह भरी जवानी में अपने ठंडे-बिस्तर और मुर्दा रातों की बात कैसे कहती।

‘‘रांड...दोष तेरे में है। अरे, औरत चाहे तो पत्थर भी पिघल जाए। हर साल बकरी और कुतिया की तरह गाभिन होती रहे। ये कह न कि तेरी कोख में ताकत ही नहीं।’’

‘‘नहीं अम्मा! ताली एक हाथ से नहीं बजती...तू मान कि तेरा बेटा किसी काम का नहीं सिवाय रोज़ा-नमाज़, रोजी-रोटी के। मीठा बोलता है और मुस्कुराता रहता है, इससे ये न समझियो कि वह बड़ा मर्द है।’’ वह कैसे कहे कि हिंजड़ा है जुम्मन एकदम हिंजड़ा!

सास रोने-धोने लगती - ‘‘पता नहीं किस घड़ी मैंने तुझे पसंद किया। कमीनी थी ननद साली, मेरी दुश्मन, वही तेरा रिश्ता लाई थी। उसने तो तुझे हमारे गले मढ़कर हमसे बदला ले ही लिया...अब हमें जिन्दगी भर यही ढोल बजाना होगा। लेकिन नहीं, मैं पोता खिलाए बिना मरूंगी नहीं। मैंने हज़रत जी से बात की है। उन्होंने कह दिया है कि औलाद के लिए दूसरा या तीसरा क्या चौथा निकाह भी जायज़ है। मैंने तो लड़की भी देख ली है। बस, ये जोरू का गुलाम जुम्मनवा एक बार ‘हां’ भर बोल दे। दूसरे दिन ही निकाह करवा दूं।’’

वह भी चिढ़ जाती - ‘‘तब ऐसा है कि गाभिन बहू लाना। एक-दो माह का पेट वाली हो। मैके से औलाद ले आई तो ठीक, वरना उसे भी मेरी तरह सौतन बरदाश्त करना होगा।’’

सास भी कहां कम थी। उसने भी दुनिया देखी थी। बुढ़िया ने कहा ही -

‘‘औलाद के लिए कुछ न कुछ गंवाना तो होगा ही। ऐसे रोने-धोने से कोई फ़ायदा नहीं। तू बांझ है समझी! अब तो जुम्मन के लिए घर में एक नई बहू ले आना है बस!’’

वह क्या कहती सिवाय इसके कि सौतन के साथ वह नहीं जी पाएगी, और यह भी कि वह आत्महत्या भी नहीं करेगी! वह पूरे समाज को चीख़-चीख़ कर बताएगी कि जुम्मन नपुंसक है। उससे औलाद क्या ईंटा-पत्थर भी पैदा होना मुश्किल है। वह उसे छोड़ दूसरा निकाह क्या करेगा। इसी बात पर वह जुम्मन से स्वयं सम्बंध-विच्छेद कर लेगी।

आख़िर हुआ भी वही...एक दिन पता चला कि जुम्मन अब दूसरा निकाह करने वाला है। इस्लाम में पहली बीवी रहते हुए दूसरा निकाह करने पर प्रतिबंध नहीं। वह जुम्मन को इसके लिए मजबूर नहीं कर सकती थी।

उसने सोच लिया कि इस दरवाजे अब उसे नहीं झांकना...और वह अपनी ख़ाला के घर चली गई। वहां से खाला और खालू दोनों ने जुम्मन पर दबाव डालना चाहा किन्तु जुम्मन अपनी मां के फ़रमान के आगे बेबस निकला। कहते हैं कि अंधी सास ने दूसरी बहू लाने में कितनी चालाकी की। वह जान-बूझकर ऐसी लड़की ले आई जिसके पेट में डेढ़ माह का गर्भ था। हां, तहकीकात से ये भी जान लिया था कि उस लड़की के पेट में किसी ग़ैर का नहीं बल्कि अपने ही जीजा का नुत्फ़ा था।

यही तो सास नसीबन से चाहती थी। लेकिन... हुआ नहीं वैसा कुछ, जैसा नसीबन चाहती थी या कि सास-पति-देवर की इच्छा थी। नसीबन ज़िद पर अड़ी रही कि दोष आदमी में है। इसलिए दूसरी शादी इस समस्या का समाधान नहीं।

सास ने हज़रत जी की चौखट में अपनी परेशानियां रखीं। चिरागा में अच्छी रकम चढ़ाई। हज़रत जी पर इसका अच्छा असर पड़ा।

उन्होंने सास से पूछा - ‘‘तो आप उससे पीछा छुड़ाना चाहती हैं?’’

‘‘जी हां, हज़रत जी! मुझ रांड-अंधी को पोते का मुंह देखना है। उससे कुछ होगा नहीं। मैंने जुम्मन के लिए एक लड़की देखी है। रिश्तेदारी के लोग हैं। खांटी सुन्नी हैं वे लोग...ये नसीबन तो वहाबी घर से है हज़रत जी!’’

हज़रत जी के कान खड़े हुए - ‘‘क्या कहा, देवबंदी घर से है आपकी पहली बहू?’’

‘‘जी हां, हज़रत जी..!’’

