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राहुकेतु
राहुकेतु
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© Rani Ram Garhwali

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बाहर कड़ाके की ठंड थी। घना कोहरा छाया हुआ था। कोहरा इतना घना था कि आस-पास कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, और न ही किसी चिड़िया के बोलने का स्वर ही सुनाई दे रहा था।

 

हाँ...इक्का-दुक्का स्कूटर स्टार्ट होने की आवाज कानों से अवश्य टकरा रही थी। कड़ाके की ठंड होने के कारण हाथ-पैर सुन्न हो रहे थे। कमरे और बिस्तर भी ठंडे थे। फिर भी बिस्तर का वह हिस्सा गरम था, जिसमें मैं लेटा हुआ था। अगर मैं थोड़ा सा भी बिस्तर से उठता तो पलभर में ही वह जगह भी ठंडी हो जाती थी।

 

ठंड ज्यादा होने के कारण स्कूलों की छुट्टियाँ पड़ चुकी थी। सूर्य के दर्शन होने मुश्किल हो गए थे। इतनी कड़ाके की ठंड में लोग घरों से बाहर कम ही निकल रहे थे। तभी दरवाजे पर थप-थप की आवाज सुनकर मैं चौंका। मैंने घड़ी में समय देखा, सुबह के छः बज रहे थे। अगर गर्मियों का समय होता तो तेज धूप होती, घरों में कूलर ठंडी हवा दे रहे होते। परन्तु जनवरी का महीना होने के कारण सुबह के छः बजे भी घुप्प अंधेरा था।

 

“दरवाजे पर कोई है।” रश्मि ने कहा। “इतनी ठंड में सुबह-सबुह कौन हो सकता है?” कहते हुए मैंने दरवाजा खोला तो, हवा का एक तीव्र झोंका मेरे बदन से सरसराता हुआ निकल गया था। ठंड का झोंका लगते ही सारे शरीर में झुरझरी फैल गई थी। दरवाजा खुलते ही बाहर छाया हुआ कोहरा एकाएक कमरे के अन्दर फैलने लगा था। कोहरे को देखकर मुझे ऐसा लगा कि जैसे कोहरा इसी इंतजार में था कि कब दरवाजा खुले और वह धड़धड़ाता हुआ कमरे में घुसे।

 

“कौन है...?” मैंने कहा। अंधेरा होने के कारण मुझे दरवाजा खटखटाने वाले का चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

 

“बाबू जी मैं भुयादो।”

 

अरे...यह भी कोई भीख मांगने का समय है क्या…? इतनी कड़ाके की ठंड में मुझे बिस्तर से उठा दिया। रश्मि इसे कुछ दो।” मैंने दरवाजे पर खड़े-खड़े रश्मि को आवाज दी।

 

रश्मि ने बाहर दवाजे के ऊपर लगे बल्ब को जला दिया था। बल्ब की तेज रोशनी में अब उसका चेहरा नजर आने लगा। उसने अपने सिर को किसी पुराने कपड़े से ढक रखा था। कपड़े के बीच में से एक मात्र उसकी आँखें दिखाई दे रही थी। बदन पर कपड़ों के नाम पर उसने एक पुरानी कमीज,पैंट, व हाफ बाजू का स्वेटर पहना हुआ था। जिसके आगे की तरफ से धागे निकल हुए थे। मैं समझ गया था कि वह स्वेटर उसे किसी ने दिया होगा। पैरों में उसके पुरानी हवाई चप्पलें थी जो कि एड़ी की तरफ से पूरी तरह घिस चुकी थी।

 

“बाबू जी, वो...वो मर गया!”

 

“कौन...?” हड़बड़ाते हुए मैंने कहा। सुनकर मुझे गुस्सा आया। क्योंकि अभी हम बिस्तर से उठे भी नहीं थे कि एक बुरी खबर लेकर वह दरवाजे पर आ धमका था।

 

“बाबू जी, कुन्तो मर गया है।”

  

एक बुरी और अकस्मात खबर को सुनकर मेरे होशो हवास उड़ चुके थे। सुबह-सुबह का समय, और ऐसे समय एक बुरी खबर सुनकर मेरा शरीर झनझना उठा था। एक बार तो मन में आया कि उसके कान पर दापे थप्पड़ रसीद कर दूं। इससे पहले कि मेरा हाथ उठता मैंने गुस्से में कहा, “कुन्तो मर गया है तो हम क्या करें? जा...और कहीं जाकर अपना रोना रो।”

 

“बाबू जी हमारे पास न पहनने को कपड़ा है और न सोने को ही बिस्तर। कभी-कभी तो खाने को भी नहीं मिलता। हम भिखारी जो ठहरे। कुन्तो कहा करता था कि भुयादो अगर वह मर गया तो तू घबराना नहीं। बाबू जी से रुपये लेकर उसको जला देना। बाबू जी भले आदमी हैं। बाबू जी, मैं आपके पास इसलिए चला आया कि कुन्तो मरा पड़ा है।” कहकर वह ही रोने लगा था।

