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किताब का अंत
किताब का अंत
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© Ranjan Sehgal

Romance

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मुझे मेरी किताब का अंत नहीं मिल रहा था, मिल जाता अगर कभी किसी से इश्क़ हुआ होता तो, होता भी कैसे? स्कूल ऐसा था जहां लड़कियां न थी, और कॉलेज माँ-बाप ने भेजा नहीं। बाबूजी की दूकान पर बैठकर ही ग्रेजुएशन तक की पढाई की। दूकान पर आई किसी ग्राहक से भी इश्क़ हो जाता अगर दूकान बिंदी-लिपस्टिक की होती। हमारी दूकान भी ऐसी थी जिसका तालुक छोटे शहरों में केवल मर्दों से होता है। "रामलाल पान भण्डार" जी हाँ, और जब मैंने काम संभालना शुरू किया तब इसका नाम बदलकर "रामलाल एंड संस पान भण्डार" कर दिया गया। जो एक तंग सी गली में माचिस की डिबिया जैसी दिखाई देती थी। उस गली में खाने-पीने से लेकर घर बनाने तक का सारा सामान मिल जाता था।

गली के बीचो-बीच एक तार पर रंग बिरंगे दुप्पटे सुखाता हुआ "सुहास", खूबसूरत युवतियों से घिरा हुआ पानी पूरी वाला "गोपाल", गली के नुक्कड़ पर गोरे-गोरे हाथों में रंगीन चूड़ियां चढ़ाता हुआ "राजेश", इन सब से जब नज़र मिलती थी तो लगता था जैसे मुझपर मन ही मन हँस रहे हों। मैं उनसे नज़र चुराकर चुना-कथा लगाने में लगा रहता था, कई बार लगता था की यह काम तो बिना ग्रेजुएशन के भी हो सकता था। सिर्फ इस लिए पढाई की गई की जब मेरे लिए कहीं रिश्ता माँगा जाए तो कहा जा सके की लड़का ग्रेजुएट है। एक दिन ख़याल आया की ज़िन्दगी में कुछ नया किया जाए। मैंने दूकान पर जाना बंद कर दिया, बाबूजी को बुरा लगा लेकिन मैंने उनको समझाया और उनसे कहा "बाबूजी मैं लेखक बनना चाहता हूँ"। बाबूजी के चेहरे पर अजीब सा भाव था जिसके पीछे छुपा हुआ सवाल यह था की "तुम लिखते हो"? फिर मैंने बाबूजी से कहा की "पता नहीं अच्छा लिखूं या बुरा पर लिखना चाहता हूँ" बस उस दिन के बाद हाथ में चुने-कत्थे की जगह कलम आ गई और पान के पत्ते की जगह कागज़। बस फ़िर लिखना शुरू किया। कभी किसी अखबार के लिए कभी किसी इश्तेहार के लिए और जब वक़्त मिला तो अपनी क़िताब के लिए। धीरे-धीरे क़िताब भी पूरी होने लगी बस उसका अंत नहीं लिख पा रहा था। छोटा-मोटा लिखकर अपने पैसों से एक बाइक भी लेली। जिसकी पिछली सीट हमेशा एक बंजर ज़मीन की तरह दिखाई देती थी। जिसे किसान सिर्फ देखता ही रहता है और कुछ कर नहीं पाता। मैं और करता भी क्या? राह चलती किसी लड़की को जाकर 'आई लव यु' बोल देता? लड़कियों के कॉलेज के बाहर सारा दिन घूमता रहता? हमारे मोहल्ले में भी कोई ऐसी न थी जिसे देखकर दिल में पियानो बज उठे। मैं ढूँढ रहा था पागलों की तरह की कोई मिले जिससे घंटों बातें करूँ। किसी को तो देखकर ऐसा लगे के इसके लिए किसी फिल्म के हीरो की तरह पूरी दुनिया से लड़ा जा सकता है। कोई तो हो जिससे मिलकर पता लगे की इश्क़ क्या है, ऐसा क्या था मिर्ज़ा-साहिबा, रोमियो -जूलिएट, लैला-मजनू के बीच? इन्ही सवालों की तलाश करते-करते उम्र गुज़र रही थी। नाम तो घर वालों ने "राज" रखा था पर कोई "सिमरन" मिली नहीं।

माँ की तबियत बहुत खराब रहनी लगी थी। और एक दिन बाबूजी भी गुज़र गए, दूकान को सँभालने वाला कोई न था इसलिए उसे बेच दिया। एक दिन माँ ने अपने पास बुलाया और मेरे सर पर हाथ फ़ेरते हुए कहा "मैं भी न रहूँ, उससे पहले सेहरा पहन ले"। बस फ़िर क्या था सेहरा पहन लिया और कर लिया ब्याह "सुगंधा" से। सांवले से रंग की बिलकुल आम सी दिखने वाली, पहली बार जब उसे देखा तो सच बताऊँ कुछ नहीं हुआ, न piano बजा, न धड़कने बढ़ी, न स्लो-मोशन में उसके बाल उड़े, न वह हीर थी, न वह हूर थी ...बस बीवी थी मेरी और मैं उसका पति। शादी के 4 दिन तक 4 शब्द भी नहीं बोले होंगे हमने एक दूसरे के साथ। यह किसी का किसी पर गुस्सा नहीं था, न ही किसी बात की नाराज़गी, समझ ही नहीं आता था की बात क्या करूँ? ज़्यादा से ज़्यादा इतना पूछ लेता था "सुगंधा,आज खाने में क्या बनाओगी"? और उसका जवाब होता "जो आप कहें"।माँ और सुगंधा की आपस में बहुत बात होती थी, वह ख़याल भी बहुत रखती माँ का। कई बार मुझे ईर्ष्या होती थी की इन दोनों की बातचीत का हिस्सा मैं भी बनूँ, लेकिन मुझे आजतक इनकी बातें ही समझ न आई।

