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अपना घरौंदा
अपना घरौंदा
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© Jahnavi Suman

Classics Inspirational Tragedy

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देवकी के घर का वातावरण इस शनिवार को कुछ भिन्न  सा था । आज घर को किसी भी हालत में खाली  करना ही  था ।  नए मकान मालिक के सामान से लदा हुआ  ट्रक किसी भी समय बेंगलुरु से दिल्ली  पहुँचने   ही वाला था  ।  घर का अधिकाँश सामान  तो बेचा जा चुका था, बस कुछ ऐसा सामान बाकि रह गया  था, जो देवकी के ह्रदय को अति प्रिय था  और वह उन्हें किसी भी क़ीमत पर  बेचना नहीं चाहती थी ।  घर से उस सामान को  निकाल कर बेटे दुष्यंत की गाड़ी में रखना था और दुष्यंत का  ड्रॉइवर यह काम बड़ी तत्परता से कर रहा था । 

 देवकी तब तक हर सामान को टकटकी लगाए देखती रहती थी, जब तक ड्राइवर  उन्हे कार में नहीं  रख देता था । हर  सामान के साथ न  जाने कितनी यादें जुड़ी थीं, जिन्हें देवकी की आँखों से टपकते आँसू और अधिक उज्जवल कर रहे थे।  

सारा सामान बाहर निकल गया तब देवकी को लगा जैसे किसी ने उसके शरीर से सारी शक्ति ही खींच ली हो । उसने आखिरी बार अपने घर को जी भर कर देख लेने की इच्छा से आँखों से अश्रु पोंछे और धीमें क़दमों से घर का चक्कर लगाया। 

  कितने यत्न से बनवाया था, यह  घर उसने । घर की एक-एक ईंट गवाह थी,  उसकी लग्न की, उसकी मेहनत की । सर्दी, गर्मी या हो बारिश डट कर खड़ी रहती थी, सामने वाली सड़क पर मज़दूरों के  आने से पहले आ जाती थी और उनके काम समाप्त करने के बाद ही बैठ कर, चैन  की साँस लेती थी । आज से यह घर किसी और का हो जायेगा ? अपना शयन कक्ष, अपनी रसोई, अपना पूजा का छोटा सा कमरा और प्यारी सी बालकनी, कल तक जो उसका था आज कैसे पल भर में पराया हो गया । उसके अपने हाथों से पाल  पोस कर बड़े किये गए  पेड़- पोधे, न जाने कल से इनका क्या होगा  कोई उनकी देखभाल करेगा भी या नहीँ ।   यह सब सोच  कर तो उसे रुलाई ही आ गई ।

 जिस  घर  के साथ पैंतीस वर्षों की यादें जुड़ी हों, उसे यूँ छोड़ कर चले जाना क्या कोई आसान काम था । 

नए मालिक मकान आ चुके थे ।  दुष्यंत ने घर की चाबियाँ उन्हें सौंप दी, देवकी बेबस खड़ी ये दृश्य देख रही थी ।  काश उसके पति की  असमय मृत्यु न होती,  दुष्यंत के पिताजी ज़िंदा होते तो क्या दुष्यंत इस मकान को बेचने का दुःसाहस  कर सकता था ।   नहीं, कभी नहीं । अकेली रह गई हूँ इसलिए बेटे बहु हावी हो गए हैं मुझ पर ।            

देवकी, अपने बेटे दुष्यंत, बहु मालती व पोते पृथु के साथ जाकर कार में बैठ  गईं ।  कार  के पीछे वाली  सीट पर दुष्यंत, मालती व देवकी  बैठे  थे।   पोता 'पृथु' ड्राइवर के बगल की सीट पर  बैठा था ।  दिल्ली की काली लम्बी सड़क पर कार  दौड़ती जा रही थी ।

