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प्यार में सँवारना और सँवरना
प्यार में सँवारना और सँवरना
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© Arpan Kumar

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“मैं चाहता हूँ कि मेरे बच्चे कभी बड़े ही न हों,” एक दोस्त ने अपने दूसरे दोस्त से अँगड़ाई लेते हुए कहा।

 

“क्यों, ऐसा क्यों?” दूसरे दोस्त ने गंभीरतापूर्वक पूछा।

 

“क्योंकि मैं उन्हें अधिक से अधिक प्यार करना चाहता हूँ। उनके साथ अनंत काल तक अपना बचपन जी भरकर जीना चाहता हूँ। उनकी शैतानियों से मैं चिड़चिड़ा नहीं होता, बल्कि उनकी ऐसी-वैसी हरकतों में खूब मैं मजे लेता हूँ। और हाँ मेरे दोस्त, एक राज की बात बताऊँ, कई बार मैं चोरी-छिपे उन्हें बदमाशियाँ करने के लिए उकसाता भी रहता हूँ।”

 

पहला दोस्त अपनी रौ में जाने क्या-क्या कहता रहा! वह अपने ख्यालों में भी अपने बच्चों से प्यार करता रहता था। वह एक बेहद ऊर्जावान और लाड़-प्यार करने वाला पिता था। उसकी पत्नी को भी उससे कोई शिकायत न थी। ऑफिस के बाद वह अपना सारा समय जिसे आजकल ‘क्वालिटी टाइम’ कहा जाता है, अपने बच्चों और अपनी पत्नी के साथ बिताता था। वह निश्चय ही एक ‘हैप्पी मैरिड लाईफ’ जी रहा था। बच्चों के लिए चॉकलेट, कंप्यूटर गेम्स, वीडियो गेम्स, कॉमिक्स सारी व्यवस्थाएं उसने बड़े अच्छे तरीके से कर रखी थी। वह आगे बढ़-बढ़कर उनकी फरमाइशें पूरी किया करता था।      

 

दूसरा दोस्त उसकी बात को बड़े उत्साह से ध्यानपूर्वक सुन रहा था। फिर कुछ देर  बाद  वह चुप्पी लगा गया।

 

पहला दोस्त अपनी धुन में था। उसने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहना जारी रखा, “जानते हो मित्र, मैं इनके लालन-पालन में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखना चाहता। अरे भाई, कौन सा इनका बचपन फिर लौट कर आएगा! हमें यह मलाल क्योंकर रहे कि हमने उन्हें उनका भरपूर हक़ नहीं दिया।”

  

दूसरा दोस्त पहले दोस्त की चमकती आँखों में देख रहा था। वहाँ अपने बच्चों के लिए एक विह्वल और सफल पिता की उपलब्धि की चमक सूरज की रोशनी को फीका कर रही थी। पहला दोस्त अपने बड़े और भव्य ड्राईंग रूम में आरामदेह सोफे पर आलथी-पालथी मारे पसर गया। दूसरे दोस्त के कंधे पर अपना हाथ रखे आगे कहने लगा, “आखिर तुम्हीं सोचो दोस्त, अगर मैं इनका यूँ भरपूर ख्याल नहीं रखूँगा तो कल होकर क्या ये यह नहीं कहेंगे कि उनका सही से ख्याल नहीं रखा गया। जैसे हम आज अपने माता-पिता के लिए कह बैठते हैं।”

   

पहला दोस्त उजबक सा उसकी आँखों में देखता रहा। फिर धीरे से कहा, “पता नहीं मित्र, मुझे तो ऐसा कुछ नहीं लगता। हम जितने भाई-बहन थे, उस हिसाब से तो हमारे माता-पिता ने अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद ठीक-ठाक ही ख्याल रखा। तब लोगों के पास इतने पैसे भी कहाँ थे! फिर उन दिनों हमारा परिवार भी कितना लंबा-चौड़ा हुआ करता था!