 

उसे रोते देखकर मेरा मन पसीज गया। मन में ख्याल आया कि मुझे उसे ऐसे वक्त डाँटना नहीं चाहिए। लेकिन वह भी तो एक बुरी खबर लेकर सुबह-सुबह चला आया था। जबकि हमारा कुन्तो से कोई मतलब ही नहीं था।

 

“कैसे मरा कुन्तो?” मैंने प्रश्न किया। इस बार मेरा स्वर नरम था।

 

“बाबू जी, वह ठंड से ठिठुर रहा था। दो दिन से उसने कुछ खाया भी नहीं था। आधी रात को जब मैंने उसे देखा तो वह मर चुका था। उसका शरीर अकड़ा हुआ था।”

 

“रश्मि,! इसे चाय पिला।” कहकर मैंने रश्मि को आवाज दी तो रश्मि एक टूटे पुराने कप में चाय लेकर आ गई थी। भुयादो ने कांपते हाथों से चाय का कप पकड़ा और जल्दी-जल्दी चाय सुड़कने लगा।

 

“क्या बात है भुयादो?”

“मेमसाहब जी...वो...वो कुन्तो मर गया है!”

“कब...?”

“रात को, दो दिन से भूखा था और बुखार में तड़प रहा था, रहम करना मेमसाह! उसे जलाने के लिए कुछ रुपये चाहिए!” कह कर उसने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए थे।

 

रश्मि कुछ देर तक चुपचाप उसके चेहरे को देखती रही। और फिर उसने बिना मुझे पूछे ही भुयादो को तीन सौ रुपये दे दिए। भुयादो ने रुपये पकड़े और फिर वह अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए बोला, “भगवान आपका भला करे मेमसाहब जी।” कहते हुए वह तेज कदम बढ़ाता हुआ घने कोहरे में ओझल हो गया।

 

भुयादो के जाने के बाद मैंने दरवाजा बंद किया और चारपाई में जाकर रजाई ओढ़ते हुए मैंने रश्मि से कहा, “तुमने बिना मुझे पूछे ही उसे तीन सौ रुपये दे दिए रश्मि !”

 

“क्या करती जी ! बेचारा आस लेकर आया था। गुस्सा मत होना, क्षमा चाहती हूँ।” रश्मि ने जिस अंदाज में ये शब्द कहे थे। उस अंदाज में रश्मि के कहे ये शब्द मुझे सुंदर, मीठे व अच्छे लगे। मैं समझ गया था कि रश्मि यह सोचकर डर रही है कि मैं उसे सुबह-सुबह डाँट न दूँ।

 

“आप खुद ही सोचिए कि, मैंने भुयादो को तीन सौ रुपये देकर गलत किया या सही किया?”

“तुमने उसे रुपये देकर अच्छा किया। पर आज...आज बार कौन सा है?”

“शुक्रवार...!” रश्मि ने मेरे चेहरे पर अपनी नजरें गड़ाते हुए कहा।

“शुक्रवार...!” मैं मन ही मन बुदबुदाया। बेचारा कुन्तो...!

 

अब उसकी आवाज कभी सुनाई नहीं देगी। बहुत दुःखी था वह! अच्छा ही हुआ कि मर गया। जिन्दा रहता तो न जाने कितने कष्ट और भोगता। बुदबुदाते हुए मैं कुन्तो के बारे में सोचने लगा। कुन्तो भीख मांगकर अपना गुजारा करता था। वह घर-घर जाकर भीख मांगा करता। भिखारी होने के बाद भी उसका अपना एक नियम था। मरते दम तक उसने अपना वह नियम नहीं तोड़ा।

 

हर शुक्रवार के दिन गली-गली में उसकी आवाज सुनाई देती, ’संतोषी माता अपका भला करेगा। आपके बच्चों का भला करेगा। संतोषी माता की जय। संतोषी माता सबका माता। आटा, चावल मुझ गरीब को भी देना। संतोषी माता का कृपा होगा। आपके बच्चों को अच्छा नौकरी मिलेगा।

 

संतोषी माता की जय। संतोषी माता सबकी माता।”

 

वह संतोषी माता का नाम लेकर घर-घर जाकर भीख मांगता था। बहुत ही कम घर ऐसे होते थे जिनके दरवाजे उसके लिए नहीं खुलते थे। लेकिन बाकी घरों से उसे कुछ न कुछ जरूर मिल जाया करता। किसी-किसी घर से उसे रुपये-दो रुपये भी मिल जाते थे।

  

जिस दिन कुन्तो न आता, गली-मोहल्ले की औरतें आपस में बतियाने लगती कि, ‘आज संतोषी माता का भक्त नहीं आया, क्यों नहीं आया होगा, कहीं ऐसा तो नहीं कि वह बीमार हो गया होगा, औरातों में तरह-तरह की बातें होने लगती।’ परन्तु जैसे ही उसकी आवाज सुनाई देती, बंद दरवाजे अपने-आप खुलने लगते। कभी-कभी ऐसा भी होता कि सुबह के बदले शाम को जब उसकी आवाज सुनाई देती तो, औरतें उसे आटा देते हुए कहती, “आज तुमने बहुत देर कर दी बाबा...!”