आज दिल्ली की सड़कों पर चहल-पहल होते  हुए भी उसे अजीब सा सन्नाटा लग रहा था । आज से पहले उसे  दिल्ली शहर इतना अजनबी नहीं लगा था । चालीस वर्ष पहले जब बिजनौर से उसकी डोली दिल्ली आई थी, तब तो उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो पूरा दिल्ली शहर उसकी आरती उतार रहा हो । अड़ोस -पड़ोस सबसे इतना लगाव था कि मायके की याद भी नहीं सताती थी । 

ईंट और पत्थरों की इमारतें बनवाते-बनवाते लगता है, यहाँ के लोगों के दिल भी भाव शून्य हो गए हैं । नई पीढ़ी  का तो कहना ही क्या ? पैसा कमाने की होड़ में अँधा-धुंध दौड़ते जा रहे हैं । ‘माँ-बाप’ अनाज में लगने वाले घुन जैसे हैं, जो  घर में पड़े-पड़े  सारी की सारी दौलत नष्ट कर  जाते हैं,  'यही सोचते होंगे निगोड़े’ ।

 देवकी विचारों के ताने-बानों में उलझी हुई थी, तभी पृथु का अति कोमल स्वर सुनाई दिया  "हम कहाँ जा रहे हैं ?" देवकी ने उत्तर दिया, “जहाँ समय ले जा रहा है” । इस पर मालती तुनक कर बोली, "मम्मी  अभी तो यह मासूम  है इससे ऐसी  बातें क्यों कर रही हो?" देवकी ने आँखे तरेर कर मालती को देखा और बोली, "मैंने कौन सा उसे तोप दागने के लिए कह दिया।" मालती ने शिकायत भरी निगाहों से दुष्यंत की ओर देखा । दुष्यंत के माथे पर भी तियोरी चढ़ी थी। 

सूर्य पश्चिम की ओर छुप रहा था। सूर्य और देवकी का मौन संवाद शुरू हो गया । वह मानो देवकी से कह रहा हो, "हर दिवस का अंत होता है, देवकी! आज अँधकार दे कर जा रहा हूँ, कल नई सुबह लेकर फ़िर  लौटूँगा।" देवकी निराश होकर मन ही मन बुदबुदाती  है, "जिस की आँखों से ज्योति ही छीन जाये उसके लिए प्रकाश क्या और रौशनी क्या?"

देवकी के अंतर्मन में विचारों की लहरें निरंतर टकरा रहीं थीं । इसी बीच दिल्ली की सीमा समाप्त हो गई । एन.सी.आर गुड़गाँव के टोल गेट पर कार  रुक गई । पृथु ने फिर सवाल किया, "हम कहाँ जा रहे हैं, कोई बता क्यों नहीं रहा ।" देवकी कांपती हुई आवाज़ में  बोली, "ये तुम्हें क्या बताएगें, बेटा ! मैं बताती हूँ ।" एक क्षण के लिए देवकी का गला रूंध गया । वह खुद को सँभालते हुए बोली, "तेरी दादी बूढों के बोर्डिंग स्कूल में जा रही है।"  पृथु के लिए यह जवाब भी एक सवाल ही  बन गया । उसने भोले पन से फिर पूछा, “बूढो के बोर्डिंग स्कूल?"  देवकी बोली,  "हाँ बेटा  तूने ठीक सुना है , मैं बूढो के स्कूल ही जा रही हूँ ।"  मालती ने फिर मूँह बिगाड़ कर दुष्यंत को देखा ।

