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वो पहली मुलाक़ात
वो पहली मुलाक़ात
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© Prateek Singh

Romance

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कुछ दिनों से उसके मिज़ाज़ कुछ बदले बदले से थे। देर से सोता था और सुबह भी आँख जल्द खुल जाती थी। कविताएं पढ़ने लगा था और खुद भी लिखता था आढ़ा तिरछा सा। मुद्दे की बात ये है कि ज़नाब गिरफ्तार होने लगे थे दो समंदर से गहरी आँखों की कैद में।

टुइ टुइ.. टुइ टुइ.. एस एम् एस

फोन जेब से निकाला तो तीन मिस्ड काल और एक एस एम् एस।

तुम बार बार मिलने की ज़िद कर रहे थे न, तो आज मैं 3 बजे ..... काम्प्लेक्स में जाउंगी । आ सकते हो तो आ जाना।

:( *एंग्री वाला इमोजी फोन न उठाने की वजह से*)

उसकी हालत ख़राब, बात खुश होने वाली थी क्योंकि कब से इंतज़ार कर रहा था इस दिन का और कितनी ही मिन्नतें कर डाली थीं इस पहली मुलाक़ात के लिए लेकिन घड़ी देखी तो 2 बज रहे थे और 6 बजे से पहले सेमेस्टर के प्रैक्टिकल का खत्म होने का सवाल ही नहीं था। और अभी तो एग्जामिनर रोल नंबर 7 पर ही अटका था। जनाब का नाम भी तो घरवालों ने 'प' से रखा था किसी पंडित से पूछकर और रोल नंबर इस हिसाब से बना था 54 उन 70 लोगों की क्लास में। पहले तो लौंडे ने पानी पी पी कर उस पंडित को गरियाया और कुछ जुगत भिड़ाने के लिये दिमाग दौड़ाने लगा।

(*ऐसे हालातों में आशिकों का दिमाग कंप्यूटर छोड़ो चाचा चौधरी से भी तेज चलता है।) खैर, मुसीबत के समय गुप्ता जी ही काम आते थे तो दौड़ा दौड़ा गुप्ता जी की शरण में जा गिरा।

अबे गुप्ता ! तुम्हायी भाभी आज मिलने को बुलाई है 3 बजे और यहाँ अभी रोल नम्बर 7 का ही वायवा चल रहा है। और ये मास्टर साला अपने आप को न्यूटन का चचा समझ के बैठा है और ऐसा ज्ञान प्रदर्शन कर रहा है की आज ही कलाम सर की अग्नि मिसाइल से दुगुनी स्पीड की मिसाइल बना कर ही उठेगा।

गुप्ता : अबे काहे इतना बौराये जा रहे हो बे। एक ही दिन होता है इन मास्टरों का जब ये अपना ज्ञान पेल पाते हैं। तुम भाभी को बोलो कल मिलने को।

लड़का : अबे तुम मेन्टल आदमी हो कतई। साले कल घर जा रहे छुट्टी पे और पूरे दो महीने बाद लौटेंगे। और तुमको बताये थे कि हमाई उनसे मिलने की प्रोबविलिटी सिर्फ मंगलवार, वीरवार और शनिवार को होती है और कल है बुधवार। भाई हम कुछ नहीं जानते, अगर आज तुम हमारा बेड़ा पार नहीं लगाए तो साला आज से दोस्ती खत्म। ( दोस्तों को फिल्मी डॉयलाग मार के उकसाने में लौंडे ने कक्षा सात में ही पी एच डी कर ली थी )

लौंडा क्लास के बाहर गुप्ता जी के सामने ऐसे खड़ा था जैसे महाभारत के मैदान में अर्जुन, कृष्ण के सामने हाथ जोड़े गीता का ज्ञान प्राप्त करने के लिए खड़े हों।

गुप्ता जी के भीतर का कृष्ण जाग चुका था और ऐसे कामों में गुप्ता जी के दिमाग की तेजी राजधानी एक्सप्रेस को भी पीछे छोड़ दे। ऐसे ही थोड़े क्लास में हर कोई गुप्ता जी को 'चीता'कहकर संबोधित करता था।

