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प्रोटोकॉल
प्रोटोकॉल
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© Jainandan Jamshedpur

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 जूसी के ऑफिस में ज्वाइन करने के पहले ही चप्पे-चप्पे में कई तरह की कानाफूसी और चर्चा व्याप्त हो गयी। पता नहीं किस दरार, फांक अथवा एंटेना से यहां की खोपडियों ने सूचनाएं रिसीव कर लीं।

 

अप्पा राव ने अपनी ही सीट से बैठे-बैठे प्रसारित किया, ‘‘जानते हो राधेचन्द्र, मुख्यमंत्री ने सीधे मैनेजिंग डायरेक्टर से कहकर इस लड़की की बहाली करवायी है।’’

 

राधेचन्द्र की जिज्ञासा बढ़ गयी, ‘‘आखिर ऐसा कौन-सा सुर्खाब का पर लगा है इस लड़की में कि मुख्यमंत्री ने इसकी सिफारिश की है? सुनते हैं - न उनकी जाति की है न उनके रिश्ते की।’’

 

‘‘जाति-रिश्ते के अलावा भी कुछ और आधार होते हैं दुनिया में......तुम्हें मालूम नहीं है कि जूसी कितना सुंदर है। जूसी का पति मुख्यमंत्री के सुरक्षा-दल में था, अतः पारिवारिक संबंध बन गया है मुख्यमंत्री से।’’ इस बार सदाव्रत ने अपने ज्ञान का बटुआ खोला।

 

‘‘अच्छा तो ऐही खातिर सीधे ऑफिसर में आ रहल बाड़ी।’’ ऊंघ रहे मधोक ने जागते हुए पूछा।

 

‘‘इसके हुस्न का जादू चल गया तो यहां और भी काफी आगे बढ़ जायेंगी।’’ अप्पा राव ने भविष्यवाणी की।

 

‘‘जानते हो यह लड़की पूरी तरह अंग्रेज है। हिन्दी तो इसे बिल्कुल ही नहीं आती।’’ सदाव्रत ने बटुए से फिर एक गूढ़ तथ्य उद्घाटित किया।

 

‘‘यह तो बड़े गर्व की बात है यार कि उसे हिन्दी नहीं आती। इस ऑफिस के लिए वह बिल्कुल ही फिट साबित होगी। हिन्दी आती तो यह बड़ा ही शर्मनाक होता।’’ बहुत देर से सुनते-सुनते मैंने भी कुछ जोड़ना जरूरी समझा।

 

जूसी के आने के पहले उसकी जो छवि बन गयी थी, हम सभी उससे काफी चिढ़ गये थे.....जल-भुन गये थे। इसलिए कि हम लोग अपनी मेरिट से नियुक्त हुए थे.....हमारे पास कोई सोर्स नहीं था और हम बीस-बीस साल से यहां होने के बाद भी महज दो-एक प्रोन्नति पा सके थे, जहां से ऑफिसर का पद हमसे काफी दूर था। जूसी सीधे ऑफिसर में बहाल हो रही थी और वह भी बिना किसी विशेष योग्यता के। हमारे असह्य होने का एक कारण और भी था कि सोर्स सीधे मुख्यमंत्री ने लगाया था.....भला मुख्यमंत्री का क्या यही काम रह गया है? सूबे का सबसे बड़ा आदमी.....वह आदमी जो रात-दिन सामाजिक न्याय और दबी-कुचली जातियों के उद्धार की बात करता है......वह कैसे-कैसे लोगों का उद्धार कर रहा है।

 

जूसी ने जब ज्वाइन किया तो हम लोग उसके लिबास, उसकी अदा, उसकी सूरत, उसकी भाषा, उसके रंग देखते ही रह गये। उसके आने के पहले हमने फैंटेसी में उसकी जैसी तस्वीर गढ़ी थी, जूसी उससे कहीं ज्यादा थी। ठेहुने तक का मिनी स्कर्ट, अर्द्धपारदर्शी स्लीवलेस टी शर्ट, गर्दन तक कटे लहराते भूरे बाल, ताम्र आबनूसी रंग....मतलब टोटल गेट अप ब्रिटेन मूल की एक खूबसूरत लड़की का।

 

ऑडियो-विजुअल रूम में डिविजनल मैनेजर देवव्रत कुमार ने पूरे स्टॉफ से परिचय कराते हुए कहा, ‘‘जूसी इज ए नॉट ओनली, नाइस लुकिंग गर्ल, बट नाइस पर्सन ऑलसो, आई होप शी विल बी वेरी मच यूजफुल फॉर दिस डिपार्टमेंट।’’

 

मैं सुनकर संशयग्रस्त हो गया.....क्या यूज में आयेगी यह लड़की? पहले ही इस डिपार्टमेंट में बहुत सारे लोग यूजलेस हैं। यह देखना रोचक होगा कि इस लड़की का क्या-क्या यूज किया जाता है।

 

जूसी ने कहा, ‘‘हाय गाइज। आई एम रियली प्राउड टू ज्वाइन दिस कंपनी। आई रिक्वेस्ट ऑल ऑफ यू प्लीज एक्सेप्ट ऐंड को-ऑपरेट मी ऐज ए यंगर मेंबर इन दिस डिपार्टमेंट.....थैंक्यू.....वेरी मच।’’

 

हम सब उसकी नजाकत और पश्चिमीकरण पर कुढ़कर रह गये। को-ऑपरेट करने की बात ऐसे कह रही है जैसे वह यहां पहाड़ ढाने आयी हो। जबकि देखा जाये तो उसे सौंपने के लिए दरअसल यहां कोई काम नहीं था। इस विभाग में जितना काम था उसके लिए छह-आठ जन काफी थे.....लेकिन यहां इसकी परवाह नहीं की जाती थी, चूंकि बड़ी-बड़ी पैरवी से आने वाले को रोकना मुमकिन नहीं था। पैरवीवाले लोग अक्सर बिना किसी स्किल या पेशेवर दक्षता के होते थे और उन्हें ऐसी जगह भी चाहिए होती थी जहां वे बिना कुछ किये हराम की तनख्वाह ले सकें। कंपनी ऐसे निखट्टुओं को लेने से मना नहीं कर पाती थी, चूंकि पैरवीकार के लंबे प्रभावशाली हाथ को अपने खिलाफ करने की जोखिम वह उठाना नहीं चाहती थी। आखिर इतनी बड़ी कंपनी है तो थोड़ी-बहुत भूल-चूक और नाजायज घट ही जाता है और उसका सुराग भी लीक होकर बाहर फैल ही जाता है।

 

इसी तरह एक-एक कर आते-आते इस विभाग में कुल पच्चीस जन हो गये थे और यह एक हिल-स्टेशन विभाग हो गया था। हिल स्टेशन, जहां लोग ऐशो-आराम करने के लिए जाते हैं और अक्सर भीड़-भाड़ बनी रहती है। विभाग का यह आलम ऐसे वक्त में था जब पूरी कंपनी में कर्मचारी कम करने के लिए वालंटियर-रिटायरमेंट स्कीम जोर-शोर से चलायी जा रही थी। चलाने को तो पूरी कंपनी में गुणवत्ता और लागत कम करने का अभियान भी चलाया जा रहा था और इन सारे अभियानों को नेतृत्व देनेवाला हमारा यही विभाग था, लेकिन पालन करने का जहां तक सवाल था, विभाग की स्थिति उन नेताओं के परस्पर विरोधी चरित्र की तरह थी जो परिवार नियोजन पर जोरदार भाषण करते हैं और खुद ही एक दर्जन बच्चे जन कर रख देते हैं......लॉ ऐंड आर्डर पर प्रवचन झाड़ते हैं और अपने प्रतिद्वंदियों की हत्या करवा देते हैं।

 