  देवकी अभी तक अपने बेटे-बहु का बहुत आदर करती  थी, लेकिन आज उसे परवाह नहीं थी कि उसके आचरण और उसके शब्दों  का उसकी 'सास-प्रतिष्ठा' पर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा ।  वह बोली, "एक अकेली माँ दस बच्चों को पाल सकती है, लेकिन दस बच्चे एक माँ को नहीं पाल सकते।" अब तक चुप बैठा दुष्यंत बोला, " मम्मा, आप पृथु की जिज्ञासा मिटा रही हैं, उसके प्रश्नों का उत्तर दें रहीं हैं  या हमें ताना  मार रही हैं  ।" मालती भी पति के सुर में लय मिलाकर बोली, "सात लाख रूपया खर्च किया है,  मम्मीजी हमनें केवल आप के लिए ।"  देवकी बोली, "ये हिसाब-किताब नई पीढ़ी को ही करना आता है । हमने तो न  कभी सीखा न ही कभी आँका कि  घर के किस व्यक्ति  पर कितना खर्च हो रहा है  । शायद पागल ही  थे हम लोग,  जो  बस  भावनाओं में बहते रहे । डायरी पर हमें  खर्च ही लिखना चाहिए था आज फलाँ व्यक्ति पर कितना रुपया खर्च किया । हिसाब-किताब  लिखने की जग़ह हम  ये क्या  लिखा करते थे, .... आज दुष्यंत ने पहली बार किलकारी मारी ।  आज उसने  पहला कदम ज़मीन पर  रखा, आज माँ  बोलना सीखा । अपनी बात पूरी करे बिना ही वह सुबकने लगी । दुष्यंत देवकी की और देखकर बोला, “मम्मा! इस तरह भावुक होने से भला क्या लाभ ?”

 कार एक बड़ी सी ईमारत के आगे आकर रुक गई  । ईमारत पर एक बोर्ड लगा था, जो   रंग-बिरंगी बल्ब की रौशनी  से जगमगा रहा था । उस पर सुन्दर अक्षरों में अंकित था, 'आपका अपना निवास '

ड्राईवर ने कार से नीचे ऊतर  कर कार  के दरवाज़े खोले । दुष्यंत ने देवकी को सहारा देने के लिए हाथ आगे बढ़ाया । देवकी का मन तो कर रहा था, उसका हाथ एक ओर झटक दे और कहे कि, “जब माँ को बेसहारा छोड़ कर ही  जा रहे हो, तो कुछ पल का   सहारा देने के लिए हाथ क्यों बढ़ा रहे हो”, लेकिन मजबूर थी अपने सहारे उतर भी नहीं सकती थी । दूसरी ओर से मालती ने आकर थैला पकड़ लिया । देवकी का मन तड़प गया । वह बोली, “रहने दे बहु यह नाटक” ।

तीनों ईमारत के भीतर प्रवेश करते हैं । रिसेप्शन में बिछे सोफ़े पर पृथु और मालती को बैठा कर, दुष्यंत, देवकी को केबिन में ले गया । उसने क्रेडिट कार्ड से कुछ भुगतान किया, फॉर्म पर हस्ताक्षर किए और इन औपचारिकताओं के पश्चात देवकी 'आपका अपना निवास' को सोंप दी गई । देवकी चारो ओर निगाह दौड़ा रही थी । उसे नाम के अनुरूप इस आश्रम में अपने घर जैसा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था । एक केयर टेकर जिसका नाम 'सुकन्या' था  देवकी को कमरे  तक पहुँचाने  के लिए आ गई थी । अब  समय आ गया था, देवकी का अपने परिवार से विदा लेने का । मालती  ने सिर पर पल्लू ढक कर अपनी सास के पॉंव छुए । बेटा माँ से गले लग कर बोला, "अपना ध्यान रखना मम्मा ।"  देवकी ने कहा, “यहाँ मेरा है ही कौन, जिसे अपने से अधिक समय दूँगी” । पृथु  के चेहरे पर कई सवाल उभर आए । देवकी चाह कर भी उनका उत्तर नहीं दे सकती थी । देवकी अपलक देखती रही अपने परिवार को स्वयं से दूर होते । 

 देवकी की भीगी पलकों में अतीत के न जाने कितने बीते लम्हे उभर आए । सुकन्या, देवकी को लिफ्ट से चौथी मंज़िल  के कमरा नंबर चार सौ सात में लेकर  पहुँची  । कमरे में दस बिस्तर बिछे हुए थे । दस अलमारियाँ रखीं थीं । एक बड़ी मेज़ के इर्द-गिर्द दस कुर्सियाँ बिछी थीं । सब पर नंबर गुदे थे । देवकी को चौंतीस नंबर की वस्तुएँ मिली । सुकन्या ने जब चौंतीस नम्बर की चाबियाँ देवकी के हवाले कीं तो देवकी बोली, "हम क्या अपराधी हैं जो हर वस्तु पर नम्बर गुदा है” । इस पर तीस नम्बर वाली विमला बोली, "छोटी-छोटी बातों को क्यों दिल पर ले रही हो बहनजी ! अपनों ने जो दुःख दिया है, वह क्या कम है” । सताईस नम्बर वाली कुमुद ने भी विमला को समर्थन दिया ।