 

“संतोषी माता का इच्छा।” कहते हुए वह एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे पर जाकर खड़ा हो जाता। मैं कुन्तो को देखता तो मुझे बहुत दुःख होता। उसका एक हाथ मात्र कोहनी तक ही था। दूसरा हाथ उसका ठीक था। उसी हाथ से वह थैला पकड़कर घर-घर जाकर भीख मांगा करता था।

 

वह हमेशा नंगे पैर ही रहता। जिसके कारण उसके काले, मोटे पैरों की एड़ियों में दरारें पड़ चुकी थी। कड़ाके की ठंड हो तेज गर्मी वह हमेशा एक पुरानी फटी हुई कमीज व मैल से सने पजामें में ही दिखाई देता। उसकी मूँछें बेतरतीब व उलझी हुई रहती। सिर के बाल उलझे हुए व खड़े रहते। मुँह पर उग आई दाढ़ी किसी रेगिस्तान में उग आई कटीली झाड़ी की याद तरोताजा कर रही थी।

 

उसके दांत पीले व मोटे थे। दांतों के बीच में सफेद पीप सा जमा रहता। शायद वह कभी नहाता भी नहीं था, और न ही वह अपना मुँह ही धोता था। क्योंकि उसके गले से लेकर कानों से होते हुए उसके माथे तक मैल की एक काली परत हमेशा जमी रहती थी। उसकी दोनों आँखों की कोरों पर पीप जमा रहता था।

  

ठंड हो या गरमी, लेकिन मैंने उसे अधिकतर कुर्ते-पजामें में ही देखा। ठंडियों में वह कांपता रहता तो गरमियों में हाँफता रहता।भीख मांगते हुए वह कुछ कदम चलता और फिर बैठ जाता। कई बार मैंने उसे रोते हुए भी देखा था। मगर मैंने उसे कभी यह पूछने की कोशिश ही नहीं की कि वह क्यों रोता है, और किसलिए रोता है? तभी मैं सोचता कि कुन्तो को किसी से क्या मतलब। हर कोई अपनी-अपनी सोचता है, चाहे दूसरा जाये भाड़ में। वैसे भी कुन्तो की बात तो दूर की बात थी। लेकिन आजकल तो पड़ोस में रहने वाले व्यक्ति भी आमतौर पर यह नहीं जानते कि किसके घर में कौन आ रहा है, और कौन जा रहा है? किसी को किसी से कोई मतलब नहीं। कोई मर भी गया तो किसी को कोई पता तक नहीं चलता।

 

भीख मांगते हुए कुन्तो अक्सर बड़बड़ाने लगता। ईश्वर के घर में भी उसके लिए जगह नहीं है। जिन लोगों की इस दुनियां को जरूरत है, उन्हें तो वह अपने पास बुला लेता है। लेकिन कुन्तो को अपने पास नहीं बुलाता। पृथ्वी के लिए बोझ है कुन्तो। उन लोगों के लिए बोझ है कुन्तो, जो उसे हर शुक्रवार को एक कटोरी आटा, उसके मैले-कुचैले थैले में डाल देते हैं।

 

रश्मि उसे हर शुक्रवार को एक कटोरी आटा देती है। एक रश्मि ही नही...बल्कि गली-मुहल्ले की जो भी औरत या लड़की उसके थैले में आटा डालती तो वह कहता, ‘संतोषी माता तुम्हारी मनोकामना पूरी करेगा। सन्तोषी माता सबका माता!’

 

रश्मि को भी वह ऐसे ही शब्द कहा करता। एक दिन वह रश्मि से बोला, “बेटा हम दो दिन से भूखा हूँ। कुछ खाने को मिल जाता तो...।” “घर में तो अभी कुछ बना हुआ नहीं है।” रश्मि ने कहा। “ठीक है...।” कहकर वह जाने लगा तो रश्मि ने कहा, रुको...मैं तुम्हारे लिए दो रोटी बना देती हूँ।” रश्मि के शब्द सुनते ही उसके आगे बढ़ते हुए कदम अचानक ही रुक गए। वह वहीं दरवाजे से हटकर दो कदम दूर बैठ गया।

 

उसे वहाँ पर बैठे हुए देखकर मैंने गुस्से में चीखते हुए कहा, “रश्मि, यह भिखारी यहाँ क्यों बैठा है?”

