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कुछ रिश्ते अधूरे से
कुछ रिश्ते अधूरे से
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© Asmita prashant Pushpanjali

Drama Tragedy

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आई.सी.यू. में ऑक्सीजन मास्क लगाकर, सफेद चादर में लिपटी वह पलंग पर लेटी थी, और दरवाजे पे लगे कांच से समीर उसे देखे जा रहा था। समीर के हाथों में पट्टी बंधी थी, और गले से बंधी पट्टी में हाथ बंधा हुआ था।

अभी-अभी कुछ वक्त पहले, समीर को अस्पताल के बिस्तर पर सोता पाकर, उसकी पत्नी आरती घर गयी। आरती के घर जाते ही, समीर बरखा की हालत देखने आई.सी.यू. के सामने आ खड़ा हुआ। बरखा भीतर अकेली ही मौत से लड़ रही थी। उसके पास कोई नहीं था।

उसे जी भरके देख लेने के बाद, समीर की आँखे आँसुओं की बूंदों से डबडबाई। डबडबाई आँखो से वह पास ही रखे बेंच पर बैठ गया। देखते ही देखते अगले पलों में, अतीत में खो गया।

आरती, समीर और बरखा कॉलेज में एकसाथ पढ़ते थे।

माँ-बाप की इकलौती संतान, शहर के बड़े उद्योगपती की इकलौती बेटी बरखा, लाड़-प्यार में पल-बढ़ रही थी। उसे बचपन से ही किसी चीज की कमी महसूस नहींं हुई थी, और ना ही उसके द्वारा कोई चीज मांगने पर नकारा गया। उसने जो मांगा, उसके आगे रख दिया जाता। इसके बावजुद भी, उसके बर्ताव में सादगी थी। और यही कारण था, की समीर के दिल के कोने में वह छुपी बैठी थी।

समीर पढ़ाई में होशीयार और कुछ बनने की चाहत दिल में रखकर, अपने पढ़ाई पर ही सारा ध्यान केंद्रीत करता था, इसी वजह से बरखा दिल में होने के बावजूद, उसने अच्छी पहचान और दोस्ती होते हुए भी, कभी प्यार का इजहाँर नहीं किया।

आरती समीर के घर के बाजू की गली में रहती थी। वह बचपन से समीर के साथ एक ही पाठशाला और कक्षा में पढ़ती थी। बढ़ती उम्र के साथ-साथ उसकी सुंदरता और भी निखरती जा रही थी। आरती सुंदरता के साथ ही संस्कारो के गहने से सजी थी। वाणी में मधुरता तो उसके रूप को और भी चार चाँद लगा देती। पढ़ाई में साधारण-सी आरती हर साल पास होती, लेकिन करियर को लेकर उसका ना कोई सपना था, और ना ख्वाहिश। बस जब से जवानी की दहलीज पर पांव धरा, तब से दिल, समीर के नाम से धड़कता। और उसने मन ही मन में समीर के साथ घर बसाने का सपना बुनना शुरु कर दिया था।

आरती, समीर, बरखा तीनों हर रोज कॉलेज में मिलते, एक साथ बैठते, गप्पे लड़ाते किंतु तीनों के दिल में एक दूसरे के लिए क्या है, ये वह तीनों नहीं जानते। अपनी अपनी चाहत और सपनों को अपने दिल में ही दबाकर रखते।

कॉलेज का जीवन खत्म हुआ।

समीर नौकरी की तलाश में उलझ गया। आरती घर पर बैठ कर अच्छी गृहिणी होने की माँ से सीख लेने में जुट गयी, और बरखा का दोनोंं से ही संपर्क टूट गया। वह न जाने कहा गायब हो गयी।

समीर की मेहनत रंग लाई, उसे प्राइवेट किंतु अच्छी नौकरी मिली।

यह सब होते होते तीन साल गुजर गये।

समीर के घर में उसकी शादी की बात चलने लगी, तब फिर एक बार, "बरखा कहाँ होगी, कैसी होगी, क्या कर रही होगी, क्या उसे मेरी याद होगी, या मुझे भूल गयी होगी" जैसे न जाने कितने सवालों ने उसके दिमाग में घर बनाना शुरू कर दिया। बरखा का खयाल आते ही, दिल में छुपे बैठे मोहब्बत के जज़्बात फिर से जाग उठे।

घर वाले जब भी उससे शादी के विषय में बात चलाते, वह बेचैन हो मना कर देता। उसे अब भी आस लगी थी, बरखा उसे मिल जायेगी।

"आखिर ये समीर चाहता क्या है ?" एक दिन उसके पिता उसकी माँ पर झुंझला उठे।

"मुझसे क्या पूछते हो। उससे ही बात कीजिये ना।" माँ ने जवाब दिया।

पिताजी- "तुमसे ना पूछूँ, तो और किससे पूछूँ। तुम उसकी माँ हो, जब भी घर में होता है, तुम्हारे ही आसपास होता है, और वैसे भी तुम घर पर ही होती हो।"

माँ- "तो ? घर पर होती हूँ तो क्या ?"