गुणवत्ता की यहां चरम दुर्गति यह थी कि जिसे हिन्दी में पत्रिका निकालने दी गयी थी उसे हिन्दी का जरा भी ज्ञान नहीं था......जिसे प्रोटोकॉल का जिम्मा दिया गया था, उसे बात करने की तमीज नहीं थी.....जिसे होर्डिंग एडवरटिजमेंट एवं डिजाइनिंग देखने का दायित्व सौंपा गया था, उसे आर्ट क्या होता है, इसका सेंस नहीं था......जिसे डिसिप्लीन एवं एडमिनिस्ट्रेशन संभालने के लिए कहा गया था, वह दो घंटे लेट आता था और अक्सर ऊंघता रहता था।

 

इतनी नालायकी के उपरांत भी सबके एप्रेजल को उत्तम दर्जा दिया जाता था और डबल इंक्रीमेंट अथवा प्रोमोशन का दौर चलता रहता था।

 

चूंकि जूसी को भी कोई काम देना था तो उसे प्रोटोकॉल यानी गेस्ट रिलेशंस दे दिया गया, जिसके तहत कंपनी के कोई भी गेस्ट हों, उनकी देखभाल करना, वर्क्स-विजिट करवाना आदि शामिल था। इस सेक्शन में पहले से ही दो-तीन अनाड़ी अपनी बत्तीसी दिखाने में संलग्न थे (चूंकि गेस्ट को जबर्दस्ती हंसकर दांत दिखाना पड़ता है).....अब उनमें एक बत्तीसी जूसी की भी शामिल हो गयी।

 

जूसी को आये चार-पांच महीने हो गये, हमसे कोई खास बातचीत नहीं हुई, सिर्फ हाय-हलो के सिवा। कोई साझा विषय था भी नहीं संवाद के लिए। हालांकि स्थिति ऐसी थी कि हम उससे बात करना चाहते भी थे और नहीं भी चाहते थे। उसकी बला की खूबसूरती तथा जादुई मुस्कराहट देख हमें लगता था कि अब हम अपने को रोक नहीं पायेंगे तथा उससे खूब घनिष्ठता से बातें करने लगेंगे। दूसरी तरफ उसका यह गुंबदनुमा कद देखकर कि सारे शीर्षस्थ महानुभावों, सूबे का नंबर एक मुख्यमंत्री, कंपनी का नंबर एक मैनेजिंग डायरेक्टर और विभाग का नंबर एक डिविजनल मैनेजर की कृपापात्र है वह.....लगता था हम उससे बात करने के लिए बहुत छोटे हैं या फिर हमारे क्लास में बहुत फासला है। उसकी अंग्रेजियत भी हमें एकदम असहज कर जाती थी।

 

एक हॉलनुमा कमरे में हम पांच लोग बैठते थे। जूसी के बारे में हम पांचों की राय समान थी.....यह लड़की अगर अपने को तोप समझती है तो समझने दो, हम उससे कोई मतलब नहीं रखेंगे। यों जूसी को हमसे मतलब रखने की मजबूरी थी, इसलिए कि ऑफिस का सेक्रेटेरिएट यहीं से डील होता था और हम पांचों ऑफिस के रक्त, रीढ़, मस्तिष्क एवं धड़कन को सहेजने वाले लोग थे।

 

मधोक सिंह गिफ्ट, इम्प्रेस्ट मनी, स्टेशनरी, डायरी, कैलेंडर, कंपनी से संबंधित सारे ब्रोशर, इन्विटेशन एवं प्रेस रिलीज डिस्ट्रीब्यूशन एवं इन्फॉर्मेशन पासिंग का इंचार्ज था।

 

सदाव्रत एकाउंट, बिल तथा इस्टब्लिशमेंट आदि डील करता था।

 

राधेचन्द्र रिसीविंग, डिस्पैचिंग, फाइलिंग और न्यूज पेपर स्कैनिंग की कटिंग-पेस्टिंग का काम देखता था। अप्पा राव स्टेनों सह टापिस्ट था।

 

मैं इन सबों के बीच बैठकर अनुवाद तथा एक पाक्षिक प्रकाशन का संपादन संभालता था। यहां मेरी जगह (सीट) एवं काम के बीच एक गजब का कंट्रास्ट था। भीड़-भाड़ और हल्ले-गुल्ले में मुझसे एकाग्रचित होकर स्क्रिप्ट लिखते रहने की अपेक्षा की गयी थी। विभाग मेरे लिए इसी जगह को सबसे उपयुक्त मानता था। मैं भी क्या करता.....यहां सिर्फ गप्पें मारता था और काम को घर ले जाकर रात में पूरा करता था। चूंकि अन्य साथियों के पास भी काम थोड़ा था और फुर्सत ज्यादा थी, इसीलिए हम अक्सर देश-दुनिया की बड़ी-बड़ी समस्याओं पर बहस करके दुबले होते रहते थे।

 

एक दिन राजनीति पर गरमागरम बातें हो रही थीं। इसी बीच कहीं से जूसी आ गयी और ध्यान से सुनने लगी।

 

माइक मधोक सिंह संभाले हुए थे। उसकी खासियत थी कि ब्रिटेन में बसे होने के एहसास देनेवाले अंग्रेजी से लदे-फदे इस ऑफिस में भी वह हर किसी से हर वक्त भोजपुरी में बातें करता था। कोई उससे अंग्रेजी में पूछे तो उसका जवाब भी वह भोजपुरी में ही देता था। कुछ लोग उसकी इस आदत के कारण उसे बेवकूफ (भोइल) समझकर उपहास की मुद्रा बना लेते थे.....ऐसे में वह धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलकर उसे स्तब्ध कर देता था।

 

राजनीति के वर्तमान तौर-तरीके से उसे खासी चिढ़ थी और वह इस विषय पर बोलते हुए एकदम तैश में आ जाता था। जूसी को देखकर उसे मुख्यमंत्री याद आ गया और वह मुख्यमंत्री की डींगहंकाई, जोकरनुमा हरकतें, फूहड़ता, परिवर्तन लाने और सामाजिक न्याय करने की लफ्फाजी तथा सरकारी खजाने से करोड़ों के माल डकार जाने की बेईमानी पर जमकर लानतें भेजने लगा। चूंकि मुख्यमंत्री उसका भाग्य विधाता था और उसी की सिफारिश पर वह चांदी काटने आयी थी, इसलिए मधोक का मकसद मुख्यमंत्री को गरियाते हुए जूसी को भी प्रताड़ित करना और धिक्कारना था। उसने अंत में कहा, ‘‘ऐसन-ऐसन लबरधोधो और लुच्चा अमदी रजनीति के असमान छू के हुकुम चलाव तारे त ऊ राज के तो डुब्हे के बा।’’

 

जूसी ध्यान से सुन रही थी.....कुछ पल्ले भी पड़ा होगा इसमें हमें संदेह था। उसके चेहरे पर कोई विकार नहीं आया। अचानक उसकी भंगिमा बोलने की हो गयी। उसने बड़े अदब से पुकारा, ‘‘मधोक सिंह जी! राउर इजाजत होखे तो एक अरज हमहुं करेके चाहतनि।’’

 

जूसी के मुंह से भोजपुरी! लगा कि जैसे कौए के मुंह से कोयल गा उठी हो। उपस्थित सबकी आंखों से एक हैरत झरने लगे। मुदित होते हुए मधोक ने कहा, ‘‘ए जूसी जी, तूं त हमार मिजाज एकदम हरियर कर देहलू। मन में जौन विचार बा निधड़क बोलीं।’’

 

जूसी ने कहना शुरू किया, ’’रउआ सब चेहात काहे बानी, हम कउनो इंग्लैंड के रहनिहार नइखीं। हम ये ही राज्य के रहेवाली बानी। मुख्यमंत्री के बारे में रउआ जे कहनी हं, ओकरा से हमार सहमति बा। लेकिन हम एकरा में आगे जोड़े के चाहतनि कि आज सकल रजनीति में सबके एहे हाल बा.....कउनो चेहरा बेदाग और ईमानदार नइखे। ई मुख्यमंत्री से उम्मीद बेसी रहे, एहि से कचोट ज्यादा बा कि सात-आठ साल के आपन शासन में एको ऐसन काम ई ना कइले जेकरा उपलब्धि कहल जाला।’’

 

जूसी ने इसके बाद भोजपुरी में ही राजनीति के दोगलेपन की बड़ी निर्मम और लंबी व्याख्या की। उसने मुख्यमंत्री के लिए भी कोई रियायत नहीं बरती। इससे लगा ही नहीं कि कहीं से भी वह मुख्यमंत्री का एहसान मानती हो।

 

मुझे संशय हो उठा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मुख्यमंत्री द्वारा सिफारिश की बात एक मनगढंत कहानी हो। मैंने पूछ दिया, ‘‘जूसी, हमने सुना है कि तुम मुख्यमंत्री की सिफारिश से आयी हो... अगर हां तो फिर उनकी बुराई करना क्या एहसान फरामोशी नहीं है?’’