 

अब पहले दोस्त की बारी थी। उत्तेजना में उसकी नसें फड़क रही थीं। उसके अंदर जमा आक्रोश किसी लावे की शक्ल अख्तियार कर चुका था और उसके भीतर का ज्वालामुखी बस फट पड़ना चाहता था, “यही तो बात है दोस्त। वे लोग अपने जैविक आनंद मात्र के लिए या कहें क्षणिक शारीरिक सुख की हड़बड़ी युक्त लालसा में एक के बाद एक संतान पैदा करते चले गए। जैसे हम मनुष्य नहीं कोई भेड़-बकरी हों और वे माता-पिता नहीं बस दो बेफिक्र जिस्म हों। और हमें धरती पर लाकर पटक दिया। बेहतर शिक्षा और चिकित्सा की बात तो दूर, दो जून के भरपेट खाने और तन ढँकने तक के कपड़ों तक की कोई व्यवस्था नहीं थी उनके नेतृत्व में। बड़े की उतरन छोटा पहन रहा है और छोटे की उतरन उससे छोटा। और उसके लिए भी मार-काट। खाने में भी यही हाल था। किसी दिन कोई भूखा रह गया तो किसी दिन कोई और। तुम्हीं बताओ, वह जीना भी कोई जीना था! और क्या इसे आदर्श पैरेंटिंग कहा जा सकता है!”

 

दूसरे दोस्त पर आते-जाते भाव यह बता रहे थे कि वह अपने दोस्त की बातों से इत्तिफाक नहीं रखता है। वह कहने लगा, “यार दीपक तुम सब-कुछ आज के चश्मे से देख रहे हो। इसलिए तुम्हारे अंदर इतनी असंतुष्टि आ गई है। जरा याद करो अपने गाँव के उन पुराने दिनों को, अपने तमाम अभाव से भरे उन दिनों में भी हम कितना खुश रहा करते थ! अपने दादा-दादी के आगे हम अपनी बेतुकी ज़िदों को मनवाकर भी किस आनंद का अनुभव करते थे! तब वे मिट्टी की पकी हुई ईंटों से हम अपने सपनों का महल बनाया करते थे! और कच्ची मिट्टी के ढेर को ला-लाकर कभी जीप तो कभी ट्रक बनाया करते थे। उन्हें सुखाकर और उनमें रस्सी बाँधकर जब हम उन्हें खींचते थे, तो मिट्टी की उन गाड़ियों पर हमारी पूरी कल्पनाशीलता सवार हो जाती थी और उनके पहियों पर हमारे भीतर का समस्त रोमांच गोल-गोल घूमता था। तब हम स्वयं अपने खिलौनों के निर्माता थे और हम स्वयं उसके उपभोक्ता। कहीं-न-कहीं इससे हमारे अंदर का हुनर भी निर्मित होता था और हमारे अंदर की अभियांत्रिकी भी कुछ आकार पाती थी। गाँव में हम बेशक  फटे-चीथे कपड़े पहनकर घूमा करते थे मगर इससे हमारे अंदर कोई कुंठा नहीं पनपती थी, क्योंकि अपने आस-पास ऐसे ही वस्त्र पहने बच्चों की दुनिया हुआ करती थी। कम-से-कम हमारा अनुभव तो यही कहता है दीपक।”

 

दीपक कुछ देर के लिए खामोश हो गया और कुछ सोचने लगा। आज वह एक सफल मैकेनिकल इंजीनियर था और वह भी ऐसे ही ग्रामीण परिवेश में पल-बढ़कर बड़ा हुआ था। वह एक क्षण के लिए निरुत्तर हो गया। आज वह देश-विदेश में जाने कैसे और कितने आधुनिक कल-पुर्जों की डिजायनिंग किया करता है, तो क्या इसके पीछे उसके बचपन की वह कला काम करती है! वह अपनी पुरानी स्मृतियों में चला गया। कैसे मिट्टी के बनाए उसके कारों की प्रशंसा उसके सारे दोस्त किया करते थे! और इसी प्रशंसा की रौ में उसके दोस्त उससे अपनी-अपनी गाड़ियाँ बनवा लिया करते थे! उन दिनों को याद करके उसके चेहरे पर संतोष की एक रेखा बनी और मिट गई।

  

दो दोस्तों के बीच हुए इस संवाद में यह पहली बार था, जब सौरभ ने इतनी देर तक कुछ कहा हो। सहसा विषय बदलते हुए दीपक ने पूछा, मानो उसकी नज़र को समझना चाह रहा हो, “अरे हाँ यार बताओ, अपने बच्चों के बारे में तुम्हारे क्या ख्याल हैं?”

