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शॉटकट्स
शॉटकट्स
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© Neeraj Kumar

Drama

16 Minutes   14.3K    20


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चलो यारों आज का काम खत्म हो गया है, और आज तो मैं अपनी बाइक से भी आया हूँ।

इतना कहकर मैं अपने दफ़्तर से निकला और मेन रोड की जगह एक कच्चे रास्ते पर आगे बढ़ गया।

क्योंकि मेन रोड से घर जाने में आधे घंटे से ज़्यादा समय लगता था और आज मैने अपनी बाइक साथ

लाई थी तो लम्बे रास्ते से जाने का कोई मतलब नहीं बनता था, तो बस मैं भी चल पड़ा था अपनी धुन

में..

पर मेरी ये गुनगुनाहट ज़्यादा देर तक नहीं रुकी..क्योंकि मैं दफ़्तर से करीब 3 किलोमीटर आगे आ

आया था और तभी मेरी बाइक का टायर पंक्चर हो गया।

मैने जैसे तैसे बाइक रोकी और इधर - उधर देखने लगा, इस आस में कि शायद कोई दुकान दिखे जहाँ

मैं अपनी गाड़ी ठीक करवा सकूं।

थोड़ी देर बेकार का इंतज़ार करने के बाद मैं अपनी बाइक को धक्का लगाते हुए आगे बढ़ा और अपने

आप को कोसने लगा, अपने उस शाॅर्टकट लेने के फैसले पर।

ठीक हुआ यही होना चाहिए तुम्हारे साथ, बड़े आए जल्दी धर पहुँचने वाले.. होशियार चंद कहीं के।

मैं ऐसे ही खुद को कोसता हुआ आगे बढ़ रहा था कि तभी मुझे किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।

मैने रुक कर देखा तो कोई आदमी मेरी तरफ भागता हुआ आ रहा था, मुझे लगा उस सुनसान रास्ते पर

अब तो कोई ना कोई मदद मिल ही जायेगी।

मैंने बिना सोचे समझे उस भागते हुए आदमी को पकड़ लिया, और बिना जाने की वो भाग क्यों रहा था,

मैंने अपनी परेशानी उसे बता दी।

बस फिर क्या था उसने अपनी जेब से पता नहीं कब एक बड़ा सा चाकू निकाल लिया.. मैं ये समझ नहीं पा रहा

था कि कैसे मैने खुद अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार ली..लेकिन इस बार मैं अपने आप को कोस नहीं पाया, मैं

काफी डर गया था और उसे देखे जा रहा था।

उसके मुंह से निकला हुआ पहला शब्द था, पैसे निकाल ..चुप चाप सारे पैसे निकाल।

तभी हम दोनों ने देखा की एक औरत 5 फूट का डंडा लिए दौडी़ चली आ रही थी। उसे देख कर चाकू वाला

आदमी थोड़ा सा घबरा सा गया और उसने मेरे हाथ पर चाकू चला दिया...

मैं बहुत डर गया था कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं, कैसे करूं??

वो औरत भी पास आ रही थी ये देखकर वो आदमी। फिर से मुझसे पैसे मांगने लगा, मैने भी बिना देर किये

उसे अपना बटुआ निकाल कर दिया..और उस आदमी ने भी सिर्फ पैसे निकाले और बटुआ मुझपे ही फेंक कर

वहाँ से भाग गया, इससे पहले कि मैं उसके पीछे जाता..वो औरत मुझ तक पहुंच चुकी थी।

मैं फिर से डर गया..और अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपा कर घुटनों के बल बैठ कर कहने लगा,

देखिए मेरे पास कुछ भी नहीं है, सारे पैसे वो आदमी ले गया, मुझे जाने दो, प्लीज़ ....

