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पिघलता पत्थर
पिघलता पत्थर
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© Niraj Sharma

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        ‘इसे क्यों लेकर आई है? ये तेरे कुल का होगा, मेरे कुल का तो नहीं है न!’
महिमा चार साल के मोहित की उँगली थामे चली जा रही थी और ससुर के ये शब्द उसके कानों में गरम सीसा बन घुले जा रहे थे। मन में कोहराम मचा हुआ था। सारी की सारी कड़वी यादें चलचित्र की भाँति एक-एक कर निगाहों के आगे घूमती चल रही थीं। 
          विवाह के कुछ समय बाद ही, रसौली होने के कारण, ऑपरेशन कर गर्भाशय को निकाल देना पड़ा था। बस तभी से, ससुराल वालों ने सीधे मुँह बात करना बंद कर दिया था। वह अपने-आप से ही प्रश्न पूछती—‘संतान पैदा न कर सके तो स्त्री क्या स्त्री नहीं रह जाती? और तो और, क्या वह मनुष्य भी नहीं रह पाती?’ मन विरक्ति से भर गया था। 
         जुबान पर तो जैसे ताला ही लग गया था। वह चुपचाप इधर-उधर के ताने-उलाहने सुनती रहती; लेकिन एक स्त्री का कोमल मन वह सब कब तक सहता? विक्षिप्त-सी हो गई थी वह। उसकी खुशी की खातिर छोटी बहन कविता ने कठोर निर्णय लिया। पति की सहमति से उसने जीजा से बात कर, अपनी दूसरी संतान को महिमा की गोद में डाल दिया। 
गोद भरते ही, उसको तो जैसे नया जीवन ही मिल गया; लेकिन ससुराल में किसी को भी यह कदम रास नहीं आया। ससुर तो जब-तब नन्हे मोहित को डाँटते-डपटते ही रहते। जब भी सामने पड़ जाता, गुस्से में कह उठते, “मर जाएगा एक दिन तू मेरे हाथों से।” 
          नन्हा मोहित कुछ समझ नहीं पाता था। सहमकर रोने लगता था। दौड़कर महिमा की गोद में छुप जाता। महिमा भी मन ही मन रो उठती। आखिर कब तक चलता ऐसा? उसने और पति ने अन्तत; अलग मकान लेकर रहने का निर्णय ले लिया। 
          साल भर होने को आया। आज सुबह, ऑफिस टूर पर पति के निकलते ही, खबर मिली कि ससुर को लकवा मार गया है। मोहित को लेकर वह उन्हें देखने को चल दी। हालाँकि मन के किसी कोने में आक्रोश अब भी दबा था, लेकिन, जब सामने पहुँची तो बिस्तर पर पड़े ससुर की लस्त-पस्त हालत देखकर उसे दया हो आई। 
           मोहित सहमा-सा उसके पीछे खड़ा झाँक रहा था। द्रवित महिमा ने बाँह से खींचकर उसे ‘बाबा’ के सामने खड़ा कर दिया। उस मासूम को देख, वृद्ध के भीतर का पत्थर पिघल-पिघलकर आँखों के कोरों के रास्ते बाहर बहने और बिस्तर में समाने लगा। मार डालने की कौन कहे, स्नेहसिक्त हाथ भी बच्चे के सिर पर रखने की हालत में वह नहीं बचा था। आधा शरीर दैव की मार से निष्क्रिय हो चुका था और शेष आधा इलाज की प्रक्रिया में जकड़ा था।

 

 

 

एक वंध्या स्त्री के संघर्ष की कथा

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