एक रोज़ बहुत तेज़ बारिश हो रही थी, हमारे घर की छत से भी पानी टपकना शुरू हो चूका था। तेज़ हवाओं के साथ गली में से दरवाज़े-खिड़कियों आवाज़ें गूँज रही थी, कहीं बच्चों के पानी में खेलने की आवाज़ और कहीं किसी के स्कूटर खराब होने की आवाज़। मैं अपने घर में खिड़की पर बैठा चाय की चुस्की लेता हुआ बारिश का मज़ा ले रहा था। इतने में मेरे फ़ोन पर सुगंधा के छोटे भाई यानी मेरे साले साहब "मिहिर" का मैसेज आया "आज दीदी का बर्थडे है"। मैंने उसे "शुक्रिया" लिखकर भेज दिया। अब समझ नहीं आ रहा था की ऐसे ही जाकर हैप्पी बर्थडे बोल दूँ या कोई तोहफा लाकर दूँ? दिमाग ने जवाब दिया "तोहफा तो देना चाहिए आखिर शादी के बाद पहला जन्मदिन है"। फ़िर एक सवाल उठा 'तोहफे में क्या दूँ?" साड़ी? अंगूठी? नया फ़ोन? और अगर उसे पसंद नहीं आया तो? और हाँ केक भी तो लाना चाहिए, बिना केक बर्थडे कैसा होगा? लेकिन जाऊंगा कहाँ गिफ्ट और केक लेने? बाहर बहुत तेज़ बारिश है, सड़कों पर पानी जमा है, अगर रास्ते में बाइक खराब हो गई तो? काफी देर सोचने के बाद मैं उठा अलमिराह से अपना रेनकोट निकालने लगा की सुगंधा की आवाज़ आई "इतनी तेज़ बारिश में क्यों जा रहे हैं बाहर"? मैंने जवाब दिया "बारिश तो होती रहेगी, घर थोड़ा बैठा रहूँगा" और कहकर मैं बाहर की तरफ निकल गया। जितना लग रहा था बारिश उससे कहीं ज़्यादा तेज़ थी। मैंने बाइक न उठाकर रिक्शा से जाने का फैसला लिया, सड़कों पर पानी बहुत ज़्यादा था, ऑटो रिक्शा भी कोई दिखाई न दे रहा था। केक की दूकान ज़्यादा दूर नहीं थी, लेकिन आसपास ऐसी कोई दूकान न थी जहां से अच्छा सा तोहफा मिल सके। फ़िर सोचा की आज केक ले जाता हूँ और तोहफा कल लाकर दे दूँगा अगर मौसम ठीक रहा तो.....। मैंने एक केक लिया और उसे अच्छे से पैक करवाया तांकि बारिश से कोई नुक्सान न हो और घर की तरफ निकल गया। घर पुहंचा तो एहसास हो गया था की बारिश ने अपना असर दिखा दिया है। घर में पहला क़दम ही छींक के साथ रखा, अंदर से सुगंधा एक तोलिया लेकर आई "कहा था न आपसे मत जाइये बारिश में" मैं कुछ नहीं बोला। केक के डिब्बे को खोला और कमरे के बीचोबीच पड़े टेबल पर रख दिया। केक के उप्पर एक मोमबत्ती लगाई और सुगंधा से कहा "जन्मदिन मुबारक हो", वह मुस्कुराई और बोली "आपको किसने बताया?''। मैंने उसे "मिहिर" का मैसेज दिखाया, माँ भी अपने बिस्तर से उठी और उसने सुगंधा को आशीर्वाद दिया और अपने तकिये के नीचे रखे हुए पर्स में से 100 रुपये निकालकर सुगंधा के हाथ में रख दिए। मैंने उसे कहा "अब काट भी लो उस केक को" वह उस टेबल के पास बैठी, अपनी आँखें बंद की और उस मोमबती को फूँक मारकर बुझा दिया। पास में रखे हुए एक प्लास्टिक के चाक़ू को जो उस केक वाले डिब्बे में ही था, उसे उठाया और उस केक पर चला दिया। माँ और मैंने उसे जन्मदिन की मुबारक बात दी, उसने केक में से एक टुकड़ा निकाला और माँ को खिलाया। फ़िर उसने दूसरा टुकड़ा निकाला और मेरी तरफ ले आई। यह सब कुछ मेरी नज़रों के सामने बहुत ही धीरे-धीरे चल रहा था, सुगंधा की ख़ुशी उसके चेहरे और आँखों में साफ़-साफ़ नज़र आ रही थी। उसने वह केक मुझे खिलाया और सच बताऊँ, उस केक का स्वाद कैसा था मुझे पता नहीं क्योंकि मेरा ध्यान और मेरी नज़र सिर्फ सुगंधा पर थी, उसकी ख़ुशी पर थी, उसकी आँखों की चमक पर थी। वह अपने होंठों को मेरे चेहरे के पास लाई और मेरे कान में धीरे से कहा "थैंक यु"। अचानक कहीं से पियानो बजने की आवाज़ आई, हैरानी की बात यह थी के मोहल्ले में किसी के घर पियानो नहीं था। मैंने सुगंधा की तरफ देखा तो स्लो-मोशन में हवा के झोंके से लहराते उसके बाल उसके चेहरे को मेरी नज़रों से छिपा रहे थे। मैं उसके करीब गया उसके हाथ से केक का टुकड़ा लिया और उसे खिलाया। उसके कान के पास धीरे से जाकर कहा "माय प्लैज़र"।
और उस दिन मुझे मेरी क़िताब का अंत मिल गया।

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