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रसना
रसना
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© Jiya Prasad

Drama Fantasy Inspirational

12 Minutes   14.5K    29


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"पापा देखो ! धूप घर में घुस गई...देखो न...चलो तो सही..! "

राघव जो जल्दी ही बुढ़ापे की मार झेलता हुआ दिखाई देता है। तनाव और दुख के कारण उसके बाल तेज़ी से सफ़ेद हो रहे हैं। चेहरे पर चमक कम है। त्वचा ढीली हो गई है। आँखें अपने गड्डों में बसने को बेताब होने लगी हैं।

इस बच्ची को देखकर ही वह ज़िंदा है।

वह तो खुद डायरी में लिखता है -

“कभी कभी लगता है मेरे अंदर इस अंधेरे की तरह एक खाई है जो मेरे पैरों को पकड़ कर खींच रही है। आखिर मैं कब तक ज़िंदा रहूँगा ! लगता है मेरे अंदर कई कुएं खुद गए हैं। पर इनमें जीवन जल नहीं है। है तो काला, वह काला रस जिसमें मैं धीरे धीरे डूब रहा हूँ। ...क्या मैं जीवित हूँ ?...क्या मैं जीवित होने की शर्तें पूरी कर पा रहा हूँ ?...नहीं पता।”

वह कुछ नहीं भूलता, यही उसकी खास बात भी है और बुरी बात भी।

हाल के वर्षों में उसने डायरी लेखन भी शुरू कर दिया था। यह बात उसकी गोद ली हुई बेटी ही जानती थी।

वह रात को जब अपने पिता के कमरे में झाँकती थी तब पाती थी कि मेज़ पर मेज़ - लाइट की रोशनी में उसका पिता न जाने क्या देर तक लिखता रहता है।

क्योंकि डायरी नितांत निजी वस्तु है इसलिए न तो उसने कभी पिता की गैर - हाज़िरी में पढ़ा और न ही कभी उसके बारे में पूछा।

हालांकि राघव पिता बहुत अच्छा था और इस बात की पुष्टि यह बच्ची अपने चेहरे की हमेशा बनी रहने वाली मुस्कान से करती थी।

राघव का घर गली में तीसरा मकान था जहां उसका परिवार कई बरस पहले आया था। राघव की उम्र उस समय सोलह बताई जाती है।

वह घर का दूसरा बेटा था और उसके पिता किसी ब्लेड बनाने वाली कंपनी में अच्छी पगार पाया करते थे। पिता रविवार के दिन घर में अपनी पत्नी का सहयोग रसोई से लेकर कपड़े धोने तक में दिया करते थे।

यह दशक अस्सी के आसपास था इसलिए मोहल्ले में उनका भरपूर मज़ाक बना करता था। उनके लिए जोरू का गुलाम जुमला गढ़ लिया गया था।

राघव के ठीक सामने वाले घर में चटाई बुनने का काम करने वाला एक परिवार रहता था। घर में माता-पिता और एक लड़की थी जिसकी क़द की लंबाई की परेशानी को उसके माता पिता के चेहरे पर साफ देखा जा सकता था।

माता - पिता सर्दी हो या बरसात, किसी भी मौसम में सुबह छ: बजे उठकर बुनाई के काम में लग जाते थे। पर इस काम से वे अपनी लड़की को दूर रखा करते थे। उनका कहना था कि हम अधिक पढ़ - लिख नहीं पाये। अब अगर अपनी लड़की को पढ़ा पाए तो इससे बेहतर और क्या बात होगी !

रसना, जो उनकी बेटी का नाम था, वह पढ़ने - लिखने में बहुत बेहतर थी। क्योंकि दोनों परिवारों का घर आमने - सामने था इसलिए संवाद होना मुनासिब था। धीरे - धीरे दोनों परिवारों में रिश्ते गाढ़े होने लगे और परिवारों की दोस्ती के चलते रसना और राघव में भी काफी बढ़िया दोस्ती हो गई। गली में बाकी लोग भी छोटे - मोटे काम - धंधों या फिर नौकरी करने वाले लोग थे। यह मोहल्ला आम लोगों से जीवंत था।

रसना की सुंदरता में कोई कमी नहीं थी। उसका रंग धूप में सूखे हुए गेंहू की तरह चमकदार था और चेहरे की सुंदरता में होंठों के पास का तिल चार चंद लगा देता था। बाल उसके लंबे थे और वह अपना बहुत समय इन्हें दिया करती थी। रसना के घर में चटाई के शानदार छोटे - छोटे नमूने सजाये गए थे।

इकलौती संतान होने के चलते उसे अलग से एक छोटा कमरा हासिल था। उसकी मुस्कुराहट उसकी बातों से ज़्यादा अच्छी लगा करती थी। उसका धीर पसंद स्वभाव मोहल्ले में सराहनीय था। लेकिन कुछ ऐसा लोग ज़रूर अपनी नज़रों में उतार लाते हैं जिससे सामने वाले पर निशाना लगाया जाए।

