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मारवाड़ी सा
मारवाड़ी सा
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© Akshay Gupta

Inspirational

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गर्मी के तीक्ष्ण मौसम में, अचानक छाये काले बादलों को देखकर बृजमोहन जी मंदिर की सीढ़ियां जल्दी-जल्दी उतरने लगे, तभी ..एक गहरी, झुंझलाहट भरी आवाज़ ''अरे ओ , मारवाड़ी सा। मारवाड़ी... सा ।''

हवा की सोंधी गन्ध में बस गयी । पलटकर देखा तो, एक बुढ़िया झुर्रियों से लदी हुई थी। बुढ़िया बोली , डोकरी को रोटा तो खिला दे । बृजमोहन जी ने जेब से 10 रूपये का नोट निकालते हुए कहा 'अरे माई रोटी तो नहीं है, यही ले ले । कमर से सटी थैली में 10 का नोट रखते हुए बुढ़िया बोली , नवे आयो हो सा ।

बृजमोहन जी - हाँ आज ही मेरा तबादला... । इतने में बृजमोहन जी के बेटे ने आकर कहा - पिताजी । ये कॉलेज के न्यू कोर्स के पेपर है अभी ऑनलाइन भेजना है साइन कर दीजिए । बृजमोहन जी ने फटाफट साइन कर दिए। बेटा चला गया ।

बुढ़िया ये देखकर फिर बोली, टाबर है न थारो । इतनो भरोसो अच्छो कोणी होवे ।

बृजमोहन जी - (बड़े गुस्से से ) बेटा है मेरा, भरोसा न करूँ ?

बुढ़िया - (हँसते हुए ) हवा की गन्ध अच्छी है मारवाड़ी सा, बड़ी अच्छी है, पर घणी जल्दी बदल जावे है ये हवा , यो मौसम ही देख लो।

टाट का थैला सर पर बिछाए बुढ़िया चल दी। बृजमोहन जी भी जल्दी जल्दी कदम बढ़ाने लगे। मंदिर के बाहर बृजमोहन जी को उनके बेटे ने एक छाता ला दिया ।

बेटा- पिताजी, मुझे साइबर जाना है ।

बृजमोहन जी - बेटा ! बाकी फ़ाइल तो दे दे। यदि बारिश हो गयी तो ?

बृजमोहन जी ने छीनकर फ़ाइल ले ही ली। छाता पाकर अब वे सुकून से धीरे धीरे, 'देल्ही में रहने के बावजूद बेटा कितना संस्कारी है सोच लिए चल रहे थे । एकाएक तेज़ बारिश शुरू हुई वे चौक पर लगी मूर्ति के सहारे खड़े हो गए। मूर्ति पर नजर गिरी तो मूर्ति हूबहू मंदिर की बुढ़िया जैसे ही थी। जिस पर स्वर्गीय हवई सेठानी छज्जू सा मारवाड़ी लिखा था। अब तो बृजमोहन जी के जैसे प्राण पखेरू ही उड़ गए हो । डर के कारण छाता और फ़ाइल दोनों जमीं पर। तभी एक आवाज आई, ओ मारवाड़ी सा फ़ाइल कोई काम की कोणी होवे । उसी बुढ़िया की आवाज़ सुन बृजमोहन जी थर-थर कांपने लगे। बुढ़िया बोली अरे सा म भुत वूत कोणी हूँ , डरो न सा । ये जो हवा की गंध होवे है न, सा । इससे इंसान भी बदल जावे। म्हारा टाबर भी बदल गया सा । मने जीती को ही मरवा दी और सब लूटी लेग्या । म्हारी याद वास्ते या मूरत ... लड़खड़ाए कदमों से बुढ़िया रोते हुए चल दी। बृजमोहन जी व्यथित होकर फ़ाइल समेटने लगे। भींग हुए कागजों पर नजर टिकी तो कागजों पर कॉलेज टूर लिखा था । बृजमोहनजी की आँखे फटी की फटी रह गयी । तेज़ हवा के साथ संस्कारों का छाता दूर उड़ गया। चारों और बुढ़िया की आवाज़ गूँज रही थी '' हवा की गंध अच्छी है मारवाड़ी सा । बड़ी अच्छी है, पर घणी जल्दी बदल जावे है ये हवा ।

आवाज़ छाता रोटी

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