  अब चौंतीस नम्बर का बिस्तर ही देवकी का ठिकाना था । उसका अपना घर और उसकी उपनी इच्छा से सजी-संवरी रसोई, उसका अपना कमरा व कमरे से सटी बालकनी, सब गुज़रे ज़माने की यादें बन कर रह गए थे ।

 

देवकी का मोबाईल चहक उठा । देवकी ने फ़ोन उठाने के लिए जैसे ही हाथ बढाया, सुकन्या ने टोकते हुए कहा, "आंटी ! आप केवल चार से पाँच बजे के बीच ही फ़ोन प्रयोग कर सकती हैं, शेष समय आप को मोबाईल का स्विच ऑफ करना होगा ।"  देवकी ने लगभग गिड़गिडाते हुए सुकन्या से कहा, "मेरे बेटे का फ़ोन है। मुझे बात करने दो ।" सुकन्या ने कहा, "आज आप का पहला दिन है ।  कल से बंद रखियेगा ।" देवकी ने कान से फ़ोन सटाया । दूसरी और से दुष्यंत की आवाज़ आई, "हेलो मम्मा ।" देवकी का रोम-रोम ऐसे खिल गया, जैसे वह अपने परिवार जन के बीच पहुँच गई हो । दुष्यंत ने आगे बोलना शुरू किया, "फ्लाईट टाइम पर है ।" देवकी ने सहर्ष कहा, "बहुत अच्छा बेटा । रूस में पृथु का बहुत ध्यान रखना । वहाँ ठण्ड बहुत होती है । उसे शहद में मिलाकर अदरक का रस  देते रहना।" दुष्यंत  ने कहा, "हाँ माँ आप चिंता न करें । "देवकी बेटे को बताना चाहती थी कि यहाँ चार से पाँच  बजे तक ही फ़ोन पर बात करने की अनुमति है, लेकिन उसे फ़ोन पर मालती की आवाज़ सुनाई पड़ी, "आप फ़ोन काट दो जी, बुढ़िया का तो लेक्च्चर बंद नहीं होगा । " यह सुन देवकी के हाथ काँप गए, कान  सुन्न पड़ गए । फ़ोन फिसलकर फ़र्श पर लुढ़क गया । कुछ देर हेलो-हेलो सुनाई दिया और फिर फ़ोन खामोश हो गया । देवकी अपने बिस्तर पर बैठ कर फूट-फूट कर रोने लगी । लेकिन यहाँ की दीवारें तो न जाने कितनी देवकियों की सिसकियाँ सुनते-सुनते कठोर हो चुकी थीं ।

आश्रम में रात के खाने की तैयारी चल रही थी । सुकन्या ने विमला से कह दिया था कि वह देवकी को हॉल में ले आए । विमला ने देवकी को लाख मनाया लेकिन देवकी खाने के लिए तैयार नहीं हुई । विमला थक हार कर बोली मैं तो जा रही हूँ , मैंने तो इंसुलीन का इंजेक्शन लगा लिया है । 

