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© Girish Pankaj

Inspirational

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गौरीशरण डोरीवाल की सुकन्या शारदा को जब 'साहित्यश्री' सम्मान मिला तो यह पूरे परिवार के लिए उत्सव और उसको सेलिब्रेट करने का दिन था। निपट व्यावसायिक पृष्ठभूमि वाले डोरीवाल परिवार की एक युवती को इतना बड़ा सम्मान मिला ! इस खुशी में कुछ उत्साही परिजनों द्वारा स्थानीय अख़बारों में बधाई के विज्ञापन भी प्रकाशित करवाए गये। तीन सितारा होटल 'डायमंड ट्यूलिप 'में ग्रेंडगाला पार्टी दी गई। डीज़े भी चला। सब झूमते रहे। साहित्यिक सम्मान का इतना रंगीन-धमाकेदार जश्न सबके नसीब में भी नहीं होता। पार्टी में स्थानीय लेखक  शामिल नहीं हो सके थे। उनको इस बात की जानकारी भी नहीं थी कि ऐसी कोई पार्टी-शार्टी रखी गई है। यह निहायत पारिवारिक आयोजन था। लेकिन पार्टी में शहर के कुछ नवधनाढ्य, कुछ प्रशासनिक अधिकारी और कुछ मंत्री-विधायक भी शरीक हुए थे। वैसे शारदा तो चाहती थी, कि कुछ लेखक भी आ जाएँ मगर पिताजी ने इंकार कर दिया था। उनका साफ कहना था, ''गोष्ठियों में लेखकों से मिल लो, कोई बात नहीं लेकिन हमारी पार्टी अपर क्लास सोसाइटी की पार्टी है। इसमें लेखक वगैरह फिट नहीं होते। डोंट वरी, उन्हें कभी स्वल्पाहार में बुला लेंगे।''

   शारदा ,चालीस साल की उम्र की खूबसूरत गोरी-चिट्टी युवती ! बिल्लौरी आँखें। भरा हुआ शरीर। तीखे नैन-नक्श। तन पर नयानाभिराम कीमती परिधान। खाते-पीते घर की लड़कियाँ अलग ही से पहचान में आ जाती हैं। सुंदर वर की तलाश में कब उम्र निकल गई पता ही नहीं चला। शारदा को इसकी परवाह भी नहीं, कि शादी नहीं हो सकी। उसने अपने लेखन और व्यवसाय से ऐसा रिश्ता गाँठ लिया है, कि शादी का कभी कोई टेंशन ही नहीं रहा। पिता गौरीशरण को इस बात का दु:ख ज़रूर  है ,लेकिन संतोष है कि शारदा ने हालात से समझौता कर लिया और उनकी फैक्ट्री को अच्छे-से संभाल लिया है। शारदा को देख कर कोई यह अनुमान ही नहीं लगा सकता कि वह चालीस की है। बमुश्किल तीस के आसपास की ही लगती है। सुंदर तो खैर वह बचपन से ही थी। 

शारदा को याद आता है बचपन का वह एक दिन, जब नाना महावीरप्रसाद डोरीवाल की एक कविता को पढ़कर उसका मन भी हुआ कि कुछ लिखे। और उसने लिखा भी। यह और बात है कि कुछ बहुत अच्छा नहीं लिख पाई। लेकिन बाद में हिंदी अध्यापक और गौरीशरण के मित्र रामानंद शर्मा के सहयोग से कविता दुरुस्त हो गई। या फिर यूँ कहें, कि पूरी तरह से नई हो गई। वह पहली कवि गोष्ठी थी, जिसमें पंद्रह साल की बालिका शारदा ने कविता-पाठ किया था। हर श्रोता चकित था, कि इस उम्र में इतनी परिपक्व कविता यह लड़की कैसे लिख सकती है !सबकी अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएँ थीं। जैसे-

.....''किसी-किसी में जन्मजात प्रतिभा विकसित हो जाती है।'' 

.....''महादेवी भी बचपन से कविताएँ करने लगी थीं।''

.....''पूत के पाँव पालने में दिखाई देते हैं।''

शारदा सुंदर थी। बच्ची थी। गोष्ठी में वह सबको आकर्षित कर रही थी। लगभग हर कवि ने शारदा को अपने पास बुलाया और उसे स्नेह दिया। सभी ने एक ही बात कही कि अगर इसी तरह लिखती रही तो यह एक अच्छी कवयित्री बन कर उभरेगी। रामानंद ने वातावरण बनाया-''मुझे तो लगता है, कि यह भविष्य की महादेवी वर्मा है। क्यों शारदा, तुमने महादेवी का नाम सुना है?''

शारदा मौन रही। 

गोष्ठी खत्म होने के बाद रामानंद बोले- ''तुम मेरे पास आना। महादेवी और सुभद्राकुमारी चौहान की कविताएँ दूँगा। उन्हें ध्यान से पढऩा।''

गोष्ठी में गोरीशरण भी बैठे थे। रामानंद ने कहा- ''भाई साहब, आप इस लड़की को लेकर मेरे पास आइएगा। देखिए, मैं इसे कहाँ से कहाँ पहुँचा दूँगा।''

''अरे भैया, धंधे-पानी वाला आदमी हूँ। मैं तो आने से रहा: हाँ, शारदा ज़रूर आती रहेगी आपके पास। इसे तराश दीजिए।''

''यही तो काम है हम मास्टरों का।''

''अब आप जैसे ज्ञानियों का साथ मिला है तो कुछ न कुछ अच्छा ही होगा।''

