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अपना अपना भाग्य
अपना अपना भाग्य
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© Birendra Nishad शिवम विद्रोही

Drama

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पुलिस स्टेशन पर दोनों पति व पत्नी परिजनों के साथ बैठे थे। पत्नी बहुत ही गुस्से में थी और इस जिद्द पर अड़ी थी कि इस इंसान के साथ तो आगे की जिंदगी मुझे काटनी ही नहीं है। पति थोड़ा सकुचाया और शरमाया सा था उसके चेहरे पर पछतावा साफ साफ देखा जा सकता था। अभी पिछली ही रात तो शादी की पहली रात थी, कितनी उमंग था इस शादी की मन में। कुछ नाते रिश्तेदार तो अभी गए भी नही थे। माँ अपनी बहू के लिए क्या क्या सोच रखी थी और छोटी बहन तो इस बात से कितनी उत्साहित थी। उसके लिए कितनी प्यारी भाभी मिली है। बाबा तो हर तरह से प्रफुल्लित थे, शायद उनका लाडला अपनी जिम्मेदारी समझे, शायद अब काम काज में हाथ बँटाए, पर इससे पहले की उनकी उम्मीदें पूरी होती बहू और बेटा पहली ही रात झगड़ा कर बैठे।

उधर दुल्हन बन कर आई 'कजरी' अपने बाबा की कितनी लाडली थी, जिसके सारे के सारे सपने चकनाचूर होने की कगार पर आ गए। कैसी विडंबना है, क्या क्या सपने देखे थे, दादी माँ की कहानी का राजकुमार घोड़े में बैठाकर सपनों के महलों में ले जाएगा। उसकी हर बात मानेगा, उसके साथ हँसी मजाक करेगा। पर यह क्या ? वह तो पहली ही रात हिंसा पर उतारू हो गया और वो भी इतनी छोटी सी बात पर।

उसने किया ही क्या था ? यह तो उसका हक था। उसने सिर्फ अपने पति को ही तो गुदगुदी की थी। अब पति यदि चारपाई से गिर कर जांत की मुठिया (आटा चक्की के हैंडल) पर टकरा गया तो उसकी क्या गलती थी। इस बात पर इतना हिंसक होना कहाँ तक जायज था। पति भी क्या करता, वह उस समय से ग्लानि तो महसूस कर रहा है। आज पहली बार किसी ने उसके पुरुषार्थ को झकझोरा था, वो भी इस हद तक। क्या यह उसको मिले लाड़ प्यार का नतीजा था ? इस समाज ने शुरुआत से लड़कों को सिर पर बैठा रखा है। बात बात पर हिंसक हो जाना, तो इनकी फितरत में है। ना जाने अपने जीवन में किस बात का गुरुर समेटे हुए हैं। जब कि इनकी हैसियत किसी नाली पर पड़े घुंघराले बाल के बराबर भी नहीं है। आज पति को अपनी असली औकात समझ आ गयी थी। अब वह पश्चाताप कर रहा था, अपने भाग्य पर, अपने परिवेश पर।

कितना ही वह असहाय महसूस कर रहा है। काश उसकी माली हालात इतनी खराब न होती, वह शादी करने से पूर्व ही अपने लिए एक अलग कमरा बना लेता। यह सब उसकी माली हालात की वजह से ही हो रहा है। भला कहीं ऐसा भी होता है एक ही कमरे में रसोई, जाँत इत्यादि अति आवश्यक घरेलू समान हो और उसी कमरे मे नए जोड़े को पहली रात गुजारने को दे दिया जाए। कुल मिला कर दो कमरे की झोपड़ी ही तो उसका मकान था। एक कमरे मे शादी मे शरीक होने आई महिलाएँ ठहरी थीं और दूसरा, जो की रसाई कम स्टोर था, उसके हवाले कर दिया गया था। जहाँ ये दुर्घटना हो गयी।

पत्नी जिसे अक्सर इस संसार ने सहिष्णु समझा है, वह तो पूर्ण असहिष्णुता की मूर्ति दिख रही थी। आज नारी जब पुरुष के अंस से अंस मिला कर चलती है, तो वह अकेले ही क्यों सहिष्णुता दिखाये। पति भी तो सहिष्णु हो सकता था, वह क्यों हिंसक हो गया। इस उधेड्बुन में वह अपने हठधर्म पर अड़ी थी। अब तो यह शादी जहर की एक्स्पायरी डेट लगने लगी थी। वाकई इस मामले में सरकारी मुलाजिम थाना प्रभारी की सोच काबिले तारीफ़ थी, उसने समझाने की हर संभव कोशिश की अंततः दोनों को एक महीने अलग अलग रहने का मौका दिया और घर वालों को समझाया कि इनको अपने आप नतीजे पर पहुँचने दें किसी तरह की जोर जबरजस्ती न करें।