पिताजी- "तो बेटे के दिल में क्या चल रहा है, किससे मिलता है, क्या चाहता है, यह सब बातें तुम्हें पता होनी चाहिये।"

"लेकिन उसने मुझे कभी कुछ बताया ही नहीं।" माँ अपनी सफाई देते हुये बोली।

पिताजी- "तो पता करो। ध्यान रखो उसकी बातों पर। कोशिश करो जानने की, आखिर वो इन्कार क्यों कर रहा है।"

दोनों की नोकझोक कुछ पल शांत हुई और, "कहीं उसके जेहन में कोई लड़की तो नहीं।" पिताजी चुप्पी को तोड़ते हुए बोले।

"आज तक ऐसा लगा तो नहीं, पर क्या पता शायद शर्म से कुछ कह नहीं रहा हो। वैसे आरती ही उसके करीब मालूम पड़ती है। दोनों साथ-साथ पढ़े हैं। पढ़ाई बंद होने के बावजूद आरती की शादी हुई नहीं। और वह माँ से ही घर-गृहस्थी की बातें सीख रही है।" माँ ने अपने अनुभव की कसौटी को खंगालते हुये उसके पिता से दिल में आई बात कह दी।

"हाँ, सुंदर और सुशील है आरती। अगर ये दोनों की चाहत होगी तो मुझे लड़की पसंद है।" पिताजी ने फैसला सुना दिया।

"मुझे भी आरती पसंद है। ऐसा कीजिये, आप समीर से बगैर पूछे, आरती के घर बात चलाइये। देखते हैं, आरती क्या जवाब देती है, आरती की हाँ आते ही समीर को सीधे रिश्ते की बात बता दीजिये। अगर उसने इन्कार ना किया तो समझ लीजिये, इसी वजह से टाल रहा था। और रिश्ता तय कर देंगे।"

"सही कहा। कल ही बात चलाता हूँ।"

अगली सुबह पिताजी आरती के पिताजी से मिले, और दोनों परिवार के संबंध के बारे में पूछने लगे, "भाई साहब, अगर बच्चों की खुशी इसी में है, तो हमें उनकी खुशी मंजूर है। हम पहले आरती की इच्छा जानना चाहेंगे।"

आरती ने पिताजी को माँ के साथ बात करते हुए सुना। उसकी तो जैसे बिना मांगे ही मुराद पूरी हुई, ऐसा तोहफा मिला। बेशकीमती तोहफा उसकी जिंदगी का।

उसने समीर के मोबाइल पर कॉल किया। वैसे दोनों कभी-कभार फोन पर बात कर लिया करते थे, इसलिए आरती का फोन आने पर उसे कोई अचरज ना हुआ।

आरती- "हाय !"

समीर- "हाय।"

आरती- "कहाँ हो।"

समीर-"ऑफिस में।"

"अच्छा सुनो ना। आज शाम को मिलते हैं।" आरती ने बडे़ ही मीठे लहजे में बात की, समीर इन्कार ना कर सका।

"ठीक है, मैं बाग में इन्तजार करता हूँ। फिर मैं ही घर छोड़ दूँगा।" समीर हमेशा ही आरती की बहुत परवाह करता था। और जब भी शाम होती, उसे अकेली जाने ना देता, स्वयं घर छोड़ देता।

आरती ने खुश होते हुए, "हाँ, ठीक है, चलेगा। अब तो तुम ही मुझे कहीं छोड़ दिया करोगे।" बोल दिया, पर समीर ने ये बात बगैर सुने फोन रख दिया।

शाम को दोनों बाग में मिले।

समीर- "बोलो, क्या बात है, क्यों मिलना चाहती थी।"