गोष्ठी के चाय-नाश्ते का पूरा इंतजाम गौरीशरण ने ही किया था। उन्होंने इस बात का भी ऐलान किया कि 'जब कभी कवि गोष्ठी हो, चाय-पान का जिम्मा मेरी तरफ से। लेकिन शर्त यही है, कि मेरी बेटी शारदा की कविता भी सुनी जाएगी'। इस शर्त के पीछे परिहास था , लेकिन व्यावहारिकता भी थी। 'माँ वीणापाणि साहित्य समिति' के पास तो इतना भी पैसा नहीं रहता कि गोष्ठियों में किसी को कवि चाय भी पिला सकें। गौरीशरण जी की बात सुन कर सबसे ज्य़ादा प्रसन्न हुए अध्यक्ष  सुरेशकांत 'भ्रमर'। बोले, ''चलो, कोई स्थाई दान-दाता तो मिला।''

शारदा के जीवन की पहली गोष्ठी हिट रही। फिर तो सिलसिला-सा चल पड़ा।''

हर गोष्ठी में रामानंद शर्मा के साथ ही शारदा आती जाती थी। कई बार जब रामानंद जी को शारदा की कोई कविता कमजोर लगती तो उसे वे सुधार दिया करते थे। अकसर सुधारने से भी बात नहीं बनती थी, तो वे पूरी उदारता के साथ अपनी ओर से एक कविता लिख कर दे दिया करते थे। मगर वे शारदा को समझा भी देते थे, कि सबसे यही कहना कि 'कविता तुमने ही लिखी है। वरना लोग गोष्ठियों में नहीं बुलाएँगे। ध्यान रखना'।  

रामानंद दयावती, अग्रोहा महाविद्यालय में हिंदी पढ़ाते थे। किताबों की समीक्षाओं के साथ-साथ कभी-कभार कविताएँ भी लिखा करते थे। स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ कभी-कभार राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में भी इक्का-दुक्का कविताएँ, और ज्यादातर पाठकीय प्रतिक्रियाओं के लिए उनको लोग पहचानते थे। शहर की लगभग हर साहित्यिक कार्यक्रमों के स्थाई संचालक भी रामानंद जी ही हुआ करते थे। कभी-कभी, कहीं-कहीं अतिथि के रूप में भी बुलाए जाते थे। कोर्स में पढ़ाए जाने वाले लेखकों का साहित्य उन्हें कंठस्थ हो चुका था। 'आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियों' संबंधित पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ाई जाने वाली सामग्री भी वे पचा चुके थे। जब किसी साहित्यिक सभा या गोष्ठी में वे बोलते तो हर कोई उनकी विद्वता का कायल हो जाता था। शारदा ने रामानंद जैसा विद्वान जीवन में पहले कभी देखा ही नहीं था। आम लोगों को भी साहित्य की कुछ किताबी बातें रामानंद जी के सौजन्य से ही पता चलती थीं। गौरीशरण भी उन्हें सबसे बड़ा विद्वान मानते थे। गौरीशरण को यकीन था कि अगर रामानंद को आर्थिक दृष्टि से सहयोग करते रहे तो वह शारदा को काफी आगे बढ़ा सकते हैं। एक दिन जब गौरीशरण ने कुछ पैसे देने चाहे तो रामानंद ने साफ-साफ कहा, 

''मुझे पैसे नहीं चाहिए। मेरा लक्ष्य है शारदा को अच्छी साहित्यकार बनाना।''

गौरीशरण की अपनी री-रोलिंग मिलें थीं। बेटे राघवशरण और श्यामशरण बिल्डर थे । घर पर केवल व्यवसाय की ही चर्चाएँ होती थीं। लेकिन जब से शारदा कविताएँ लिखने लगी, कभी-कभार कविताओं की चर्चा भी होने लगी। 

एक दिन स्कूल से लौटने के बाद शारदा ने एक कविता लिखी। कविता कैसी बनी, यह जानने के लिए वह रामानंद शर्मा के घर पहुँच गई। रामानंद ड्राइंग रूम में बैठे कर सुबह का अखबार पढ़ रहे थे। शारदा को देखा तो उसे अपने पास बुला लिया। 

''कहो, कैसे आना हुआ। लगता है, फिर कुछ कविताएँ बनी हैं।''

''जी सर, सुनिए कैसी है।''

शारदा कविताएँ सुनाती रही। रामानंद हर कविता पर 'वाह'...'अद्भुत'...'सुंदर'...'क्या बात है'...आदि-आदि कह कर दाद देते रहे। 

''तुम कमाल का लिख रही हो।'' इतना कह कर रामानंद ने शारदा को चूम लिया। फिर बोले, ''तुमको बुरा तो नहीं लगा?''

''बिल्कुल नहीं सर। आप तो चाचा के समान हैं ।''

''चाचा के समान हूँ मगर चाचा नहीं हूँ, क्यों?'' रामानंद हँस पड़े और बोले, ''हम दोनों दोस्त हैं। साहित्यिक दोस्त। पक्के दोस्त। समझी न?''

शारदा भी हँस पड़ी। इसके बाद रामानंद ने शारदा को फिर चूमा। शारदा शरमा गई। कुछ नहीं बोली। 

थोड़ी देर तक रामानंद शारदा की कविताओं को गौर से देखते रहे फिर उसका हाथ पकड़ कर बोलने लगे- ''मेरे पास अनेक कवियों की कविताएँ हैं। अगली बार आना। निकाल कर रखूँगा। उन्हें पढऩा। तुम्हें प्रेरणा मिलेगी।''

शारदा रामानंदजी की पकड़ से मुक्त होना चाहती थी, लेकिन रामानंद हाथ छोड़ ही नहीं रहे थे। रामानंद शारदा के हाथ को सहलाते, कभी उसकी पीठ पर हाथ फिराते। कभी उसकी जाँघ पर हाथ रखते हुए साहित्य-चर्चा करते रहे। जब वे समझ गए, कि लड़की कुछ-कुछ घबरा रही है, तो अपनी गतिविधियों पर पूर्णविराम लगाते हुए बोले, ''ठीक है, आज की चर्चा यही खत्म। तुम अपनी कविताएँ मेरे पास छोड़ दो। इनको मैं सुधार कर  किसी पत्रिका में भेजूँगा। उसमें छपने से तुम्हारा नाम होगा।''

''अच्छा, सर, मेरी कविताएँ छप जाएँगी न? मैं कवि बन जाऊँगी न?''