समाज में तरह-तरह कि चर्चाओं का बाजार गरम हो गया था। किसी को पत्नी बदचलन लगने लगी थी, तो किसी को पति क्रूर। आज अगर मुंशी प्रेमचंद होते तो उन्हे अपने कहे पर पछतावा जरूर होता कि स्त्री में पुरुष के गुण आ जाए तो वह कुलटा हो जाती है जबकि पुरुष में स्त्री के गुण आ जाए तो वह महान बन जाता है। आज तो कुछ हद तक स्त्री में पुरुष के गुण दिखने लगे थे कि उसने प्रतिरोध करना सीख लिया है। जबकि पुरुष पश्चाताप व ग्लानि महसूस कर रहा था जिन्हें शास्त्रों में स्त्री के आभूषण समझे गए हैं, तो क्या पति को महान कहा जा सकता है ?

यह कहानी किसी एक दम्पति की नहीं है वरन इस इलाके के हर घर की कहानी है जहाँ पुरुष, स्त्री पर अपना हक़ समझता है। उसे वह अपने पैर की जूती तक समझ बैठता है जिसे वह जब जैसे चाहे पहन सकता है। इसीलिए ग्रामीण इलाकों में स्त्री के साथ घरेलू हिंसा आम बात है। स्त्री भी इसे अपना भाग्य समझकर आजीवन सहती रहती है। आज इलाक़े में यह चर्चा का विषय है।

बड़े बूढ़े कह रहे थे, “इ खेलौना (खेलावन) की पतोहू के चालै चलन ठीक न रहे होइ हैं। तवहिंन आये इ नौटंकी फैलाइस है। जब याहे करैं का रहा तो वोई का बाप विवाहवे कहे किहिस रहा। पहिलेंन जहाँ जाएं का होत जाएं दया।"

कुछ तो कह रहे थे:- “इ पढ़ाई लिखाई से इहै होइ। इं चार अच्छर पढ़ि का लिहेन बाप दादा के नाक कटा दया हैं। ऐहिस से ईं छोकरियन का ज्यादा पढ़ा लिखा के सर मा न चढ़ावैं का चाह।" जबकि इसके विपरीत युवाओं के बीच यह चर्चा हो रही थी कि “ई सजीवना (सजीवन) जा दिमागे खराब है। भला पहिलेंन रात कउनो अपने मेहरारू का मारत पीटत है। फिर ससुर जब मरबै भा रहा तो ढंग से कूटिन ल्यात। उ ससुरी तो चलीन गे रहै।“

पर सजीवन अपने आप में काफी शर्मिंदगी महसूस कर था। उसे पश्चाताप हो रहा था कि उसने उस रात हाथ क्यों उठाया। उसे भी अपनी पढ़ाई लिखाई पूरी करनी चाहिये थी। पर बेचारा कहाँ से पढ़ाई कर पाता। दो बीघा खेत ही तो उसकी आय का जरिया थे। वो भी जब पूरा परिवार रात दिन मेहनत करता। ऊपर से स्कूल की दूरी। उसके घर से प्राइमरी स्कूल दो किलोमीटर दूर था तभी तो पांचवी जमात तक पढ़ाई किसी तरह से पूरी कर ली थी। पर इसके ऊपर आठवीं तक का स्कूल उसके घर से 5 किलोमीटर दूर था जहाँ अगर वह पढ़ने जाता तो लौटकर परिवार का हाथ नहीं बंटा सकता था। इन परिस्थितियों में पढ़ाई करना दुसाध्य था। सजीवन परेशान था और सोच रहा था कि उसे किसी की जिंदगी बर्बाद करने का कोई हक़ नहीं है अतः वह कजरी को छोड़ देगा। वह पढ़ी लिखी लड़की है। उसने जमाना देख रखा है। सजीवन ने निश्चय किया कि वह कजरी के पास जाएगा उससे बात करेगा। अगर वह नहीं आना चाहती तो उसे बिलकुल भी परेशान नहीं करेगा........


स्त्री पुरुष अहंकार

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