"समीर तुमसे एक बात कहनी। हाँ, पता नहीं घर जाकर तुमसे क्या पूछा जायेगा, या क्या कहा जायेगा, उसके बाद तुम क्या फैसला लेते हो। लेकिन इन सब से पहले मैं अपने दिल की बात कह देना चाहती हूँ।" आरती कह रही थी, और समीर सुन रहा था। अगले ही पल-

"समीर, आई लव यू।" आरती के मुँह से सुनते ही समीर की आँखें फटी की फटी रह गयी।

"हाँ समीर, मैं तुमसे तब से प्यार करती हूँ, जब से बचपन की दहलीज पार की, तुमसे प्यार करते-करते ही बड़ी हुई हूँ। तुम्हारे साथ घर बसाने के सपने देखते-देखते सोई भी हूँ और नींद से जागी भी हूँ। यह मेरा सिर्फ सपना ही नहीं, मेरी ज़िन्दगी है, मेरी साँस है, इसे मत छीनना।" और आरती की आँखे डबडबा गईं। उन्हीं डबडबाई आँखो से वह समीर की बाइक की तरफ चल दी।

कुछ पल मानो जैसे समीर के पैरों को लकवा मार गया। किंतु अगले ही पल, हो रहे अंधियारे ने उसे होश में लाते हुए, उसके पैरों में जान भर दी। वह चुपचाप बाइक स्टार्ट करने लगा तो आरती भी बगैर कुछ बोले, उसके इशारे को समझते हुए, कांधे पर हाथ रख बैठ गयी।

आरती की वह छुअन समीर को मीठी लगी।

आरती को बाहर ही रास्ते पे छोड़कर, जब तक वह घर के भीतर दाखिल ना हुई, समीर वही खड़ा रहा।

और आरती के भीतर जाते ही, समीर अपने घर लौट आया।

रात को खाने की मेज पर माँ और बाबूजी ने शादी के बारे में सीधी ही बात शुरू की, "समीर , हमने आरती के साथ तुम्हारी शादी तय कर दी।" पिताजी के मुँह से आरती का नाम सुनते ही, समीर के खाना खाते-खाते जोर से खांसी का झटका लगा।

पिताजी- "क्यों, क्या हुआ। पानी पिलो।"

पानी की घूँट पीते हुए, समीर सर नीचे झुकाए, शाम जो आरती ने कहा, उस बात को सोचने लगा।

"अच्छा तो ये बात है, आरती उस वक्त यही कहना चाहती थी।"

पिताजी- "क्या तुम्हें ये रिश्ता मंजूर है, या नहीं ?"

"हम सुबह बात करेंगे इस विषय पर।" इतना कहते हुए समीर अपने रुम की तरफ चला गया।

बिस्तर पर पड़े समीर की आँखों के सामने अब बारी बारी दो चेहरे आने लगे, कभी बरखा तो कभी आरती।

बरखा का चेहरा कुछ धुँधला-सा होता चला गया। किंतु पूरी तरह से मिट नहीं पाया। शाम को मिली, पीले रंग की सलवार-कमीज और खुले लंबे बालों की आरती की वही मूरत उसकी आँखो में उभरने लगी, जब आरती ने, "हाँ समीर, मैं तुमसे तब से प्यार करती हूँ, जब से बचपन की दहलीज पार की, तुमसे प्यार करते-करते ही बड़ी हुई हूँ। तुम्हारे साथ घर बसाने के सपने देखते-देखते सोई भी हूँ और नींद से जागी भी हूँ। यह मेरा सिर्फ सपना ही नहीं, मेरी ज़िन्दगी है, मेरी साँस है, इसे मत छीनना।" डबडबाई आँखो से समीर से कहा।

बार-बार यही बात और आरती का चेहरा उसकी आँखो के आगे आने लगा।

"पता नहीं, मैं सही सोच रहा हूँ, या गलत। माना के आज भी बरखा मेरे दिल में बसी है, लेकिन वह मेरे बारे क्या सोचती है, मुझे यह भी तो पता नहीं। और ना जाने कहाँ है, कभी मिलेगी भी या नहीं। माना मैं बरखा से प्यार करता हूँ, परंतू आरती....!! वह तो मुझसे प्यार करती है। जरूरी तो नहीं, मेरा प्यार मुझे ना मिले, तो आरती को भी उसका प्यार ना मिले। और ना यह भी जरूरी है, की हम जिससे प्यार करते हैं, वह भी हमसे प्यार करे। अगर मुझे बरखा नहीं मिलती तो इसका मतलब यह नहीं, मैं आरती की खुशियों का गला घोट दूँ, उसे शादी से मना कर के। मेरे बचपन की साथी है, मैं उसके घरौंदे के सपने को तोड़कर उसे कष्ट नहीं दे सकता। चाहे मुझे मेरी चाहत दफनानी पड़ी तो भी चलेगा।"