''जरूर बनोगी। लेकिन तुमको मेरे पास आना पड़ेगा। गुरु बिन होत न ज्ञान।''

शारदा प्रसन्न हो कर लौट गई। रामानंद जी ने उन कविताओं को ध्यान से पढ़ा और उन्हें डस्टबिन में फेंकने के बाद दो-तीन नई कविताएँ लिखीं और 'कोकिल-स्वर' में भेज दी। पत्रिका का संपादक हँसकुमार रामानंद का पुराना दोस्त था। कविता छप गई। पूरी साहित्यिक बिरादरी में शारदा की चर्चा होने लगी। इतनी कम उम्र में इतनी परिपक्व कविता ..? सब हैरत में थे। लेकिन सभी इस बात से सहमत थे, कि प्रतिभा उम्र, घर, ऊँच-नीच या गरीब-अमीर नहीं देख्रती।

 

दिन बीतते गए। शारदा कॉलेज में पहुँच गई। अब वह अपने मन से कुछ-कुछ शब्द गढऩे लगी। रामानंद जी के पास रखी साहित्यिक पत्रिकाओं को पढ़-पढ़कर उसे कुछ-कुछ ट्रेंड भी समझ में आने लगा था। लेकिन उसकी कविताओं में रामानंद जी द्वारा सुधार का सिलसिला जारी रहा। उन्हीं के सौजन्य से पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ भी छपती रहीं। शारदा की कार अकसर रामानंद शर्मा के घर के बाहर खड़ी दिखती तो लोग समझ जाते कि सेठ गौरीशरण की पुत्री रामानंद से साहित्य के नए पाठ सीख रही है। कुछ मुसकराते, कुछ अपनी कल्पना-शक्ति का सहारा ले कर अनुमान लगाते। लेकिन इससे शारदा को कोई फर्क नहीं पड़ा। क्योंकि उसके मन में कोई ऐसी-वैसी बात भी पैदा नहीं हुई थी। धीरे-धीरे शारदा का नाम युवा कवयित्रियों की सूची में शामिल हो गया। कभी-कभार उसकी चर्चा भी होने लगी। रामानंद जी से शारदा उसका मिलना-जुलना जारी रहा। शारदा की कविताओं में रामानंद इतना सुधार कर देते थे, कि अंतत: कविता रामानंद जी की हो जाती थी, लेकिन रामानंद उदार हो कर कहते थे, ''नहीं, ये कविताएँ तुम्हारी हैं। भूल कर भी किसी से मत कहना कि मैं सुधारता हूँ। लोग तरह-तरह की बातें बनाने लगते हैं। ये आपस की बात है, ध्यान रखना। समझ रही हो न, मैं क्या कह रहा हूं?''

''जी, समझ रही हूँ।'' शारदा ने शरमा कर मुसकराते हुए ज़वाब  दिया। 

 

एक बार दिल्ली में राष्ट्रीय सेमिनार हुआ। रामानंद के कहने पर ही शारदा को भी कविता पाठ के लिए बुलाया गया था। लेकिन एक युवती अकेले कैसे जाए? घर के लोगों को व्यवसाय से फुरसत मिले तब तो । आखिर गौरीशरण ने रामानंद से आग्रह किया। वे बड़ी मुश्किल से राजी हुए। 

गौरीशरण ने धन्य होते हुए बोले- ''आपका यह अहसान मैं कभी नहीं भूलूँगा।''

शारदा सत्रह साल की और रामानंद पैंतालीस साल के। पिता की उम्र के। गौरीशरण बोले- ''यह आपकी बिटिया है। इसे आपके  संरक्षण में भेज रहा हूँ।''

''चिंता न करें, मैं हूँ। ध्यान रखूँगा इसका। अरे, आपकी बेटी है तो ये मेरी भी कुछ है। अब आपने इसे मुझे सौंप दिया है तो इसका ध्यान रखना मेरा फर्ज है। देखिएगा, दिल्ली में ऐसा रंग जमाएगी, कि हर तरफ शारदा-शारदा की ही गूँज सुनाई पड़ेगी।''

रामानंद शर्मा शादीशुदा थे। उनकी एक लड़की थी सुकन्या। वह भी कविताएँ लिखती थी, लेकिन रामानंद उसे फटकारते हुए समझाते थे, "कविता-फविता छोड़ो। मन लगा कर पढ़ाई करो। तभी कहीं नौकरी मिलेगी ! "पति से त्रस्त हो कर पत्नी अकसर मायके चली जाती थी। दरअसल पत्नी ज्ञानवती, पति की दिलफेंक शैली से दु:खी रहती थी। अकसर इस बात को लेकर घर में झगड़ा होता रहता था। ज्ञानवती एक ही बात कहती थी, ''तुम पराई लड़कियों पर बहुत ध्यान देते हो। अपनी लड़की पर तो ध्यान हीं नही देते, कि क्या पढ़-लिख रही है।''

कई बार तो मारपीट की भी नौबत आ जाती थी।

खैर...गौरीशरण को भरोसा दिला कर रामानंद शारदा को दिल्ली ले गए। दोनों एक ही होटल में रुके। वहाँ शारदा का परिचय बेटी के रूप में ही कराया। शारदा कुछ नहीं बोली। मंद-मंद मुसकारती रहीं। साथ रहते-रहते शारदा के मन में रामानंद के प्रति आकर्षण बढऩे लगा था। उनके कारण वह एक कवयित्री के रूप में पहचानी जाने लगी थी। कितने लोगों के पत्र आते हैं। फोन आते हैं। आज इनके कारण ही वह दिल्ली तक पहुँच गई। अगर रामानंद मुझे प्यार करते हैं तो मैं भी इनको चाहती हूँ। बात खत्म। बढ़ती बेल को एक सहारा तो चाहिए। कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। यह बात तो पिता गौरीशरण शुरू में समझा ही चुके थे। 