कमरा खाली हो गया था ।  सब खाने के लिए  हॉल में एकत्र हो गए थे । बिस्तर पर बैठे-बैठे देवकी की झपकी लग गई । देवकी वर्तमान से धीरे-धीरे अपना दामन छुड़ा, स्वप्न लोक में खो गई । पोता पृथु चश्मा लेकर भाग रहा है । वह उसके पीछे-पीछे भाग रही है । पृथु खिलखिला कर हँस रहा है । "मेरा चश्मा, मेरा चश्मा" वह बुदबुदा रही थी । तभी सुकन्या कमरे में आती है । वह देवकी के कंधे को झिंझोड़ कर कहती है, "चश्मा तो आपकी आँखों पर है आंटी ।" देवकी का रंगीन सपना टूट जाता है, वह यथार्थ के धरातल पर आ जाती है । सुकन्या कहती है, "आंटी खाना खाने चलिए ।" देवकी उदास स्वर में कहती है, "नहीं, आज मैं अपने  परिवर से बिछुड़ गई हूँ । आज मेरी खाने की बिलकुल इच्छा नहीं है।" सुकन्या देवकी का हाथ पकड़कर कहती है, "आंटी आप मेरे साथ नीचे चल कर तो देखिए  सब लोग कितने खुश हैं । यहाँ हर व्यक्ति अपने परिवार से बिछुड़ा है ।" देवकी बोली, "सब आडम्बर कर रहे हैं । अंदर ह्रदय में सब सन्नाटा समेटे बैठे हैं ।" सुकन्या ने कहा आप के न आने से मैनेजर मुझ से नाराज़ हो जायेगा ।" देवकी ने कहा, “ऐसी बात है तो मै चलती हूँ ।" दोनों खाने के हॉल  की ओर चल देती हैं । 

एक बड़ा सा हॉल, लगभग चार सौ बुजुर्गों से भरा हुआ था । देवकी तो सहमी सी एक ओर खड़ी रह गई । देवकी को अचानक पीछे से आकर किसी ने कहा, "अरे, मिसिज़ चोपड़ा ! आप भी यहाँ ?" देवकी ने पीछे मुड़कर देखा, दस साल पहले उनके पड़ोस में रहने वाले कर्नल रणजीत सिंह खड़े थे । देवकी ने आश्चर्य से  कहा, "कर्नल साहिब ! आप यहाँ कैसे ?" रणजीत ने हँसते हुए कहा, "जैसे आप यहाँ, वैसे हम भी यहाँ । सब एक ही कश्ती पर सवार हैं ।" देवकी ने पूछा, "बहिनजी कहाँ  हैं ?"  रणजीत चेहरे पर आई उदासी को छुपाने के लिए मुस्कुराने लगा । वह बोला, "सुधा, जीवन भर कदम से  कदम मिलकर चलती रही । दो साल पहले उसके कदम लड़खड़ा गए । शायद मेरी हे गलती थी । हर मोड़ पर 'लेडीज़ फ़र्स्ट’ कह कर उसे आगे करता रहा । ईश्वर को लगा, मेरी ऐसी ही भावना है ।" देवकी की आँखे भर आई थीं । रणजीत ने कहा, "चलो खाना खाते हैं । चपाती ठंडी हो जाएगी तो चबाना कठिन हो जायेगा । 

उधर विमला कब से अपने पास रखी खाली कुर्सी पर बैठने के लिए देवकी को बुला रही थी । देवकी, विमला के पास जाकर बैठ गई । उसने अनमने मन से थोड़ा सा भोजन ले लिया । रविवार होने के कारण, भोजन के  बाद दो घंटे, संगीत का कार्यक्रम भी चला । 

सभी अपने कमरों में लौट आए ।  बिस्तर पर लेटे,  कुछ बतियाने लगे, कुछ खर्राटे भरने लगे और कुछ रात की काली  स्याही में रौशनी ढूढने लगे । सूक्ष्म से सूक्ष्म प्रकाश बिंदु, भले  ही उसे जुगनू अपने साथ लाया हो । देवकी की, रणजीत सिंह से हुई दो मिनिट की भेंट, उसके विचारों को दस साल पीछे ले गई । कितना मेल मिलाप था, दोनों परिवारों के बीच । यादों की गलियों में विचरते-विचरते उसे नींद आ गई । 

दो घंटे बीते होगें कि, किसी की सिसकियों से उसकी नींद खुल गई । उसने पास रखी मेज़ से अपना चश्मा उठाया । अपने बिस्तर पर बैठ कर वह इधर उधर देखने लगी । ऊँघती हुई विमला बड़बड़ाई, " सो जाओ बहनजी । कुमुद हर रात को ऐसे ही सिसकती है । इस बिचारी के साथ बहुत बुरा हुआ । कल तुम्हें बताऊँगी ।"

