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कहानी
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© Supreet Saini

Drama

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महेश पाल जी अपना काले रंग का बस्ता उठा घर की ओर चल रहे थे। आज दोपहर में दफ्तर मे खाना खाते समय अचानक उनका हाथ लगने से मेज से दाल का डब्बा उनके बस्ते पर गिर गया था। बस्ते के ठीक बीच मे एक दाल का दाग बन गया था - धब्बा हलके पीले रंग का था, और बस्ता धोने पर भी पूरी तरह से गया नहीं था। ध्यान से देखें तो पता चलता था की दाल के धब्बे का निशान बिलकुल दिल्ली के नक़्शे के सामान था, और जहाँ अभी भी दाल के २-३ दाने बैग पर लगे थे, वह ठीक उसी जगह थे जहाँ दिल्ली में उनका घर था। टैगोर बस्ती मे बस से उतर कर घर की ओर जाते समय महेश पाल जी यही सोच रहे थे - उनका यह नियम था की ऐसी अकस्मात् हुई बातों पर अत्यधिक ध्यान दिया जाये।

महेशजी का जन्म टैगोर बस्ती में ही हुआ था - टैगोर स्वयं तो वहां कभी नहीं रहे थे, पर बहुत साल पहले एक नेता ने टैगोर का पुतला बस्ती के एकाएक पार्क मे बनवाना उचित समझा। टैगोर ने महेश जी और बस्ती के अन्य बच्चों के खेलने का मैदान छीना ज़रूर, पर बदले मे बस्ती मे सभी रहने वालों को एक महान लेखक बनने की प्रेरणा दी। इस प्रेरणा का सबसे गहरा असर महेश पाल जी पर हुआ था। उनके जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य अपने नाम एक छपी पुस्तक देखना था। इस नाशवान शरीर को अमरता भेंट करने का केवल यही एक तरीका था । लेखक बनने पर अपने यश और ख्याति की कल्पना करते वह टैगोर के पुतले के सामने से गुज़रे ।

पर असल में पुतला अब वहां था ही नहीं। कुछ साल पहले के बस्ती में हुए हिन्दू-मुसलमान दंगों में बस्ती के कुछ बदमाश जवानों ने दंगों के गोलमाल का फायदा उठा कर गुरुदेव का पुतला तोड़ दिया था। इससे भी बढ़ कर आगबबूला करने की बात यह थी कि वह गुंडे अब पुतले के टुकड़ों को विकेट बना कर क्रिकेट खेला करते हैं। पर आजकल की पीढ़ी से कोई समझदारी की बात या काम की अपेक्षा करना ही मूर्खता थी - हताश सोच मे डूबे हुए महेश जी घर पहुंचे। घर का दरवाज़ा खटखटाया तो पहले माले से नीचे आती उनकी बेटी की पायल की आवाज़ उनके कानों में पड़ी। आवाज़ सुन कर उनका चेहरा खिल गया, और लगा कि अब थकान मिटाने के लिए चाय की ज़रुरत नहीं पड़ेगी ।

हाथ-मुंह धो कर अपने बेटे, बेटी, और पत्नी के साथ बैठक मे बैठे तो उन्हें बहुत शान्ति महसूस हुई। पर महेश जी इस शान्ति से बहुत सतर्क रहते थे - उन्हें पता था कि एक महान लेखक और ख़ुशी का मिलन कभी नहीं हो सकता । ख़ुशी लेखन को खुरदरा बना देती है, और लेखन में अगर दम है तो वह ख़ुशी का अस्तित्व मिटा देता है। उन्हें ठीक से याद नहीं था की उन्हें ये बात कहाँ से पता चली थी, पर जहाँ से भी हो, दिल में घर कर गयी थी। जब से उन्होंने यह सुना, अपने और ख़ुशी के बीच एक हाथ का फांसला रखने का फैंसला कर लिया था।

