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रेडियो
रेडियो
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© Jiya Prasad

Drama

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बात तब की है जब घरों में ब्लैक-एन-व्हाइट टीवी होना भी बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। मनोरंजन के साधनों में रेडियो की एक ख़ास जगह हुआ करती थी। घर में एक शख़्स थे जिन्हें टीवी देखने का शौक तो नहीं था पर रेडियो सुनने का उत्तम चस्का जरूर था। उम्र यही कोई पचास या उसके आसपास रही होगी। पिता जी दिल्ली में अस्सी के दशक के अंतिम सालों में आए और आते ही थोड़ी खोजाई के बाद एक कंपनी में काम पर लग गए। उनकी उस समय तनख्वाह एक सौ पिछत्तर रुपये तय हुई। ओवरटाइम मिला कर दो सौ से दो सौ पचास तक मिल जाया करते थे।

उस वक़्त तक शहर में ठिकाने की जद्दोजहद जारी रही। कुछ ही समय में कंपनी के पास ही एक कमरा किराए पर मिल गया। धीरे धीरे पिताजी ने खुद से पकाकर खाने के लिए कुछ बर्तनों और स्टोव का इंतजाम किया। बाद में बाकी सामानों का। पिता जी को फिल्मों का बहुत शौक तो नहीं था पर हाँ खबरों को जानने की दिलचस्पी लगातार रहती थी। सो कुछ ही महीनों की बचत से सौ रुपये या आसपास की क़ीमत का एक मर्फी रेडियो ले आए। इसके बाद के समय में परदेस में यही एक उनका सच्चा साथी था। काम से लौटने के बाद जब बदन टूट रहा होता तब भी रेडियो चला लेने के बाद वे उसे सुनने में पूरी तरह तल्लीन हो जाते और उसी धुन में काम भी पूरे कर लेते। इस रेडियो से ही वह अपने को अपडेट भी कर लेते थे।

कुछ ही बरसों में कलकत्ता में रहने वाले बड़े पापा दिल्ली पिताजी के पास आए और यहाँ की आबोहवा के शिकार हो गए। उनको यहाँ का माहौल इतना पसंद आया कि वे वापस कलकत्ता नहीं गए। कुछ ही समय बाद मैं और माँ भी इसी शहर में बसने आ गए। अब दिल्ली सपरिवार के रहने की जगह बन गई। बड़े पापा को अचानक एक बीमारी ने आ घेरा सो वह ज़्यादातर अपना समय घर में ही बिताने लगे। इसलिए पिताजी ने अपना प्रिय रेडियो बड़े पापा को ध्यान बांटने के लिए तोहफे की शक्ल में पेश कर दिया। पहले-पहल तो उन्हें रेडियो अपने एकांत का ज़ोरदार उल्लंघन लगा पर जब उसे एक बार चालू किया तो कुछ नहीं बोले और हमेशा के लिए उसे अपने पास रख लिया।

बड़े पापा को देखो तो लगता था कोई सूफी दरवेश हैं। ज़्यादा बोलते नहीं थे। कभी उन्हें किसी बात पर बहस करते हुए नहीं देखा। जो रुपया कमाया उसे घर के लोगों पर ही भरपूर खर्च किया। किसी से उम्मीद रखना भी वे नहीं जानते थे। किसी भी चीज पर वे न तो कभी उत्तेजित होते थे न किसी ने कभी उन्हें बहस और गुस्सा करते देखा था। इस दुनिया के वे बिलकुल नहीं लगते थे। जब वह बीमार पड़े तब भी उनके चेहरे पर किसी भी तरह की कोई शिकन दिखाई नहीं दी। उनकी मृत्यु भी बड़ी शांति से दस्तक दे गई थी। किसी तरह का शोर उनके अंदर महसूस नहीं किया गया। उन्हों ने अपने लिए एक अलग कमरे की मांग की सो उन्हें हरे पर्दे वाला कमरा दिया गया जो छत पर अपने आप में अकेला रहता था। अब उस कमरे के साथी बड़े पापा बन गए। हालांकि पिताजी को इसके चलते बहुत मेहनत करनी पड़ी फिर भी वे खुश थे कि वे बड़े भाई साथ हैं।