 

“जी वो...वो...उसने कल से...उसने दो दिनों से कुछ भी नहीं खाया है। वह भूखा है जी...।” रश्मि ने घबराते हुए कहा। भय की रेखाएं उसके चेहरे पर स्पष्ट रूप से दखाई देने लगी थी।

 

“रश्मि...!” मैंने अपने आप को संयत करते हुए कहा, “तुम्हें रोटी बनाते देखकर ऐसा लगता है जैसे वह भिखारी पराया नहीं बल्कि कोई अपना है। तुम्हें इसे रोटी, चावल, आटा जो कुछ भी देना है। वह गेट के बाहर ही दिया करो, ठीक कह रहा हूँ न मैं?”

 

“ठीक है जी..., आज के बाद ऐसा ही होगा।”

 

रश्मि ने उसे दो रोटियाँ बनाकर व एक टूटे कप में चाय लाकर उसे देते हुए कहा, “कहाँ रहते हो बाबा?”

 

“झुग्गी में...।” उसने रोटी व चाय का कप पकड़ते हुए कहा।

 

“झुग्गी में...!” मैंने उसकी बात का नकल करते हुए कहा, “हर हफ्ते तू इतना बड़ा थैला आटा मांग कर ले जाता है। क्या करता है तू उस आटे का, जो कि तू अपने लिए दो रोटियां भी नहीं बना सकता?”

 

“आप गुस्सा क्यों होते हो बाबू जी, भूख तो होती ही ऐसी है कि वह इंसान को कुछ भी करने को मजबूर कर देती है। लोग चोरी करते हैं, जेब काटते हैं, कत्ल करते हैं, छीना-झपट करते हैं, तो पेट के लिए ही करते हैं न?...पर मैं ऐसा नहीं करता बाबू जी। मैं तो भीख मांगता हूँ। पेट की भूख शांत करने के लिए मैं चोरी व कत्ल करने वालों से बहुत अच्छा आदमी हूँ।”

 

“उसकी बातों को सुनकर मैं खामोश हो गया। पलभर में ही मन में समाया हुआ गुस्सा उड़न छू हो गया था। मैंने बड़े प्यार से रश्मि से कहा, “रश्मि, आज के बाद उस भिखारी को दरवाजे के पास मत बिठाना। उसका दरवाजे पर बैठना मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। अगर तुम उसे रोटियां देना ही चाहती हो तो सुबह नाश्ते के वक्त उसके लिए रोटियां बनाकर रख लिया करो।”

 

रश्मि मेरी बातों को सुनती रही। वह एक चोर की भांति मेरे सामने चुपचाप अपना सिर झुकाए खड़ी रही। मेंने अपने दोनों हाथों से पकड़कर उसके चेहरे को ऊपर की ओर उठाते हुए कहा, “मैं तुम्हें डाँट नहीं रहा हूँ रश्मि। बल्कि तुम्हें समझाने की कोशिश कर रहा हूँ।” वह कुछ पल तक एकटक मेरे चेहरे को घूरती रही और फिर वह धीरे-धीरे मुस्कराने लगी।

 

उस दिन के बाद रश्मि शुक्रवार को सुबह नाश्ता बनाते वक्त ही कुन्तो के लिए दो रोटियां बनाकर रख लेती थी। वह जानती थी कि कुन्तो भीख मांगने जरूर आएगा। मगर कभी-कभी जब कुन्तो शुक्रवार को दिखाई नहीं देता तो रश्मि उन दो रोटियों को किसी गाय या कुत्ते के लिए डाल देती थी।

 

कुन्तो भीख जरूर मांगा करता था। लेकिन एक भिखारी होने के बाद भी उसका अपना एक नियम था। वह हफ्ते में एक ही दिन शुक्रवार को भीख मांगने आता था। पहले-पहले जब मैंने कुन्तो को भीख मांगते देखा, तो मुझे उससे घृणा होने लगी थी। उसे देखकर ऐसा लगता था जैसे उसे पानी से नफरत हो। मैल से सने उसके शरीर से तेज बदबू आती थी।

 

लेकिन अब मैं उससे न नफरत करता और न ही घृणा करता। उसे देखकर मैं सोचता कि इस दुनियाँ में जो आता है वह अपने भाग्य और अपने कर्मानुसार जीता है। एक दिन जब रश्मि उसे रोटियां दे रही थी, मैंने कुन्तो से कहा, “कुन्तो तू अकेला रहकर इतने सारे आटे का क्या करता है? बाजार में ले जाकर सस्ते दामों में बेच देता है क्या?”

