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कुछ तो बता ज़िन्दगी
कुछ तो बता ज़िन्दगी
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© Ritu Verma

Drama Inspirational

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आज फिर से दरवाजा खोलते हुए उसे एक खालीपन का एहसास हुआ। वो अपने उस खालीपन को समझ नहीं पा रही थी। ये निर्णय उसने बहुत सोच समझ कर लिया था फिर क्यों उसे ऐसा लग रहा है। वो क्यों कोई ठोस निर्णय नहीं ले पा रही है, क्या ये प्यार है या फिर एक आदत है जो उसकी जिंदगी का हिस्सा बन गयी है। अगर वो इस रिश्ते का हिसाब करे तो इसमें दर्द ज्यादा और खुशी कम थी। एक ख़ालीपन लिए हुए ये रिश्ता सामाजिक दायरों में पनपता रहा। सामाजिक दायरों के तहत इस रिश्ते को मुकम्मल करने के लिए इसमें नए पौधे भी पल्लवित हो गए।

कुछ सालों तक इस खालीपन को दुनियादारी का नाम दे कर ज़िन्दगी चलती रही। हर बार ये लगा ये उसकी अकेली की कहानी नहीं है। ये तो सब रिश्तो की कहानी है। हर सुबह एक मुस्कान के साथ वो फिर से भीड़ में खो जाती। सुबह से शाम कब होती पता ही ना चलता। अपने दर्द की ऐसी आदत पड़ गयी कि वो उसे सामान्य रूप से लेने लगी। उसे वो दर्द नहीं अपने वजूद का हिस्सा लगता था। दिन गुजरने लगे और महीने सालों में बदल गए। सब कुछ सामान्य चल रहा था, एक खुशहाल परिवार का नाटक जारी था, बिना किसी हिचकिचाहट के,क्योंकि इसमें सब खुश थे। पर एक सुबह इस रिश्ते के सामना ऐसे तूफान से हुआ कि पूरा परिवार तार-तार हो गया।

जितने मुहँ उतनी बातें, क्या हकीकत किसी को नहीं पता। कब और कैसे इस रिश्ते को जंग लग गई, खुद उसे भी नहीं मालूम हुआ। जब पता चला कुछ हो नही सकता था। वैसे इस बात की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी, पर वो कभी इस बात को स्वीकार ही नहीं कर पाई। रोज़ रात को देर से घर आना, हर बार एक नया बहाना बनाना, सब कुछ धीरे-धीरे हो रहा था पर वो अपनी एक दुनिया में खोई हुई थी, वो दुनिया जहाँ वो एक पत्नी थी।एक अधूरापन पर ये रिश्ता उसे दुनिया और समाज में सम्पूर्ण होने का अहसास कराता था।

सोचते-सोचते सुबह हो गयी। सोनाली ने जल्दी-जल्दी अपना टिफ़िन पैक किया, कपड़े पहने और भारी मन से दफ्तर की ओर चल दी। आज कल वो खुद अपने मन की थाह नहीं पा रही थी। मेट्रो में बैठकर उसने आँखे बंद कर ली और उसका मन हवा से बातें करने लगा, ऐसा महसूस हो रहा था, अभी कल की ही तो बात थी, जब वो सपनों पर सवार हो कर अपने नए घर में आई थी। हर दिन सुनहरा था और हर रात में चाँदनी बिखरी हुई थी। उसे अपने से ज्यादा खुशनसीब इस दुनिया में कोई ना लगता था। हर दिन की शुरुआत एक नई उमंग के साथ होती थी। पास पड़ोस और रिश्तेदारों में वो एक चर्चा का विषय थी। कोई किसी को इतना प्यार कैसे कर सकता हैं। वो बार-बार आईना देखती पर अपने में ऐसा कुछ ना पाती जिसकी वजह से आगमन उस पर जान छिड़कता था।

उसे आज भी याद थी, उसकी शादी को बस एक माह ही बीता था, उसे मुँह दिखाई के जो पैसे मिले थे,उसे कहीं भी नही मिल रहे थे, उसने आगमन से पूछा, उसने बोला तुम्हारे पैसे तुम जानो। पाँच हज़ार थे, जो आज से पंद्रह साल पहले थोड़ा बहुत तो मायने रखते थे। पूरी आलमारी छान मारी पर नहीं मिले। तभी आगमन ने पीछे से प्रवेश किया और उसको बाहों में जकड़ लिया, इससे पहले वो कुछ बोलती, आगमन ने उसके हाथ मे एक साड़ी और एक सूट का पैकेट पकड़ा दिया। सोनाली इससे पहले कुछ पूछती उसने चुम्बनों की बौछार कर दी।

अगले दिन सोनाली को आगमन की पैंट की पॉकेट से पाँच हज़ार का बिल मिला, और ये उसी दिन का कटा हुआ था जिस दिन से उसके पैसे गायब हुए थे। सोनाली को कुछ-कुछ समझ आ गया था।