होटल में रात बिताने के बाद दूसरे दिन का सूर्योदय 'नए रिश्तों' की किरणें बिखेरता हुआ उदित हुआ। शारदा प्रफुल्लित थी। शरमा भी रही थी। रामानंद शर्मा पहले से ज्यादा युवा नज़र आ रहे थे। सुबह-सुबह शारदा ने एक कविता लिखी। उसका शीर्षक था-'पहला प्यार'। कविता पढ़कर रामानंद शर्मा मुसकरा पड़े और बोले-''अब तुम्हारी कविताओं में भोगे हुए यथार्थ के बिंब भी आएंगे। अच्छा है। ''फिर उन्होंने कुछ टिप्स दिये। जैसे पहले कौन-सी कविता पढऩी है और  दूसरी कौन-सी। अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में क्या बोलना है। आदि-आदि। सब कुछ रामानंद शर्मा लिख कर लाए थे। शारदा को उसे कंठस्थ करना था। वह देख कर भी बोल सकती थी। 

कविता-पाठ बेहद सफल रहा। सबसे कम उम्र की कवयित्री के रूप में शारदा ने आकाशवाणी और दूरदर्शन को साक्षात्कार भी दिया। रामानंद शर्मा के मित्र स्वरूपचंद 'दैनिक खबरनामा' में रिपोर्टर थे। उन्होंने शारदा डोरीवाल की तारीफ में इतने कसीदे गढ़े कि होटल पहुँच कर शारदा रामानंद जी से लिपट गई और पैर छू कर बोली- 

''सर, आप के कारण मैं कहाँ से कहाँ पहुँच गई।''

 

शारदा प्रशस्ति-पत्र, स्मृति-चिन्ह लेकर लौटी। अख़बारों की कतरनें भी साथ थीं। 

बेटी की इस उपलब्धि पर घर वाले गदगद् थे। फिर बड़ी पार्टी का बहाना बन गया। पार्टी में रामानंद और उनकी पत्नी ज्ञानवती भी शरीक हुऐ। रामानंद पत्नी को छोड़कर शारदा के इर्द-गिर्द ही मंडराते रहे। शारदा भी रामानंद जी को देख कर मुसकरा रही थी। जिस  तरीके से शारदा मुसकरा रही थी, और बार-बार उनका हाथ पकड़ रही थी, उसे देख कर ज्ञानवती का माथा ठनका। मामला गड़बड़ है। ज्ञानवती के चेहरे पर तनाव था। मगर मुसकराते रहना उनकी मजबूरी थी। जैसे-तैसे पार्टी खत्म हुई । घर पहुँचते साथ ही ज्ञानवती ने फटकारना शुरू किया- 

''अपनी गरिमा बना कर रखो। जिस तरह तुम बेटी की उम्र की लड़की के साथ चिपक रहे थे, उसे देख कर ही समझ में आ गया था, कि दाल में कुछ काला है। मुझे  तो लगता है, कि पूरी दाल ही काली है। बहुत दिन बाद लौटी थी। सोचा था, कि तुम सुधर गए होगे, लेकिन यह मेरी भूल थी। तुम जैसे लंपट तो कभी सुधर ही नहीं सकते। मन करता है कि हमेशा-हमेशा के लिए लौट जाऊँ। मैं यह सब बर्दाश्त नहीं कर सकती। सहने की भी एक सीमा होती है।''

''तुम तो बस, बेमतलब शक करती रहती हो। अरे, वह मेरी बेटी की उम्र की है।''

''यही सुविधा लेकर दोनों तरफ से गलत संबंध फलते-फूलते रहते हैं', ज्ञानवती बोली, 'मुझे मत सिखाओ रिश्तों का गणित। मैंने तुम जैसे अनेक लेखक देखें हैं। क्या इधर और क्या दिल्ली ! छि: ! व्यभिचार के लिए साहित्य की आड़ ली जाती है? और ये लड़कियाँ... आगे बढऩे के लिए तुम्हारे जैसे लोगों का सहारा लेती हैं। आज तुम्हारे साथ लड़िहा रही है, कल किसी और के साथ नजर आएगी। साहित्य की दुनिया में एक-दो छिनालें बड़ी चर्चा में हैं। इनके कारण दूसरी अच्छी लेखिकाएँ, शक की नज़रों  से देखी जाती हैं। लेकिन ध्यान रखना, मैं ठाकुर की बेटी हूँ। मुझे धोखा दिया तो चौराहे पर पीटूँगी ,चप्पल से। जैसे वो कौन-सा सिंह था न, उसे उसकी पत्नी ने युनिवर्सिटी के गेट पर सबके सामने पीटा था। मैं भी लिहाज न करूँगी, हाँ।''

रामानंद जी की बोलती बंद थी। क्या बोलते । चुपचाप सोने चले गए। 

 

000

 

दिन बीतते गए। शारदा और ज्यादा 'बड़ी'...और ज्यादा 'समझदार.'..और ज्यादा 'व्यावहारिक' होती गई। 

एक दिन शारदा की मुलाकात डॉ. विष्णुस्वरूप से हुई। हिंदी-दिवस पर आयोजित काव्य गोष्ठी की वे अध्यक्षता कर रहे थे। विष्णुस्वरूप ,विवेकानंद महाविद्यालय में हिंदी प्राध्यापक थे। शारदा को देख कर हौले से मुसकराए। शारदा ने इसके पहले एक-दो कार्यक्रमों में देखा जरूर था, लेकिन रामानंद शर्मा साथ में थे इसलिए कोई बातचीत नहीं हो सकी थी। 

