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निर्दयी माँ
निर्दयी माँ
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© Rashi Singh

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"अरे मंजूलता मैडम क्या नाम रखे हैं आपने बच्चों के? आपने फ़ंक्शन अपने गाँव जाकर किया इसलिए मैं शामिल नहीं हो पाई। "स्कूल आते ही मंजूलता अध्यापिका से मैंने जिज्ञासावश पूछ लिया।

"हाँ जी हो गया नामकरण आप तो आईं ही नहीं मैडम चलो कोई बात नहीं ..!"

"नाम क्या रखे हैं बच्चों के ?"

"भूमि और आकाश "मंजूलता ने नजरें चुराते हुए कहा। मैं आश्चर्यचकित रह गयी बच्चों के नाम सुनकर। करती क्या बस मुस्करा कर रह गयी। दिमाग में हजारो सवाल घूमने लगे। उस दिन की घटना एकाएक दिमाग में बिजली की भाँति कौंध गयी।

उस दिन जब मैं यह सुनकर अस्पताल गयी की मंजूलता मैडम की डिलीवरी हुई है। अस्पताल में देखा मंजूलता की सास बैंच पर बैठी सिर पर हाथ रखकर रो रहीं थीं।

"क्या हुआ आँटी सब कुशल मंगल।"

"अरे काहे का कुशल मंगल ? हमार बिटुआ के तो भाग्य ही खोटो है।"

"क्या हुआ ?"

"फिर दो दो बिटियाँ जन कर रख दीं बहुरिया ने पहले से ही तीन थीं। अब वंश न बड़ेगो आगे लागत है। "उन्होंने सुबकते हुए कहा।

"अरे चुप करो क्यों रो रही हो ? किसी को बताना नहीं कि तुम्हारी बहु के दो बेटियाँ हुईं हैं। मैं कुछ इंतजाम करती हूँ। तुम्हारे बेटे से बात हो गयी है। पूरे दो लाख लगेंगे।"एक नर्स आकर आँटी के कानों में फुसफुसाई। आँटी चुप हो गयीं। मैं सकते में आ गयी। और आँटी के चेहरे पर मुस्कान आ गयी कुटिल मुस्कान।

"क्या हुआ नाम पसंद नहीं आये ?"मंजूलता ने फिर प्रश्न किया।

"नहीं ऐसी बात नहीं है।"

"शिवा तो बिल्कुल अपने पापा पर गया है।"मंजूलता ने बेशर्मी से कहा तो मेरा दिल उस बच्ची जो पता नहीं कैसे माहौल और कैसे लोगों के हाथ गयी होगी के प्रति करुणा और मंजुलता के प्रति घृणा से भर उठा। अपनी बच्ची की अदला बदली छी---!

बेटी अस्पताल वंश

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