जब वो औरत कुछ नहीं बोली तो मैंने अपने हाथ (जिससे मैंने अपना चेहरा ढका था) उठाकर देखा तो वो

औरत उसी डंडे के सहारे खड़े होकर हांफ रही थी।

मैंने थोड़ी हिम्मत बांधी और जैसे तैसे खड़ा हुआ

मुझे उठता देख उस औरत ने पूछा - तू कोन है रे..और उस हरामी से क्या बात कर रहा था??

मैं उस वक्त कुछ भी बोलने की हालत में नहीं था..फिर भी दर्द में कराहते हुए मैंने कहा - मैं उस आदमी को

नहीं जानता उसने मेरे सारे पैसे भी ले लिए, अब मैं अपनी गाड़ी कैसे ठीक कराउंगा, घर कैसे जाउँगा??

मेरे एक हाथ से खून भी बह रहा था ये देखकर उसने अपनी साड़ी से एक टुकड़ा फाड़ा और मेरे घाव पर बांधने लगी।

मैं अपने साथ हुए इस अचानक से इस हादसे से उबर ही नहीं पा रहा था.. खामोश हो कर सोच रहा था कि

आखिर ये हुआ क्या ?

पट्टी बांधने के बाद उस औरत ने अपने फोन की टॉर्च जला कर पहले तो मेरा चेहरा देखा, थोड़ी देर गौ़र से

देखने के बाद मेरी बाइक की वो टायर देखी जो सच में पंक्चर हो गई थी। फिर उसने पूछा तुम हो कौन और इस वक्त यहाँ कर क्या रहे हो ?

मैं मेन रोड से घर जाने वाला था दफ़्तर से निकला और सोचा ये रास्ता शॉर्टकट है तो इसमें आ गया,

और फिर मेरी गाड़ी का टायर पंक्चर हो गया, मैने इधर उधर देखा कोई नहीं मिला तो खुद धक्का लगा कर

यहाँ तक आया, फिर तभी देखा कि वो आदमी भाग रहा था, तो मैने उससे मदद मांगी और फिर उसने आपको देखा तो घबरा कर मुझ पर हमला कर दिया और मेरे पैसे ले कर भाग गया..। मैने कहा, जाने क्यों मेरी बात सुनकर वो हँसने लगी।

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था, मैं मेरी हालत पर उसको हँसता देख चौक गया, और हैरानी से उसकी तरफ

देखने लगा। शायद वो मेरी परेशानी पर नहीं बल्कि मेरी किस्मत पर हँस रही थी। उसकी हँसी मुझे ऐसे चुभ रही थी जैसे किसी ने मेरे घाव पर लाल मिर्च डाल दी हो। आप हँसना बंद करेंगी प्लीज़..मैने थोड़े गुस्से में कहा।

मेरी नाराज़गी देख कर उसने अपनी हँसी पर काबू पाया और मुझसे कहा - चलिए, आपकी थोड़ी मरहम -

पट्टी कर दें, मेरा घर यहीं पास में है और आपकी गाड़ी भी ख़राब हो गई है आज आप यहीं रुक जाईए ।

मैं सोचने लगा, अचानक इस औरत में इतनी इंसानियत कहाँ से जाग गई ?

उसने फिर से कहा - देखिए, आज आप यहीं रुक जाईए कल आपके सो कर उठते ही हम किसी को कहकर

आपकी गाड़ी ठीक करवा देंगे। मुझे थोड़ी हिचकिचाहट हुई कि मैं ऐसे कैसे किसी अंजान औरत के घर में चला जाऊं, मैने उसको कहा,आप ऐसे कैसे किसी अजनबी को अपने घर आने को कह सकती हैं, मेरा मतलब है आपको डर नहीं लगता? और आपके घरवाले क्या कहेंगे?