विष्णुस्वरूप ने अपनी ओर से आगे बढ़ कर बातचीत शुरू की-''तुम..शारदा डोरीवाल हो न? मैंने तुम्हारी कविताएं पढ़ी हैं। अच्छा लिखती हो। कुछ कविताओं पर तो मैंने लम्बा नोट्स भी लिखा है। देखो, साथ ले कर आया हूँ।''

विष्णुस्वरूप ने जेब से एक कागज निकाल कर दिखाया जिस पर शारदा की कविताओं के बारे में कुछ लिखा था। शारदा ने उसे इत्मीनान से पढ़ा ,फिर विष्णुस्वरूप के पैर छू कर मुसकराते हुए बोली- ''आप जैसे पारखी लोगों के कारण ही मैं यहाँ तक पहुँची हूँ, सर।'' 

''लेकिन तुमको अभी और आगे जाना है। मेरी मानो तो पी-एच. डी कर लो। एम.ए.तो तुमने कर ही लिया है शायद।''

''जी मेरे नंबर भी अच्छे हैं। प्रथम श्रेणी के। रामानंद शर्मा जी की कृपा थी। वैसे सर भी बोल रहे थे कि पी-एच.डी कर लो। अब आप मिले हैं तो लगता है मेरी यह तमन्ना भी पूरी हो जाएगी।''

''बिल्कुल। मैं हूँ न। करवा दूँगा। तुम रजिस्ट्रेशन करवा लो। अरे, वो भी मैं सब करा दूँगा। तुम कल मुझसे मिलो।''

''लेकिन सर, पी-एच. डी के लिए तो बहुत लिखना पड़ता है। मैं कुछ-कुछ आलसी किस्म की लड़की हूँ। कैसे होगा काम?''

''तुम उसकी चिंता मत करो। पंजीयन करवा लो। लिखने का काम मुझ पर छोड़ दो। जितना हो सके, तुम लिखना  वरना मैं खुद लिख दूँगा या किसी से लिखवा लूँगा। दरअसल मैं तुम जैसी प्रतिभाओं को देख कर भावुक हो जाता हूँ। लगता है,तुम जैसी लड़कियों को आगे बढऩा चाहिए। हम स्त्री-विमर्श की बातें भर करते हैं। मैं तुम्हारे लिए समय निकाल सकता हूँ। इसके पहले भी मेरे अंडर में अनेक  लोग पी-एच. डी कर चुके हैं।''

''सर, आपने तो मेरी मन की मुराद पूरी कर दी। कल घर आइए। पिताजी से चर्चा करके उन्हें समझा दीजिए। उनको विश्वास में लेना जरूरी है। वे कहेंगे ,तभी मैं आगे बढूँगी।''

''बड़ी सुंदर बात है। अपने पिता से तुम इतना प्यार करती हो। ठीक है, मैं कल आता हूँ। लेकिन शर्त यही है कि तुमको चाय पिलानी होगी। वो भी अपने हाथों की।''

''आप आएँ तो सही।''

विष्णुस्वरूप ने शारदा के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- ''नई कविता में स्त्री-विमर्श: आधुनिकता के विशेष संदर्भ में ' इस विषय पर मैं एक सिनौप्सिस तैयार कर लेता हूँ। दो चार-दिन में रजिस्ट्रेशन की औपचारिकता भी पूरी कर लेंगे। कोई दिक्कत नहीं आएगी। सब अपने लोग हैं। तो ठीक है, कल आता हूँ।''

शारदा घर पहुँची और पिताजी को विष्णुस्वरूप से हुई बातचीत का जिक्र कर दिया। गौरीशरण तो प्रसन्न हो गए, वाह, मेरी बेटी अब डॉक्टर भी बन जाएगी? डॉ. शारदा डेरीवाल। अच्छी खबर सुनाई तुमने। कल विष्णुस्वरूप को हम कुछ पैसे एडवांस में दे देंगे। पीएच- डी करना आसान नहीं। और तुम से ये सब हो नहीं पाएगा। बेचारे प्रोफेसर साहब किसी न किसी से लिखवाएँगे ही। उसके लिए पैसे खर्च करने पड़ेंगे । मैंने सुना है, कुछ लोगों ने इसे धंधा बना लिया है।''

''वहीं मैं सोच रही थी', शारदा बोली, 'लेकिन पता नहीं, कितना खर्चा होगा? आप तो सीधे तीस हजार का चेक काट देना।''

शारदा अपने कमरे में चली गई। अचानक उसे रामानंद शर्मा की याद आई। उसने नंबर मिलाया। वह लैंडलाइन का युग था। फोन रामानंद की पत्नी ज्ञानवती ने उठाया। 

''सर हैं?''

''आप कौन..?''

''मैं शारदा...।''

''ओह तो तुम...? रईसजादी...?' वहाँ से ज्ञानवती का तल्ख स्वर गूँजा, 'तुम्हारे हुस्न के पीछे ये बुढ़ऊ बर्बाद हो गए हैं। तुम जैसी लड़कियों के कारण दूसरी औरतें बदनाम होती हैं। कितनी बार बिस्तर गर्म कर चुकी हो?''

''क...क....क्या बक रही हैं आप? मैं....मैं तो उनकी बेटी के समान हूँ।''

''अच्छा, बेटी के समान हो...?' ज्ञानवती के स्वर में और कठोरता आ गई थी, 'मैं बताऊँ बाप-बेटी की हरकतें? दिल्ली साथ-साथ जाना, एक कमरे में रहना, हाथ में हाथ धर कर घूमना। सगी बेटी भी अपने बाप से इतना नहीं चिपकती ,जितना तुम चिपकती हो। उस दिन पार्टी में भी तुम यही कर रही थी। खबरदार जो दुबारा फोन किया तो। घर आ कर चप्पलों से आरती उतारूँगी तेरी। समझ गई ना?''

