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दफ्तर में खून,  भाग- 8
दफ्तर में खून, भाग- 8
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© Mahesh Dube

Thriller

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गतांक से आगे- 

वंदना शानबाग ! प्रभाकर दांत पीसता हुआ बोला, इस एप्रन और स्टेथोस्कोप का तुम्हारी दराज में क्या काम ? तुम पत्रकार हो कि डॉक्टर?

 

वंदना ने मुंह खोला तो उसके मुंह से आवाज ही नहीं निकली। डर के मारे उसकी घिग्घी बंध गई थी। उसके मुंह से केवल सर, सर की आवाज निकल रही थी।

बोलिये मैडम ! प्रभाकर बोला,  अब सर पैर करने से काम नहीं चलेगा।

सर ! वो किसी तरह बोली, ये सब मेरा नहीं है, मुझे नहीं मालूम किसने ये इधर रख दिया।

बनो मत! प्रभाकर ने डांटा, क्या कल तुम डॉक्टरों के दल में ट्रेनी डॉक्टर का रूप धरकर, आई सी यू में नहीं गई थी ?

नहीं सर ! मैं तो इस बारे में कुछ नहीं जानती। मैं वहाँ नहीं गई थी।

अच्छा ! रुको, अभी पता चल जायेगा। यह कहकर प्रभाकर ने जोर से सूरज सिंह  की आवाज लगाईं। तुरंत एक पुलिस सिपाही हाजिर हुआ और उसने प्रभाकर को सलाम किया।

 

प्रभाकर ने वंदना से पूछा, क्या तुम इसे जानती हो ?

वंदना के इनकार में सिर हिलाने पर प्रभाकर ने उसका जो परिचय दिया उसने सभी को चकरा कर रख दिया। वह बोला, सूरज सिंह ही वह आदमी है जो चेहरे पर पट्टियां बांधे कल रामनाथ पांडे की जगह पर आई सी यू में लेटा हुआ था जब तुमने इसकी नाक से नली नोंची थी। 

इतना सुनकर सबके मुंह पर आश्चर्य झलक आया।

प्रभाकर आगे बोला, पांडे की मौत तो पहले ही हो चुकी है। मैं जानबूझकर कल यहाँ आया और बिष्ट से यह बताकर गया कि पांडे होश में आने वाला है क्योंकि मैं जानता था कि कातिल की इस बात में उत्सुकता जरूर होगी कि पांडे किस हाल में है और वह फिर उसे मारने की कोशिश जरूर करेगा। इसीलिए मैंने सूरज को, जो कद काठी में बिलकुल रामनाथ जैसा है, चेहरा ढंक कर वहां लिटा दिया। और जैसा मैंने सोचा था वही हुआ, पहले जुंदाल पहुंचा तब इसकी परीक्षा लेने के लिए मैंने फोन करके अपने सिपाही को वहाँ से हटा दिया यह भीतर गया पर बिना कुछ किये लौट गया तो मैं समझ गया कि यह कातिल नहीं है।

सब मुंह बाए प्रभाकर के खुलासे  को सुन रहे थे। वह आगे बोला, मैडम वंदना जी! आपकी काली पट्टी वाली चप्पल सूरज ने अपनी आँखों से देखी थी जब आपने इसकी नाली खींची थी। समझी ? वही चप्पल आप अभी भी पहने हुए हैं। सिर पर पट्टियां होने के कारण यह चेहरा नहीं देख पाया था पर चप्पल इसने बराबर पहचानी थी। सबने सूरज की ओर देखा, उसका सिर सहमति में हिल रहा था।

नहीं ! नहीं ! नहीं ! वंदना फूट फूट कर रो पड़ी, मैं वहां गई ही नहीं थी।

 

ओके! ओके! प्रभाकर बोला, एक ऐसा सबूत मैं तुम्हे देता हूँ जिसे तुम झुठला नहीं सकोगी। सूरज सिंह के बदन पर बाँधी गई पट्टियों पर ऐसा रंगहीन केमिकल लगाया गया था कि उससे स्पर्श होने पर इंसानी बदन का कोई भी हिस्सा कई दिनों तक गाढ़ा नीला रहता है। वह निशान धोने से और गाढ़ा होता है। सूरज कह रहा था कि कल तुम्हारी कुहनी नली खींचे जाते समय इसकी पट्टी पर रगड़ खाई थी,  जरा मेहरबानी करके अपने कुर्ते की बाहें ऊपर करो क्योंकि कल तुमने आधे बांह की शर्ट पहनी थी, अगर कुहनी पर नीला रंग नहीं मिला तो मैं तुम्हे निर्दोष मान लूँगा।

वंदना ने जल्दी जल्दी अपनी बाहें चढ़ानी शुरू की पर प्रभाकर का ध्यान उसकी ओर नहीं था। वह तो उस समय गिद्ध की तरह उस मालिनी ठाकुर को घूर रहा था जो इनसे बेखबर जल्दी जल्दी अपनी कुहनियों को चेक कर रही थी।

 

आखिर मालिनी ने अपनी कुहनियाँ क्यों चेक की ?

 

पढ़िए, भाग -9 में

 

रहस्यपूर्ण मर्डर मिस्ट्री

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