उसने फिर से मुस्कराते हुए जवाब दिया - देखिये साहब, डर के साथ हमारी जमती नहीं थी इसलिए बहुत साल

पहले ही छोड़ दिया, या फिर ये कह कह सकते हैं कि ज़माने ने इतना डराया कि डर भी डर कर मर गया और

जहाँ तक बात है हमारे अकेले होने की तो आपको बता दें कि हमारा 6 साल का बेटा है।

उसकी इन गहरी बातों से मैं सोचने पर मजबूर हो गया.. मुझे जाना चाहिए या नहीं, क्या करूं रात भी बहुत

हो गई है, भूख भी ज़ोर की लगी है, क्या करूं, क्या करूं?

मुझे ख़ामोश देख कर वो समझ गई कि मैं अभी भी उसके साथ चलने को तैयार नहीं था।

तब उसने भी थक-हार कर कहा, ठीक है आप यहीं रहिए और सुबह तक का इंतज़ार कीजिए, वैसे अगर मन

बदल जाए तो आ जाइएगा। दाएँ ओर दो गली छोड़ कर तीसरा मकान मेरा है, चलती हूँ।

इतना कहकर वो वहाँ से जाने लगी और मैं अब तक यही सोच रहा था कि क्या करूं,क्या करूं ?

पर मैने इस बार हिम्मत कर के उस औरत को रोका।

ज़रा सुनिये , क्या मुझे थोड़ा खाना मिल सकता है ? भूख लगी है बहुत जो़र की।

उसने मुस्कराते हुए मुड़ कर देखा और साथ चलने का इशारा किया। पर क्योंकि मेरे एक हाथ में ताज़ा घाव था

मुझसे अपनी गाड़ी धकेली भी नहीं जा रही थी तो मैने उससे मदद मांगी, उसने भी झट से धक्का लगाना शुरु

कर दिया। जैसा उसने कहा था थोड़ी देर में हम ठीक दो गली बाद उसके घर के सामने खड़े थे।

जैसे ही उसने दरवाज़ा खट-खटाया, मेरी धड़कने तेज हो गई और मैं खुद को दिलासा देने लगा ना बेटा ना डरो

नहीं, अबे तुम मर्द हो। तभी अंदर से दरवाज़ा खुला तो मैने देखा कि अंदर तो वही 6 साल का लड़का है जिसके बारे में ये औरत बता रही थी, मुझे उसे देख कर थोड़ा भरोसा हुआ कि ये औरत सच बोल रही है और मैने भी राहत की सांस ली और घर के अंदर चला गया।

हमारे अंदर जाते ही उस औरत ने मुझे तुरंत साबुन और एक लोटा पानी दिया और कहा की मैं अपना घाव

अच्छे से साफ कर लूं तब तक वो मेरे लिए कुछ रोटियां बना देगी।

उसके बात करने के तरीके से ऐसा लग ही नहीं रहा था कि मैं उसके लिए कोई अंजान हूँ।

मेरे घाव से अब खून आना बंद हो गया था वो भी उसी औरत की बांधी हुई पट्टी की बदौलत और जब मैं

अपने हाथ धो कर वापस आया उसने कहा लाओ दवा लगा दें मैं भी बैठ गया, उसने भी मेरे घाव को अच्छे से

साफ किया और दवा लगा दी और फिर किसी नर्स की तरह बड़ी ही आसानी से पट्टी बांधने लगी उसकी इतनी

सफाई देखकर मुझसे रहा नहीं गया और मैने पूछ ही लिया, क्या आप कोई नर्स हैं ?

उसने फिर से मुस्कराते हुए जवाब दिया- नहीं साहब, ज़िंदगी हमारी है, तो घाव भी हमारे...और हम अपने

घाव भरते - भरते इतना तो सीख गए कि चोट लगने पर हमारी पट्टी करने के लिए कोई नहीं है इसलिए

अपने ज़ख्म भी और अपने मरहम भी।

उसने अपना जवाब देते - देते मेरी पट्टी बांध ली थी और खाना परोसने लगी ।

उसका जवाब सुनकर मुझे समझ ही नहीं आया कि मैं अब क्या कहूं? तो फिर मैने सवाल ही बदल दिया इस