 

‘‘हां यह सच है कि मैं मुख्यमंत्री की सिफारिश से आयी हूं.....लेकिन मेरी सिफारिश करके उन्होंने मुझे गुलाम नहीं बना लिया है और वे दूध के धुले नहीं हो गये हैं। आप सभी जानते ही होंगे कि मेरा पति उनके प्रमुख अंगरक्षकों में एक था, जिसने पिछले वर्ष एक सभा में जाते हुए उन पर चली गोली को अपनी छाती पर झेल लिया और मारा गया। अब आपलोग ही बताइये कि किसका किस पर कितना बड़ा एहसान है? मेरे पति के कारण मुख्यमंत्री की जान बच गयी और इसके एवज में उन्होंने मुझे एक नौकरी दिला दी.....तो पहले मुख्यमंत्री पर मेरा एहसान है जान बचाने का। वे जीवित ही नहीं रहते तो मुझे नौकरी क्या देते?’’

 

जूसी हमारे बीच एक पहेली जैसी थी.....अब लग रहा था कि पहेली का अर्थ काफी खुल गया है। मैं तो पहले यह जानकर ही हैरान रह गया कि जूसी शादी-शुदा है। इसकी कमनीयता और मासूमियत देखकर लगा था कि इसकी शादी करने की तो अभी उम्र भी नहीं हुई.....पर विडंबना थी कि वह काफी पहले विधवा भी हो गयी। यह तो एक घोर अन्याय हुआ है इसके साथ। अपराधी और हत्यारे किस्म के लोग बड़े ओहदे पर काबिज हो जाते हैं और उसकी दुश्मनी का शिकार किसी बेकसूर को बनना पड़ता है.....आखिर क्यों? जूसी के पति को एक गलत आदमी के लिए जान क्यों गवा देनी चाहिए?

 

यह पहला अवसर था कि जूसी के प्रति हमारे मन में जमी कठोरता और हिकारत के टीले में सेंध लग गयी। वह हमें मासूम ही नहीं बेबाक और सरल भी प्रतीत हुई। इसके बाद वह अपने व्यवहार-बर्ताव से क्रमशः हमसे घनिष्ठ होती चली गयी। वह हमें बहुत अच्छी लगने लगी और हम उसके कायल होते चले गये।

 

जो अप्पा राव जूसी के बारे में सबसे ज्यादा दुष्प्रचार किया करता था उसे भी बदलना पड़ गया। एक बार वह बीमार हो गया। किसी पेंचीदे ज्वर ने उसे दबोच लिया। एक महीने से भी ज्यादा समय के लिए अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। विभाग के हम सभी लोग औपचारिकतावश एक-दो बार देख आये। अमूमन ऐसा ही होता था। लंबे समय के लिए कोई बीमार हो तो दो-तीन बार जाने के बाद लोग जाना लगभग छोड़ देते थे।

 

स्वास्थ्य-लाभ करके अप्पा ने जब ऑफिस ज्वाइन किया तो जूसी के लिए उसकी आंखों में एक विनम्र कृत्तज्ञता समायी थी। उसने बताया कि जूसी ताजे फल और मेवे के साथ उसे रोज देखने जाती रही तथा डॉक्टरों से मिलकर इलाज की प्रगति से अवगत होती रही। इतना नियमित और तत्पर तो उसके घर के लोग भी नहीं रहे.....यहां तक उसकी पत्नी भी नहीं।

 

मधोक सिंह अपनी बेटी की शादी कर रहा था। एक बड़ी रकम उसे दहेज-दानव को भेंट चढ़ानी थी। लौटा देने की शर्त पर मदद के लिए उसने सबसे आग्रह किया। किसी ने कोई खास उत्सुकता नहीं दिखाई। पता चला जूसी ने उसे पचास हजार रुपये की मदद कर दी, जबकि उससे मधोक ने मांगा भी नहीं था।

 

पैसे के मामले में अक्सर किसी न किसी साथी का कुछ न कुछ घटा ही रहता था। जूसी की उदारता अब सबके लिए सहज उपलब्ध हो गयी, जैसे हमें एक वरदान मिल गया हो। हम देख रहे थे कि जूसी छोटी-बड़ी आर्थिक मदद करने में खिन्न होने की जगह खुशी का अनुभव करती है।

 

अब वह हम सबके लिए कई कोणों से अनिवार्य बन गयी। उसके व्यक्तित्व में निहित प्रभामंडल हमारी ऑफिस-दिनचर्या को खुशगवार बना देने लगा।

 

उसके पास एक कार थी.....हम सभी स्कूटरवाले लोग थे। उसने हम सभी को कार चलाना सिखा दिया। हमें जब भी जरूरत होती वह अपनी कार हमें निर्द्वंद्व भाव से दे दिया करती।

 

ऐसे समय में जब स्वार्थपरता, बेईमानी और टुच्चेपन की गटर हर जगह बह रही हो, जूसी क्यों हमारे प्रति इतना सदाशय, उदार, हमदर्द और शुभचिंतक थी, हम इस विषय पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाल पाते थे।

 

वह हमारी क्षमता की तुलना में हमारे छोटे ओहदे को देखकर आश्चर्य करती, ‘‘पूरा ऑफिस आपलोगों के कंधों पर है.....आपलोग इतने अनुभवी और पारंगत हैं, फिर भी कोई प्रोमोशन नहीं.....कोई स्पेशल इंक्रीमेंट नहीं। मुझे तो आप सबके सामने खुद को ऑफिसर मानने में शर्म महसूस होती है।’’

 

मैंने कहा, ‘‘इस देश में कॉन्टैक्ट और बैकग्राउंड के आगे योग्यता प्रायः हर जगह दोयम दर्जे की चीज होकर रह गयी है.....इस कंपनी में भी यही चलन है, इसलिए हमारे मुर्दाहाल ग्रेड देखकर शोक मत करो।’’

 

हमारे बीच अब निस्संकोच वार्तालाप होने लगा। खासकर मुझसे वह अपनी अंतरंग और निजी बातें भी करने लगी। ऐसी-ऐसी बातें जिससे कोई खुशफहमी पाल सकता है कि जूसी को उससे प्यार हो गया है। मैं टिफिन के समय लंच ऑफिस में ही लेता था। जूसी ने मेरे लिए एक जार में अपने हाथ का बना आम का अचार ला दिया।

वह अक्सर खुद की बनायी चटपटी चीजें टिफिन में भरकर ले आया करती.....कभी इडली, कभी उरद बड़ा, कभी केक.....हम उंगलियां चाट-चाटकर खाते।

 

पहली जनवरी को कई दोस्तों के सामने उसने गुलाब फूल के साथ धागे से टंकी हुई पंखुड़ी मेरे कोट में लगा दी......हम स्नेहविगलित होकर उसे देखते रह गये।

