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चालीस रुपये
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© Vasudev Shree Krishna

Drama

2 Minutes   1.8K    33


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बैठा हूँ चौराहे पर, एक करीब 40 वर्ष पुरानी ईमारत में बनी चाय की होटल पर | आते जाते लोगो के चेहरों को पढने की कोशिश में | हर चेहरा अपनी अलग कहानी कह रहा हैं | नजरो के सामने मेरा लैपटॉप हैं और उसमे -खुली एम एस वर्ड की खाली फाइल, जिसमे मैं टाइप कर रहा हूँ | एक करीब 7-8 साल का बच्चा हाथो अपने नाजुक से हाथो में जिनमे खिलोने होने चाहिए, एक केतली में देवता की मूर्ति ले कर चला जा रहा हैं जा रहा हैं | इस केतली में थोडा सा तेल हैं और तेल में गिरे कुछ सिक्के | वो हर दुकान पर जाकर “जय शनि देव” बोलता हैं | कोई उसे फटकार देता हैं, कोई एक सिक्का डाल देता हैं | इस चाय की होटल के मालिक के पास होता हुआ अब वो मेरी और बढा चला आ रहा हैं | उसने एक कारी लगी पैन्ट पहनी हैं, जिसमें बेल्ट लगाने वाले लगभग सभी नाके टूटे हुए हैं | उसने एक गंदली सी शर्ट पहनी हैं जिसकी कॉलर नहीं हैं | लेकिन वो नहा कर आया हैं | बाल अस्त व्यस्त से हैं | शायद कई दिनों से उसने अपने बालो में तेल नहीं लगाया हैं | वो मेरे पास टेबल पर आकर बैठ गया हैं | अपनी केतली में से सिक्के निकाल रहा हैं, और अपने काँधे पर पड़े रद्दी से कपडे से उन्हें पोछ रहा हैं | सब सिक्को को पोंछ लेने के बाद वो दबी सी आवाज में इन्हें गिन रहा हैं ; एक, दो, तीन, चार, पांच... मैं उससे कुछ बात करना चाहता हूँ पर उसके सिक्के गिन लेने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ | उसने पेसे दो-तीन बार गिने हैं | कुल मिला कर 43 रूपए उसने इकट्ठे किए हैं | अब वो अपनी केतली को वहीँ टेबल पर छोड़ कर और सिक्को को अपनी जेब में डाल कर बाहर चला गया हैं | वो वापस आता हुआ दिखाई दे रहा हैं | उसके एक हाथ में चाय का गिलास और एक में बिस्कुट का पैकेट हैं | वो फिर मेरे पास आकर बैठ गया हैं | चाय में डुबो डुबो कर बिस्कुट खा रहा हैं | अब मैं उससे बात करने वाला हूँ |

Beggar Child Poverty

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