सुबह घर से निकल रहे समीर से फिर एक बार, "तो क्या जवाब है तुम्हारा ?" बाबूजी ने पूछा।

"जैसा आप लोग ठीक समझें।" समीर ने मुस्कराते हुए कहा।

"सच...!" माँ खुशी से उछल पड़ी।

समीर सिर हिलाते हुए निकल गया।

समीर और आरती के शादीशुदा जीवन हँसते हुए गुजर रहा था, समीर के दिल के कोने में छुपी बरखा कभी-कभार बाहर आ ही जाती थी।

जिस कंपनी में समीर काम करता था, उसकी पार्टनर और एक कंपनी थी।

समीर अब सीइओ के पद पर कार्यरत था।

एक दिन दोनों कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर और अधिकारीयों की मीटिंग रखी गयी।

समीर निर्धारीत वक्त पर उपस्थित हो गया। राउंड टेबल पर सभी अपनी-अपनी जगह बैठे थे। बस केवल एक ही कुर्सी खाली थी। और सब उसी कुर्सी पर बैठने वाले इंसान के आने का इंतजार कर रहे थे।

हॉल का दरवाजा खुलते ही किसी के दाखिल होने की आहट के साथ सभी खड़े हुए तो समीर भी खड़ा हुआ।

और जब वह इंसान कुर्सी पर आकर बैठा तो समीर और उसकी नजरें एक दूजे से टकराईं। वह कोई और नहीं बरखा ही थी।

दोनों की नज़रें मिलते ही, दोनों ने मुस्कराते हुए एक दूसरे को पहचानने के संकेत दिए, किंतु ऑफिस वर्क में पर्सनल बातें करना उन्होंने मुनासीब नहीं समझा।

बरखा को ऐसे अचानक सामने पाकर, समीर पूरा वक्त अलग ही दुनिया में खोया रहा।

जो इतने सालों से उसके जेहन में बैठी है, वो आज अचानक उसके सामने बैठी थी।

"आखिर वक्त ने हमें एक दूजे के सामने ला खड़ा किया ही। ये कैसा संयोग है, क्या है वक्त के पेट में हमारे लिये, कहाँ थी अबतक, कैसी थी। " ना जाने ऐसे कितने सवालों ने समीर के दिल में घर कर लिया। और बार-बार उसकी नज़रें बरखा से टकराती। बरखा की नज़रें भी जवाब दे रही थी कि, "हाँ। मुझे भी बहुत कुछ कहना है।"

मीटिंग खत्म हुई। सब बाहर निकले, समीर ने बरखा के पास जाकर, "क्या हम बाहर कही कॉफ़ी पीने चल सकते हैं।" पुछा तो फौरन ही, "हाँ। बिलकुल चल सकते हैं।" बरखा ने जवाब दिया। और दोनों बाहर चल दिये।

होटल के टेबल पर बैठते ही समीर ने सवालों का अंबार लगा दिया।

तौ "एक साथ कितने सवाल। बताती हूँ।" उसी सादगी के साथ हँसते हुए बरखा बोली।

कॉलेज खत्म होने पर वह अपने पापा के साथ, उनके बिज़नेस के सिलसिले से विदेश टूर पर गयी। जहाँ वह उनके साथ बिज़नेस के बारे में जो जान पायी, उससे बिज़नेस में उसकी रूची निर्माण हो, उसने पापा के साथ काम करने की इच्छा जताई तो ,"ठीक है। पर तुम्हें मेरे साथ पहले काम सीखना होगा।" पापा ने शर्त रखी।

बरखा- "मैं तैयार हू पापा।"

पापा- "इसके लिए नये प्रोजेक्ट के पूरे होने तक, तुम्हें मेरे साथ विदेश रहना होगा।"

बरखा- "हाँ, मुझे वह भी मंजूर है।"

और जब वह व्यवसाय की बारीकियाँ सीख गयी, तो उसके पिता ने उसे कंपनी की सीइओ बनाकर भारत वापस बुला लिया।