तुरंत पहुंचे चेले को लेकर खोखे पे और छोटी गोल्ड फ्लैक जला ली। तसल्ली से पहला कश खींचा और धुआं छोड़ते हुए सिगरेट लौंडे की तरफ बढ़ाई और बोले- खींचो ।

लड़का : अबे हमारी सांस अटकी हुयी है और तुमको बकर सूझ रही है, 2:15 बज गए हैं कुछ तो करो मालिक। लौंडा बेक़रारी से तड़प उठा।

आखरी कश मारते हुए गुप्ता लौंडे को लेकर क्लास की ओर चल पड़ा।

गुप्ता : सुनो जैसा समझाएं हैं बिलकुल वही वही कहना और एक्सप्रेशन ऐसा हो फॉर एक्साम्प्ल तुमको दस्त लगे हों और शौचालय 200 मीटर दूर।

*हरामखोर मिसालें भी ऐसी देता था कि जी खराब हो जाए।

खैर लौंडे ने माथा सिकोड़ा और लाचार सा चेहरा लटकाये हुए न्यूटन के चचा के सामने पहुँचा।

मास्टर एक हाथ में समौसा लिए हौंकने में व्यस्त था और दूसरे हाथ से कान के बाल खजुआ रहा था।

सर जी आपसे इक छोटी सी रिक्वेस्ट है ।

मास्टर : बोलो।

(हिचकते और नाक पे ऊँगली फिराते हुए - जो ह्यूमन बीहैवियर पढ़ा होगा जान जाएगा झूठ बोल रहा है, लेकिन मास्टर का पूरा कंसंट्रेशन समौसे पे ) सर जी आप हमारा वायवा अभी ले लेंगे ?

मास्टर :काहे आप किसी विधायक के लौंडे हैं का ?

लड़का: नहीं, नहीं सर ( लड़के की चोक ले गयी, गुप्ता की तरफ देखा तो उसने आँख मार कर प्रोत्साहन बढ़ाया ) दरअसल बात ये है कि हम कानपुर के रहने वाले हैं और 3:15 बजे की गोमती एक्सप्रेस ( ट्रेन का नाम और सटीक समय गुप्ता ही बताये थे ) से रिजर्वेशन है और पिताजी हमाये प्लेटफार्म पे इंतज़ार कर रहे हैं। आपसे विनती है कि हमारा प्रैक्टिकल पहले ले लोजिये।

कानपुर और गोमती का नाम सुनकर मास्टर थोड़ा नरम हुआ..हाव भाव और बोली से अंदाजा लग गया कि ये कानपुर लखनऊ के आस पास का ही था।

लौंडे के लाचार चेहरे को देख के उसको दया आई और उसका नंबर पहले लगा दिया। खैर 2 बजकर पचास मिनट पे खत्म हुआ वायवा। कालेज से काम्प्लेक्स पहुँचने के लिए 2 रिक्शा और एक टेम्पो बदलना जरूरी था, और समय लगता कुल 40 मिनट। वैसे रिक्शे वाला रास्ता वह रोज़ पैदल ही कवर करता था पैसे बचाने के लिए, पर आज तो समय पर पहुँचना उतना ही जरूरी था जितना आर्मस्ट्रांग का चाँद पर।

फिर गुप्ता की तरफ मुड़कर भागा,

भाई मोटरसाइकिल की चाभी दे दो, नहीं तो देर हो जाएगी और तुम्हारी भाभी चली जाएगी।

गुप्ता : अबे दिमाग तो सेंटर में है, हम तुमको बाइक नहीं देंगे। साले चलाना तो ढंग से सीखे नहीं अभी, खुद भी टूटोगे और बाइक भी फोड़ोगे।

लड़का: भाई प्लीज ! हाथ जोडें, हम पक्का शाम को तुम्हें पनीर की सब्जी खिलाएंगे।

गुप्ता जी पिघल गए और चाबी थमाते हुए बोले, 50 का तेल भरवा देना। ( आज गुप्ता 500 का तेल भराने को बोलता तो लौंडा वो भी भरा देता )

एक्सीलेटर ताने हुर्र करता बाइक लेकर दौड़ पड़ा ( तिरपाठी जी के अनुसार लौंडा तभी एक्सेलरेटर हौंकता है जब या तो गाड़ी नयी नयी सीखा हो, या नया नया इश्क़ में पड़ा हो और यहाँ तो दोनों बातें लागू हो रही थी)