 

वह मुझे यह तक बता देती थी कि तबीयत ठीक नहीं है, मासिक-धर्म में काफी रक्तस्राव हो रहा है।

 

एक बार उसके गुप्तांग में इंफेक्शन हो गया तो इसे भी बताने में उसने संकोच नहीं किया.....कहा कि ऑफिस के सार्वजनिक टायलेट से संक्रमण ने उसे धर दबोचा है। अब टायलेट की अच्छी सफाई पर हमें ध्यान देना होगा।

 

वह कई बार दिल्लगी की बातें करती तो बोलते-बोलते अपनी एक आंख दबा देती.....जैसे कनखी मार रही हो। इस अदा पर लोग निहाल हो जाते।

 

एक बार उसने बताया कि मुख्यमंत्री का एक रिश्तेदार था, जो अक्सर उससे यौनाचार के लिए एकांत में पकड़-धकड़ लेता था। वह मुख्यमंत्री आवास जाना नहीं चाहती थी लेकिन उनकी वज्र देहातिन पत्नी रहन-सहन के तौर-तीरेके एवं व्यंजन-पकवान बनाने की विधि सीखने के लिए उसे अक्सर बुलवा लेती। वह लड़का, कहते हैं अंग्रेजी में एम.ए. पास था और वहां रहकर मुख्यमंत्री को अंग्रेजी बोलना सिखाया करता था। बाहर के किसी आदमी से सीखने में मुख्यमंत्री को झेंप होती थी।

 

वह जब मूड में होती तो मुख्यमंत्री के बारे में निहायत अंदरूनी तहें खोलने लगती। किस्तों में सुन-सुनकर हम काफी-कुछ उनके बारे में जानने लगे थे। मुख्यमंत्री की बेटी इसी शहर के मेडिकल कॉलेज में कंपनी कोटे से दाखिला लेकर पढ़ रही थी। जूसी लोकल गार्जियन की तरह अक्सर उसे हालचाल पूछने चली जाती। यों उसकी देखरेख का समुचित खयाल जिला-उपायुक्त स्वयं करते थे। मुख्यमंत्री की बेटी के कारण जूसी उपायुक्त के काफी नजदीक हो गयी।

 

इस नजदीकी से मुझे एक लाभ मिल गया। मैं अपने छोटे बेटे का एक चर्चित अंग्रेजी स्कूल लोयोला में दाखिला कराना चाहता था। जूसी ने डीसी से कहवाकर मेरा यह काम करा दिया।

 

वह जब हमारे कमरे में दाखिल होती तो एक तरह का व्याप्त ऊबाउपन, नीरसता और बोरियत एकाएक खत्म हो जाती। सबके चेहरे खिल उठते जैसे हम सभी उसके आने की अव्यक्त प्रतीक्षा कर रहे हों। वह चुटकुले सुनाती......फिल्मी गाने गुनगुनाती.....छेड़छाड़ करती.....मासूम शरारतें करती। हम खूब मजा लेकर सुनते थे। हमें सबसे ज्यादा रस तब मिलता था जब वह मुख्यमंत्री की बेवकूफियों और ढकोसलों के प्रसंग सुनाती थी।

 

मुख्यमंत्री खैनी खाकर कैसे थूकते हैं और खास लहजे में कैसे बोलते हैं, इसका वह जीवंत पैरोडी उतारती थी।

 

क्रिकेट देखते हुए मुख्यमंत्री की एक टिप्पणी उसने सुनायी, ‘‘अरे भाई, ई कौन खेल है जिसके रेफरी के हाथ में कोई सीटी नहीं है और मैदान में एक तरफ का ग्यारह खिलाड़ी हैं और दूसरी तरफ के सिर्फ दो खिलाड़ी हैं। हम जब फुटबॉल खेलते थे तो रेफरी हाथ में सीटी लेकर सारा मैदान दौड़ता था और उसमें दोनों तरफ के 11-11 खिलाड़ी एक साथ मैदान में होते थे। हमको तो ई क्रिकेट खेल बहुत बुड़बकाही वाला मालूम होता है।’’

 

जूसी को एक लड़के से प्रेम हो गया। वह उससे रूठने-मनाने की बातें भी हमें बताने लगी। हम उस लड़के के भाग्य पर बहुत ईर्ष्या करते जिसे जूसी जैसी सहृदय लड़की दिल की गहराइयों से प्यार करने लगी।

 

उसने हमें उस लड़के के बारे में बताया, ‘‘सुमंत हमें रोज मिलता है। एक ही साथ पढ़े थे हम कॉलेज तक। मेरे पति से भी उसकी अच्छी दोस्ती रही। राजधानी के आवास पर वह बराबर मिलने आता रहा। अब तक उसने शादी नहीं की......मैं जानती थी क्यों नहीं की। एक बड़े अंग्रेजी अखबार का ब्यूरो चीफ है वह.....संयोगवश यहां फिर हमारी मुलाकातें होने लगीं।’’

 

उसने कुछ ही दिन पहले बड़ा साहस करके जूसी से कहा, ‘‘जूसी, आई लव यू.....इफ यू डोन्ट.....प्लीज फोरगेट माई दिज टॉक।’’

 

जूसी ने कहा, ‘‘मैं जानती हूं सुमंत.....इस एक वाक्य को कहने के लिए तुम्हें काफी इंतजार करना पड़ा।’’

 

सुमंत ने कहा, ‘‘यह सच है जूसी.....इस एक वाक्य को कहने के लिए मैं बस योजनायें बनाता रहा.....शब्दावली ढूंढ़ता रहा.....अवसर की तलाश करता रहा, तभी तुम्हारी शादी हो गयी। अब जब तुम फिर अकेली हो गयी और इस शहर में आ गयी तो मैं फिर योजनायें बनाने लगा...शब्दावली ढूंढने लगा.....अवसर की तलाश करने लगा।’’

 

जूसी ने कहा, “सुमंत ऐसा नहीं है कि इस एक वाक्य के कहने पर ही प्यार का इजाहर होता है.....मैं जानती थी कि तुम मुझे प्यार करते हो। प्यार कहने से नहीं होता और छुपाने से नहीं छुपता। प्यार जब हो जाता है तो पूरी दुनिया जान जाती है.....मुझे सचमुच एक दोस्त की जरूरत है......आई लव यू टू।’’

 

जूसी जब अपने इस तरह के प्रेम-संदर्भों का बयान रखती तो एकाउंट, बिल तथा इस्टब्लिशमेंट आदि डील करने वाला हमारा सहकर्मी सदाव्रत का अपना एकाउंट गड़बड़ा जाता और उसके चेहरे पर एक खिन्नता उभर आती। दरअसल उसके लड़के का भी किसी विजातीय लड़के से अफेयर्स चल रहा था और वह उससे शादी करने पर आमादा था, जबकि सदाव्रत एकदम इसके खिलाफ था। उसने एक बड़ी दहेज-राशि पर एक सजातीय लड़की वाले से बात तय कर ली थी। अतः उसे लगता था कि यह प्यार-मोहब्बत समाज का एक निर्लज्ज व्यभिचार है जिससे मां-बाप का घोर अपमान होता है।

 

प्रेम के बारे में सदाव्रत की इस धारणा का जब जूसी को पता चला तो उसने एक लंबा वक्तव्य दे दिया, ‘‘सदाव्रत जी। आप सोच कर देखिये, आप भी जीवित हैं तो इसलिए कि आपको भी कोई न कोई प्यार करता है अथवा आप किसी न किसी को प्यार करते हैं। कुछ हसरतें.....कुछ इच्छायें.....कुछ सपने होते हैं हर आदमी के, जिसके लिए जीता है वह। किसी को अगर यह लगने लगे कि वह किसी के प्यार के लायक नहीं तो वह या तो आत्महत्या कर लेता है या यह साहस न हो तो जीकर भी लगभग मृतावस्था को प्राप्त हो जाता है। प्यार न हो तो इस दुनिया में कुछ भी अच्छा नहीं है सदाव्रत जी.....सब कुछ बेकार है.....निस्सार है.....और जिसे प्यार होता है उसके लिए यह दुनिया हर तरह से खूबसूरत एवं रंगीन दिखती है। प्यार करने वाला आदमी दुनिया की हर बुराई, हर बदसूरती, हर ठोकर, हर दुख-दर्द, पीड़ा, आंसू, उपेक्षा, गरीबी बर्दाश्त कर लेता है। बाई द वे सदाव्रतजी... मैं अगर आपसे बेइंतहा मोहब्बत करने लगूं तो क्या आप मुझे इस उम्र में भी मना कर सकेंगे.....ठुकरा सकेंगे?’’