बरखा उसी कंपनी की सीइओ थी, जो समीर के कंपनी की पार्टनर कंपनी थी, और समीर भी एक शाखा के सीइओ के पद पर कार्यरत था।

"तब तो मुलाकातें होती रहेंगी।" समीर ने कहा।

बरखा- "हाँ, जरूर।"

और दोनो वापस चल दिये।

आज फिर बरखा से मिल समीर की पहली मोहब्बत फिर से सर निकालने लगी। जो अब तक किसी कोने में दबी पड़ी थी।

आरती की शादीशुदा ज़िन्दगी खुशहाल चल रही थी। समीर ने हमेशा एक अच्छे पति की जिम्मेदारी पूरे दिल से निभायी थी। आरती अपने जीवन में खुश थी।

कभी-कभी काम के सिलसिले से होने वाली समीर और बरखा की मुलाक़ात बीच-बीच में यूहीं होने लगी। समीर के अपने कार्य में होशियार होने के साथ ही, बरखा को उससे काम के संदर्भ में नयी बातें सीखने मिलती।

समीर के टैलेंट से बरखा प्रभावित होने लगी।

बरखा के जीवन में अभी तक किसी का प्रवेश नहीं हुआ था। और अब वह अपने काम को भी अच्छे तरीके से सिख गयी। वह जब भी समीर के साथ या समीप होती, उसे समीर का साथ अच्छा लगता। उसके मन को समीर की निकटता भाती। और दूर होने पर, रात के अंधियारे में, उसके साथ बिताये पल याद आते ही, बेचैन हो उठती।

"ये आजकल मुझे हो क्या रहा है। क्यों समीर की तरफ खिचती जा रही हूँ। क्यों उसका साथ अच्छा लगता है, कहीं मैं...!! समीर से प्यार करने तो नहीं लगी...! कल उसी से पूछती हूँ।" बरखा सोचते हुए सो गयी।

फोन पर समीर- "हेलो।"

बरखा- "हेलो, गुड मॉर्निंग।"

समीर- "गुड मॉर्निंग।"

"अच्छा सुनो ना।" बड़े ही लाड़ से बरखा।

"हाँ। सुनाओ ना। हम तो सुनने के लिए तैयार हैं।" समीर भी शरारत भरी बातें करने लगा तो बरखा ठहाका मारते हुए हँस पड़ी।

बरखा- "अच्छा सुनो, मिलने आ सकते हो।"

समीर- "जरूर, बोलो कहाँ आना है ?"

बरखा- "ऑफिस में ही आना है।"

समीर- "ओके, कुछ देर में पहुँच जाता हूँ।"

जब समीर बरखा के कैबिन में दाखिल हुआ, तो उसे इन्तजार करते पाया।

"हाय" समीर ने अंदर दाखिल होते हुए बरखा की ओर देखते हुए कहा।

उसे सामने पाते ही, बरखा का चेहरा खुशी से खिल उठा।

"क्या बात है, बहुत खुश दिख रही हो।" समीर कुछ पल बगैर पलके झपकाए बरखा को देखने लगा। दोनों की नजरें मिली, और बरखा का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। धड़कते दिल के साथ सीना ऊपर नीचे होने लगा जो समीर की नजरों से छिप न पाया। एक पल के लिए, समीर अपना वजूद भूलकर फिर से एक बार अपनी दबी मोहब्बत के गिरफ्त में आ गया। उसके दिल ने कहा, "बरखा के सीने में धड़कता दिल तुम्हारा ही है। तुम्हारे लिये ही धड़क रहा है।" अपने सीने में उमड़ती भावनाओं पर वह काबू पाता, तब तक बरखा ने समीर का हाथ पकड़कर धड़कते सीने से लगा लिया। बरखा का वह स्पर्श समीर को अपनी चाहत के और करीब ले गया। वह पूरी तरह चाहत की गिरफ्त में खो चुका था।

"समीर, ये दिल क्यों इतनी जोरो से धड़क रहा है ?" बरखा कुछ मदहोश-सी।

"क्यों ?" समीर भी उतना ही मदहोश था।

"शायद मैं तुमसे प्यार करने लगी हूँ।" बरखा ने प्यार का इजहार किया तो, "और मैं तो तुमसे सालों से प्यार करता हूँ।" समीर ने भी अपने प्यार का राज खोल दिया।

"समीर..." और दोनों एक दूजे की बाहों में समा गए।

"हाँ बरखा, मैं तुमसे कॉलेज के जमाने से प्यार करता हूँ, चाहता हूँ। ना तब भुला सका, जब तुम मुझसे दूर थी, और ना अब भूला सका जब तुम लौट आयी।"

