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भाग्य ग्रहण
भाग्य ग्रहण
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© mona kapoor

Inspirational Tragedy

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रोज़ की तरह आज भी ऑफ़िस लेट पहुंचने के कारण आरोही का पूरा दिन खराब होने वाला था, आखिर बॉस की रोज रोज की डांट सुनकर किसका दिन अच्छा निकलता है परन्तु करती भी तो क्या बेचारी, आखिरकार ये नौकरी उसकी जरूरत व मजबूरी दोनो जो बन बैठी थी, जिस दिन नौकरी जॉइन की थी तब तो बॉस द्वारा पूरी सहानुभूति दिखाई गई थी परंतु कुछ ही दिनों बाद वो सहानुभूति कहाँ ग़ायब हो गयी थी पता ही नहीं चला। वैसे भी प्राइवेट नौकरी जो ठहरी अगर पैसा देंगे तो काम तो लेंगे ही। खैर इन सब बातों को अब आरोही ज्यादा दिल से नहीं लगाती थी, क्योंकि घर के हालातों से परेशान व ऑफ़िस मे बॉस के उसके प्रति ना खुश रवैये को देखते हुए पीछे काफी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा था आरोही को, परन्तु इस बार वो ये नौकरी से हाथ नहीं गवाना चाहती थी, क्योंकि घर जो चलाना था, बच्चों का पेट भरना, उनकी स्कूल व ट्यूशन की फीस ,घर का राशन पानी, बिल सबके बोझ तले अकेली ही दबी हुई थी वो इसीलिए बॉस के कुछ भी कहने पर आगे से कुछ नहीं बोलती थी वो, बस माफ़ी मांग अपना काम पूरी लगन से करती व लेट पहुंचने पर भी सारा काम पूरा करके ही निकलती।

खुद के लिए जीना भूल गयी थी आरोही, नहीं जानती थी कि पिछले आठ सालों में कब आखिरी बार खुद को आईने में देख श्रृंगार किया था, कब खुद के लिए अपनी मनपसंदीदा सलवार सूट लिया था, कब आखिरी बार अपने व अपनी खुशी के लिए सोचा था। केवल तीस साल की ही तो थी आरोही लेकिन बालों का सफेद होता रंग व आंखों के नीचे पड़े काले घेरे साफ बयां करते थे उसके जीवन के दुःख व परेशानियों को। आठ साल पहले अजय जिसे अपने सपनों का राजकुमार व खूब प्यार देने वाला समझ अपना हाथ उसके हाथों में थमा चुकी आरोही को कतई अंदाजा ना था कि, ये फैसला उसके जीवन को व उसके उज्ज्वल भविष्य को डूबा देगा।

खूब नाजुकता व प्यार से पली आरोही अपने माता पिता की बेहद लाड़ली थी आखिर बड़ी बेटी जो थी। वो केवल दो बहनें ही थी जो अपने घर को ख़ुशियों से महकाती थी। मासूमियत के साथ साथ थोड़ी ज़िद्दी सी, अपनी मनमर्जी के स्वभाव वाली आरोही को जो चीज़ पसंद आती बस वही चाहिए होती माता पिता के लाड़ प्यार ने भी उसे बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद आरोही ने अपने माता पिता के समक्ष नौकरी करने का प्रस्ताव रखा परंतु उसके माता पिता कतई राज़ी ना थे क्योंकि कहीं ना कहीं वे जानते थे कि जमाना कैसा है व उनकी बेटी इतनी परिपक्व नही है जोकि इस जालसाज़ जमाने के गलत इरादों को भांप सके और वैसे भी जरूरत ही क्या थी उसे नौकरी करने की उसके पिता एक अच्छी सरकारी नौकरी के पद पर थे तो पैसों की कमी का तो कोई सवाल ही नहीं था।