 

सदाव्रत से कोई जवाब देते नहीं बन पड़ा। जूसी ऐसी ही थी.....वह किसी को भी कन्विंस कर देती थी।

 

जूसी के इस खुलेपन और फराखदिली का, उसके साथ के एक-दो ऑफिसर लड़कों ने एक भ्रामक अर्थ निकाल लिया कि यह एक चालू किस्म की लड़की है और डिविजनल मैनेजर तथा अन्य अधिकारियों से इसके यौन-संबंध हैं। वे लड़के बड़े बाप के नालायक बेटे थे जो बाप के रसूख और पैरवी के कारण सीधे ऑफिसर में बहाल कर लिये गये थे। अपनी मेरिट पर उन्हें नौकरी ढूंढ़नी होती तो वे चपरासी के लिए भी अयोग्य करार कर दिये जाते। लेकिन इस कंपनी में इस सामंती प्रथा पर खूब चतुराई से अमल होता था कि उच्च अधिकारियों के नालायक बेटे का क्लास भी बुर्जुआ ही बना रहे। तो इन नाकारा लड़कों का कंपनी में यही जॉब था कि काम करने वाली लड़कियों को कैसे चारा डालकर फंसाया जाये। इनमें एक लड़का रोहन राय था, जिसका बाप मैनेजिंग डायरेक्टर का फैमिली डॉक्टर रह चुका था। रोहन को एमडी आज भी अपने परिवार के एक सदस्य के रूप में मान्यता देते थे।

 

रोहन ने एक दिन ऑडियो-विजुअल रूम में जूसी के वक्ष पर हाथ डालते हुए उसे किश करने की कोशिश की। जूसी ने तड़ातड़ उसके गाल पर तीन-चार झन्नाटेदार तमाचे जड़ दिये। उसने तनिक परवाह नहीं की कि इस कंपनी का एमडी उसका क्या लगता है। रोहन तिलमिलाकर रह गया, ‘‘देख लूंगा मैं तुम्हें.....मुख्यमंत्री कितनी बार तुम्हें बचाने आता है?’’

 

जूसी ने जब हमें इस घटना की जानकारी दी तो हम मन मसोसकर रह गये। हमें बहुत बुरा लगा.....हम जूसी को हमेशा खुश देखना चाहते थे। रोहन को हमने ताकीद कर दी कि आइंदा जूसी के साथ ऐसा दुव्र्यवहार नहीं होना चाहिए।

 

रोहन ने हमें बरगलाने की चेष्टा करते हुए कहा, ‘‘आप लोग इस लड़की को नहीं जानते.....यह सचमुच परले दर्जे की करप्ट है। मि. देवव्रत एवं कई अन्य उच्चाधिकारियों से इसके नाजायज रिश्ते हैं। राजधानी में भी मुख्यमंत्री के कई मुंहलगे लोग इसके पक्के आशिक थे। मुझे खेद है कि आप सब एक गलत और गंदी लड़की को अपना विश्वास और समर्थन दे रहे हैं।’’

 

रोहन के कहने से हम प्रभावित या परिवर्तित नहीं होना चाहते थे, लेकिन मैंने महसूस किया.....हम अप्रभावित भी नहीं रहे और अपरिवर्तित भी नहीं।

 

डिविजनल मैनेजर देवव्रत के बारे में बहुत पहले जूसी ने मुझे बताया था कि लड़की के मामले में यह आदमी बहुत चटोरा है। मुझे टटोलने की कोशिश करता रहता है।

 

हम लोग सुनकर दंग रह गये थे.....सफेद और जेन्टलमैन दिखनेवाले ये लोग कितने बहशी और पतित होते हैं। उसने न जाने कितने मासूमों को रौंदने की हवस पूरी की होगी।

 

रोहन ने हमें आजमाने के बाद डिविजनल मैनेजर देवव्रत के कान भी भर दिये कि जूसी नीचे के लोगों की हितैषी बनी हुई है और उनके कहे-सुने अनुसार संचालित होती है।

 

देवव्रत ने जूसी को बुलाकर समझा दिया, ’’देखो जूसी, नन ऑफिसर स्टाफ से ज्यादा मेलजोल नहीं रखना चाहिए। इट बिल नॉट बी ए हेल्दी साइन इन योर पार्ट। यू नो, ऑफिसर और नॉनऑफिसर के बीच एक दूरी न हो तो प्रबंधन इसे अच्छा नहीं मानता। तुम अभी नयी हो.....तुम्हें काफी ऊंचे पद पर पहुंचना है......कंपनी के इथिक्स और डिकोरम का अनुपालन करो।’’

 

जूसी जब इस पूरे प्रकरण से हमें अवगत करा रही थी तो उसके चेहरे पर एक मायूसी छायी थी।

 

मैंने उससे कहा, "जूसी, इस कंपनी में तुम क्या सचमुच बहुत ऊपर जाने की हसरत रखती हो? अगर हां तो इसके मूल्य तो चुकाने ही होंगे और नहीं तो मायूस होने की कोई जरूरत नहीं है।’’

 

जूसी ने बहुत पारदर्शी नजरों से हम सबको निहारा। उसके चित्र में कुछ बेबसी और बेचारगी की रेखायें भी खिंची थीं।

 

जूसी की प्रसन्नता हमें आह्लादित करती थी। उसने हमारे हृदय के सारे परकोटों, गवाक्षों, अर्गलाओं, मीनारों, कक्षों, रौशनदानों पर अपनी छाप लगा दी थी। हम उसे कई बिम्बों और प्रतीकों में देखते थे, तितली की तरह.....स्वप्न की तरह.....तरंग की तरह.....खुशबू की तरह.....बसंत की तरह.....संगीत की तरह.....चांदनी की तरह.....रोमांच की तरह.....कल्पना की तरह......कविता की तरह।

 

हमारी इस घटाटोप अनुरक्ति की अवस्था में ही जब जूसी ने हमारी तरफ आना धीरे-धीरे कम कर दिया, तो ऐसा लगा कि आंतरिक अनुभूतियों की एक जीती-जागती तस्वीर के रंग बदलने लग गये। तो क्या वह सचमुच अपने को ऑफिसर में ढालने लग गयी?

 

एक दिन उससे बोलने-बतियाने के लिए आतुर निगाहों से ताकते हुए मैंने पूछा, ‘‘जूसी, क्या सचमुच तुम बदल रही हो?’’