दोनों तरफ प्यार के जज़्बात सुलगने लगे। दिन आते जाते रहे। दोनों के बीच प्यार की बातें, नोकझोक चलती रहती।

समीर का शादीशुदा जीवन था। घर पर होने पर आरती साये की तरह उसके साथ मंडराती। पर बरखा अकेली थी। वह पूरी तरह समीर के प्यार में गिरफ्त हो चुकी थी। वह जब भी घर पर अकेली होती, समीर को जेहनी तौर पर साथ-साथ पाती, और इसके साथ ही, अब वह घर गृहस्थी के सपने संजोने लगी। उसके सपनों में वह रानी होती और समीर राजा होता।

दिनोदिन उसकी यह चाहत जोर पकड़ने लगी, और एक दिन , "समीर। मैं घर बसाना चाहती हूँ।" जब उसने कहा तो समीर हक्का-बक्का हो उसे देखता रहा।

"ऐसे क्या देखते हो। सच, मैं तुम्हारे साथ घर बसाना चाहती हूँ।"

समीर उसके जज्बातों की कद्र करते हुये चुपचाप सुनने लगा।

बरखा- "तुम चुप क्यों हो ?"

फिर भी समीर चुप।

बरखा- "क्या हुआ ?"

समीर- "कुछ नहीं।"

बरखा "फिर तुम चुप क्यों हो ?"

"चलो, मैं चलता हूँ। फिर मिलते हैं।" कहते हुए समीर ने वेटर को बुलाकर बिल दिया। और,

"चलो तुम्हें छोड़ देता हूँ।" बरखा से कहने लगा।

बरखा- "नहीं मैं चली जाऊँगी, गाड़ी है।"

"गाड़ी ड्राइवर ले आयेगा।" समीर ने जब कहा तो बरखा उसके पीछे चल दी।

आज दोनों के बीच खामोशी ने शिरकत की।

समीर जब घर आया तो, आरती उसे देखते ही गले पड़ गयी। दिल कहीं खामोश था, मगर फिर भी समीर अपनी खामोशी छुपाते हुए, उसके सर को सहलाते हुए कमरे में दाखिल हुआ।

"क्या बात है, थक गये हो।" आरती पति को निहारती हुई बोली।

समीर- "हूँ, थोड़ा-सा।"

"अगर मैं ऐसी खबर सुनाऊँ, जो तुम्हारी थकावट भगा दे, तो !" आरती शरमाते हुए बोली।

"तो...!" समीर ने उलटा सवाल किया।

आरती- "तो क्या दोगे ?"

समीर- "क्या चाहिये ?"

आरती- "मैं जो माँगू, दोगे ?"

समीर- "हाँ, पहले बताओ तो।"

आरती ने मेज पर रखा एक लिफाफा दिया, जिसे समीर गौर से पढ़ने लगा। और पढ़ते ही, "सच...!!" चिल्ला उठा, तो आरती शरमा गयी।

वाकई, आरती के प्रेगनेंसी की रिपोर्ट पढ़ते ही समीर की सारी थकावट भाग गयी। उसने आरती को बाहों में भरते हुए चूम लिया।

"अब लाइए मेरा इनाम।" आरती शरारती अंदाज में !

समीर- "बोलो क्या चाहिये तुम्हारा इनाम ?"

बस इतना सुनते ही आरती भावुक हो उठी।

और समीर का हाथ थामते हुए, "कुछ नहीं, मेरी माँग आपके सिंदूर से यूहीं सजी रहे। मेरी आखरी साँस तक आपके हाथों में मेरा हाथ रहे। और आपके कंधे पर ही मेरी अर्थी निकले...!" "आरती !!!" समीर ने उसके मुँह पर हाथ रखते हुए चुप कराया, और सीने से लगा लिया।

रात समीर की आँखों से नींद जैसे मीलों दूर उड़ गयी।

कभी बरखा की बातें याद आती उसे, तो कभी आरती की।

पर जीत तो केवल एक ही रिश्ते की होनी थी। वह रिश्ता जिससे एक नयी जान इस दुनिया में कदम रखने वाली थी।

कुछ दिनों से समीर और बरखा के बीच चुप्पी छायी थी।

आखीरकार एक दिन ,"समीर क्या हुआ ? तुम मुझसे बात नहीं कर रहे। मुझे तुमसे मिलना है।" बरखा ने फोन कर बात की।

समीर- "शाम को मिलते हैं।"

बरखा- "नहीं मैं अभी आती हूँ। कहाँ हो ?"