 

“बाबू जी, मैं अकेला नहीं हूँ। मेरा लड़का व उसकी बहू भी है। वे दोनों मेरे साथ ही रहते हैं।”

 

कुन्तो के शब्दों ने मुझे सोचने के लिए मजबूर कर दिया था। घर पर उसका लड़का और उसकी बहू है, फिर भी वह घर-घर जाकर सुबह से शाम तक संतोषी माता का नाम लेकर भीख मांग रहा है-

 

“तू भीख मांग रहा है तो तेरा लड़का क्या कर रहा है?”

 

कुन्तो की आँखें भर आई थी। एक गहरा सांस लेने के बाद उसने अपने सिर के उलझे बालों को खुजलाते हुए कहा, “क्या करूं बाबू जी, काँठी और उसकी घरवाली दोनों ही सुबह-सुबह उसे भीख मांगने के लिए घर से बाहर निकाल देते हैं। जिस दिन वह भीख मांगने नहीं जा पता, उस दिन वे दोनों उसे बहुत मारते हैं।”

 

मैंने उसके चेहरे की ओर देखा, उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे थे। कुछ देर तक अपने आँसू बहाने के बाद उसने अपने लड़के की घरवाली के बारे में कहा, “चुड़ैल है साली...। जब से वह हरामजादा उस हरामजादी को घर में लाया है, तब से उस डायन ने उसका जीवन नरक बना दिया है। दिनभर वह कुतिया की तरह घूमती रहती है। और फिर रात को वे दोनों मजे से बैठकर दारू पीने लगते हैं।”

 

मैं बड़ी तन्मयता से उसकी बातों को सुनता रहा। सोचने लगा कि जब कोई इंसान किसी दूसरे इंसान को अपनी दुःख भरी बातें सुनाए तो सुनने वाले को उसकी बातों को जरूर सुनना चाहिए। हालांकि कोई किसी के दुःख को बांट तो नहीं सकता। परन्तु वह उसे दिलासा देने के लिए दो शब्द प्यार भरे तो बोल ही सकता है। बातों के दौरान जब मैंने कुन्तों से पूछा कि उसका बायाँ हाथ कैसे कटा तो रुँधे गले से उसने कहा, “उसके लड़के और बहू ने एक दिन उसे बहुत मारा। उस वक्त वह बीमार था। बुखार में भी वह भीख मांगने जाया करता था। मगर जब दो दिनों से वह भीख मांगने नहीं जा सका तो उन दोनों ने उसे बहुत मारा। उसके बायें हाथ को जगह-जगह टीन के टुकड़े से काट दिया। उस वक्त वह अपने भाग्य को कोसते हुए बुखार में हाँफ्ते हुए रोता रहा। टीन से कटने के कारण उसका हाथ जगह-जगह से पक गया था । एक दिन जब वह अस्पताल गया तो डाक्टरों ने उसे बचाने के लिए उसका हाथ काट दिया था।”

 

आस-पास के घरों से लोग निकल कर उसके इर्द-गिर्द खड़े होकर उसकी बातों को ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। “एक बीड़ी देना बाबू जी, गला सूख गया है।” अपने गले पर हाथ फरेते हुए उसने कहा, “बीड़ी पीऊँगा तो गला तर हो जाएगा। सच कहता हूँ बाबू जी, इंसान पर बुढ़ापा कभी न आए। बुढ़ापा आने से शरीर में कई तरह के रोग लग जाते हैं। बीड़ी पीना भी एक रोग ही है और यह रोग किसी कैंसर के रोग से कम नहीं है।”

 

मैंने उसे बीड़ी जला कर दी तो बीड़ी को अपनी उँगलियों के बीच फँसाकर, उसके लम्बे-लम्बे कश खींचते हुए वह बोला, “बदमाश है वह! हरामजादी...कुत्तिया...रंडी...डायन है वह!”

 

“तुझे शर्म नहीं आती अपने लड़के की बहू के लिए एसे शब्द कहते हुए?” मैंने अपनी आवाज को जोर देते हुए कहा तो आस-पास के सभी लोग मेरी ओर देखने लगे। मेरी आवाज को सुनकर उसके चेहरे पर किसी भी तरह के लक्षण नहीं उभरे। बल्कि वह चुपचाप बीड़ी के लम्बे-लम्बे कश खींचता रहा।

 

उसने एक बार ढेर सारा धुआँ अपने मुँह से छोड़ते हुए छत की मुडेर की ओर देखा। उस वक्त वहाँ पर दो कबूतर अपने पंख फड़फड़ाते हुए आपस में एक-दूसरे से उलझे हुए गुटर गूं बोल रहे थे। अपनी नाक का बाल खींचते हुए उसने एक बार फिर बीड़ी का लम्बा कश खींचा, और मुँह में जमे धुँए को आकाश की ओर उड़ा दिया।