 

“मैं अपने बच्चों को जल्द-से-जल्द बड़े होते देखना चाहता हूँ”, सौरभ कुछ भावुक होते हुए और अपनी इस अनुभूति को दीपक से और खुद से छुपाते हुए कह रहा था।  

 

“क्यों ऐसा क्यों”, दीपक को संभवतः सौरभ से ऐसे किसी उत्तर की उम्मीद न थी। आँखों ही आँखों में दीपक ने सौरभ की ओर अपनी प्रश्नाकुलता की गेंद फेंकी जिसे सरलता से कैच करते हुए और उससे भी अधिक सरलता से अपनी बात रखते हुए सौरभ ने कहना शुरू किया, “क्योंकि मैं डरता हूँ...मैं कब खत्म हो जाऊँ! मैं नहीं चाहता कि मेरे पीछे वे किसी भी तरह की मजबूरी में जीएं। वे जब स्वावलंबी होंगे तो मैं निश्चिंत हो जाऊँगा। कदाचित मैं तब और खुलकर जी पाऊँगा। हो सकता है, तब वे अत्यधिक व्यस्त हो जाए, मेरे लिए समय न निकाल सकें, मुझे क्रमशः आदर कम देने लगे, मगर मैं यह सब सह लूँगा। मेरे बच्चे मेरे प्रति बेअदब और निरंकुश हो जाएं, मुझे मंजूर है, मेरे जीते जी वे मुझे भुला दें, मुझे मंजूर है, मगर मेरे मरने के बाद उन्हें किसी बेचारगी में जीना पड़े, यह किसी भी सूरत में मुझे बर्दाश्त नहीं होगा। मैं चैन से तब मर भी न सकूँगां|”

 

सौरभ दरअसल अपने मुँह से इतना कुछ कहने से बचना चाह रहा था। उसे लगता था, उसकी ऐसी बातों को कौन जाने किस रूप में ले!

   

दीपक उसकी बातों को सुनकर कुछ देर के लिए एकदम खामोश हो गया। वह सौरभ की आँखों में झाँक रहा था। वहाँ उसे सूरज की चमक नहीं बल्कि समुद्र की शांति तैर रही थी। उन आँखों में एक जिम्मेदारी और उदासी का मिला-जुला रूप था। वहाँ ‘ऐन ओल्ड मैन एण्ड द सी’ के बूढ़े नाविक की जीवटता और थकावट थी। वहाँ अपने घर परिवार को किसी तरह एक सुरक्षित स्थान तक ले चले जाने तक हार न मानने की जिद थी।

  

दीपक के लिए घर-परिवार को चलाने वाले किसी आदमी की आँखों में इस तरह देखने का पहला अनुभव था। उसके लिए यह एक नया रूप था। वह तो अपनी रुमानियत वाले अंदाज़ को ही अब तक सच मानता चला आ रहा था। टी.वी. के पर्दे पर आने वाले विज्ञापनों में जिस तरह ममता और वात्सल्य को दिखाया जाता है, वह कमोबेश कुछ उसी तरह अपने परिवार को चला रहा था। जहाँ खूब सारा ऊधम और प्यार का अंतहीन प्रदर्शन घर के कोने-कोने तक फैला हुआ था। इसका परिणाम यह हुआ था कि दीपक के दोनों बच्चे दिनों दिन बेहद जिद्दी और डिमांडिंग होते चले जा रहे थे।

 

दीपक को लगा कि उसे भी बीच-बीच में सौरभ की तरह सोचना चाहिए। पिता के रूप में अपने परवरिश कौशल पर पहली बार वह स्वयं प्रश्न चिह्न लगा रहा था। मन ही मन अपने भीतर चल रहे इस शक-ओ-सुबहा को उसने अपने जीवन के लिए ऐतिहासिक माना। कहाँ तो अब तक वह खुद के ‘डोटिंग फादर’ कहलाए जाने पर इतराया करता था और कहाँ अब वह अपने  पूरे गृह-प्रबंधन पर सवाल कर रहा था। वह सोच रहा था, क्या सौरभ की ऐसी सोच को उसे भी अपनाना चाहिए! मन ही मन वह अपने बच्चों को याद करने लगा। उसकी नौ वर्षीय बिटिया डिंपल  और उसका सात वर्षीय बेटा लकी  दोनों दिखने में स्वयं उसकी तरह ही स्मार्ट थे। रंग और नाक-नक्श अपनी गोरी-चिट्टी माँ का चुरा लाए थे। मगर इधर के कुछ वर्षों में उन्हें फास्ट-फूड की ऐसी आदत लगी कि वे इतनी कम उम्र में ही फूल कर कुप्पा हो गए थे। रात में देर तक टी.वी. से चिपका रहना उनकी रोज की आदत हो गई थी। जाने कैसे-कैसे सीरिअल देखने लगे थे! और फिर सुबह-सुबह स्कूल जाने के लिए तैयार करने में रश्मि  को कितनी तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता था! आजकल उनका पेट भी ठीक से साफ नहीं हो पा रहा था और सुबह-सुबह नियमित रूप से वे ट्वॉलेट भी नहीं जा पा रहे थे। उनका मन निरंतर चिड़चिड़ा हो रहा था और वे पढ़ाई में भी पिछड़ने लगे थे आदि आदि। 

