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सावित्री
सावित्री
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© Asha Pandey 'Taslim'

Tragedy

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मायके जाने की ख़ुशी में उस रोज़ समय से दो घण्टे पहले ही मैं हावड़ा स्टेशन पहुंच गयी। घड़ी में अभी सिर्फ़३ बजे थे जबकि ट्रेन५ बजे की थी। एक पल को खीज भी हुई अपने उपर और हँसी भी आई कि २० साल बाद भी मायके की पुकार इतनी भाती है हमारी अंतरात्मा को कि हम औरतें दौड़ पड़ती हैं बिना घडी़ देखे ही।बचपन और मायेके की गलियों को याद करते हुए,अपने आस-पास नज़र घुमाने लगी। चेहरे पे हल्की सी मुस्कान कब आ गई थी पता ही नहीं चला।

मेरे आसपास कुछ और सहयात्री भी विचर थे,तभी मेरी नज़र बीच प्लेटफॉर्म पे बैठे६ भिखारी बच्चों पे पड़ी जो किसी चीज़ के बटवारे को लेकर आपस में उलझ रहे थे।मेरी नज़र भी उन्हीं के उलझनों में उलझ के रह गई।तभी उनमें जो सब से बड़ी थी उसकी नज़र मेरी नज़र से टकराई मेरी मुस्कान का ज़वाब एक मासूम सी मुस्कान से उसने दिया और फिर खड़ी हो गई।

उसे ध्यान से देखा मैंने वो बच्ची नहीं एक मुक्कमल औरत थी हां उसकी लम्बाई शायद ३ फिट ही होगी।छोटे-छोटे बेतरतीब कटे रूखे उलझे बाल।मटमैले भुरे उसके रूखे-सूखे बालों को टक्कर देता उसका कुर्ता-शलवार जो लाल से काला हो चुके दुप्पटे से गडमड।वो ऐसी दिख ही रही थी कि उसे देख कर घिन आने लगे।

मेरे पास खड़ी एक औरत ने कहा "अरे बौनी है ये तो" और एक अजीब सी हँसी सब के चेहरे पर तैर सी गयी।

वो बौनी सी औरत हम सबके सामने आकर खड़ी हो गई और अपने छोटी सी हथेली को फ़ैलाते हुए कहा "दे ना माई कुछो खाये को" हम और हमारा लड़का लोग भूखे हैं। मैंने अब उस झुण्ड को दुबारा देख १२ साल से लेकर २ साल तक के ५ बच्चे थे।'ई सब तेरा बच्चा है? मैंने पुछा।

उसने मुस्कुरा कर कहा 'हाँ माई सब मेरा ही है" उ बड़का चौदह साल का लगता नहीं न, बीमार है।साला नशेड़ी जो होग़ीस है ।मैं२० ने रूपये का उसे नोट दिया तो उसने छ्ह जनो की दुहाई देते हुए कुछ और पैसे मांगे।मेरे पास खड़ी बंगाली महिला ने उसे अब हिक़ारत से देखते हुए ज़ोर से कहा- खाली जन्मों देना जानता तुमलोग तब नहीं सोचता कि कैसे खिलायेगा एतना लोग को,अरे बोलो उसके बाप को काम करे,बच्चा लोग को आदमी बनाओ,कैसा माँ बोलता १४ साल का लड़का नशा करता? उस भिखारीन ने उस औरत को देखा और कहा।नहीं है उसका बाप।मैं अबतक चुप सुन रही थी कह बैठी,अरे तो जो अब तेरा मरद उसको बोल।शादी तो की है न रहती किसके साथ ?उसने कहा 'कुछो पैसे दो पहले बच्चा लोग को देदें तब बताते हैं।एक १० का नोट मैंने और उसे पकड़ाया।बच्चों को पैसे देने के बाद उसने हमसब औरतों को देखा और कहा 'हमको कुछ नहीं पता।न तो अपने बाप का और न ही इन पांचों बच्चों के बाप का।जाने हमको यहीं कोई जनम दिहिस या कि फेंक गया।हमसब ने उसे आश्रय और दुःख के साथ देखा,हमे नहीं पता था कि अब वो जो आगे कहने जा रही है वो हमारे समाज़ को किस कदर नंगा खडा़ कर देगा।

उसने अपने छोटे-छोटे हाथ से अपने बड़े बेटे को दिखाते हुए कहा 'उसका उमर का रहे होंगे माई जब हम तो उका जनम दिये रहे ,हमको तो इ भी नहीं पता था कि रात को मेरे साथ रोज़ कोई,भर पेट खाना खिला कर और दारु पिला कर जो करता है, उ का करता है।उससे मिला या किस किससे मिला इ बोझ पता नहीं अब पेट जाने कि साला कौन हमरी भूख मिटाया या अपनी। पेट ने ही पेट दिया है माई।मैं किस भूख को याद रखती और कैसे।बाक़ी जना भी भूख से भूख का बदला आया।

हम सारी औरतें अपने इस कथित भद्र समाज़ के महान कृत्य पे नज़रें झुकाये सब सुन रही थीं।भिखारिन बोली 'एके बात अच्छा किया ऊपर वाला उसको भी सरम आया होगा न माई तबे बेटी न दिया हमको न तो उसको भी नोच के खाता न ई सब'।उसके मुँह से आते दारु के भभके और सर पे जमे धूल मिट्टी ने उबकाई की हद तक हमें घिन से भर दिया था।कैसे होते हैं वे लोग जिन्हें खुद को मर्द कहते गर्व होता होगा? हरकते ऐसी? बहरुपिये हाँ हाँ बहरुपिये।या सियार जैसा ही।मरे का शिकार करते सियार की तरह।एक मजबूर अनाथ बच्ची को पेट भर खाना खिलाने के एवज में ? छी छी छी

तभी पेलटफॉर्म नम्बर १३ पे लोकल ट्रेन आई और वो भिखारिन भी चलने को हुई कि मैंने अचानक पूछ लिया।तेरा नाम क्या है ?

उसने मुड़ कर अपनी दो छोटी छोटी आँखें मेरे चेहरे पे गड़ाई ,जाते जाते ही तमतमा कर कहा 'सावित्री'....

समाज़ मायका बच्चे क्रूरता भूख

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