इतना बोल कर ज्ञानवती ने रिसीवर पटक दिया। शारदा घबरा गई। उसे डर तो था, कि जिस तेजी के साथ रामानंद शर्मा के निकट आई और फिर साथ-साथ घूमना-फिरना हो रहा है, उसे देख कर कोई भी बातें बना सकता है। कहानियाँ गढ़ सकता है। शारदा सोचने लगी, समाज अभी बहुत अधिक प्रोग्रेसिव नहीं हो सका है। जैसे पश्चिम हुआ है। भारतीय समाज ,अभी भी स्त्री-पुरुष के साथ संबंधों को सेक्स के साथ ही जोड़ कर क्यों देखता है। क्या स्त्री-पुरुष अच्छे दोस्त नहीं हो सकते? इतना सोचने के बाद शारदा मुसकरा पड़ी। हकीकत तो यही थी, कि उसने न जाने कितनी बार रामानंद शर्मा के साथ प्यार-मोहब्बत वाला फिल्मी खेल खेला था। दिल्ली में तो अति हो गई थी। लेकिन सच पूछा जाए तो यह सब देखा किसने? बस, लोग अनुमान लगाते रहते हैं। जो भी हो, अब तो आगे ही बढऩा है। अगर रामानंद शर्मा से इतनी अंतरंग न होती तो क्या वे मेरे लिए इतना कुछ करते, जितना कर रहे हैं। ये तो 'गिव्ह एंड टेक' का दौर है। लेकिन ज्ञानवती की बातें सुन कर शारदा ने मन बना लिया कि अब रामानंद जी से दूरी बनाने का समय आ गया है। मामले ने तूल पकड़ लिया तो कभी भी कोई सीन क्रिएट हो जाएगा। बेहतर है, कि किनारा ही कर लिया जाए। अब विष्णुस्वरूप हैं, इनके सहारे डॉक्टर तो बन ही जाऊँगी। 

शारदा अब धीरे-धीरे आत्मनिर्भर भी होती जा रही थी। 'कोकिला स्वर', 'साहित्य दर्पण', 'कवितायुग', 'नवार्थ', और 'साहित्ययुग' जैसी कुछ चर्चित पत्रिकाओं में शारदा की कविताएँ और कहानियाँ छपने लगी थी। समय-समय पर इन पत्रिकाओं को वह अपनी कंपनी 'गौरी एंड संस' का विज्ञापन भी भिजवाया करती थी। लोग उसे काव्य-कहानी-पाठ के लिए इधर-उधर आमंत्रित भी करने लगे थे। 

शारदा घर पर बैठे-बैठे अखबार पलट रही थी, कि तभी फोन बजा। 

''हैलो, कौन? मैं बोल रहा हूँ...रामानंद शर्मा....बहुत दिन से तुम घर नहीं आई, क्या बात है?''

''बस, ऐसे ही। अरे सर, एक खुशी की बात है। मैं पी-एच. डी कर रही हूँ।''

वाह, खुशी की बात है। तुम आना मेरे पास। विषय तय कर लेंगे। अगले साल मैं भी गाइड बन जाऊँगा।''

मुझे गाइड मिल गया है।' शारदा बोली," विष्णुस्वरूपजी । उन्होंने कहा है कि वे पूरा मार्गदर्शन करेंगे।''

''विष्णुस्वरूप...?'' रामानंदजी का मुँह कड़वा हो गया, 'अरे, उसे कुछ नहीं आता। फेंकने में माहिर है। वह केवल वसूली-मास्टर है। बेगारी कराता है। शोषण करता है। तुम एक साल रुक जाओ। सारा काम मैं कर दूँगा।''

''नहीं सर, मैं अब नहीं रुक सकती। मुझे जल्द से जल्द डॉक्टर बनाना है।''

''मतलब तुम मेरा कहना नहीं मानोगी।''

''अब आप एक साल रोकेंगे ,तो कैसे रुकूँगी।''

''ये मेरा आदेश है कि तुम विष्णस्वरूप के अंडर में पी-एच. डी नहीं करोगी ,तो नहीं करोगी।''

''सॉरी सर, यह संभव नहीं।'' इतना बोल कर शारदा ने फोन काट दिया। 

फोन क्या कटा, रामानंद भी कट गए। वे समझ गए कि शारदा को अब मेरी ज़रूरत नहीं ,क्योंकि अब उसे दूसरी सीढ़ी जो मिल गई थी।

 

000

 

शारदा डोरीवाल की कार अब विष्णस्वरूप के घर के बाहर खड़ी नज़र  आने लगी। 

शोधकार्य हेतु शारदा का पंजीयन हो गया था। विष्णुस्वरूप पूरे मनोयोग से रात-दिन एक करके शोधकार्य में भिड़ गए थे। बीच-बीच में शारदा भी कुछ टिप्स दे दिया करती थी। इस बीच विष्णुस्वरूप और शारदा अंतरंग पलों को भी जीते रहे। विष्णुस्वरूप भागते रहे और शारदा जीती रही। दो साल कब निकल गए पता ही न चला। शारदा को पी-एच. डी की उपाधि भी प्रदान कर दी गई। 

शारदा को विष्णुस्वरूप के निकट आना शुरू -शुरू में तो अजीब-सा लगा। ये तो रामानंद शर्मा से धोखा है। लेकिन रामानंद भी क्या कर रहे थे। जीवन भर अपनी पत्नी को धोखा देते रहे। धोखे की बुनियाद पर ही तो अब संबंधों के महले खड़े हैं । कौन किसको कितनी चालाकी से धोखा देता है, यह उसकी प्रतिभा पर निर्भर है। मौका मिले तो धोखा दे दो। ज्यादा भावुक होने की ज़रूरत नहीं। शारदा के नये चेहरे ने ,पुराने चेहरे को बिना किसी अतिरिक्त हिचक के अपदस्थ कर दिया था। 