उनके इंतकाल से पहले के दिन हमेशा की तरह साधारण ही बिता करते थे। उनके रूटीन में अक्सर कुछ किताबें शामिल हुआ करती थीं। पर थोड़े वक़्त में ही उन्हों ने किताबों से रिटायरमेंट ले ली और रेडियो से और लगाव बढ़ा लिया। गीत, नाटक, खबरें और हर तरह के कार्यक्रम वे रेडियो पर सुनते थे। रेडियो का रंग पीला था और उसके खटके या बटन बड़े बड़े, गोल व काले रंग में थे। उसके दाहिने तरफ एक एंटीना था जिसे अगर उठा दिया जाता तो चैनल जल्दी पकड़ में आते थे। उसमें नीले रंग वाले बड़े बड़े निप्पो कंपनी के सेल डाले जाते थे। इतना ही नहीं उसमें एक हेंगर भी था जिसे पकड़ कर उसे आसानी से कहीं भी लाया ले जाया सकता था। वे रेडियो खास खास समय पर सुनते थे जैसे सुबह 11 बजे से 12 बजे तक। इसके बाद 3 से 4 बजे तक और रात के 9 से 10 बजे तक। रेडियो की वॉल्यूम बहुत तेज़ तो नहीं होती थी पर उसकी आवाज़ नीचे के कमरों तक आ जाती थी। हल्की मद्धम।

रेडियो हमारे भी रूटीन का दिलचस्प हिस्सा था। इसलिए हमें भी उसकी आदत हो गई थी। कुछ कार्यक्रम हमें भी अच्छे लगते थे। लगता था कानों का अभ्यास हो रहा हो। रेडियो जब चलता था तब सभी लोग खामोश होकर सुनते थे। इसलिए बातों की बहुत ज़रूरत नहीं पड़ती थी। सभी इशारे से अपनी जरूरत की बात सम्पन्न कर लेते थे। ऐसा लगता था कि सच में दीवारों के भी कान होते हैं। वह भी मानो साथ साथ रेडियो सुन रही हों। बड़े पापा को इस बात की बखूबी खबर रहती थी कि वे ही नहीं सभी रेडियो सुन रहे हैं इसलिए वे मुस्कुरा दिया करते थे। बार बार चैनल नहीं बदलते थे। जब वे रेडियो सुनते तो लगता था कि कोई दरवेश अपनी प्रार्थना में लीन है। मेरी उम्र उस समय तेरह बरस रही होगी। इसलिए यादें अभी तक दिमाग और दिल में टिकी हुई हैं।

उनकी मृत्यु सुबह सूरज उग आने के बाद हुई। परिवार में सभी को बहुत दुख हुआ। एक जन कम हो गया। या यूं कहें कि वह साधू अब हमारे साथ नहीं रहा था। उनके बाद उनके कमरे में एक भी तब्दीली नहीं की गई। जो चीज जहां रहती थी वह चीज वैसे ही राखी जाती रही जब तक हम वहाँ किराए पर रहे। उनके कमरे को बाद में मैंने पढ़ने लिखने के कमरे में तब्दील कर लिया था। जब वहाँ बैठकर मैं अपना काम करती तब ऐसा लगता कि कोई आसपास ही बैठा है। या कमरे में किसी और की भी मौजूदगी है।

उनके बाद भी ऐसा लगता था कि वह रेडियो सुन रहे हैं। घर में एक खालीपन सा ज़रूर आ गया था। कोई रेडियो भी नहीं सुनता था। सुनने का रस खत्म हो गया था। रेडियो से भी बहुत लगाव नहीं रह गया। उसके प्रति बना आकर्षण घर के लोगों में धीरे धीरे ही सही पर मिट रहा था। पर जब मैं पढ़कर थक जाती तब रेडियो को चालू कर अपनी पसंद का कुछ सुनने लग जाती थी।

लगभग दो या तीन महीने बाद अचानक रात नौ बजे मुझे रेडियो चलने की आवाज़ सुनाई दी। लगा कोई ऊपर के कमरे में रेडियो सुन रहा है। मैं भागी हुई ऊपर के कमरे में दाखिल हुई। मुझे लगा कि शायद मैं रेडियो बंद करना ही भूल गई हूँ। लेकिन कमाल था कि कुछ भी हलचल नहीं थी। पर ऐसा अहसास आया कि कोई अभी अभी यहाँ आया था। पापा मेरे पीछे पीछे भागे हुए आए और बोले- 'क्या हुआ?' मैंने कहा- 'कुछ नहीं। ऐसा लगा रेडियो बज रहा था!' पिता थोड़े अचरज में बोले –“हमने तो नहीं सुना!” मैंने कुछ नहीं कहा और कमरे को चारों तरफ से निहार कर हम दोनों नीचे के कमरे में वापस आ गए।