रसना का क़द उसके व्यक्तित्व में एब की तरह कुरेदा गया। उसकी बाकी सारी खासियतों को धूल में मिला दिया गया। और उम्र के बढ़ते और शादी न होने के चलते उसे उसके बेहद कम क़द के लिए ताने दिये गए। रसना को घर में कभी इस बात का अहसास नहीं था कि उसका क़द बेहद कम था।

लेकिन स्कूल और कॉलेज या फिर आसपास मानो उसे कुरेद - कुरेदकर लोग कहते -

“बौनी रसना, नाटी रसना, बित्ता भर की रसना, छुटकी रसना, बेचारी रसना, अजीब - सी लगती है रसना, क्या होगा रसना का..!”

कितना कुछ सुनती थी रसना !

एक वक्त ऐसा आया कि उसे आदत लग गई इन सब बातों को सुनने की। पहले वह रो भी जाया करती थी पर कुछ अरसा हुआ कि उसने रोना भी बंद कर दिया है। ऐसे में राघव ही था जो उसे कहता था -

“तू मेरी दोस्त है। मजबूत रह। नौकरी के पेपर दे। अपने पैरों पर खड़ी हो। तुझे क्या करना है इन सब बातों से।”

पर रसना जानती थी कि वह भी उसका मन रखने के लिए सब बातें करता है। कॉलेज में भी वह रसना को दूर से देख ले तो कन्नी काट लेता है। जानकर भी अनजान बन जाता है। घर का रास्ता एक है पर वह अलग ही आता है। क्या रसना नहीं जानती कि वह ऐसा क्यों करता है ? रसना उम्मीद से अधिक समझदार है। वह सब जानती है इसलिए अब वह खुद ही उसे देखकर अनजान बन जाती है। रसना उसे कब से चाहती थी। इस बात को राघव बहुत अच्छी तरह से जानता था। लेकिन वह तो अपने को स्मार्ट समझता है इसलिए वह कम से कम एक बौनी लड़की से तो प्यार नहीं कर सकता। लोग क्या कहेंगे !

रसना ने अपनी डायरियों में तमाम तरह के जज़्बात लिखे थे। कई तो उसे खुद ही समझ नहीं आते या अजीब लगते थे। उसने एक रोज़ लिखा -

“राघव से उम्मीद नहीं है पर प्रेम से थी। सुना है प्रेम अंधा होता है। उसे क़द की ज़रूरत नहीं होती। फिर क्या राघव को समझ नहीं आता ?”

उसने एक रोज़ कैथरीन कुकसन का लिखा उपन्यास ‘कलर ब्लाइंड’ पढ़ा और वह बहुत प्रभावित हुई। उस एक संवाद से सबसे ज़्यादा -

“ईश्वर तो रंग ही नहीं देख सकता। ईश्वर रंग के मामले में अंधा होता है।”

उसने कुछ देर सोचा और मद्धिम रोशनी में डायरी में दर्ज़ किया -

“क्या ईश्वर क़द के मामले में भी अंधा होता है? हाँ... होता तो ज़रूर होगा। वामन अवतार में जब वह आया तो क्या उसका भी ऐसा मज़ाक उड़ा था। खैर भगवान अजीब है। क्या वह आसमान में सच में रहता है जो हमारी सुनता होगा। ऊपर से तो उसे सब कुछ बराबर ही दिखता होगा। क्या मैं भी दिखती हूँ ? इतनी छोटी हूँ, क्या मैं दिखती होउंगी ?”

इस बीच राघव के परिवार और रसना के परिवार ने दोनों की शादी की बात सोची जिसमें रसना की माँ ने कहा कि एक बार राघव और रसना की रज़ामंदी भी जाननी चाहिए। पर राघव से पहले रसना ने मना कर दिया। वह राघव का इंकार नहीं सह सकती थी। राघव ने इस सब के चलते चैन की सांस ली।

रसना ने इसके बाद राघव से लगभग दूर रहना शुरू कर दिया था। एक डायरी लेखन ही ऐसी जगह थी जहां वह उससे मिल लेती थी। बात कर लेती थी। इंसान की समानता की तमन्ना लेखन में कितनी समान हो जाती है। सभी लोगों के लिए लेखन सच्ची और वास्तविक डेमोक्रेसी जैसा स्पेस है। कम से कम रसना को तो यही लगता है।

क्योंकि जब वह लिखती है तब वह बस एक लिखने वाली ही रहती है। जो भी शब्द दिलोदिमाग में तैरते हैं वह उन सब से घिर जाती है। कितना सुखकारी है लिखना !