‘‘बस फिर क्या है। तलाक दे दो उस ‘मुनाफ़िक’ को। ये देवबंदी लोग ‘काफ़िरों’ से भी बदतर होते हैं। इन से ‘सलाम-मुसाफ़ा’, खाना-पीना, और रिश्तेदारी वगैरा की मुमानियत है। आपने निकाह से पहले इसकी तस्दीक नहीं की थी क्या? आज ये दिन न देखना पड़ता। अच्छा हुआ, अल्लाह तआला ने उस ‘मुनाफ़िक’ से आपके घर में औलाद न दी। आपको सिर्फ इसी बिना पर तलाक मिल सकती है कि आपकी बहू बद-अक़ीदा है।’’

कहा भी गया है कि एक बार काफ़िर का एतबार कर लो किन्तु देवबंदी या वहाबी पर कतई भरोसा न करो। इन लोगों को अल्लाह के प्यारे रसूल पर ईमान नहीं। ये बद-अक़ीदा लोग नबियों के नबी, हुज़ूरे-अकरम सल्ल लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अपनी तरह का एक इंसान समझते हैं।

ये उन पर दरूद नहीं भेजते, ज़िन्दा वलियों और बुज़ुर्गों की करामात पर यकीन नहीं रखते। ये लोग बरेलिवियों को ‘बिद्दती’ समझते हैं। जबकि ये काफ़िरों से भी बदतर हैं। इनके साए से भी बचना चाहिए।

और देवबंदी होने की बिना पर जुम्मन ने उसे तलाक दिया था।

 

बस स्टार्ट हुई। बगल वाली महिला कुछ सहज हुई।

नसीबन ने उसके बच्चों को प्यार किया।

नसीबन ने उनसे उनका नाम पूछा। बच्चों ने तुतलाकर अपने नाम बताए जिसे बस की घुरघुराहट में वह सुन न पाई। फिर उसने उनसे पूछा - ‘‘कहां जाना है?’’

जवाब बच्चों की मां ने दिया - ‘‘शहडोल..’’

फिर बात को आगे बढ़ाने की गर्ज से उसने पूछा - ‘‘और आप कहां जा रही हैं?’’

-‘‘शहडोल।’’

-‘‘देखिए कब तक पहुंचाती है बस...स्टैंड से ही लेट हो गई है। आगे जाने क्या हो?’’

-‘‘ठीक कह रही हैं आप, यदि यही हाल रहा तो रात तक शहडोल पहुंच पाएंगे!’’

-‘‘अब जो हो...और कोई साधन नहीं। रास्ता भी इतना खराब है कि बस चाहे भी तेज भागना तो भाग नहीं सकती। अब तो सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं।’’

-‘‘पीछे सीट मिले तो मैं सफर ही न करूं...आगे ठीक है। धचका उतना पता नहीं चलता।’’

इस वार्तालाप के बाद एक चुप्पी...कण्डक्टर आया।

टिकट के पैसे बढ़ाए।

कण्डक्टर ने दो इंच के कमज़ोर से काग़ज़ का एक टिकट दिया। इधर की निजी बसों में इसी तरह की टिकटें मिलती हैं। वह भी कभी दिया कभी गोल!

खिड़की पूरी खुली थी।

बगल वाली ने टोका - ‘‘छोटकी को बुखार है। जरा खिड़की तो बंद कर लीजिए...’’

नसीबन ने मुरव्वत में खिड़की बंद की किन्तु थोड़ा फांक छोड़ दिया ताकि उसे शुद्ध हवा मिलती रहे।

-‘‘क्या हुआ उसे?’’

-‘‘कुछ नहीं, कल इसके मामू ने इसे आइसक्रीम खिला दी थी। रात में हल्का सा बुखार हो आया। मैं तो डर रही हूं कि इसके अब्बा को क्या बताऊंगी...वह मुझे बहुत डाटेंगे।’’

-‘‘तो क्या आपने जान-बूझकर बुखार से कहा है कि मेरे बच्चे की देह पर आकर बैठे।’’

-‘‘वह बात नहीं । उन्हें औलाद से बहुत प्यार है। वह तो अच्छा है कि सास नहीं रही वरना वह अंधी तो बहुत गरियाती!’’

-‘‘अंधी सास!’’ नसीबन का माथा ठनका। उसे अपने पहले शौहर जुम्मन की मां की याद हो आई।

-‘‘हां आपा, ’’ जाने क्यों उस महिला ने उससे बहनापा जोड़ लिया।

नसीबन को उस महिला में दिलचस्पी हुई।

उसने उससे पूछा - ‘‘शहडोल में आपकी ससुराल है?’’

-‘‘हां।’’ मुख़्तसर सा जवाब।

-‘‘कहां पर घर है?’’ नसीबन व्यग्र थी।

-‘‘इतवारी मुहल्ला में।’’ महिला ने सहज भाव से उत्तर दिया।

इतवारी मुहल्ला, यानी इतवारी मुहल्ला में तो उसकी पहली ससुराल थी। उसने तत्काल अगला प्रश्न दागा

-‘क्या नाम है आपके शौहर का?’’

नसीबन ने अपनी आंखें जवाब सुनने से पूर्व बंद कर लीं।

उस महिला ने अपने शौहर का नाम बताने में संकोच किया। उसने अपनी बच्ची से कहा

-‘‘बिटिया अब्बू का नाम चची को बता दो!’’

बिटिया ने अटकते हुए कहा - ‘‘जुम्मन...’’

नसीबन की आंखें बंद थीं।

एक बम सा फटा उसके कान के पास! ‘जुम्मन’ काश! उसने अपने कान भी बंद कर लिए होते।

 

 

अनवरसुहैल नसीबन मुस्लिम स्त्री निकाह तलाक पुनर्विवाह देवबंदी बरेलवी मुस्लिम समाज

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