उस दिन मम्मी-पापा को किसी रिश्तेदार की शादी के समारोह में जाना हुआ। घर में मुझे अकेले रहना पड़ा क्योंकि मुझे अपनी परीक्षाओं की तैयारी करनी थी। हालांकि माँ मुझे साथ ले जाने की ज़िद्द पर थीं पर पिता की बात के आगे वे अधिक बोल नहीं पाईं। भारी मन से जल्दी आ जाने की बात कह वे गईं। उस रोज़ की घटना से मुझे थोड़ी बहुत घबराहट होती थी पर इतनी नहीं कि डर का खौफ आ जाए।

जब घर में कोई न हो तब अपना घर भी चेहरा बदल लेता है। अचानक से लगता है कि कई खिड़कियाँ दीवारों पर लगीं हैं और खूब हवा घर में घुसी आ रही है। मैंने मन पसंद खाना बनाया और उसके बाद नहाने धोने का काम किया। कपड़े धो लेने के बाद जब धुले बाल खोलकर शीशे में खुद को निहार रही थी तभी कुछ सुनाई पड़ा। एक बार को यह मेरा भ्रम लगा। मैं कंघी बालों में चलाने लगी। तभी मैंने फिर सुना। मैंने न चाहते हुए भी छत के कमरे की तरफ जाने का मन बनाया। छत की तरफ जाने वाली सीढ़ी पर चढ़ते हुए आवाज साफ सुनाई देने लगी। कोई गाना ही चल रहा था। जब कमरे की खिड़की से अंदर झाँका तब देखा कि रेडियो कोने में टेबल पर पड़ा चल रहा है। मैं काफी डर गई। तभी मैंने यह जानने की तसल्ली करनी चाही कि कोई है या नहीं। खिड़की से सिर्फ एक तरमैंने फैसला किया कि मुझे चाभी ला कर दरवाजा खोलना चाहिए। हालांकि मैं इतना डरी हुई थी कि नहाने के बाद भी पसीने से तर थी। हाथ पाँव काँप रहे थे। जैसे तैसे बदहवाशी में नीचे उतरकर चाभी खोजी। चाभी के मिलने में काफी समय चला गया। आवाज़ अभी भी मेरे कानों तक आ रही थी। मैंने चाभी का छल्ला लिए फिर सीढ़ी के सीध में डर से देखा। जाने क्या हुआ कि चक्कर आए और मैं धड़ाम से गिर गई। उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं। जब होश आया तब रात के ग्यारह बज रहे थे। माँ के दबाव में पिताजी ने घर बदलने की सहमति जता दी थी। पिता बोल रहे थे कि जल्दी ही कोई और घर देख लेंगे। इसके बाद मैंने आँखें बंद कीं और करवट बदलकरकुछ रोज़ के बाद एक अजीब हादसा हुआ। रविवार का दिन था। हम सुबह के नाश्ते के लिए बैठे थे। लेकिन इसी बीच छत के कमरे से कुछ गिरकर टूट जाने की आवाज़ आई। धड़ाम! हम जल्दी से चाभी के साथ ऊपर गए और कमरा खोला। आनन फानन में जब कोने पर नज़र गई तो देखा रेडियो नीचे गिरा शहीद हो चुका था। उसके अंजर-पंजर निकल कर बिखर गए थे। हमें लगा शायद कोई बिल्ली होगी पर हम यह जानते थे कि इस मौहल्ले में अभी तक ऐसी कोई बिल्ली नहीं थी जो इस तरह बंद कमरे में घुस जाये। माँ ने कहा कि शायद हवा से गिरा होगा। पर हम यह बात भी जानते थे कि हवा इतनी तेज़ नहीं चल रही थी कि रेडियो गिर जाये। हम तीनों ने अपनी अपनी तसल्ली के लिए बहाने खोजे पर हम तीनों ही के मन में कुछ ऐसा था जिसे हम हर हाल में साझा भी नहीं करना चाह रहे थे।

बहुत गहरी नींद में सो गई।

Radio Life Chaos

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