समीर- "ऑफिस !"

बरखा- "ठीक है, वहीं रुकना, मैं आ रही हूँ।"

कुछ देर बाद वह समीर की कैबिन में थी।

बरखा- "समीर, क्या हुआ ? मुझे जवाब नहीं दिया।"

समीर- "किस बात का ?"

बरखा- "वही जो मैंने कहा था। मुझे घर बसाना है।"

समीर- "अच्छी बात है, बसाओ।"

बरखा- "समीर...!! तुम समझते क्यों नहीं। मैं सिर्फ तुमसे प्यार करती हूँ। और तुम्हारे साथ घर बसाना चाहती हूँ।"

समीर- "ये नामुमकीन है, हम ऐसा नहीं कर सकते।"

बरखा- "पर क्यों ?"

समीर- "क्या तुम जानती नहीं, मेरी शादी आरती से हो चुकी है।"

बरखा- "तो।"

समीर- "तो हम शादी कर घर बसा नहीं सकते।"

समीर की ये बात सुनते ही बरखा तिलमिला उठी।

बरखा- "इसका मतलब तुम मुझसे प्यार नहीं करते। मैं ही बेवकूफ हूँ।"

इससे पहले की समीर कुछ कहता, बरखा तिलमिलाती हुई वहाँ से चल दी।

"रुको, बरखा रुको।" समीर ने पीछे से आवाज देते हुए रोकने की कोशिश की, किंतु वह चल दी।

समीर हताश हो बैठ गया। लेकिन उसका मन किसी काम में लग नहीं रहा था।

वह उठ खड़ा हुआ और बाहर चल दिया।

समीर ने बरखा के कैबिन में देखा पर वह नहीं थी। उसने फोन भी किया, लेकिन फोन भी स्विच ऑफ आने लगा।

समीर ने बरखा के घर की तरफ कार दौड़ाई। वह घर पर अकेली ही थी। रोने से उसकी आँखें लाल हो चुकी थी।

"बरखा..!" समीर ने दरवाजे पर टिकटिकी देते हुए आवाज लगाईं।

"तुम क्यों आए हो।" बरखा गुस्से से बोली।

समीर- "ये क्या बचपना है।"

"हाँ, यह बचपना ही तो है। जो मैं तुमसे प्यार करने लगी। तुम्हारे प्यार में होश खो बैठी...! हाँ ये बचपना ही तो है, जो तुम्हारे प्यार की बातों को सच समझ बैठी...! ये बचपना ही तो है, जो तुमसे शादी कर घर बसाने के, साथ-साथ रहने के सपने सजाने लगी, अरमान संजोने लगी।" बरखा फूट-फूट कर रोते हुए कहती रही, और समीर सुनता रहा।

कुछ देर बाद अपने आपको शांत कर, " समीर आखिर दिक्कत क्या है, हम क्यों एक नहीं हो सकते ?"

समीर- "क्योंकि पहले ही शादीशुदा हूँ, आरती मेरी पत्नी है।"

"हाँ तो ठीक है ना। देदो उसे तलाक। निकाल दो अपनी जिंदगी से।" बरखा चिढ़-सी गयी।

समीर- "नहीं, ये नहीं हो सकता।"

"क्यों ? क्यों नहीं हो सकता ? क्या तुम आरती से प्यार करते हो, और अगर उससे प्यार करते होते, तो मुझसे प्यार क्यों करते हो। या फिर मुझसे प्यार नहीं करते, यह सब झूठ था।" बरखा के दिलो दिमाग पर नफ़रत हावी होने लगी।

"नहीं, ऐसा नहीं है। तुम मेरी चाहत हो। लेकिन आरती मेरी पत्नी है। मेरे होने वाले बच्चे की माँ, मेरी कुछ मर्यादायें हैं।" समीर के मुख से यह सब सुनते ही बरखा के दिमाग में धमाके से उड़ने लगे। और समीर उसकी तरफ ध्यान ना देते हुए कहे जा रहा था।