आरोही बाईस वर्ष की होने वाली थी अगले ही माह, काफी रिश्ते आते थे उसके लिए, आते भी क्यों ना आखिरकार आरोही थी ही इतनी सुंदर व अच्छे परिवार से। काफी सोच समझ व जाँच पड़ताल कर अच्छे खानदान में आरोही के रिश्ते की बातचीत की शुरुआत हुई लड़का सबको पसंद आया। अब देरी थी तो आरोही की हाँ की परंतु आरोही के दिमाग में तो नौकरी करने का भूत जो सवार था, वह शादी नहीं करना चाहती थी।माता पिता ने खूब समझाया परंतु आरोही तो किसी की बात सुनने को तैयार ना थी उसकी इसी ज़िद के चलते वो रिश्ता हाथ से निकल गया था। उसके इस स्वभाव को देख उसके माता पिता भी बेहद चिंतित रहने लगे थे क्योंकि उसके इस स्वभाव का गलत असर उनकी दूसरी बेटी पर पड़ना स्वाभाविक जो था, परंतु वो भी क्या करते आखिर बचपन के लाड़ प्यार व हर ज़िद को पूरी करते करते आरोही के इस स्वभाव निर्माण में उन्ही का सबसे पहला हाथ जो ठहरा।

उसकी इस ज़िद के आगे भी उसके माता पिता को घुटने टेकने पड़े थे व आरोही को नौकरी करने की रजामंदी दे चुके थे। आरोही बड़ी खुश थी एक अच्छी कंपनी में एडमिन के पद पर नौकरी पाकर परन्तु नहीं जानती थी कि उसका नौकरी करने का शौक उसके जीवन की राह ही बदल देगा। लगभग एक माह हो बीतने वाला था कि तभी उसकी मुलाकात अजय से हुई ,कल ही तो जॉइनिंग की थी अजय ने आँफिस में वो भी मैनेजर की पोस्ट पर। हट्टा कट्टा शरीर, घुँघराले बाल व सांवले रंग वाले अजय को देखते ही आरोही का दिल उस पर आ बैठा था, अजय के दिल का भी शायद यही आलम था तभी प्यार होना तो स्वाभाविक ठहरा। अब दोनों ऑफ़िस में एक दूसरे से बातचीत करने का बहाना खोजते, धीरे धीरे बाहर मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो चुका था। अजय आरोही को रोज़ ऑफ़िस से घर अपनी गाड़ी में छोड़ने जाता, आरोही के माता पिता इस बात से अंजान थे कि उनके पीठ पीछे उनकी बेटी अजय के साथ अपना भविष्य बिताने को तैयार हो गई थी।

कुछ दिनों के बाद आरोही के माता पिता ने फिर आरोही के रिश्ते की बात करनी शुरू की परंतु इस बार आरोही ने साफ साफ मना कर अजय से विवाह का प्रस्ताव अपने माता पिता के सामने रख दिया था। वो जानती थी कि आज नही तो कल उसके माता पिता को उसकी ज़िद के आगे झुकना ही पड़ेगा। दोनों बच्चों की खुशी के लिए आरोही के माता पिता ने अजय से मिलना चाहा। मिलने पर पता चला कि अजय के माता पिता का काफी सालों पहले देहांत हो चुका था और वो इस शहर में अकेला रहता था। काफी सरल स्वभाव वाला प्रतीत हुआ था अजय उनको, इसीलिए आरोही के माता पिता दोनों की शादी करने के लिए तैयार हो गए थे, क्योंकि बच्चों की खुशी में उनकी खुशी जो थी। शादी कर आरोही अजय के साथ अपना नया घर बसा चुकी थी उसके माता पिता ने भी अपनी हैसियत से आरोही व अजय को काफी कुछ दे दिया था।