बंद कमरे में वह अपने दिन डायरी लेखन और पढ़ने में गुजारती थी। कुछ दिनों से उसे अजीबोगरीब अहसास और सपने आते थे। इसका ज़िक्र उसने किसी से नहीं किया। रात को सोने के समय उसने अपने आप को देखा की छाती और गले के हिस्से में बॉल के समान एक गोला घूम रहा है। वह लगातार घूम रहा गोला सूरज के नवजात बच्चे सरीखा है। उसे लगा कि यह उसके अधिक सोचने और तनाव का नतीजा है। पर यह गोला लगातार घूमता रहा और घूमता रहा। उसने एक रोज़ हिम्मत कर के अपनी माँ को यह बात बताई। पर माँ के लिए अब वह छाती के बोझ में तब्दील हो चुकी थी सो माँ ने उसकी इस बात पर ध्यान नहीं दिया।

अगले दिन रात में उसने लेखन से जुड़े कुछ ख़यालों को डायरी में उतारने के लिए कलम थामी।

उसने लिखा -

“अधूरे प्रेम और टूटते तारे, लेखन के लिए बहुत बढ़िया विषय हैं। कम से कम मेरे लिए तो हैं ही।”

पर जैसे ही उसने तारे के बारे में सोचा वह रोशनी का गोला उसकी छाती में चक्कर काटने लगा। उसका गला सूख गया और वह पानी पीने दौड़ पड़ी। पर उसे राहत नहीं मिली। वह अधूरी चाहत और रोशनी के गोले में तड़पने लगी और सुबह कब हुई उसे मालूम नहीं चला।

इस बीच राघव अपनी ज़िंदगी के जश्न में खो गया। उसने रसना से उसके कद से भी बड़ा फासला अख़्तियार कर लिया। वह बेहद कम मिलता और रसना की आँखों से आँखें भी नहीं मिला पाता।

उसके दोस्तों में जो कभी रसना का नाम भी आता तो वह गुस्से से उबल पड़ता। वह दिन - ब - दिन रसना के नाम से भी चिढ़ने लगा था। यहाँ तक कि उसने घर में घर बेचने की बात भी कह दी थी कि यह गली मोहल्ला उसके मानक पर उतर नहीं पाता। इसलिए उन्हें घर बेचकर कहीं ओर अच्छी कॉलोनी में चलना चाहिए।

पिता खासे नाराज़ हुए और बोले -

“अपनी कमाई करो और जहां चाहे बस जाओ।”

माँ ने खांसी से ज़रा आराम पाते हुए कहा -

“ज़िंदगी भर घर बदलेंगे या कभी टिककर जिएंगे।”

थोड़ा थमकर वे फिर बोलीं -

“अभी भी वक़्त नहीं गुज़रा है। रसना के बारे में सोचो। ज़िंदगी नेकी और क़ाबिलियत से अच्छी चलती है। रंगरूप की शाम ढल जाती है।”

उस रात वह गुस्से के मारे घर देर से आया और बिना खाये बिस्तर में चला गया।

मेहनत के फल बड़े रसीले हुआ करते हैं। रसना की मेहनत रंग लाई थी। उसका किसी बैंक में क्लर्क के पद पर चुनाव हो गया था। वह इन मायूसियों में रोशनमान हो गई और उसके माँ - पिता भी खुशी से झूम उठे। रसना ने अपनी खुशी को खुले दरवाज़े से आई हुई रोशनी के समान लिया।

पिता से बोली -

“आप दोनों को अब आराम करने की ज़रूरत है। चटाई बुनने में आप लोग थक जाते हैं। इसलिए आराम कीजिये। इतनी पगार तो है ही कि हम आराम से खा सकें।”

इसके दो महीने बाद ही रसना ने घर में रंग रोगन करवाया। अपने कमरे को खासतौर से सजाया और उसे किताबघर में तब्दील कर दिया। इतना ही नहीं बाद के महीनों में उसने तमाम रुचिकर किताबें खरीदीं और बाकायदा नियम से पढ़ने भी लगी।

इस बीच उसके माँ - पिता ने उन किताबों से भरपूर नाता जोड़ लिया। पिता भी कुछ ही समय में एक अच्छे पाठक में तब्दील हो गए और बेहद कम पढ़ी - लिखी माँ को भी हल्की भाषा पढ़ना सिखाने में कामयाब हो गए।

उसके माँ - पिता ने यह पहली बार अनुभव किया कि किताबों की दुनिया में कितनी रचनात्मकता है। हर तरह के अनुभव हैं। जगहें हैं। कहानियाँ हैं। किरदार हैं। परिस्थितियाँ हैं। वह सब है जो ज़िंदगी के साथ मिलता है। किताबों की दुनिया में जाकर उन्हें अपने उस बर्ताव से घिन आई जो कभी वे रसना के क़द के चलते कर बैठे थे।