 

वह हंस पड़ी......एक ऐसी हंसी जो व्यथा के गर्भ से निकलती है। कहा, ‘‘आप लोग मेरे बहुत अजीज हैं नन्द जी। मैं कुछ ज्यादा ही अल्हड़ और बातूनी हो गयी थी.....अब सचमुच खुद को बदल रही हूं.....लेकिन चाहती हूं कि आप लोग मेरे लिए न बदलें। मुझे अपने दिलों में जो जगह दी है वह सुरक्षित रहे।’’

 

मैंने कुछ नहीं कहा.....किसी ने कुछ नहीं कहा.....हम समझ गये कि उसका अभिप्राय क्या है। हम सभी लोग यह चाहते थे कि जूसी आसमान की बड़ी से बड़ी बुलंदियों को छुए, जिस पर फख्र किया जा सके।

 

सुमंत कभी-कभार जूसी से मिलने आ जाया करता था। हममें से कोई न कोई उसे बुला लेता और उसका हालचाल पूछते हुए यह निवेदन रखना नहीं भूलता, ‘‘सुमंत भाई, जूसी को खूब प्यार करना.....वह बहुत अच्छी लड़की है। समुद्र में अथाह पानी है, लेकिन जूसी के हृदय में समुद्र के पानी से भी अथाह प्यार है.....देखना यह प्यार कम न हो।’’

 

सुमंत यह कहते हुए हंस देता, ‘‘भाई साहब। जूसी को आपलोग इतना मान देते हैं, सचमुच यह उसकी खुशनसीबी है। मैं तो जी ही इसलिए रहा हूं कि उसे प्यार करना है।’’

 

जूसी से हमारे लगाव विरल होते जा रहे थे। ऑफिसियल प्रयोजन लेकर सप्ताह में दो-एक अतिसाधारण-संक्षिप्त वार्तालाप से ज्यादा की अब गुंजाइश नहीं रह गयी थी।

 

इस दरम्यान सिर्फ एक वार्तालाप ऐसा हुआ जिसे विशिष्ट और यादगार कहा जा सकता है।

 

मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ समुद्र देखने के ख्याल से पुरी गया था। अब तक समुद्र नहीं देखा था मैंने.....बहुत ललक थी मन में। मित्रों ने कहा कि जहां से लहरें बार-बार आती और जाती हैं, उस बालुका-बक्ष पर हम सभी अपने दो अति प्रियजन के नाम लिखें.....इस कामना से कि इस अनंत-असीम सागर का उन्हें आशीर्वाद प्राप्त हो।

 

मैंने स्वतः स्फूर्त जो दो नाम लिखे उनमें पहला अपने बड़े बेटे दीर्घायु का और दूसरा जूसी का था। अनजाने में अपने ही लिखे पर मैं चकित रह गया। तो क्या ये दो जन ही हैं जिन्हें मैं दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करता हूं?

 

जूसी से जब मैंने इसकी चर्चा की तो उसके चेहरे पर एक ताजे फूल की रौनक उभर आयी। उसने कहा, ‘‘नंद जी। मैं धन्य-धन्य महसूस करती हूं कि आप मुझे इतना महत्व देते हैं। सागर की गोद पर दुआ के लिए लिखा गया मेरा नाम, मेरी स्मृति में सदा कायम रहेगा और मेरे उर-अंतर को स्पर्श करके मुझे भावुक बनाता रहेगा।’’

 

मुझे नहीं मालूम कि जूसी ने मेरे उस बालिग बचपन को कभी याद किया भी या नहीं, लेकिन इतना तो मैं जरूर ही महसूस कर रहा था कि हर प्रकार की जरूरी-गैरजरूरी बातें करते रहने से हमारे बीच जो एक अनौपचारिक रिश्ता बन गया था, उसकी सांसें अब टूटने लगी थीं।

 

‘‘क्यों इतनी वाचाल और बातूनी हो तुम?’’

 

कभी किसी के टोकने पर जूसी ने ही कहा था, ‘‘जिसे प्यार या फिर घनिष्ठता कहते हैं, उसकी बुनियाद होती है आपस में बातें, खूब बातें, चाहे वे जैसी भी हों। बल्कि जब खूब बातें हों, अनर्गल, बेमतलब, नादानी और बेवकूफी भरी, तो उसे ही प्यार कहते हैं। अर्थात सघन संवाद ही संबंध की नींव है.....यह हर जगह लागू होता है.....पिता-पुत्र के बीच.....भाई-भाई के बीच...दो दोस्त के बीच.....दो पड़ोसी के बीच। अनौपचारिक बातें कम हो गयीं.....समझिये दूरी बढने लगी।’’

 

जूसी अब रोहन से खूब घुल-मिलकर बातें करने लगीं। देवव्रत के कमरे में वह पहले जाना पसंद नहीं करती थी......अब उसका वहां खूब उठना-बैठना शुरू हो गया। सुमंत भी अब कभी-कभार यहां आकर अड्डा मारने लगा। अपने अखबार के लिए ज्यादातर फैक्स और एसटीडी कॉल वह यहीं से मुफ्त करने लगा।

 

बहुत विचार करते-करते एक दिन मैंने पूछ लिया, ‘‘जूसी! हमसे दूरी बनाकर अब अपनी मंजिल की ओर तेजी से बढ़ रही हो न!’’

 

बहुत द्रवित और स्नेहिल नजरों से उसने मुझे देखा, फिर कहा, ‘‘आपसे सच-सच कहूं नंद जी! आप लोगों से कटकर रहना मेरे लिए भी एक सजा है। सुमंत चाहता है कि हमारे पास ढेर सारा पैसा हो, इसके लिए मुझे नौकरी करते रहनी होगी। अगले सप्ताह हमलोग कोर्ट-मैरिज करने जा रहे हैं.....अब साथ ही रहेंगे इसलिए उसकी ख्वाहिश को तवज्जो देना जरूरी है। मैं नहीं जानती कि शादी का मेरा निर्णय कितना उचित है?’’

 

‘‘मुबारक हो जूसी.....निर्णय पर अब कोई संशय मत करो.....सुमंत तुम्हें दिल से चाहता है.....तुम दोनों को खुश देखकर हमें भी अपार खुशी मिलेगी।’’

 

मैं समझ गया - सुमंत ने जूसी को कंपनी के फ्रेम में ढल जाने की हिदायत दी है.....इल्तिजा की है.....गणित समझायी है।

 

इसके बाद जूसी का इस तेजी से रूपांतरण होता चला गया कि हम भौंचक रह गये।

 

कंपनी ने कारखाने की जमीन के अलावा शहर में अपनी टाउनशिप तथा इसके विस्तार एवं अन्य संभावित योजनाओं को सोचकर आसपास की काफी जमीनें राज्य सरकार से लीज पर ले रखी थीं। इन्हीं में एक परती बेकार पड़े निपट एकांत के भू-खंड पर घर के मोहताज छोटे व्यवसाय करने वाले तथा लघु उद्योगों में काम करने वाले सौ-डेढ़ सौ लोगों ने एक-एक झोपड़ी उठा ली। यह स्थल शहर से इतना अलग-थलग था कि प्रबंधन को बहुत बाद में पता चला। जब पता चला तो मन-मुताबिक एसपी-डीसी के नहीं होने की वजह से कुछ नहीं किया जा सका। लेकिन ज्यों ही प्रशासन उसके अनुकूल हुआ कि उसने बुलडोजर चलवाकर सारे घर ध्वस्त करवा दिये।

 

इस कांड की तीव्र निंदा हुई और सरकार तक भी शिकायत पहुंचायी गयी।

 

इसी साल कंपनी को लीज का फिर से नवीकरण कराना था। सरकार पर चारों ओर से यह दबाव पडने लगा कि नवीकरण न किया जाये। अगर किया भी जाये तो उतने ही क्षेत्र का जिनमें इसके निर्माण हैं।

 

इस विषय पर जूसी से कई बार चर्चा हुई थी और उसने भी माना था कि कंपनी का यह रवैया अमानवीय है.....फालतू जमीन का नवीकरण सचमुच नहीं होना चाहिए।

 

हमने सुना कि जूसी राजधानी भेजी गयी है यह प्रस्ताव लेकर कि मुख्यमंत्री जो भी कीमत चाहें ले लें, लेकिन नवीकरण कर दें। हमें बहुत क्लेष पहुंचा, जैसे खुद पर से ही ऐतबार उठ गया हो और जूसी की जगह हम ही अपनी नजरों में गिर गये हों।