 

हवा का एक तेज झोंका सरसराता हुआ आया, और बीड़ी के सिर पर जमी हुई राख को उड़ाकर कुन्तो के कपड़ों पर फैला कर चला गया। बीड़ी के अंतिम हिस्से को जमीन पर बुझाने के बाद उसने कहा, मैं जानता हूँ बाबू जी कि आपको मेरे ये शब्द अच्छे नहीं लग रहे होंगे। लेकिन मैं क्या करूँ…? मजबूरी में कहना पड़ रहा है। आप तो महलों में रहतें हैं। बातें करना जानते हैं। लेकिन जहाँ कोढ़ी, कचरी, भिखारी रहते हैं। कभी रात को वहाँ देखना बाबू जी। एक बार अगर देख लोगे तो फिर दुबारा वहाँ कभी नहीं जाओगे। नरक है वहाँ नरक...! इंसानियत का नंगा नाच वहीं होता है। वहाँ जो कुछ भी बोला जाता है वह गाली-गलौच के बिना नहीं बोला जाता।”

 

मैं उसकी बातों को सुनकर अचम्भित था। क्योंकि उसकी बातें थी ही ऐसी, जो किसी भी आदमी को सोचने के लिए विबश कर दे। इसलिए सभी लोग उसे घेरे हुए दम साधे खड़े थे। मैंने अंदाजा लगाया कि वह जो कुछ भी कह रहा है वह बिना सोचे समझे कह रहा है, “गंदी है बाबू जी काँठी की पत्नी। सुबह से शाम तक कहाँ रहती है? कुछ पता नहीं...! पर शाम को जब वह घर आती है तो उसके पास दारू की बोतल होती है। दोनों मजे से दारू पीते हैं। हरामजादी है वह! हरामजादा है काँठी, कुत्ता, कमीना साला! मुझे पूछे बिना ही वह उसे घर ले आया। बाद में मुझे पता चला कि उसके माँ-बाप ने भीख मांग-मांगकर जो कुछ कमाया था, वह काँठी को दे दिया था। जब वह आई तो उस वक्त वह पेट से थी। तीन महीने बाद उसने एक बच्चे को जन्म दिया। लेकिन दो महीने बाद ही वह बच्चा मर गया।

 

उसके शब्दों को सुनकर उसके इर्द-गिर्द घेरा बनाए सभी लो सन्न रह गए थे। वह अपने घर का भेद इस कदर खोल रहा था जैसे कि वह अपने मन में बरसों से दबी हुई भड़ास को एक बार में ही बाहर निकाल कर अपना मन हल्का कर लेना चाहता हो। मैं अपने जीवन में पहली बार एक ऐसे इंसान को देख रहा था जो लोगों के बीच में घिरा हुआ अपनी ही इज्जत के दिल खोलकर परखचे उड़ा रहा था। काँठी की पत्नी का चरित्र ठीक था या नहीं, यह तो हम नहीं जानते। लेकिन उसकी बातों से ऐसा लग रहा था कि काँठी की पत्नी का चरित्र ठीक नहीं है।

 

अब तक लोगों के दिलों में कुन्तो के लिए दया उमड़ चुकी थी। उसके इर्द-गिर्द खड़े सभी लोग उसकी बहू-बेटे को उसी के सामने कटु भरे शब्द बोलने लगे। जब वह जाने लगा तो लोग धीरे-धीरे इधर-उधर होने लगे। मैंने उसके उठते ही अपनी नाक पर रुमाल रखते हुए नाक को कसकर दबा लिया था। ताकि उसके बदन से आने वाली तेज बदबू से मेरे नथुने बच सके। 

 

‘कड़ाक’ की आवाज के सुनते ही मैं सिहर गया था। कुन्तो के बारे में सोचते हुए मेरी निंद्रा अचानक ही भंग हो गई। लेकिन उसका भद्दा व मैल से भरा हुआ चेहरा, अब भी स्पष्ट रूप से मेरी आँखों के आगे तैर रहा था।

 

“क्या हुआ?” रश्मि जब दरवाजा बंद करके अंदर आई तो मैंने कहा, “कड़ाक की आवाज कहाँ से आई?”

“कप के टूटने की आवाज थी।”

“सुबह-सुबह तुमने कप तोड़कर अच्छा नहीं किया रश्मि।” मैंने उसके चेहरे पर नजर गड़ाते हुए कहा।

“क्यों...?”