बार मैने पूछा, खाने में क्या है? मेरा मतलब है आप ज़्यादा परेशान ना हो और कुछ अलग ना बनाएं जो भी

बचा होगा मैं खा लूंगा। उसने कहा - दाल और रोटी है आम के आचार के साथ और इतना कहते कहते उन्होंने खाना परोस भी दिया।

पहला निवाला चखते ही लगा कि ना जाने मैं कितने दिन से भूखा हूँ और मैं बड़े चाव से खाने लगा। चार

रोटियां खाने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैने उनको खाने के लिए तो पूछा ही नहीं, कितनी ग़लत बात है,

और मैने देखा तो वो मेरी तरफ ही देख रहीं थी, तो मैने भी कहा, माफ़ कीजिएगा मैने आपको पूछा ही नहीं खाने के लिए तो उन्होंने कहा, आप सिर्फ सवाल क्यों करते हैं, उनकी इस बात पर हम दोनों ही हंस पड़े,

और फिर तुरंत मैने उनसे कहा की अब जहाँ मैने इतने सवाल पूछ ही लिए हैं तो क्या मैं एक और सवाल पूछ लूं? बहुत देर से सोच रहा था उसके बारे में। ठीक है। मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा।

वो आदमी कौन था? जिसने मेरे सारे पैसे लुट लिए, जिसके पीछे आप वो डंडा ले कर भाग रहीं थी, जिसने मुझपर हमला किया और आप जिसको गालियां दे रही थी, कौन था वो कमीना? कोई चोर था क्या?

ये सवाल सुनकर उनकी चेहरे की मुस्कान फीकी पड़ गई और ये देखकर मैं उनसे कहने लगा कि ठीक है

आप जवाब मत दीजिए मैं....तभी उनका जवाब आया, वो हमारे चाचा हैं और अब खाना खाने तक कोई सवाल नहीं आपको जो भी पूछना है खाने के बाद पूछना। उनकी ये कड़क आवाज़ सुनकर मैने भी अपना सिर झुकाया और थाली पर ध्यान लगाया। खाना खा कर हाथ धोने के बाद मैं अपनी गाड़ी को देखने दरवाज़े पर गया और थोड़ी देर के लिए वहीं बैठ गया। मुझे ऐसे उदास सा देखकर उन्होंने कहा, ठीक है साहब, आप उदास मत रहो आप अपने सारे सवाल हमसे पूछ सकते हैं ....

उनके इस मज़ाकिया अंदाज़ की वजह से मैं थोड़ा सहज महसूस कर रहा था, तो मैने भी कहा चलिये ठीक है,

आप कहती हैं तो पूछ लेता हूँ । तैयार हो जाइये आपका पहला सवाल।

आपका नाम क्या है?

- आरती।

आपकी उम्र क्या है?

- 26 साल।

आपके बेटे का नाम क्या है ?

- रोशन।

आपके घरवाले ?

- लव मैरेज, कोई साथ नहीं रहता।

आपके पति?

- अब नहीं हैं।

ये सुनकर मुझे झटका लगा और मैं सोच में पड़ गया अभी उनकी उम्र ही कितनी है और इतनी छोटी सी उम्र

में ऐसा दुख, इतना सब बीतते हुए भी खुल कर हँस लेना बहुत बड़ी बात होती है, सच में।

मैने उनसे कहा, आप सच में महान हैं। ज़िंदगी में इतनी मुसीबतों के होते हुए भी आप ऐसे डट कर खड़ी हैं,

मुझे आप पर और आप जैसी हर महिला पर गर्व है। मेरी ये बात सुनकर वो और ज़ोर से हँसने लगी।