उस साल मई में ही मानसून ने दस्तक दे दी थी, बादलों के नीचे एक आवारा बादल हवा को एक्सीलेटर से चीरते हुए 3:05 पे काम्प्लेक्स पहुंचा। दौड़कर सीढ़ियों से ऊपर पहुंचा तो मैडम जी पिंक टॉप, ब्लैक जीन्स में एक हेयर क्लिप मुँह में दबाये कॉस्मेटिक की शॉप पे दोनों हाथों से नयी हेयर क्लिप ट्राई कर रही थी। एक तो लौंडा वैसे ही मदहोशी में डूबा था,

उसको इस मायावी रूप में देखकर रहा सहा होश भी गँवा बैठा। वहीं बूत बन गया। मैडम का चेहरा खिल उठा। पास जाकर बोली हमें लगा आप नहीं आओगे !

अब छोरा कुछ सुन पाये तब तो बोले। मैडम ने कन्धा पकड़ के हिलाया तो होश में आया जैसे अभी नींद से उठा हो।

"कहाँ खो गए थे ?"

एक तो पहली बार इश्क़ में पड़ा, ऊपर से पहली मुलाक़ात कंधे पर उनका हाथ पड़ते ही सकपका गया।

"जी वो वो मैं.. मैं.."

"क्या वो वो मैं मैं लगा रखा है, जादा टाइम नहीं है हमारे पास। मम्मी से झूठ बोल कर आई हूँ कि सहेली को किताब लौटाने जा रही हूँ।"

"वो वो तुमको पहली बार इतनी करीब से देखा तो बोल ही नहीं निकल रहे मुँह से।"

वो खिलखिला कर हंस पड़ी।

लौंडा मन में खुद को कोसते हुए ( इससे अच्छी कोई बात नहीं मिली बोलने को ) लेकिन उसको खिलखिलाकर हँसते देख थोड़ा कॉन्फिडेंस बढ़ा और बोला।

"आज आप इस मौसम से भी जादा खूबसूरत लग रहीं हैं।"

( खुश तो हुई पर एक्सप्रेशन बदलकर बोली ) "जादा चने के झाड़ पर मत चढ़ाइये हमको, जो लड़के झूठी तारीफ़ करते हैं वो हमें पसंद नहीं।"

( हड़बड़ाहट में ) "नहीं मम्मी कसम आप बहुत सुन्दर हैं हम सच कह रहे हैं।"

( गुस्से में )" पागल, इसमें मम्मी की कसम खाने वाली क्या बात है।"

"माफ़ कर दीजिये मुझे समझ ही नहीं आ रहा की लड़की से बात कैसे करते हैं।" ( मन में, मुझे गुप्ता का साथ छोड़ना पड़ेगा.. साला कुछ भी ऊल जुलूल बोल रहा हूँ )

लड़का : सुनिए यहाँ पर ये लोग और आँटियाँ हमे घूर रही हैं, बहुत अजीब लग रहा है। सीढ़ियों पर ऊपर चलते हैं, वहीं बैठेंगे फिर छत पर चलेंगे बहुत रोमांटिक मौसम हो रहा है।

लड़की : रोमांटिक नहीं होता पागल रोमेंटिक कहते हैं।

लड़का: हाँ हाँ वही रोमांटिक।

लड़की : आप नहीं सुधरेंगे। चलिए कहाँ चलना है।

सीढ़ियों पर बैठे हुए 10 मिनट हो चुके थे। दोनों खामोश थे।

"आप पर ये पिंक कलर बहुत अच्छा लग रहा है... नहीं... मतलब आपके पहनने की वजह से ये कलर और सुन्दर हो गया है।" ख़ामोशी तोड़ते हुए लड़के ने कहा।

लड़की : बस भी करो, कितनी तारीफ़ करोगे ?

