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प्रेम-कहानी
प्रेम-कहानी
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© महिमा (श्रीवास्तव) वर्मा

Romance Tragedy

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कल्चरल फेस्ट की कामयाबी के बाद आज कॉलेज के चुनींदा साथी पिकनिक के लिए सपरिवार आये हुए थे। बेहद खूबसूरत था ये पिकनिक स्पॉट, हरे भरे वृक्षों की छाँव सुखद सुहानी लग रही थी, पेड़ों की घनी छाँव में सबने पड़ाव डाल लिया था, थोड़ी ही दूर पर वृक्षों के पीछे एक पतली सी नदी थी जो यहाँ से नहीं दिखती थी , पर वृक्षों सघन पहरे के बीच इठलाती –बलखाती वो सतत कलकल करती बह रही थी। उसके किनारे पर बिखरी पड़ी चट्टानें प्रेमियों के बैठने और प्रेमालाप के लिए सबसे उपयुक्त थीं और शायद प्रेमी युगलों की प्यार भरी, रस भरी बातें सुन-सुन कर ही वो इतनी चिकनी हो गई थी।

मानसी को बेहद खुशनुमा और रूमानी लग रहा था ये समां , ऐसे में गूँज रही थी एक मधुर प्रेम गीत गाती अचला मेम की मीठी स्वर लहरी। इस वक़्त वो साक्षात् प्राचीन कहानियों की स्वर्ग से उतरी अप्सरा सी लग रहीं थी, जो किसी तपस्वी का तप भंग करने धरा पर उतर आई थी. अचला मेम बहुत खुश हैं ये उनके स्वर झलक रहा था, मानसी बहुत खुश थी उनके लिए।

उन के ख़ुशी की आभा दमकते ,प्यार के रस से भीगे चेहरे को देख मानसी यादों में खो गई।

इस कॉलेज में हुई अपनी नियुक्ति का पत्र लेकर वो प्रिंसिपल से मिली तो ज्वाइन करने की औपचारिकताओं के साथ ही प्रिंसिपल ने एक वरिष्ठ प्राध्यापिका को बुला कर उनके साथ उसे भेज दिया ताकि वो सभी साथी प्राध्यापकों से परिचित हो जाये। वो प्राध्यापिका स्टाफ़ रूम तक उसे लेकर आईं और सबसे परिचय करवा ही रहीं थी कि एक मीठी स्वर लहरी गूँज उठी. अनायास ही वो इस आवाज़ की मालकिन से मिलने को बैचेन हो उठी ..उसने पूछ ही लिया कौन हैं जो इतना सुरीला गा रही हैं ? प्राध्यापिका उसे संगीत कक्ष में लेआई।

“ ये हैं अचला मेम , हमारे यहाँ की संगीत की शिक्षक. “

इतनी मीठी स्वर लहरी सुन वो जितनी प्रफुल्लित हुई थी अचला मेम के अस्त-व्यस्त , बिखरे से व्यक्तित्व को देख उसे उतनी ही मायूसी हुई।

वैसे वो बेहद खूबसूरत थी। उनकी कमर तक आते लम्बे घने बाल और गोरा मगर रूखा सा चेहरा देख कर उसे लगता कि अगर हलके मेकअप के साथ व्यवस्थित तरीके से साड़ी पहने तो वो कितनी अच्छी लगेगीं।

संगीत का मानसी को बेहद शौक था ,खुद भी काफी अच्छा गा लेती थी हालाँकि वो सीख तो नहीं पाई थी. इसलिए यहाँ जितना संगीत वो सीख सके या कम से कम संगीत के साथ रह सके ये चाह उसे अचला मेम के नज़दीक लानेलगी।

फिर धीरे -धीरे पता चला कि अचला मेम अभी तक कुँवारी हैं, दो बड़ी बहनों की शादी कर चुकी है। एक छोटी बहन और सबसे छोटा एक भाई भी है जिनकी जिम्मेदारियां उन्हें पूरी करनी है। वो केवल संगीत सिखाते या गाते हुए कुछ कहतीं. सबके बीच अक्सर चुपचाप अनमयस्क- सी बैठी रहती उनका बिखरा हुआ व्यक्तित्व और सबके प्रति निस्पृहता उन्हें मूडी , घमंडी , खडूस आदि की उपाधियों से नवाज़ता। उनके पीछे उनकी हँसी भी उड़ाई जाती। पर मानसी को लगता उनका यूँ अव्यवस्थित रहना शायद अपनी इच्छाओं को बिखेर देने का उनका अपना तरीका है।