 

आश्रम में देवकी की पहली सुबह----- अपना घर होता तो रसोई में जाकर एक कड़क चाय का प्याला बनाती और सूरज की सुनहरी किरणों को बालकनी में बैठ कर  निहारती । गमले में लगे तुलसी के पौधे से पीले पत्ते अलग करती ।  समाचार पत्र की प्रतीक्षा करती । लेकिन यहाँ तो सुना है, आठ बजे चाय मिलेगी । योग करना होगा । नहा-धोकर हॉल में ही जाना होगा । यहाँ की दिनचर्या के सभी आदि हो चुके हैं । इसमें इच्छा कम बेबसी अधिक नज़र आती है । 

 

नाश्ते के बाद, कुछ देर, एक दूसरे को जानने का, बाते करने का अवसर दिया जाता है । देवकी और विमला  दूर, एक कोने में बैठ  गई । विमला ने ठंडी आह भरकर कुमुद की दर्द भरी कहानी सुनानी शुरू की… एक लड़का है कुमुद का ।  छोटी ही उम्र में पति का साथ छूट गया था । जैसे-तैसे बेटे को पढ़ाया -लिखाया । इस काबिल कर दिया कि अच्छी नौकरी मिल जाये । उसे विदेश में अच्छी नौकरी भी मिल गई । जल्दी ही लड़के की शादी हो गई ।  एक दिन वह कुमुद से बोला, यहाँ का मकान बेचकर विदेश चलते हैं । कुमुद ने स्वीकृति दे दी । मकान बिक गया और विदश जाने का दिन तय हो गया । दिल्ली के अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर कुमुद का परिवार पहुँच गया । लड़के ने माँ से बाहर ठहरने के लिए कहा । पत्नी को साथ लेकर वह हवाई अड्डे के भीतर चला गया । घंटे बीत गए जब  वह लौट कर नहीं आया, कुमुद ने घबराकर पूछताछ शुरू कर दी  ।  पुलिस ने बेटे व बहु के नाम से पड़ताल की तो पाया दोनों अमेरिका की उड़ान भर चुके हैं । कुमुद को विश्वास ही नहीं हो रहा था । वह गृहमंत्रालय तक पहुँच गई । पुलिस ने सी.सी.टी.वी से लिए गए चित्र दिखाए तब बेचारी को ऐसा सदमा लगा की पूछो मत । देवकी ने विमला से पूछा, "कुमुद इस आश्रम में कैसे आई? यह तो प्राइवेट है।  यहाँ तो सात लाख की रकम देनी पड़ती है । विमला ने धीरे से कहा, "कर्नल साहिब ने अख़बार में ख़बर पढ़ी । उन्होंने ही रुपया दिया है । यह बात कुमुद को मत बताना” ।

 

कमरे में वापिस जाने का आदेश मिल चुका  था । देवकी को यहाँ आए अभी चौबीस घंटे भी नहीं हुए थे,  इन चौबीस घंटों में शायद ही कोई पल आया हो जब देवकी को अपना घर न याद आया हो । 

 स्त्री इतनी बेबस क्यों हो जाती है ? जब पिता  के घर होती है, तब पिता की इच्छा के विरुद्ध कोई कदम नहीं उठा सकती । पति के घर आती है तो, उसकी इच्छा के विपरीत नहीं जा सकती । बेटा बड़ा होते ही, माँ को निर्देष देने लग जाता है । नारी सब प्रकार से सक्षम होते हुए अक्षम क्यों बन जाती है ? यह उसकी शारीरिक दुर्बलता है, मानसिक विफलता है या त्याग की भावना ।  समय भी कहाँ से कहाँ ले जाता है व्यक्ति को ।