 

दीपक यह सब सोचते हुए भूल गया कि वह अपने लँगोटिया यार सौरभ के साथ बैठा हुआ है। शाम हो रही थी और सूरज की तेज भी क्रमशः मद्धम, पड़ती चली जा रही थी। दीपक को जाने क्यों शुरू से ही शाम का सूरज उदास कर जाया करता था। इस पल वह भी अचानक से उदास हो गया और जिस तरह सूरज आकाश के पश्चिमी हिस्से में सिमटता चला जा रहा था, वैसे ही इस समय  दीपक भी खुद में ही सिमटता चला जा रहा था। उसे यह पता भी नहीं चला कि सौरभ उसे लगातार देखे जा रहा है। और दोनों के बीच कोई आठ-नौ मिनट से एक भी शब्द का आदान-प्रदान नहीं हुआ था। यह पहली बार था, जब सौरभ ने दीपक को इतनी देर तक अपने में खोया और चुप-चाप देख रहा था।        

 

सौरभ तो खैर स्वभावतः ही गंभीर था। दीपक की चुप्पी को देखकर सौरभ का अपने बारे में यह ख्याल कुछ अधिक पुख्ता हो रहा था कि वह हरदम गंभीरता का चोला ओढ़े रहता है, और घर-परिवार की मामूली बातों को भी दार्शनिकता की धुंध से भर देता है। वह आत्म-ग्लानि से भर उठा। कैसे उसने अपने स्मार्ट और हल्के-फुल्के दोस्त को अपनी फिजूल की बातों में उलझा कर उसे निराश और दुःखी कर दिया। अरे वह वर्तमान में जीता है और ढेर सारी मौज-मस्ती करता है, तो क्या गलत करता है! फिर उसने आगे बढ़कर दीपक के कंधे को झिंझोड़ते हुए और मुसकुराने की कोशिश करते हुए कहा, “दीपक, इतना कुछ सोचने की ज़रूरत नहीं है। हर आदमी एक दूसरे से अलग है और हरेक का मानस एक-दूसरे से भिन्न है। हर कोई अपने हिसाब से अपनी ज़िंदगी जीता है और अपने स्टाइल में अपना परिवार  चलाता है। तुम्हें  भी जो ठीक लगे, वह करो। बस इतना ध्यान रहे कि घर के मुखिया होने के कारण तुम अपने घरवालों को अधिकाधिक खुशियाँ दे सको और उन्हें स्वावलंबी और स्वस्थ रख सको।”                                                       

 

तभी दीपक अपनी जगह पर से उठा और पीछे से उसकी आँखों में झाँकते हुआ बोला, “दोस्त, हम एक-दूसरे के बारे में कितना कम जानते हैं! तुम अपने अंदर अपने बच्चों के लिए इतना सारा प्यार छुपाए हुए हो, यह तो मैं आज ही जान पाया। और बुरा मत मानना मेरे दोस्त, तुम्हारे अंदर तह-दर-तह जमे डर के इस बादल को हटाकर इस प्यार को बाहर निकाल पाना आसान भी नहीं है। मेरे लिए तो क्या तुम्हारे बच्चों के लिए भी नहीं। हम सब तो प्यार  करने मात्र के लिए किसी को प्यार करते हैं मगर तुम तो किसी को प्यार करते हुए उसके व्यक्तित्व को सँवारने की पूरी चिंता करते हो। अपने आश्रित को स्व-आश्रित करने की तुम्हारी यही पहल तुम्हारे प्यार को उदात्त बनाती है। तुम प्यार में दूसरों को सँवारना चाहते हो, शायद इससे खुद भी सँवर पाते होगे।” 

  

सौरभ क्या कहता! बस चुप ही रहा। हाँ, एक बार ऊपर आकाश की ओर ज़रूर देखा। बादल-रहित नीला आकाश शाम की इस बेला में बड़ा साफ और सुंदर दिख रहा था। उसे लगा कि आज उसका दोस्त दीपक भी उसके मन-रूपी आकाश तक सारे बादलों को चीरकर पहुँच पाया।

 

कुछ देर तक दोनों दोस्त दूर गगन में आजाद उड़ते परिंदों के एक जोड़े को देर तक देखते रहे।

 

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बाल-परवरिश की कहानी

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