४५ की आयु में वह जानते थे कि उम्र उनके साथ नहीं है - ज़्यादातर लेखक अब तक अपना सर्वश्रेष्ठ काम दुनिया को दे चुके होते हैं। इसलिए मन में थोड़ी बैचैनी थी की अपनी कहानी की रचना उन्हें अगले २-३ साल मे ही करनी होगी । कहानी की खोज में उन्होंने अच्छे लेखकों के तौर तरीकों, आदतों, रहन-सहन, प्रेरणाओं, और नसीहतों पर गौर करना शुरू कर दिया था। कुछ २ वर्षों से अपने दफ्तर के बैग मे एक कॉपी भी रखने लगे थे जिसमे वह समय-समय पर आये विचार लिखते थे। उन्हें पता नहीं था की कब छोटे से छोटा विचार भी एक बहुमूल्य रचना की प्रेरणा बन सकता है। अपने इस विचार की खोज मे उन्होंने एक कॉपी बनाई। कॉपी पढ़ने की इजाज़त किसी को नहीं थी, इसलिए ठीक से नहीं बता सकता की उसमे क्या लिखा था, पर इतना जानता हूँ की उन्हें बहुत अजीज़ थी।

बचपन के सपने को साकार बनाने के लिए बाकी सब कदम वह पहले ही तय कर चुके थे। बात-बात पर किसी लेखक के उदाहरण देते, हमेशा कुछ न कुछ पढ़ते रहते, रहस्य्मयी तरीके से अपनी कॉपी मे कुछ लिखने लग जाते, या किसी सामान्य सी लगने वाली घटना पर कहना, "वाह! कितनी पेचीदा है ये ज़िन्दगी।" बस अब जो बात बाकी रह गई थी वह यह थी की कॉपी मे लिखी पंक्तियों को एक कहानी नामक धागे से पिरोकर एक खूबसूरत किताब का रूप देना।

लेखक बनने की चाह में उन्होंने अपने आस-पास सब कुछ बेहद बारीकी से देखना शुरू कर दिया था - चाहे वह राह चलता भिखारी हो, या सब्ज़ी बेचने वाला ठेलेवाला, या शाम मे काम से लौटते कर्मचारी, या टूटी सड़क, या उस पर चलती खटारा बस - कुछ भी महेश पाल जी की पैनी नज़र से बच नहीं सकता था। अकसर आस-पास की साधारण घटना को देख अपने परिवार वालों का ध्यान उसकी ओर आकर्षित करते, और उस सरल घटना की पेचीदगी समझाने की कोशिश करते। जब उनका विवरण सुन परिवार का कोई सदस्य घटना के बारे मे कुछ और जानने की कोशिश करता, तो महेश जी चिढ कर बोलते, "तुम्हे बात तो समझ नहीं आ रही है। जो कह रहा हूँ, उसकी भावना समझो। यह गणित नहीं, जीवन है।"

खैर, देखते ही देखते २ साल बीत गए - बैग मे पड़ी कॉपी, और उसकी अगली ३ भी भर गयीं, पर कहानी की खोज अभी भी जारी थी। इस कठिन समय मे गिरते मनोबल को संभालने मे महेश जी की पत्नी का हाथ हमेशा उनके कंधे पर रहा - उन्हें प्रेरित करने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए - कभी प्रोत्साहित किया, कभी पैनी नज़र की तारीफ, कभी आलस की आलोचना, या कभी एक नयी शुरुआत करने की ताकत दी - पर कुछ रंग नहीं ला रहा था, और सब दरवाज़े बंद होते नज़र आ रहे थे।