पर आस - पड़ोस में लोग उन्हें हिकारत की नज़र से देखते थे जो बेटी के पैसों पर ज़िंदा थे। लेकिन रसना ने यह साफ कर दिया कि वह इस तरह की बातों पर ध्यान नहीं देती और घर में इसका ज़िक्र भी नहीं चाहती। उसने आगे भविष्य में अपनी योजनाओं पर ध्यान लगा लिया था। वह आत्मविश्वासी बन गई थी। यदि कोई उसे उसके क़द से कम भी समझता तो वह माकूल जवाब देती और परवाह नहीं करती।

रसना ने एक बहस यह भी खड़ी कि बौने लोग और बाकी लोग, लोग ही हैं। ‘स्नॉ व्हाइट’ के कहानी या फिर ‘गुलिवर ट्रेवल्स’ में आए बौने किरदार सिर्फ बौने ही नहीं बल्कि वे इनसे और भी आगे की खासियत रखते हैं। इस बीच एक पल को भी वह राघव को नहीं भूलती थी। रोशनी का गोला साथ - साथ चलता था। या यूं कहें कि रसना को उसकी आदत लग गई थी।

रसना की मुहब्बत डायरी में चाहे जितनी फलफूल रही थी पर उसके व्यावहारिक जीवन में एक रिश्ता आया और उसने अपने माँ - पिता के घोर आग्रह के चलते मान लिया। सब ठीक था। उसे इस अचानक आई खुशी पर यकीन नहीं हो रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि“गौरव का मेरी ज़िंदगी में आना मुझे हैरानी में डाल देता है। मुझे अपने श्रीमती रसना और कुमारी रसना के दो रूपों को देखकर कुछ समझ नहीं आता कि क्या आकलन किया जाये। यहाँ भरपूर सम्मान मिलता है जिसकी आदत नहीं रही कभी। अच्छा ...खुशियाँ क्या ऐसी ही होती हैं ? मैं खुश हूँ। गौरव जब आसपास रहते हैं तब मुझे बहुत अच्छा लगता है। छुट्टी का दिन घर में छोटा लगता है। मन में सवाल आता है कि रविवार इतना छोटा क्यों होता है ? धत् ! मैं पागल हो गई हूँ। दजीवन समय से बुना जाता है। बुनने के साथ साथ व्यक्ति अपने आप को भी बुनना जान जाता है। रसना अपने को जान रही थी पर दूसरी तरफ राघव अपने भटकाव को जीने की ललक में ही रह गया था। पर उसे एक बहुत बड़ा आघात लगा। इस बात का पता रसना को तब लगा जब वह अपने माँ - पिता से मिलने आई। उसे बताया गया कि राघव किसी काम से कहीं बाहर गया था। घर में उसका बड़ा भाई और माँ पिता ही थे। जाने क्या हुआ कि रात को आग की लपटों में कोई बच न सका। सब जन जलकर खाक हो गए। राघव जब आया तो रसना, जिसने अपने लिखने की आदत को अभी भी बरक़रार रखा था ने डायरी में लिखा -

“मुझे राघव के लिए अच्छा नहीं लग रहा। ईश्वर को इंसान की ज़िंदगी में इस तरह की घटना को नहीं रचना चाहिए। वो जहां भी हो बस जल्दी से ज़िंदगी की तरफ मुड़े। हमें फिर से वापस आना होता है। कैसी भी बुरी घटना हो या सदमे लग जाएँ, तब भी हमें ज़िंदगी की तरफ वापस आना चाहिए। जीने से बेहतर कुछ नहीं।"

कुछ समय बाद राघव वापस मोहल्ले में आया और साथ में एक बच्ची लाया। पड़ोस के लोगों से उसने अपनी बातचीत लगभग समाप्त कर दी थी। लोगों ने उस बच्ची के बारे में खुद से कई क़यास लगाए और कुछ समय बाद चुप हो गए। अब कभी - कभी सामने के घर में आने वाली रसना को चोरी चुपके देखता है। कुछ दिनों से रात में उसके गले और छाती के नजदीक एक रोशनी का गोला घूमता है। जब जब वह घूमता है उसे रसना बहुत याद आती है। कई घंटों वह तड़पता है और उठ नहीं पाता। कभी - कभी उसे लगता है कि उसके बिस्तर के नीचे पानी इकट्ठा हुआ है और बहुत से तारे उस पानी में घुल रहे हैं।

"जीना तो उतना ही लंबा होता है जितना होता है और मरने के बारे में सोचने से बुरा कुछ नहीं होता।”

वह होश खो बैठा। जाने कहाँ चला गया कोई नहीं जानता !

क्या प्रतिक्रिया दे। उसने डायरी में लिखा -

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