"हमारी कास्ट अलग है, हमारी शादी तो हो जाएगी न ?" ( लड़के ने बिना सोचे समझे पूछ डाला, शादी के लिए प्रोपोज़ वो भी इस तरह से। खुद इतना अनिश्चित होकर )

लड़की : "पापा और भाई कभी नहीं मानेंगे। 99% चांसेस नहीं होगी।" ( उसने जो सच था कह दिया )

"पर तुम तो तैयार हो न, 1% चांसेस तो हैं न बहुत हैं। मैं तुम्हें ले जाऊँगा उठाकर।"

"पता है मैं अक्सर सोचती हूँ कि हमारी शादी होगी। एक लड़का होगा तुम्हारी तरह।"

लड़का: नहीं पहले लड़की होगी मेरी तरह फिर लड़का होगा तुम्हारी तरह।

लड़की ने मुस्कुराते हुए लड़के के कंधे पे सिर टिका लिया।

उसने किस्से कहानियों में जिस जन्नत का जिक्र पढ़ा था आज वो खुद उस जन्नत में था। उसने भी उसके सिर पर अपना सिर टिका दिया।

दोनों गुम थे ख्यालों की उस खूबसूरत नदिया में गोते लगाते खामोश उन पलों को जीते हुए। एक दूसरे का सहारा बने हुए।

बादलों की गड़गड़ाहट से अचानक वो खामोशी टूटी और दोनों के उमड़ते ख्यालों पर एक अल्प-विराम लगा।

लड़की : छत पर चलते हैं मुझे ये मौसम बहुत पसंद है।

उसने कांच के दरवाजे का हैंडल खींचा तो वो लॉक निकला।

"ओह नो, रुको मैं शीशा तोड़ देता हूँ" ( वो फिल्मी स्टाइल में बोला )

"नहीं चोट लग जाएगी, हम यहीं पर ठीक हैं। ( वो फ़िक्र में बोली ) तुम साथ हो तो हर जगह खूबसूरत है। फिर क्या फर्क पड़ता है शीशे से भी तो आसमान दिख रहा है न।"

दोनों एक दूसरे का हाथ थामे आसमान की और ताकते रहे। वो उसकी और मुड़ा और उसके चेहरे पे बिखरते उसके बालों को कान के पीछे ले जाते हुए बोला - आई लव...

ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग

मम्मी का फ़ोन है, चुप रहना।

"हाँ मम्मी,.....आ रही हूँ किताब वापस करके.....अभी बारिश थोड़ी न हो रही है.......नहीं भीगेंगे....आती हूँ।"

"सुनो अब जाना होगा मम्मी बुला रहीं है, मुझे छोड़ने नहीं चलोगे ?"भारी क़दमों से वो उसको लेकर नीचे आया।

"अरे वाह ! बारिश शुरू हो गयी, तुम हमको पैदल घर छोड़ने चलो । ( वो बारिश की बूंदों में भीगकर चहकते हुए बोली )"

"अरे हम तुमको कुछ खिलाये भी नहीं, चलो तुमको नारियल पानी पिलाते हैं, हमको बहुत पसंद है।"

वो मान गयी। * बाद में पता चला उसे नारियल पानी नहीं पसंद *

दोनों ने एक ही स्ट्रॉ से नारियल पानी पिया और उसके घर की ओर बढ़ चले। पहली बारिश की बूंदों में भीगते एक दूसरे का हाथ थामे कब घर के नज़दीक पहुँच गए पता ही नहीं चला।

"मैं अब चली जाउंगी बस सौ कदम पर है घर, तुम जाओ।"

मुड़ कर दो कदम ही चली थी कि सैंडल टूट गयी।

आउच !!

"अब कैसे जाओगी ? मैं गोद में लेकर छोड़ आता हूँ।" ( हा हा )

"नहीं जी। मै चली जाऊँगी। अच्छा सुनो..."

"हाँ बोलो.."

लड़की : (जाते हुए ) आई लव यू !

पहली बार ज़नाब को बारिश में भीगना अच्छा लगा था।

वहाँ खड़ा उसको देखता रहा जब तक वो नज़रों से गायब नहीं हो गयी।

शाम को,

लड़का : गुप्ता जी कभी बारिश की बूंदों को चखा है ?

गुप्ता : हैं बे ! सर्किट ढीला हो गया है ? केमिस्ट्री में पढ़े नहीं कि पानी रंगहीन, गंधहीन और स्वाद-हीन होता है। अउर हाँ फ़ौरन सब्जी बनाओ पनीर की।

पर लौंडे को समझ आ गया था कि काहे गुलज़ार जी बारिशों को मीठा कहते थे।

मुलाकात प्रेमिका नशा

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