 

मैंने एक दिन सुमंत को पकड़ा और बड़े अधीर स्वरों में पूछ बैठा, ‘‘सुमंत। मूल्यों की हमेशा कद्र करने वाली जूसी को क्या हो गया.....सुना वह राजधानी...।’’

 

सुमंत ने मुझे घूरकर देखा। उसकी नजरों में ऐसी वक्रता मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। उसने झिड़कते हुए कहा, “जूसी को क्या करना है, यह उस पर छोड़ दो नंद जी। तुम बस अपना ख्याल रखो.....दूसरे की चिन्ता में सेहत खराब करना अच्छा नहीं। जूसी नहीं जाती तो क्या समझते हो, मुख्यमंत्री तक जाने के लिए दूसरा आदमी नहीं मिल जाता? इतनी बड़ी कंपनी क्या जूसी से ही चलती है? यह तो जूसी का नसीब है कि कंपनी ने उसे इतने बड़े दायित्व के लायक समझा। मैं पत्रकारिता से जुड़ा हूं.....जानता हूं कि कंपनी के एहसानों से लदे अखबार तक इसके खिलाफ नहीं लिखते, फिर जूसी अकेली क्या कर लेगी?’’

 

सुमंत से अब मेरा जिरह करने का कोई औचित्य नहीं रह गया था। इस विभाग में होने की वजह से जानता था कि एक पत्रकार के रूप में वह कंपनी के साथ अपनी किन-किन चीजों का सौदा करता है। कंपनी एक-एक लाख रुपये का विज्ञापन साल में तीन बार औसतन हर अखबार को देती थी।

 

इस दम्पति के पास अब एक आलीशान कार थी.....एक बड़ा बंगला था। कंपनी के वाइस प्रेसिडेंटों और डिविजनल मैनेजरों द्वारा क्लब में दी जानेवाली पार्टियों में वे आमंत्रित होने लगे थे। डिविजनल मैनेजर के पीए ने बताया कि जूसी को प्रोमोशन भी मिलने जा रहा है।

 

मैंने तय किया कि जूसी की तरफ से अब ध्यान पूरी तरह हटा लेना ही उचित है। नाहक तकलीफ होती है मन को। आखिर यह लड़की मेरी लगती ही कौन है, जिसके उठने-गिरने की मैं परवाह करता रहूं?

 

पहले वह नजरें चुराती थीं, अब मैंने मुंह फेरना शुरू कर दिया। शायद ताड़ गयी वह और एक दिन मेरे सामने की कुर्सी पर आकर बैठ गयी। मुझे बहुत असहज लगने लगा। उसने मुझे मासूमियत से निहारते हुए कहा, ‘‘नंद जी, जानती हूं......बहुत नाराज हैं आप मुझसे। मैं भी खुद से प्रसन्न नहीं हूं। आपसे कहा था मैंने कि मैं बदल रही हूं, लेकिन चाहती हूं कि आप लोग मेरे लिए न बदलें.....मुझे अपने दिलों में जो जगह दी है वह सुरक्षित रहे। हवा के विपरीत चलते हुए छोटी यात्रा में ही थक सी गयी हूं, नंद जी। चाहती हूं कि मैं गर्भवती हो जाऊं.....लंबी छुट्टी में रहूं और एक बेटे को जन्म दूं। लेकिन सुमंत ऐसा नहीं चाहता नंद जी, मैं क्या करूं?’’

 

अपनी सरलता में जूसी ने ऐसा समाधान मुझसे पूछा कि मैं कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था। यह उसकी अदा थी, जिससे वह बार-बार हमें अंतरंग-आत्मीय बना लेती थी। इस एक संवाद से मुझे ऐसा लगा जैसे उससे कभी मेरी कोई दूरी हुई ही नहीं।

 

बातचीत से हमें यह स्पष्ट हो गया था कि सुमंत ने उस पर माया के महाजनी एवं उपभोक्ता पाठ पूरी तरह आरोपित कर दिया है कि दुनिया में सुख, एश्वर्य, भोग और सारे ठाट-बाट का जरिया सिर्फ अर्थ और यौवन है।

 

कंपनी के बड़े-बड़े मेहमान आते थे......कस्टमर्स, वीआईपी, एक्जीक्यूटिव्स, डिग्नेटरीज, टेक्नोक्रेट, शेयर होल्डर्स, गवर्नमेंट बॉडीज.....इनका प्रोटोकॉल एसाइनमेंट अब अधिकांशतः जूसी को ही दे दिया जाता था। वे कहां जायेंगे, कहां ठहरेंगे, किनसे मिलेंगे, कहां डिनर और लंच करेंगे.....सारा कुछ करवाने में उसे साथ रहना होता था।

 

एक बार मैंने मजाक में बहुत पहले कहा था, ‘‘जानती हो जूसी, आज जिसे हम प्रोटोकॉल ऑफिसर कह रहे हैं.....वस्तुतः राजे-रजवाड़े के समय में इसे अर्दली कहा जाता था।’’ वह हंस पड़ी थी और देर तक हंसती रही थी.....मुझे लगा था जैसे कोई स्वच्छ निर्झर फूट पड़ा हो।

 

जूसी की देखभाल एवं सत्कार से अतिथि संतुष्ट एवं खुश होकर जाते थे। डिविजनल मैनेजर और एमडी के पास लिखे पत्र में जूसी के लिए खासतौर पर प्रशंसात्मक उद्गार दर्ज होते थे। विभागीय मीटिंग में इसका जिक्र होता और जूसी की तारीफ की जाती। रोहन और उस सेक्शन के दूसरे ऑफिसर एकदम कुढ़ जाते थे। रोहन धड़ल्ले से मुंहफट फिकरा कस देता था, ‘‘हुस्न, खूबसूरती और जवानी का इससे अच्छा इस्तेमाल कंपनी में और क्या हो सकता है? काश! हम भी लड़की होते।’’

 

जूसी को चरित्रहीन और अमर्यादित कहने में कितना दम था.....इस बारे में हम दुविधाग्रस्त थे। लेकिन उसके बदले हुए रंग-ढंग और तेवर देखकर उसके बारे में अब कोई अतिरंजित सूचना भी हमें अविश्वसनीय नहीं लगती थी। हम अब यह मानने चले थे कि हमारी दिनचर्या का एक सबसे सुरीला साज किसी यांत्रिक खराबी के कारण बेसुरा हो गया.....इसी बीच जूसी ने एक ऐसा राग सुना दिया कि हम सभी मंत्रमुग्ध रह गये।

 

कस्टमर के रूप में एक टेक्निकल टीम के साथ सऊदी अरब का एक बहुत बड़ा शेख आया। उसे एक स्टील प्लांट बैठाना था, अतः टेक्नोलॉजी और सारा संयंत्र खरीदने का सौदा इसी कंपनी से उसे करना था। टीम गेस्ट हाउस में ठहरायी गयी और शेख डायरेक्टर बंगलो में, जहां उच्च स्तरीय आवभगत का पूरा सरंजाम था। एक रात मैनेजिंग डायरेक्टर ने शेख के सम्मान में अपने घर पर डिनर दिया।

 

शेख की मेहमाननबाजी की पूरी देखरेख जूसी कर रही थी, इस हिदायत के साथ कि जरा-सा भी कोई नुस्ख न रहे।

 

एक शाम जूसी जब उसे शहर के सबसे हसीन पार्क की सैर करवा रही थी तो उसने लक्ष्य किया कि शेख की हरकतें कुछ बदल रही हैं, नीयत में एक खोट समा रही है और उसकी आंखों में कामुकता की परछाई तैरने लगी है। जूसी ने जब बदतमीजी को अनदेखा करके अपनी अरुचि दर्शायी तो वह जरा खुलकर अपना इरादा जाहिर करने लगा। कहा कि वह दुनिया के पंद्रह सबसे धनी आदमियों में एक है.....तेल के कई कुएं हैं उसके पास.....उसे अगर खुश कर दिया गया तो वह एक बहुत-बहुत कीमती तोहफा दे जायेगा।

