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उम्मीद का कागज़
उम्मीद का कागज़
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© Neeraj Kumar

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      तीन आने का एक दर्जन मिलता था, अब देखो चालीस में  भी देने को तैयार नहीं है, पचास रुपये एक दर्जन केले  का  माँ गता है । एक  बित्ता का केला आता था,  इनका देखो अँगूठे भर का केला और मनमाने दाम, सरासर लूट है, दिन दहाड़े डकैती है ये तो।  शकुंतला देवी भुनभुनाती हुई फलवाले पर अपनी खीज उतार रही थी । 75 से 80 वर्ष की उम्र होगी बुढ़िया शकुंतला देवी की । हड्डियों का ढाँचा, झुकी हुई कमर, हाँ चेहरे पर अभी भी बुर्राक गोरापन, एक तेज़ । जब कमर सीधी कर किसी से नज़रे मिलाकर बात करती तो सामने वाला एक बारगी श्रद्धानवत हो जाता।  मोहल्ले वाले ज़्यादातर उसके सामने आने से बचते फिरते थे। कहते बुढ़िया अपने बच्चों के बारे मे डींगे हाँका करती है । अगर गलती से कोई सामने पड़ गया तो अपने बेटों एवं बहुओं के बारे मे वही घिसी पिटी बातें बताने लगती कि उसका एक बेटा बंगलोर मे बड़ा इंजीनियर है और दूसरा दिल्ली मे डॉक्टर तथा बेटी अमेरिका में रहती  है। मोहल्ले  वाले उसकी इस बात से ऊब जाते थे, बुढ़िया के पास बात करने के लिए कुछ और होता नहीं था और मोहल्ले  वाले यह सब सुनना नहीं चाहते थे पर यह सब बताते हुए शकुंतला देवी गर्व से भर जाती थी एवं लाठी के सहारे कमर को सीधी करती हुई जब तन कर खड़ी होती तो उसके झुर्रियों भरे मुख पर चमक देखने लायक होती थी। शकुंतला देवी कहती मोहल्ले  वाले तो सब उससे जलते हैं, उन्हे उनके बच्चों के उच्चे हैसियत की कद्र ही नहीं।

      बाहर लोगों को पकड़ पकड़ कर अपने बच्चों के बारे मे बताने वाली शकुंतला देवी जब घर पहुचती तो ख़ुद को जंग लगे टिन के खाली डिब्बे सा महसूस करती। । 1200 रुपऐ मासिक पारिवारिक पेंशन से उसका जीवन यापन मुश्किल से ही हो पता था । ऊपर से इस उम्र मे रोग बीमारी तो लगी ही रहती है। लेकिन अपने इस दुख को शकुंतला देवी कभी बाहर वालों पर ज़ाहिर नहीं होने देती । ख़ुद  तो चले गए,  मुझे इन दीवारों के साथ अकेला छोड़ दिया, आहें भर्ती हुई शकुंतला देवी जब ख़ुद  ही ख़ुद से यह कहती तो उसकी आँखें डबडबा जाती । वैसे अच्छा हुआ जो यह घर बना दिया था, कम से कम ये दीवारें तो हैं उसके सुख दुख के  साथी । लेकिन, घर हो या शरीर समय के साथ क्षय होना तो निश्चित ही है। ऊपर से वर्षों से घर की न रंगाई पुताई हुई थी और न ही मरम्मत। घर भी शकुंतला देवी के देह की तरह किसी भी वक़्त ढहने के लिए तैयार था । बाहर अपने बच्चों के बारे मे हुलस हुलस कर बोलने वाली बुढ़िया अंदर से कितना खोखला और एकाकी महसूस करती थी। जिन बच्चों को बड़े अरमान से पढ़ाया लिखाया, अच्छी परवरिश दी, वर्षों से वे उसे देखने भी नहीं आऐ थे। जब उसके पति की मौत हुई तब छोटा बेटा आया था, वो भी दाह कर्म के चौथे दिन और दशकर्म के पूर्व ही यह कहते हुए चला गया कि इन फालतू के विधि विधानों के लिऐ अब समय किसके पास है। बड़ा बेटा और बेटी तो तब भी नहीं आऐ थे। बड़ी मुश्किल से शकुंतला देवी ने दूर के एक गरीब रिश्तेदार के बेटे को हाथ पैर जोड़ कर उसी से श्राद्ध कर्म का विधि विधान कराया था । 

      फिर भी बूढ़े मन को आशा थी कि उसके बच्चे एक दिन जरूर आऐंगे। वह रोज़ ही उनका इंतेज़ार करती ।

      मोहल्ले  मे अत्यधिक दुर्गंध के कारण,  जिस दिन पड़ोसियों के कहने पर पुलिस ने घर का दरवाजा तोड़वाया तो लाश के हाथ में एक कागज देखकर सब चौक गऐ । शकुंतला देवी ने उस कागज़ मे एक-एक दिन का हिसाब रखा था कि उसका कौन सा बच्चा कब आया था। उसकी लाश को नगर निगम की लावारिस लाश ढोने वाली गाड़ी ले गई।

 

 

 

बुढ़ापा उम्मीद

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