"मैने तुम्हें प्यार किया, तुम्हारे दिल को कोई चोट लगे, यह मैं नहीं देख सकता। इसका मतलब ये नहीं, कि मैं आरती को कोई चोट लगने दूँगा। माना मैंने तुमसे प्यार किया। लेकिन ये भी सच है, आरती ने मुझसे प्यार किया और करती है। जितनी मैं अपने प्यार की कद्र करता हूँ, उतनी ही आरती के प्यार की।"

वहाँ कुछ पल सन्नाटा-सा छाया हुआ था। लेकिन ये खामोशी साधारण नहीं थी। ये आने वाले तूफ़ान की चेतावनी थी। वो तूफ़ान जो बरखा के रुह में भीतर से बह रहा था, शायद लावा बनकर फुटने वाला था।

फिर एक बार, समीर खामोशी को तोड़ते हुए,

"बरखा प्यार का मतलब वह नहीं जो तुम चाहती हो। प्यार का मतलब सिर्फ लेना ही नहीं, प्यार का मतलब तो देना होता है। तुम मुझसे और मैं तुमसे प्यार करता हूँ, इसका मतलब ये नहीं, कि हम साथ-साथ रहें। या आरती को अकेला कर दूँ। मैं तुमसे प्यार करता हूँ, यह जानकर अगर आरती स्वयं मेरे जीवन से दूर होना चाहे तो मैं उसे रोकूँगा नहीं। लेकिन तुम्हें पाने के लिए, उसे ज़िन्दगी से निकाल नहीं सकता। पास रहना और साथ-साथ रहना ही प्यार नहीं होता।"

समीर के पीठ पीछे बरखा यह सुन रही थी, समीर को क्या पता था, कि अगले ही पल वहाँ जो शांति है, वह जलजले में बदलने वाली है।

समीर कहे जा रहा था, और बरखा गुस्से से आगबबूला हो, मेज के ड्रार में कुछ ढूँढने लगी। जिसके खड़खड़ाहट से समीर ने पीछे मुड़ कर देखा, तो उसकी आँखे फटी की फटी रह गईं। बरखा ने तब तक छोटी पिस्तौल ढूँढ ली। समीर ने सोचा भी नहीं था, कि वह ऐसा कोई कदम उठाएगी। और घर में पिस्टल होना, बरखा के लिए कोई अचरज वाली बात नहीं थी। आखिर वह बड़े उद्योगपती की इकलौती संतान थी।

समीर ने लपकते हुए, बरखा के हाथ से पिस्टल छीननी चाही, तो हाथापाई और लड़खड़ाहट में बरखा के हाथों ट्रिगर दबा, लेकिन उसका रुख समीर की बाँह की तरफ था, गोली चल गई, तब तक पिस्टल समीर के हाथ में भी आ चुकी थी, और उसकी बाँह में गोली भी लग चुकी थी।

कुछ ही वक्त पहले जो गुस्सा बरखा के सर चढ़ बोल रहा था, अब वह डर, घबराहट में तब्दील हो गया, जिसे उसने दिलो जान से चाहा, उसे जख्मी कर, उससे जुदा होने के एहसास ने ,उसे और भी सख्त कदम उठाने पर विवश कर दिया। दिल में मायूसी के साथ प्यार से बिछड़ने के गम ने उसे पूरी तरह घेर लिया। और बगैर कुछ सोचे उसने अंगूठी में जड़े हीरे को हलक से नीचे निगल लिया।

और..... वहाँ अंधेरे के साथ-साथ सन्नाटा फैलने लगा।

जब समीर की आँखे खुली तो वह अस्पताल के बिस्तर पर था।

आरती उसके सामने रखे स्ट्रेचर पर बैठी थी।

यह सब याद आते ही, समीर ने खड़े होते हुए, फिर एक बार कांच से भीतर झाककर देखा। बरखा ऑक्सीजन मास्क चढ़ाए वैसे ही पड़ी थी।

समीर को काफी थकावट महसूस हुई और वह अपने कमरे में लौट बिस्तर पर सो गया।

अगली सुबह आँख खुली तो दिन निकल चुका था। आँख खोलते ही उसने आरती को सफेद साड़ी में सामने पाया।

"क्या हुआ ?" समीर के पूछने पर आरती उसका हाथ थामे वहाँ ले गयी। जहाँ बरखा को सर से पाँव तक सफेद चादर से ढककर बाँध रखा था, लाश की तरह।

लाश की तरह नहीं वह तो लाश ही थी, "कुछ अधूरे रिश्तों की !"

समीर- "नो.........!!!"

और आरती के हाथों में मुँह छिपाकर रोने लगा।

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