 

उसने यह भी कहा, ‘‘मेरे हरम में दर्जनों लड़कियां हैं.....कई-कई मुल्कों से लायी हुईं। जानता हूं कि इस मुल्क में भी चाहूंगा तो कई बिकने वाली लड़कियां मिल जायेंगी, लेकिन तुम्हारी खूबसूरती में जो कशिश है वह मेरे दिल में उतर गयी है।’’

 

जूसी बड़ी मुश्किल से उसे टालकर घर लौट पायी। साले ये गुस्ताख शेख समझते हैं कि पैसे से दुनिया की हर चीज खरीद लेंगे। सुमंत से बहुत अधीर स्वर में उसने शेख की अशिष्टता का बयान किया, इस भाव से कि अनुकल प्रतिक्रिया और आश्वासन द्वारा उसे लगे आघात का उपचार हो सकेगा। लेकिन सुमंत ने इसे इस रूप में लिया जैसे पड़ोस से पिटकर आये किसी नादान बच्चे को फुसला रहा हो, ‘‘कम ऑन जूसी.....शेख लोग तो थोड़े मनचले और ऐय्याश होते ही हैं। इसे इतना तूल देना उचित नहीं है, डार्लिंग। थोड़ी चतुराई से टेकल कर लो। कंपनी का वह खास मेहमान बनकर आया है.....नाराज हो गया तो यूं नो, कंपनी के करोड़ों की आशा पर पानी फिर जायेगा। देश को भी विदेशी मुद्रा की जरूरत है.....सो डोंट बी सो सेंटीमेंटल, माई स्वीटहार्ट।’’

 

जूसी सन्न रह गयी.....पत्नी के आबरू पर एक गैर मुल्क का गैर मर्द हाथ डाल रहा है और पति इसे एकदम मामूली बात कहकर विदेशी मुद्रा अर्जित करने की राष्ट्रीय चिंता कर रहा है। अंदर ही अंदर घुटकर रह गयी वह।

 

अगले दिन इस मुद्दे को उसने चिन्तातुर और परेशान मुद्रा में डिविजनल मैनेजर देवव्रत कुमार के सामने रख दिया। देवव्रत से बेहतर और कौन जान सकता था कि चरित्र के मामले में जूसी का क्या रुख रहा है।

 

देवव्रत ने अपने प्रशासनिक कौशल का प्रयोग करते हुए बड़े मसीहाई अंदाज से उसकी ओर देखकर पुकारा, ‘‘जूसी, डोंट बी सिली। तुम नाहक डिस्टर्ब हो गयी हो। बी प्रैक्टिल यार! आज हर चीज में ग्लोबलाइजेशन की हवा है.....हमें अपने बिहैवियर, हैबिट्स और कल्चर को भी उसके अनुरूप ढालना होगा। यह नहीं कि सिर्फ वस्तुओं को.....प्रोडक्ट्स को बेचने-खरीदने से ही ग्लोबलाइजेशन और लिब्रेलाइजेशन हो जायेगा। यह शेख कंपनी का बहुत बड़ा कस्टमर है.....एमडी बार-बार उसकी खातिरदारी के बारे में ताकीद कर रहे हैं.....देसी बाजार में इन दिनों भारी मंदी चल रही है.....यूं नो, इस शेख पर कंपनी के इस साल के प्रॉफिट का सारा दारोमदार टिका है। एक मामूली से पर्सनल इशू के लिए पब्लिक इंट्रेस्ट की बलि मत होने दो, जूसी। तुम्हारा प्रोमोशन लेटर तैयार है...।’’

 

जूसी की आंखों में मानो खून उतर आया। उसे लगा कि यह आदमी डिविजनल मैनेजर नहीं किसी कोठे का दलाल है जो उससे कह रहा है कि घर आये मोटे आसामी को प्लीज जाने मत दो.....मालामाल होने का अवसर बार-बार नहीं मिलता।

 

उसकी तनी हुई भंगिमा जरा भी ढीली नहीं हुई। इसे देखकर देवव्रत की मनःस्थिति बेचैन हो गयी। उसने तुरंत फोन पर एमडी से सब कुछ बता दिया। एमडी ने फोन पर ही सीधे जूसी को तलब कर लिया, ‘‘जूसी, आई नो यू आर ए वेरी इंटेलीजेंट गर्ल। आई बिलीव दैट यू नो योर पीआर (पब्लिक रिलेशंस) रेस्पांसिबिलिटी वेरी वेल। इट इज योर ड्यूटी टु मेक सिचुएशन फेबरेबुल फॉर द सेक ऑफ कंपनी। यू आर अवेयर विद आवर स्लोगन ‘कस्टमर फस्ट हर हाल में’। ग्लोबलाइजेशन इज आवर चैलेंज जूसी.....वी मस्ट फेस इट। गो अहेड एंड विन द गोल। होप यू विल सक्सीड इट.....ओके...बेस्ट ऑफ लक...।’’

 

जूसी अगले दिन फिर उस शेख के साथ रही। दिन में उसने छूने, चिपकने, चूमने की बार-बार कोशिशें जारी रखीं। रात में  शेख के डिनर हो जाने के बाद वह लौटने लगी तो उसने सीधे जूसी का हाथ पकड़ लिया।

 

जूसी ने झटके से हाथ छुड़ाकर उसे बेपनाह नफरत से निहारा और कहा, ‘‘लानत है तुम पर शेख.....तुम हमारे मेहमान नहीं होते तो अपनी जूती से मैं तुम्हारा चेहरा बिगाड़ देती। तुम तेल के दर्जनों कुओं के मालिक और दुनिया के जाने माने रईसों में एक हो सकते हो.....तुम्हारे ऐशगाह में दुनिया के कई मुल्कों सहित हिन्दुस्तान की भी लड़कियां हो सकती हैं.....लेकिन एक गैरतमंद की खुद्दारी को जबर्दस्ती खरीदने के लिए दुनिया की सारी दौलत भी कम पड़ जाती है, शेख.....इसे याद रखना.....गुड बाय।’’

 

जूसी ने रात में ही अपना रेजिग्नेशन ड्राइवर के हाथों सीधे मैनेजिंग डायरेक्टर के घर भिजवा दिया।

 

सुबह ही सुबह मेरे घर आकर उसने पूरी दास्तान सुना दी। मुझे लगा कि उसने महीनों के अबोले की एक ही साथ ढेर सारे अर्थगुंफित संवाद से भरपाई कर डाले हैं।

 

जूसी फिर से बिम्बों और प्रतीकों में हमारे दिमाग पर छा गयी, तितली की तरह.....स्वप्न की तरह.....तरंग की तरह.....खुशबू की तरह.....वसंत की तरह.....संगीत की तरह.....चांदनी की तरह.....रोमांच की तरह.....कल्पना की तरह.....कविता की तरह...।

 

जूसी इसके बाद हमारे इस विभाग में कभी नहीं आयी, लेकिन उसका न आना भी हमें रोज उसके आने की आहट दे गया। उसने हमें बता दिया कि इज्जत, आबरू और संस्कृति का लिब्रेलाइजेशन नहीं होता..... विदेशी मुद्रा से बड़ी हैं ये चीजें। ये हमारे मूल्य हैं.....ये बचेंगे तो हमारा समाज बचेगा.....हमारा देश बचेगा......हमारा परिवार बचेगा। हम तुम्हारे कायल हैं जूसी.....हमें तुम पर गर्व है.....हम तुम्हें प्यार करते हैं.....दिलोजां से प्यार करते हैं.....आमीन।

 

 

 

 

 

 

#प्रोटोकॉल

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