मानसी उनसे एक विशेष सी- सहानुभूति रखती हुई उनके बेहद नज़दीक आ गई थी. वो हर बात में उनका साथ चाहती ,सबके बीच उनसे ज़बरन बात कर उनको सबके साथ बातचीत में शामिल करती,सबको आश्चर्य होता था कि अब मानसी उनकी काफी अच्छी मित्र बन गई थी।

अभी कुछ दिनों पहले कल्चरल फेस्ट की धूम मची. उसको अच्छी तरह संपन्न करने हेतु कुछ लोग चुने गए उसमे अचला मेम को तो होना ही था, उसका भी चुनाव हुआ था. अब जोर –शोर से तैयारियाँ होने लगी।

एक दिन मानसी अचला मेम को अपनी कल्पना के अनुरूप वेशभूषा में सजे -संवरे देख सुखद आश्चर्य से भर उठी. हाय ,कितनी प्यारी लग रहीं थी वो। जल्दी ही ये राज उसने जान लिया था कि इस परिवर्तन का कारण उसी की तरह नये आये 'दिवाकर सर' हैं जो अभी कुछ दिनों के लिये अपना विषय छोड़ कर कॉलेज के कल्चरल फेस्ट में 'तबला वादक' की भूमिका निभा रहे हैं. अक्सर दिवाकर सर अचला मेम के मधुर स्वर और सुरों पर उनकी पकड़ की तारीफ करते और वो शरमा जाती। मानसी को उन्हें शरमाते देखना बेहद अच्छा लगता, लगता एक खूबसूरत प्रेम-कहानी की साक्षी बन रही है वो, अचला मेम के साथ वो भी सराबोर उठी थी इस प्यारी सी प्रेम कहानी के रस से। शाम को देर तक रिहर्सल होता और अक्सर दिवाकर सर ही साथ आते. मानसी को छोड़ते हुए वो अचला मेम को छोड़ने उनके घर जाते, कई बार अचला मेम से उसे पता चलता कि उन्होंने दिवाकर सर को खाना खिला कर ही घर जाने दिया। उन्ही से मानसी को पता चला था कि दिवाकर सर भी कुँवारे थे और अकेले ही रहते थे. प्रोग्राम में होने वाले एक डांस के स्टेप्स में कुछ परशानी आ रही थी तब दिवाकर सर के सुझाव से अल्पना मेम की छोटी बहन अलका जो कि बहुत अच्छी डांसर थी , 4-5 दिन सिखाने आ गई थी. बहुत जिम्मेदारी से दिवाकर सर ने अलका को लाने और छोड़ने का काम किया था. इससे ये भी स्पष्ट हो गया था कि अचला मेम के यहाँ पर सभी उनको पसंद करने लगे हैं.

मीठी स्वर लहरी थमते ही मानसी की तंद्रा टूटी. गाने पर जोर –जोर से तालियाँ बज़ रही थीं सभी तारीफों के पुल बाँध रहे थे , पर मानसी को उन सबके बीच दिवाकर सर की आवाज़ नहीं सुनाई दी. उसने चारों तरफ देखा और फिर पूछा अचला मेम से उनके बारे में. गाने के दौरान ही 'दिवाकर सर' नदी की तरफ चले गए थे , उन्होंने बताया.

सभी लोग अब साथ साथ कोई गीत गाने में व्यस्त हो गए थे. मानसी को अपने साथ आने का इशारा कर अचला मेम नदी की तरफ बढ़ गईं. मानसी भी साथ चल पड़ी, नदी के किनारे पड़ी चट्टानों पर दूर तक कोई दिख नहीं दे रहा था। दिवाकर सर को ढूँढती अचला मेम आगे तक चली गईं . वो शायद वहाँ बैठे हैं कहती हुई अचला मेम मानसी को वहीँ रुकने का इशारा करती हुई एक चट्टान की आड़ में चली गई।

थोड़ी ही देर बाद उसने अचला मेम को धीरे-धीरे वापस आते देखा।

उनके पीछे सिर झुकाये 'दिवाकर सर' और “अलका’ चले आ रहे थे।

दिवाकर सर के पहले नदी की तरफ जाती अपनी छोटी बहन अलका को अचला मेम नहीं देख पाई थीं, न ही अलका वहाँ सबके बीच नहीं है ये देखना उन्हें याद रहा था।

नज़दीक आने पर अचला मेम को देख मानसी स्तब्ध रहगई।

पहले की तरह खुला-बिखरा पल्लू, अस्तव्यस्त बाल और धुला हुआ बेरंग चेहरा,जैसे असलियत को स्वीकार कर कर्तव्य की अपनी राह पर फिर से अकेले चलने को तैयार।

कर्तव्य संगीत अधूरापन लालसा

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