मैं उनकी इस हँसी की वजह समझ नहीं आ पा रही थी। फिर उन्होंने जो कहा वो सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई । उन्होंने कहा, हम एक वेश्या हैं साहब, आपको मदद की जरूरत थी इसलिए मदद किए, वो क्या है ना साहब हम शरीर बेचते हैं इंसानियत नहीं। हम आपको पहले नहीं बताए क्योंकि हमको लगा आपको पता चलेगा तो आप हमारे घर का खाना तो क्या पानी भी नहीं पियेंगे। फिर हमारी वजह से आपको चोट भी लगी थी। हाँ, वो आदमी जिसने आपको चाकू से मारा वो हमारा दलाल था, पैसे मांग रहा था हमने जितने बनते थे दिये, पर वो और मांग रहा था और जब हमने नहीं दिया तो हाथ से छीन कर भाग रहा था इतने में उसे आप मिल गए। उनके इस जवाब ने थोड़ी देर के लिए चारों तरफ खामोशी की लहर दौड़ा दी।

आख़िरकार मैने ख़ामोशी तोड़ने की सोची और कहा, अब आप मुझे ये सब क्यों बता रहीं हैं ?

उन्होंने कहा - आपने जब हमसे तमीज़ और शराफत से बात की हम तभी समझ गए थे कि आप बड़े सीधे हैं

और बड़े सालों बाद हमसे भी किसी ने इतनी तमीज़ से बात की, बडे़ सालों बाद किसी कि आँखों में अपने

लिए हवस की जगह तहज़ीब देखी, फिर आपने हमारे घर में खाना खाया तो हमें लगा हम आपको धोखा दे रहें

हैं, हमसे रहा नहीं गया इसलिए सब सच बता दिया आपको अब आपकी मर्जी आप चाहें तो यहाँ से जा सकते हैं , हमारे मन में भी अब कोई बोझ नहीं है।

अब मेरे मन में पहले से ज़्यादा सवाल थे और मैं फिर से ख़ामोशी से सोच रहा था कि कहीं मैं कोई सपना तो

नहीं देख रहा हूँ आख़िर ये मेरे साथ हो क्या रहा है ?

तब उन्होंने फिर से अपने मज़ाकिया अंदाज़ में पूछा - क्या हुआ ? लगता है आपके सवाल भी अधूरे हैं

आपकी मुस्कान की तरह।

मैं इस बार जब उनकी तरफ मुड़ा मेरी आँखें भर आई थी, मैने अपनी भरी हुई आँखों से चेहरे पे एक मुस्कान

लिए फिर से एक सवाल किया।

ये बच्चा ? आप कब से? ये सब कैसे शुरु हुआ?

आरती - साहब, आज के दौर में लोग चीज़ों की कीमत लगाते-लगाते इंसानो की भी कीमत लगा देते हैं, काश

! हम भी जानवर होते तो कम से कम खरीदे और बेचे जाने का दुख नहीं होता।

हमारे पिताजी धोबी थे, बहुत कम पैसे कमाते थे पिताजी और उनको शराब की लत भी थी, जब पैसे कम पड़

जाते थे तो घर का सामान बेच देते थे और उन पैसों की भी शराब पी जाते थे। एक दिन महीने भर की शराब

और कुछ पैसों के बदले हमको भी एक 40 साल के आदमी को बेच दिया ।

हमने सोचा हमारे बाप के उमर का है ज़्यादा से ज़्यादा हमें नौकरानी बना कर रखेगा लेकिन आदमी जानवर

भी बनता है ये हमने उससे मिल कर जाना, हमारे शरीर पर एक भी जगह नहीं बची है जहाँ उसकी दरिंदगी के

निशान ना हों । हमें तो अपनों ने ही बेच दिया था तो ग़ैरों के खरीदे जाने पर ऐतराज़ कैसे करते। तब हम

सिर्फ 19 साल के थे। पूरे 6 महीने उसने हमारा बलात्कार किया और फिर हम एक दिन वहाँ से भाग गए और

भागते - भागते यहाँ आ गए। इस शहर में आने के बाद हमने बहुत लोगों से काम मांगा कुछ लोगों के यहाँ