देवकी विचारों में खोई हुई थी, कि विमला धम्म से आ कर उसके पलंग पर बैठ गई । वह देवकी से बोली, "अपने घर के विषय में क्यों सोचती रहती हो ?"  देवकी की निगाहें खिड़की से बहार चली जाती हैं, जैसे वह दूर मकानों के बीच अपना घर तलाश रही हो ।  वह विमला से कहती है, "अपना घर आखिर अपना ही होता है ।"  विमला कहती है, "देखना में एक दिन तुम से कहलवा कर रहूँगी, ये आश्रम घर से ज़्यादा अच्छा है ।" देवकी बस  मुस्कुरा दी । 

  

चार महीने इसी तरह बीत गए । देवकी और विमला की दोस्ती गहराती रही । देवकी अपने घर की यादों से बाहर नहीं निकल सकी और विमल अपने कथन पर अडिग रही कि हम अपने घर से अधिक यहाँ प्रसन्न हैं ।   देवकी ने अक्सर विमला को एक कागज़ के टुकड़े  को निहारते देखा  था  । कोई समीप आता था, तो विमला झट से  उस कागज़  को मोड़कर पल्लू में बांध लेती थी । वह पल्लू के कोने को   मुठ्ठी में दबाकर सोती थी ।  देवकी कभी-कभी विमला से मज़ाक में कहती थी, “किसका प्रेम पत्र छुपा रही हो ?” विमला तुरंत कोई दूसरी बात छेड़ देती थी । 

 

एकादशी का दिन था, कुछ महिलाओं ने व्रत रखा था । सुकन्या ने आकर बताया कि 'प्रताप क्लब' की ओर  से फल बांटे जा रहे हैं । सुनते ही सब नीचे जाने की तैयरी करने लगे । देवकी बिस्तर पर लेटी  थी । विमला ने कहा नीचे नहीं चलोगी ?

   विमला ने कहा, “नहीं, पूरी जिंदगी तो दानपुन्य करती रही, अब औरों के आगे हाथ फैलाना क्या अच्छा लगेगा ?" विमला बोली, "शाम तक भूखी बैठी रहना, यहाँ व्रत वालों  को  खाने के लिए कुछ नहीं मिलेगा ।" 

कुछ देर बाद विमला चार केले लेकर लौटी । उसका मुँह फ़ीका पड़ गया था । उसने दो केले देवकी को देते हुए कहा, न जाने कैसे-कैसे लोगों को भेज देते है, क्लब वाले ।  अपने दो केले लेने  के बाद, मैंने तुम्हारे लिए भी दो केले मांग लिए । जानती हो बहिन, मुझे  उस लड़के ने क्या कहा ?   देवकी ने पूछा, "क्या कहा ?” विमला पल्लू से आँखें पोंछती हुई बोली, “ बहनजी, उसने कहा, बुढ़िया ! शर्म नहीं आती ? कब्र में पैर लटक रहे हैं, अभी तक लालच नहीं छोड़ा” । यह सुनकर देवकी को गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन वह बोली,  "जाने दो, उसने  अपनी जबान गन्दी की है ।"

 

विमला अपने बिस्तर पर जा कर लेट गई । शाम की चाय का समय हुआ । देवकी विमला के पलंग के पास गई । पलंग पर सटी मेज़ पर केले अभी भी रखे थे ।  देवकी ने विमला का कन्धा हिलाया और  बोली, "मुझे तो केले खिला दिए, तुम्हारे तो केले अभी तक ज्यों के त्यों रखे हैं ।" देवकी को जब  अपने  किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं मिला तो वह धक् सी रह गई । उसकी सबसे प्रिय सखी विमला चिर निद्रा में सो चुकी थी । विमला जिस क़ाग़ज़ को पल्लू में बाँध कर रखती थी, आज उसने वह कागज़ सीने से लगा  रखा था । देवकी ने धीरे से उस कागज़ को निकाला । कागज़ के टुकड़े को देखकर देवकी की आँखें डबडबा  गई । उस   कागज़ के टुकड़े  पर  विमला के घर की तस्वीर खींची थी, जिस की नेम प्लेट पर बड़े काले अक्षरोँ में  साफ़-साफ़ लिखा दिख रहां था -  'अपना घरौंदा' ।

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