शारदा को डॉक्टरेट मिलने की खुशी में डोरीवाल परिवार की ओर से इस बार ,सितारा होटल कैक्टस में डिनर दिया गया । डांस-डीजे, कॉकटेल.. यानी फुल एंन्जाय ! शहर का कोई साहित्यकार पार्टी में नज़र र नहीं आया। बस एक नया चेहरा था और वो था विष्णुस्वरूप का।

बाद में शारदा का शोधकार्य पुस्तक रूप में भी छप कर आ गया। प्रज्ञान प्रकाशन ने पचास हजार रुपए लेकर पुस्तक छाप दी। शानदार विमोचन भी हुआ। विमोचन में जाने-माने आलोचक महेश्वरप्रसाद चतुर्वेदी, 'कोकिलस्वर'  के संपादक कामेश्वरसिंह विशेष तौर पर बुलाए गए थे। स्थानीय अखबार के संपादक भी विशेष अतिथि थे। खबरे  छपवाने के लिए कई बार ऐसे रचनात्मक हथकंडे जरूरी होते हैं। यह ज्ञान शारदा को विष्णुस्वरूप ने ही दिया था। कार्यक्रम का संचालन विष्णुस्वरूप ने किया। 

अपनी लच्छेदार भाषा के लिए पहचाने जाने वाले आलोचक महेश्वरप्रसाद चतुर्वेदी ने शारदा की मेहनत की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा-''इधर के स्त्री-विमर्शों में ,बिल्कुल ताजा और धमाकेदार उपस्थिति दर्ज करके शारदा ने अपनी प्रतिभा का एक तरह से विस्फोटक परिचय दिया है। दैहिक वर्जनाओं से ऊपर उठकर स्त्री अब अपनी अस्मिता के लिए ,अपने आकाश के लिए संघर्ष कर रही है। स्त्री को नैतिकता का पाठ पढ़ा कर उसे मध्ययुगीन मानसिकता में जीने पर मजबूर करने वाले समाज में ,अब इधर का स्त्री-लेखन एक तरह से प्रतिरोधी आवाज के रूप में उभरा है। शारदा जैसी लेखिकाओं ने स्त्री-छवि को एक नई अर्थवत्ता प्रदान की है। अब जरूरी हो गया है कि स्त्री बगावत करे। परम्परा से, गर्हित-से लगने वाले मूल्यों से।'

चतुर्वेदी जी का भाषण गौरीशरण जी के कुछ खास समझ में नहीं आया मगर वे इतना तो समझ गये कि उनकी बिटिया की तारीफ हो रही है। जहाँ सब लोग तालियाँ बजाते थे, वहाँ गौरीशरण भी बजा देते थे। उनके लिए यह दिन व्यक्तिगत उपलब्धि से कम नहीं था। उनके परिवार के एक सदस्य ने कितना नाम रौशन किया है !

शारदा ने भी अपने लिखित विचार व्यक्त किए। पिता गौरीशरण और विष्णुस्वरूप की उसने जम कर तारीफ की। कार्यक्रम में रामानंद शर्मा भी पीछे की पंक्ति में बैठे हुए थे। कार्यक्रम के बाद शारदा उनसे मिली तो सकुचाते हुए कहा, ''सॉरी सर, मैं आपका नाम लेना भूल गई है। लेकिन मैं जानती हूँ, कि मुझे आगे बढ़ाने में आपने कितनी मेहनत की है।''

रामानंद  ने बुझी मुसकान के साथ कहा- 'अरे, कोई बात नहीं। हो जाता है कभी-कभी।'' तभी शारदा की नजर रामानंद के ठीक पीछे खड़ी एक युवती पर पड़ी। रामानंद ने परिचय कराते हुए कहा, ''इससे मिलो, ये है विनीता। तुम्हारी ही तरह प्रतिभाशाली है। कविताएँ लिखती है।''

शारदा ने विनीता का मुसकराते हुए अभिवादन किया और आगे बढ़ गई। 

वक्ता हवाईजहाज से आए थे। उन्हें स्टार होटल में ठहराया गया था। लौटते वक्त सबको आकर्षक गिफ्ट भी दिए गए। कीमती शॉल एवं आकर्षक स्मृति चिन्ह तो पहले ही प्रदान किए जा चुके थे । बाद में होटल पहुँच कर गौरीशरण ने वक्ताओं को एक-एक लिफाफा सौंपते हुए कहा-मेरी यह तुच्छ भेंट स्वीकार करें। 

हर लिफाफे में दस-दस हजार रुपए रखे गए थे। 

 

शारदा और विष्णुस्वरूप की जोड़ी मशहूर हो चुकी थी। दोनों ने अनेक सेमिनार और साहित्यिक सम्मेलनों में भाग लिया। कभी-कभार शारदा अपनी विधवा सहेली सुनीता को भी साथ ले जाया करती थी। इससे घर वाले निश्चिंत हो जाते थे कि लड़की अकेली नहीं है। सुनीता में साहित्यिक प्रतिभा भी खूब थी। सुनीता किसी निजी स्कूल में टीचर थी। शारदा सुनीता को कुछ विचार-बिंदु दे दिया करती थी , और सुनीता इन्हें कभी कहानी तो कभी कविता में ढाल दिया करती थीं। रचना शारदा की हो जाती थी। शारदा सुनीता को हर महीने  पाँच हजार रुपए की मदद करती थी। शारदा के पास पैसे की कोई कमी थी नहीं। अकेली जान। काम-काज करने वाले नौकर-चाकर। मस्त हो कर साहित्य की दुनिया में खोई हुई थी। फिर सुनीता जैसी सहेली मिल गई। सुनीता की ऐसी कोई चाहत भी नहीं थी, कि वह कोई बड़ी लेखिका बने। बस, उसे इसी बात का संतोष था कि शारदा जैसी सहेली के वह काम आ रही है। उसका समय भी कट रहा है। सुनीता की रचनाओं में बाकी सुधार विष्णुस्वरूप कर दिया करते थे। 