नौकरी भी की पर हर जगह हमें इंसान की शक्ल में भेड़िये ही मिले। फिर हमें ये चाचा मिले हमारे दलाल

इनकी वजह से आज हमारे सर पर छत है और जब हम पेट से थे तब इस बस्ती में कई औरतों ने हमारा

ख़याल रखा हम नहीं जानते ये जो बच्चा आप जिसको चैन की नींद सोते हुए देख रहे हैं इसका बाप कौन है

पर हम इतना जरूर जानते हैं कि हमने इसे जन्म दिया है और हाँ ये पैसे वाला बने ना बने इसको आपके जैसा

एक अच्छा इंसान जरूर बनाएंगे।

इस बस्ती में हमारे जैसी बहुत सी औरतें हैं जो आपना शरीर बेचती हैं पर हम सब यहाँ इंसानो की तरह

रहते हैं, बाकियों कि तरह दिखावा नहीं करते की सामने तो दीदी बोले और थोड़ी दूर जाने पर कपड़ों के भीतर

जाने की बात करें।

तो साहब ये थी हमारी दास्तान ।

अब आप बताओ कोई और सवाल है क्या?

उस वक़्त मुझे अपने आदमी होने पर घिन आ रही थी, मैं उनकी कहानी सुन कर ही इतनी तकलीफ में था कि

उनपर गुज़रे हुए लम्हों के खयाल से ही सहम गया था। हर वेश्या पहले किसी की बेटी होती है, फिर एक औरत होती है और जब हम जैसे कुछ लोगों की हैवानियत से तंग होकर कोई औरत वेश्या बन जाती है ,तो उसे समाज के लिए गंदगी और कलंक जैसे नाम दे दिए जाते हैं।

हम हमारी इस सोच को कैसे दूर करें इस बारे में कोई नहीं सोचता कोई ये नहीं सोचता कि हम जैसे ही कुछ

लोग इस समाज में हैं जो इनके इस पेशे पर अपना पैसे पानी की तरह बहाते हैं और हममें से ही वो लोग भी हैं

जो लड़कियों को औरतों को इस पेशे से जुड़ने पर मजबूर करते हैं। ये कोई नहीं सोचता कि ये पेशा बुरा है

इससे जुड़े लोग भी इंसान ही हैं।

कुछ इसी तरह के ख़याल मेरे मन में चल रहे थे तब आरती जी ने कहा, साहब ये तो गलत बात है आपने मेरे

बारे में तो सब पूछ लिया, अपने बारे में भी कुछ बताइए।

मैंने झट से अपने आँसू पोछे और अपना एक हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा, जी मेरा नाम अमर है, आरती जी आपसे मिल कर आज बहुत खुशी हुई, सच में।

मैं यहीं यहाँ से 3 किलोमीटर दूर आपकी ख़बर नाम का जो अख़बार है ना उसी में पत्रकार हूँ। आज शाम

को काम खत्म कर के घर जल्दी जाने के चक्कर में आपको तकलीफ़ दे रहा हूँ, वैसे जिस शाॅर्टकट को मैं अब

तक कोस रहा था अब उसका शुक्रगुज़ार हूँ।

अंजाने में ही सही आरती जी, इसने मुझे आपसे मिलवा दिया, मेरी इस बात पर हम दोनों ही हँस पड़े।

आप यहाँ नये आए हैं ? आरती जी ने पूछा।

जी हाँ ! दरअसल मुझे अभी बस दो हफ्ते ही हुए हैं इस शहर में आए हुए।

ठीक है पत्रकार साहब, अब हमको नींद आ रही है आप भी सो जाइए रात के 2 बज चले हैं, सुबह उठकर आपकी गाड़ी भी तो बनवानी है, इजाज़त दीजिए।

आपके सोने का इंतजा़म बिस्तर पर कर दिया है, हम रोशन के साथ रसोई में सोने जा रहे हैं।

मैं कुछ कह पाता उससे पहले वो रसोई में जा चुकी थी, मैं भी आरती जी, रोशन और इनके जैसे लोगों के