“कहते हैं कि सुबह-सुबह बर्तनों का टकराना व टूटना अपशकुन होता है।”

“कुछ नहीं होता जी, यह आपका वहम है। कुन्तो मर गया, इसलिए मैंने उसका कप फेंक दिया है।”

“तुमने एक भिखारी का जूठा कप घर में क्यों रखा था?” मैंने अपनी बातों को सख्त करते हुए कहा।

 

“मैंने कुन्तो का कप कभी घर में नहीं रखा। बल्कि उसका कप तो हमेशा गेट के पास रखे गमलों की बीच में रखा रहता था।” कहकर रश्मि गुशलखाने में जाकर साबुन से अपने हाथ धोने लगी थी।

 

मैंने चारपाई पर बैठे-बैठे एक बार खिड़की खोलकर बाहर देखा, बाहर अब भी घना कोहरा छाया हुआ था। कोहरा घटने की अपेक्षा बढ़ता ही जा रहा था। कई सालों के बाद दिल्ली में कड़ाके की ठंड पड़ी थी। फलस्वरूप दिल्ली में धूप के दर्शन बिल्कुल भी नहीं हो रहे थे। सुबह से शाम तक दिल्ली को घने कोहरे ने अपनी आगोश में ले रखा था। ऐसी हालात में सड़क पार करना भी कठिन हो रहा था। दिन भर सड़कों पर चलते वाहन अपनी हैडलाइट जलाकर पीं-पीं, पों-पों का शोर मचा रहे थे। लोग जगह-जगह आग जलाकर अपने शरीर को सेंकने की कोशिश कर रहे थे, ताकि उनके शरीर में गरमी आ सके, और वे ठंड से बच सकें।

 

एक दिन जब मैंने कुन्तो के साथ भुयादो को देखा तो मैंने रश्मि से कहा, “देखो रश्मि, आज कुन्तो अपने साथ किसी लड़के को लेकर आया है।” “भुयादो है…! वह कुन्तो के साथ तभी आता है, जब कुन्तो की तबियत ठीक नहीं होती है। उस वक्त वह कुन्तो के थैले को अपने कंधे में उठाए फिरता है।”

 

मैं बिस्तर पर लेटा हुआ कुन्तो के बारे में सोच ही रहा था कि, मैं एकाएक हड़बड़ा कर उठ-बैठा। भुयादो तीन सौ रुपये लेकर चला गया है, पर कुन्तो मरा भी है या नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि भुयादो ने झूठ बोला हो ताकि उसे दारू पीने के लिए रुपये मिल सकें। कुन्तो के बारे में सोचते हुए बार-बार किसी तूफान की तरह उमड़ते-घुमड़ते ये बिचार मेरे मन-मस्तिष्क पटल पर किसी हथोड़े की तरह चोट कर रहे थे। खैर जो होना था, वह तो हो गया था। रुपये देने के बाद अब पछताने से भी कोई फायदा नहीं था। कई तरह की बातों को सोचते हुए मैं अपने मन को समझाने की कोशिश करने लगा।

 

लेकिन अगले हफ्ते शुक्रवार को भुयादो की आवाज सुनकर मैंने बालकनी में से देखा, भुयादो कुन्तो के नक्शे कदम पर चल रहा था। वह कुन्तो की तरह जोर-जोर से सन्तोषी माता का नाम लेकर भीख मांग रहा था, ‘संतोषी माता की जय। संतोषी माता आपका भला करेगा। आपका घर भरेगा। आपके बच्चों को नौकरी देगा। संतोषी माता सबका माता।’

 

कुन्तो के मरने के बाद भुयादो अब उसकी जगह भीख मांगने आ गया था। उसके कंधे पर वही थैला लटका हुआ था जो कभी कुन्तो के कंधे में लटका होता था। गुरु के मरने के बाद चेले ने अब वह थैला अपने कंधे पर लटका लिया था।

 

“अरे…यह थैला तो कुन्तो का है न भुयादो?” मैंने कहा।

“हाँ...बाबू जी, यह थैला उसी का है। मेरे पास भीख मांगने के लिए थैला नहीं था। कुन्तो के मरने के बाद यह थैला मुझे मिल गया है।”

“और क्या-क्या मिला तुझे उसका...?”

“कुछ नहीं बाबू जी, मैंने उसकी फटी हुई जेबों को बहुत टटोला। एक मात्र दो रुपये का एक सिक्का मुझे उसकी जेब से मिला। मैंने उस सिक्के से एक बीड़ी का बंडल ले लिया। ठंड बहुत ज्यादा है न बाबू जी...बीड़ी पीने से ठंड का एहसास कम होता है।”

“कुन्तो के इस थैले को उसका लड़का लेकर नहीं गया?” मैंने थैले की ओर इशारा करते हुए कहा।

“वह तो कुन्तो के मरने की खबर सुनकर भी नहीं आया। अच्छा ही हुआ बाबू जी कि काँठी नहीं आया। अगर वह आ जाता तो कुन्तो का यह थैला मुझे कभी नहीं मिलता।”

“तुझे मालूम है कि वह क्यों नहीं आया?”