दिन महीने में परिवर्तीत हो गए पर सोनाली को कहीं न कहीं ये लगता की कुछ तो ऐसा है जो आगमन और उसमें ठीक नहीं है। आगमन उसे कभी किसी बात पर टोकता नहीं था। उसे हर तरह की आज़ादी थी पर कुछ तो था जो ठीक नहीं था, जिसे ज़ुबा से बयाँ नहीं कर सकते हैं पर महसूस कर सकते हैं।

देखते ही देखते एक साल बीत गया। सोनाली की ज़िंदगी में ऊपरी तौर से सब ठीक था पर अंदर से एक खोखलापन था, रिश्ते में कहीं भी ठहराव ना था। एक पर्दा था जिसे कोई पार ना कर पाया, उस पर्दे के दूसरी तरफ भी धीमे-धीमे एक और दुनिया पनप रही थी। सब अनजान थे या जानबूझकर कर अनजान बन गए। आगमन के रात-दिन के नासमझ खर्चो ने सोनाली को नौकरी करने को मजबूर कर दिया। अपनी दो साल की बिटिया आरोही को छोड़ कर जाने का उसको बिल्कुल मन ना करता पर जीवन की जरूरतों ने इतनी मोहलत ना दी।

देखते-देखते पाँच साल बीत गए, पर उनकी दुनिया में कोई परिवर्तन ना आया। रात-दिन, घर-बाहर संभालते हुए सोनाली तीस साल की उम्र में ही प्रौढ़ लगने लगी। हर दिन की शुरुआत एक दिमागी खेल से होती जिसमें उसे आगमन के झूठ और सच का पता लगाना होता। हर रात एक काली चादर ले कर आती जिसको सोनाली और आरोही ओढ़ कर सो जाते। आगमन उस चादर से बहुत दूर एक अपनी सपनों की दुनिया में व्यस्त रहता।

आज सोनाली को काटो खून नहीं था, मकान मालिक आया हुआ था और उसने बताया पिछले दो माह से उसका किराया बकाया था। सोनाली ने अपने खाते से उसे तीस हज़ार दिए और आज फिर से उसके खाते का बैलेंस जीरो था। सोनाली, आरोही को सीने से लगाये चुपचाप बिना आवाज़ रोती रही। आरोही चार साल की उम्र में चौदह बरस की हो गयी। आगमन का आगमन रात के बारह बजे हुआ।

सोनाली के पूछने पर एक नई कहानी तैयार थी। सोनाली का मन ना था विश्वास करने का पर फिर से समाज , रिश्ते और प्यार के जाल में उलझ गयी। सोनाली को पता भी ना चला धीमे-धीमे उस रिश्ते को बचाने के लिए वो और सब रिश्तों से दूर हो गयी। हर बार आगमन का एक झूठ उस ज़िन्दगी के एक नए आयाम से परिचय करता था।

कभी-कभी सोनाली को लगता आगमन एक पति और पिता की ठीक से जिम्मेदारी निबाह नही पा रहा हैं, इसको छिपाने के लिए वो झूठ का सहारा लेता है। हर छोटी बात पर सोनाली को जिम्मेदार मानना, आगमन की पुरानी आदत थी। सोनाली सब कुछ समझती थी पर कुछ ना बोलती थी। कुछ सालों से तो आगमन घर में मेहमान जैसा बन गया था। सोनाली का जन्मदिन था, हालांकि ये दिन उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण नहीं था पर आरोही का उत्साह देखते ही बनता था। उसने चुपके-चुपके केक आर्डर कर दिया था। उसी शाम सोनाली के एकाउंट में उसकी तनख्वाह आयी थी। तभी एक के बाद एक उसके पास मोबाइल से मैसेज आया, उसके एकाउंट से चालीस हज़ार रुपये निकाले लिए। सोनाली ने अपना ए.टी.एम. कार्ड पर्स में देखा पर वो वहाँ नदारद था।

तभी आगमन का फ़ोन बजा, उसने बताया एक बिज़नेस डील के लिए उसने पैसे निकाले हैं। सोनाली शून्य में ताक रही थी। पूरा महीना कैसे कटेगा।

आरोही की फीस, दूध, राशन और तमाम ऐसे ख़र्च हैं जो मुँह बायें खड़े थे। आगमन रात को आया एक गुलदस्ता ले कर, आरोही उसका इंतेज़ार कर के सो चुकी थी। सोनाली ने चुपचाप खाना लगाया और निःशब्द दोनों ने खाया। ना सोनाली ने कुछ पूछने की कोशिश की क्योंकि वो एक नई झूठी कहानी नहीं सुनना चाहती थी।