कभी बच्चे पूछते की लिखने की इच्छा इतनी प्रबल क्यों है उनके मन में, तो गंभीर होने का नाटक करते और कहते, "मैं दुनिया देखने का अपना नजरिया औरों के साथ बांटना चाहता हूँ। कोशिश कर रहा हूँ, भावनाओं और शब्दों का मिलन नहीं हो पा रहा है अभी तक। कोशिश कर रहा हूँ।" सिर्फ पत्नी के सामने वह ये नकाब उतारते, और बताते की अपने नाम किताब होने से उन्हें साहित्य के इतिहास की सदस्य्ता मिल जाएगी। कोशिश करते कि पत्नी को समझा पाएं कि शब्दों के जादूगर कहे जाने में उन्हें कितना सुख मिलेगा। पत्नी का उनके कंधे पर हाथ, और आँखों की रौशनी उन्हें बताती की वह उनकी भावनाएं और मायूसी, दोनो समझती है।

दिवाली के बोनस मिलने से पहले पत्नी ने सुझाव दिया कि इस वर्ष वो बोनस को कहीं घूमने पर खर्च करें। कहा, "शायद तुम्हारी प्रेरणा कहीं और छिपी है। बोनस से इस बार अपने परिचय से दूर कहीं जाओ। हो सकता है नये माहौल मे नये विचार और नई कहानियाँ मिलेंगी।" बात उन्हें भा गई और शाम मे देश का नक्शा ले कर बैठ गए, और ध्यान से लक्ष्य् ढूंढने लगे।

कुछ दिनों पश्चात, एक हफ्ते की छुट्टी ले कर बस्ते समेत दिल्ली के एयरपोर्ट पर बैठे थे। मद्रास की फ्लाइट समय से कुछ देरी से चल रही थी। आँखों में फौलाद सा इरादा था कि इस बार तो वह अपनी कहानी ले कर ही लौटेंगे। दफ्तर मे चाचा के लड़के की शादी का बहाना बनाकर आये थे। एयरपोर्ट पर बैठे जब उन्होंने सोचा कि उनके सहकर्मियों के चेहरे कैसे दिखेंगे जब वह अपनी छपी किताब का 'रीडिंग सेशन' दफ्तर में देंगे, तो एक भीनी सी हँसी उनके मन से निकल कर चेहरे तक पहुँच गयी।

मद्रास एयरपोर्ट पर उन्हें काफी तकलीफ हुई । वहां कोई हिंदी नहीं जानता था और महेश जी तो हिंदी के ही लेखक थे। बड़ी मुश्किल से उन्होंने एयरपोर्ट से होटल तक की टैक्सी करी और सूरज ढलने से थोड़ा समय पहले अपने कमरे पहुंचे। सोचा कि आज वो खाना खा कर रात भर आराम करेंगे और कल सुबह कहानी की खोज मे बाहर निकलेंगे।

अगले कुछ दिन महेश जी खूब मद्रास घूमे। मरीना बीच देखी, बहुत मंदिरों में भगवान के समक्ष अपने आप को समर्पित किया, स्वामी विवेकानंद के घर मे उनके कमरे मे बैठ कर ध्यान लगाया, रेलवे स्टेशन जा कर स्टेशन मास्टर के आत्मकथा तक भी पूछ डाली - पर वापस लौटने के दिन तक उन्हें बहुत सारे काले पन्ने मिले, कहानी नहीं।

मद्रास के एयरपोर्ट पर बैठे महेश जी उदासी से अपनी कॉपी को देख रहे थे। पिछले ४ वर्षों में भरी ५ कॉपियां उनकी गोद मे पड़ी थीं। इन कॉपियों मे उन्होंने जैसे अपना रक्त, भावनाएं, और अपना पूरा अस्तित्व डाल दिया हो - पर निर्दयी कॉपियों ने उन्हें एक कहानी नहीं दी। अचानक उनके दिल्ली के विमान के निकलने की घोषणा हुई, और अपना बस्ता उठा वह विमान द्वार की ओर चल पड़े। पीछे कुर्सी पर पड़ीं कॉपियाँँ महेश जी को जाते, द्वार के पार जाने तक, आँखों से ओझल होने तक देखती रहीं...।

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