“अब आपसे क्या छिपाना बाबू जी, उन दोनों बाप-बेटे में रोज लड़ाई होती थी।”

“क्यों...?”

 

मेरे ‘क्यों’ शब्द को सुनकर उसने इधर-उधर देखा और फिर जेब से बीड़ी निकाल कर उसे सुलगाते हुए उसने कहा, “दीवारों के भी कान होते हैं बाबू जी, कुन्तो अच्छा आदमी नहीं था! कुन्तो को एक दिन उसके लड़के काँठी ने अपनी घरवाली के साथ रंगे हाथों पकड़ लिया था। उस दिन से वे दोनों एक दूसरे के पक्के दुश्मन हो गए। लोगों का कहना था कि कुन्तो का पहले से ही रौंची के घर में आना-जाना था।

 

भुयादों को भीख में जो कुछ भी मिलता था वह उसके बराबर के दो हिस्से करता था। एक हिस्सा वह रौंची के घर देता था और दूसरा हिस्सा अपने लिए रखता था।

 

“रौंची कौन...?”

“काँठी की घरवाली बाबू जी! लोगों की नजरों में कुन्तो उसका ससुर था। लेकिन सच कहूँ बाबू जी तो मैं कुन्तो को ही रौंची का असली पति मानता हूँ। रोज-रोज इसी बात को लेकर उन दोनों में झगड़ा होता था। आखिर एक दिन काँठी ने रौंची के साथ मिलकर झुग्गी के ऊपर रखे जंक लगे टीन के टुकड़े से उसके हाथ को जगह-जगह से काटते हुए उसे निकाल दिया। उस दिन से कुन्तो अलग रहने लगा। वैसे भी काँठी और रौंची को दारू जरूर चाहिए बाबू जी। जब भी कोई काँठी को अंगरेजी दारू पीने को देता है न..., तो वह उसे रात को अपनी झुग्गी में रुकने के लिए कहता है।

 

जिस दिन कुन्तो मरा! उस दिन जब मैं काँठी को बुलाने के लिए उसकी झुग्गी में गया। मैंने दरवाजे की जगह लटके पुराने मैले कपड़े को हटाकर देखा, काँठी एक ओर पड़ा हुआ था, और उसकी घरवाली के साथ कोई दूसरा व्यक्ति लेटा हुआ था। वहीं सामने जमीन पर, एक अंगरेजी दारू की बोतल पड़ी हुई थी। जब मैंने काँठी को बताया कि कुन्तो मर गया है तो वह बोला, ‘अच्छा ही हुआ। मर गया साला, कुत्ता, कमीना । चल जा यहाँ से...।’ मैं उसके जहरीले शब्दों को सुनकर चुपचाप वापस लौट आया, बाबू जी...।”

 

कुन्तो के बारे में बताते हुए भुयादो का चेहरा एकाएक गमगीन हो चुका था। उसकी आँखों में पानी तैरने लगा था। वह चुपचाप उठा और फिर कुन्तो की तरह आवाज लगता हुआ दूसरी गली की ओर मुड़ गया। लेकिन कुछ ही दिनों के बाद भुयादो भी अचानक गायब हो गया।

 

कुछ महीनों बाद एक भिखारी से मुझे पता चला कि भुयादो रौंची को लेकर भाग गया। वह कहाँ गया…? किसी को कुछ पता नहीं। लेकिन जिस वक्त वह रौंची को अपने साथ लेकर गया उस वक्त उसके हाथ में वही थैला था जो उसे कुन्तो के मरने के बाद मिला था।

 

आज भी गली में कई तरह के भिखारी भीख मांगने आते हैं। उनका भीख मांगने का अपना-अपना तरीका होता है। उनकी तरह-तरह की आवाजें होती हैं। कोई कहता है, ‘रानी महाराज’ तो कोई कहता है, ‘अल्लाह के नाम पर कुछ दे न बाबा’ और कोई अपनी आवाज को बेसुरा व लम्बा खींचते हुए कहता है, ‘इस फकीर की झोली में भी कुछ दे रे बाबा’ और कोई भिखारी कोई भिखारी इतनी जल्दी बोलता है, जैसे कि उसे प्लेटफार्म से छूटने वाली रेलगाड़ी को पकड़ना हो, ‘दे न बाबा दे न, भगवान के नाम पर दे न, आंटी दे न, माता लोग दे न।’

 

भीख मांगने वालों की कई तरह की आवजें गली में गूंजती हैं। लेकिन कुन्तो जैसी आवाज किसी की नहीं होती। लोग आवाज सुनकर दरवाजा खोलते हैं, इधर-उधर देखते हैं, और चुपचाप दरवाजा बंद कर लेते हैं।

 

राहुकेतु

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