आगमन और सोनाली फिर से एक नई सुबह का इंतज़ार करते हुए सो गए। सोनाली मन ही मन सोच रही थी। इस रात की कभी सुबह होगी या नहीं। सुबह आती है पर अपने साथ उजाला नहीं जिम्मेदारियों और एक फरेब का इम्तेहान ले कर। क्यों वो खुल कर बात नहीं कर पाते। बहुत प्यार से उसने कई मर्तबा कोशिश करी पर हर दफा उसे नाकामयाबी ही मिली।

सोनाली को समझ नहीं आ रहा था किससे बात करे, घर में बताने का कोई फायदा नहीं, उसके माता-पिता खुद अपनी समस्यओं से जूझ रहे थे। आगमन के माता-पिता से कुछ छिपा नहीं था पर वो ये बोलकर पीछा छुड़ा लेते थे कि ये शादी के बाद ऐसा हो गया।

आज दफ़्तर से सब सहकर्मियों का ट्रेड फेयर घूमने का कार्यक्रम बन गया। सोनाली का बिल्कुल मन नही था। उसके एकाउंट में बस दस हज़ार थे और पूरे माह के बेशुमार खर्च। वहाँ पहुँच कर भी उसका ध्यान घर पर ही लगा रहा, लोग उसे छेड़ रहे थे, कभी तो अपने मियां से ध्यान हटाओ। सब लोग शॉपिंग करने में व्यस्त हो गए, सोनाली ने झूठी मुस्कान के साथ कहा, अभी कल ही मेरे जन्मदिन पर आगमन ने चार साड़ियाँ दी है पर अंदर ही अंदर वो रो रही थी।

उसे आज भी याद है फरवरी की वो शाम जब पूरी रात आगमन घर नहीं आया। उसका मोबाइल लगातार स्विच ऑफ आ रहा था या जब ऑन होता तो लगातार बिजी रिंगटोन दिखता। पूरी रात उसने आँखों में काट दी, आगमन के घर पर खबर कर दी थी। अगले दिन सुबह से ही वो फिर उसका नंबर मिलाने लगी, दो घंटे की लगातार कोशिश के बाद वहाँ से एक महिला ने फ़ोन उठाया और बोली, "सर जरूरी काम से बाहर गए हैं।" सोनाली इससे पहले कुछ बोलती फ़ोन कट गया। सोनाली का सिर चकराने लगा, कौन है, आगमन कहाँ है, ऐसे कितने सवाल उसके जेहन में घूम रहे थे। आगमन के माता-पिता को उसने सब बात दिया। उन्हें भी कुछ समझ नहीं आ रहा था।

एक दिन इसी जद्दोजहद में बीत गया। आगमन के बहुत ज्यादा दोस्त भी नही थे। सोनाली के पास कोई चारा नहीं था, उसने फिर से आगमन के नंबर पर फ़ोन लगाया, काफी कोशिश के बाद नंबर मिला और जो कुछ उस महिला ने बताया उसे सुनकर सोनाली के पैरों तले जमीन खिसक गई। वो और आगमन पिछले दो सालों से पति पत्नी के तरह रह रहे हैं। उस महिला को नहीं मालूम था कि आगमन शादीशुदा है, उसे बताया गया था कि उसकी बीवी उससे अलग रहती है। एक और ऐसी बात बताई जिससे सुनकर सोनाली सकते में आ गयी, आगमन की माँ उस महिला से दो बार मिल चुकी है और फिलहाल वो एक केस में फंस गया है जिसके कारण वो रायपुर गया है। अपना सारा सामान वो उस महिला के पास छोड़ कर गया था।

फ़ोन कट करने के बाद सोनाली बहुत देर तक शून्य में ताकती रही। उसे ये समझ नहीं आ रहा था कि वो किस कारण से रिश्ते में बंधी है, प्यार, आरोही के लिए सुरक्षा या सामाजिक मान्यता के लिए, बहुत सोचा, सोचते सोचते सुबह हो गयी। सास से जब उसने पूछा तो वो बोली उसने तो बोला था कि उसकी बहन जैसी है पर सोनाली नहीं समझ पा रही थी, उससे सब क्यों छुपाया जा रहा था।

अब उसके संसार में वो थी और उसकी आरोही और शांति और सुकून, फिर आज अचानक ये खालीपन क्यों महसूस हो रहा है। ये खालीपन उसके दिल में है या सामाजिक दायरों में परिपूर्ण ना होने के कारण उसे महसूस होता है।

हर तरह से उसने अपने मन को टटोला पर कुछ समझ ना आ रहा था। तभी उसकी तन्द्रा बजती हुई घंटी से भंग हुई, उसने उठ कर दरवाज़ा खोलाष उसके सामने आँखों में हज़ारों सपने लिए आरोही खड़ी थी। ज़िन्दगी से भरपूर,उसकी जिंदगी को एक नई राह दिखाती हुई। तभी खिड़की की ओट से चुपके से छन-छन चाँदनी ने अपनी रोशनी से पूरे घर के साथ-साथ उसके मन को भी नहला दिया। अब वो फिर से तैयार थी।।

झूठ रिश्ते खालीपन

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