लिए कुछ अच्छा करने का ख़्याल लिए लेट गया पर मुझे नींद आते -आते 4 बज गए।

अगली सुबह जब मेरी आँख खुली तो सुबह के 10 बज रहे थे, मैने तुरंत अपने एक साथी को फोन किया और

उससे कहा कि वो हमारे बाॅस से कह दे कि मैं अगले 3दिन आँफिस नहीं आने वाला ।

मेरी ये बात आरती जी ने सुन ली, और मेरे फोन रखने पर सामने से आकर पूछा आप कहीं जा रहे हैं पत्रकार

साहब ? मैने कहा, हाँ एक ज़रूरी काम आ गया है उम्मीद है मेरी बाइक बन गई होगी।

अरे हाँ, हम आपको वही बताने तो आए थे पर हर बार आप सो ही रहे थे नाक बजा कर,अभी हम पाँचवी बार

आए हैं ।

इतना कह कर आरती जी फिर से हँस पड़ी ।

अब मुझे चलना चाहिए ये कह कर मैं जैसे ही आरती जी के घर से निकला आस पास के लोगों ने ऐसी इज्ज़त

दी जो इस देश में किसी बड़े नेता या अफ़सर को ही मिलती है।

उस पूरी गली में लोगों ने दोनों हाथ जोड़कर राम सलाम किया लोगों का इतना प्यार देखकर आँखें भर आई।

और अगले कुछ पलों में मैं उन सब से दूर चला गया।

3 दिन बाद

आरती जी की बस्ती में लगातार 6 बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ एक के बाद एक करके आने लगीं। सब लोग घबरा कर

खड़े हो गए सभी गाड़ियों को पूरी तरह से घेर लिया गया था, के तभी तीसरी गाड़ी से मैं नीचे उतरा और उस

भीड़ में आरती जी को ढूँढने लगा और जब वो नहीं दिखी तो मैने उनका नाम जो़र से चिल्लाया.. आरती जी।

तभी मैने देखा भीड़ में से आरती जी निकल कर मेरे पास आ रही थी, उनके आने के बाद मैने उनको कहा,

मुझे आपसे दो मिनट बात करनी है, अंदर चलिए। आरती जी और पूरे बस्ती वाले सभी सहम से गए थे उनको लग रहा था कि उनकी इस छोटी सी बस्ती में कोई मुसीबत आन पड़ी है।

जैसे ही हम सब जितने भी लोग गाड़ी में आए थे कमरे में गए, मैने आरती जी को कहा आरती जी पानी

पिलाइये गला बहुत सूख गया है, इधर घबराई हुई आरती जी ने कहा, साहब आखिर बात क्या है ? पहले वो बताइए। मैने कहा, आरती जी आप अपने रोशन की पढ़ाई की चिंता छोड़ दीजिए। ये जो लोग आए हैं ना मेरे साथ ये सबके सब एन.जी.ओ से आए हैं और आज के बाद आपको भी और बाकी सभी औरतों को वो गंदा काम करने की कोई ज़रुरत नहीं है, ये लोग आपको काम सीखाएंगी और आपके बनाए हुए चीजों से पैसे कमा कर आप अपनी जिंदगी बिना किसी के आगे हाथ फैलाए आराम से इज्ज़त के साथ बिता सकती हैं।

बस्ती वालों को मनाना आपका काम है, और हाँ इन लोगों के रहने और खाने पीने की ज़िम्मेदारी भी आपकी।

वो आरती जी जो हज़ार तकलीफ़ सह कर भी हँसते रहती थी, मेरी ये बात सुनकर फूट-फूट कर रो रही थी और रोते-रोते उन्होंने मेरे पैर पकड़ लिए।

मेरे काफी समझाने के बाद वो उठीं और उस दिन के बाद फिर कभी किसी के सामने नहीं झुकी।

सुनसान घाव इज्ज़त

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