समय बीतता गया। शारदा की मेहनत रंग लाती गई। 

एक दिन शारदा को स्थानीय अखबार में एक शासकीय विज्ञापन नजर आया। लेखक की पहली कृति के लिए पचास हजार का सम्मान दिया जा रहा था। शारदा ने अपने पिता को विज्ञापन दिखाया। 

गौरीशरण बोले- ''अरे, ये पुरस्कार तो सरकारी है। मंत्रीजी अपने खास है। बात करके देखता हूँ। मिल जाए तो ठीक। प्रयास करके देखता हूँ। मनुष्य को ईमानदारी से कोशिश करनी चाहिए। बाकी हरि इच्छा। आज ही मिलता हूँ मंत्रीसे। कितनी बार तो उसे चंदा दिया है।''

गौरीशरण मंत्री से मिले। शारदा भी साथ गई। मंत्रीजी शारदा की देहभाषा पढ़ते रहे। गहराई और गोलाइयों का अनुमान लगाते रहे। आखिर वही हुआ। 

दो महीने बाद सम्मान डॉ. शारदा डोरीवाल की झोली में था। 

 

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शारदा उपलब्धियों की सीढिय़ाँ चढ़ती जा रही थी। अब वह मोबाइल-युग में प्रवेश कर चुकी थी। हाइटेक हो चुकी थी। देश के कोने-कोने में उसके चाहने वाले थे। कभी किसी पत्रिका के संपादक का मोबाइल आता तो कभी किसी साहित्यिक संस्था का बुलावा। उसकी साहित्यिक यात्राएँ चलती रहती। अब तो विष्णुस्वरूप की भी कोई खास जरूरत नहीं थी। वह अपनी सहेली सुनीता के साथ इधर-उधर चली जाती। फिर परदेस में कोई न कोई ऐसा अनुकूल आत्मीय-सा लगने वाला मिल ही जाता था, जिसके साथ पल दो पल प्रेम के गुजारे जा सकते थे। सुनीता शारदा की भावनाओं को समझ कर उसका पूरा साथ दिया करती थी। कहाँ साथ रहना है, कहाँ शारदा को अकेले छोडऩा है, उसे समझ में आ गया था।

 

एक दिन फिर एक मोड़ आया। शारदा के जीवन में फिर एक चेहरे ने प्रवेश किया। 

यह था रीतेशकुमार। 

रीतेश की अँगरेज़ी अच्छी थी। एक दिन किसी समारोह में रीतेश से मुलाकात हुई थी। रीतेश ने मिलते ही कहा था, आपकी कविताओं से मैं बहुत प्रभावित हूँ। इनका मैं अँगरेज़ी  में अनुवाद करना चाहता हूँ। अगर आप इज़ाज़त दें तो।''

''ये तो खुशी की बात है। मेरी रचनाएँ आपको इस लायक लग रही हैं तो खुशी से कीजिए। कब मिलूँ आपसे?''

''जब भी मन हो आपका। मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा...आपके लिए।'' रीतेश ने दिलफेंक मुसकान के साथ उत्तर दिया और शारदा का हाथ दबाते हुए कहा, ''मैं कल आपका इंतजार करूँगा।''

दूसरे दिन शारदा की कार रीतेश के घर के बाहर खड़ी थी। 

फिर तो यह रोज़ का क्रम बन गया। अनुवाद के लिए साथ-साथ बैठना भी जरूरी है ,और जब सुनीता साथ है तो घर वाले भी निश्चिंत।

देखते ही देखते अनुवाद कार्य पूरा हो गया। कुछ महीने बाद शारदा की लिखी अँगरेजी की कविताओं का संग्रह ''स्वीट मेमोरीज़  एंड अदर पोयम्स' प्रकाशित हो गया। तब लोगों को पहली बार पता चला  कि शारदा अँगेरजी कविताएँ भी लिखती है। रीतेश के प्रयासों से शारदा को 'फ्रंकलिन पुरस्कार' भी मिल गया। पुरस्कार लेने के लिए शारदा अपनी सहेली सुनीता के साथ पहली बार विदेश यात्रा के लिए निकल रही थी। पूरा परिवार उसे छोडऩे एयरपोर्ट पर था। सबके चेहरे पर खुशी थी। पिता गौरीशरण की आँखें बार-बार छलक रही थीं। लेकिन इधर शारदा कुछ-कुछ परेशान नज़र  आ रही थी। फ्लाइट का समय हो रहा था....मगर रीतेश अब तक नहीं पहुँचा। उसका मोबाइल भी नहीं लग रहा। पता नहीं क्या बात है। तभी रीतेश का चेहरा नज़र आया तो शारदा की जान में जान आई। रीतेश भी साथ में जा रहा था। शारदा का अँगरेज़ी -भाषण रीतेश ने ही तैयार किया था।  शारदा को कामचलाऊ अँगेरजी तो आती थी लेकिन इतनी नहीं कि धाराप्रवाह साहित्यिक भाषण दे सके। 

रीतेश को देख कर शारदा ने खुश हो कर हाथ लहराया। तभी शारदा का मोबाइल बजा। उसने देखा स्क्रीन पर विष्णुस्वरूप का नाम था। शारदा ने फौरन काट दिया और तेजी के साथ रीतेश की ओर बढ़ गई।

 


    

 

 

एक संपन्न स्त्री अपनी उपलब्धियों के लिए पुरुषो को सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल करके आगे बढ़ती है

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