शादी को दो महीने हो चुके थे….कुछ दिन सब कुछ ठीक सा चलता रहा, अजय नौकरी करता तो आरोही घर संभालती। धीरे धीरे दिन निकलते गए व अजय का एक नया चेहरा आरोही के सामने आने लगा, ज़रा जरा सी बात पर गुस्सा हो जाना, अपशब्द कहना, क्लेश करना आरोही के समझाने पर उसे ही खरी खोटी सुनाना…आरोही की समझ से सब परे सा था..न जाने कौन सा रूप था यह अजय का। हद तो तब हो गयी थी जब एक दिन अजय ने शराब पीकर आरोही के साथ मारपीट तक कर दी…..कितनी खुश थी आरोही उस दिन जब उसे पता चला था कि वो माँ बनने वाली है और इस बात की खुशी वह सबसे पहले अजय के साथ बाँटना चाहती थी परंतु अजय के इस भयानक रूप ने आज उसकी अंतरात्मा तक को झंझोर दिया था। आज उसे अपनी शादी एक बहुत बड़ी भूल लगने लगी थी, भीगी पलकों के साथ कब आरोही को कब नींद आ गयी थी पता ही नही चला। अगले दिन जब आरोही की नींद खुली तो अजय को सामने पाया, अजय ने आरोही से अपने बीती रात मे किये गए व्यवहार के लिए माफ़ी मांग उसे मना लिया व बहुत खुश हुआ यह जान कि वो बाप बनने वाला है।आरोही ने भी सोचा रात गयी बात गयी आखिरकार वो अजय से प्यार भी तो बेइंतहा करती थी उसको माफ़ करने के अलावा और कोई रास्ता भी तो न था, परन्तु अजय को उसकी इतनी बड़ी ग़लती के लिए माफ़ कर देना आरोही के लिए और समस्या पैदा कर देगी कभी नहीं सोचा था उसने।

धीरे धीरे दिन बीतने लगे और अजय का असली रुप आरोही के सामने आने लगा। आरोही बिल्कुल अकेली सी पड़ गयी थी। जब उसे पता चला वो एक नहीं जुड़वाँ बच्चों की माँ बनने वाली है समझ नही पा रही थी कि वो खुश हो या दुःखी क्योंकि जब जीवनसाथी का साथ ना हो तो हर खुशी बेरंग लगती है। अजय हर रोज़ शराब पी कर आता आरोही को अपशब्द बोल मारपीट कर सो जाता। हद तो तब हो गई जब अजय अपनी नौकरी ही छोड़ कर चला आया मानो कि मुसीबत का एक और पहाड़ टूट पड़ा। एक घर चलाने के लिए पैसे नहीं ऊपर से आरोही की गर्भावस्था। माता पिता भी अब आरोही की स्थिति से अंजान ना थे, उन्होंने आरोही को बहुत समझाया कि अजय को छोड़ने में ही उसकी व उसके होने वाले बच्चों की भलाई है परंतु वह कुछ समझने को तैयार ना थी क्योंकि अब उसका अजय के प्रति प्यार तो खत्म हो गया था परंतु शुरुआत हो गयी थी अपने होने वाले बच्चों के प्रति जिम्मेदारियों की।

कुछ महीनों के बाद आरोही ने एक बेटा और एक बेटी को जन्म दिया उसे लगा कि शायद अब अजय को अपनी जिम्मेदारी का एहसास हो जाएगा परन्तु इस बार भी वो गलत थी। जब भी वो अजय को नौकरी कर कमाने के लिए कहती बस अजय का यह जवाब सुनने को मिल जाता कि “तेरे बाप के पास इतना पैसा है तो सही जो तेरा घर चला सके फिर मुझे नौकरी क्यों करनी है आखिर इसीलिए तो शादी की थी मैंने तुझसे”। बस आरोही यह सब जली कटी बातें सुन और टूट जाती पर कर कुछ ना पाती। बच्चों को भी अभी उसकी जरूरत थी इसीलिए घर चलाने के लिए नौकरी भी कैसे करती व बार बार अपने माता पिता से पैसों की मदद मांगती तो शर्मिंदगी महसूस होती परन्तु करती भी क्या मजबूर जो थी।

दोनो बच्चे छः माह के हो चुके थे…बच्चों की देखरेख, घर का सारा काम अकेले ही तो करती आरोही ऊपर से शराब पीने के लिए पैसे ना मिलने पर अजय की मारपीट भी बर्दाश्त करती। धीरे धीरे अजय ने शराब पीने के लिए घर का सामान भी बेचना शुरू कर दिया था। तभी एक दिन शराब की गंदी लत अजय को ले डूबी, शराब के नशे में धुत्त अजय को कोई ट्रक वाला मार गया जिससे अजय की मृत्यु हो गयी थी। अजय की मौत की खबर सुन आरोही के पैरों तले ज़मीन ही खिसक गयी हो मानो, चाहे जैसा भी था अजय आरोही ने दिल दिया था उसे।

आरोही के जीवन के हर रंग अजय से शादी के बाद बेरंग हो गए थे बस यही कमी थी वो भी पूरी हो गयी थी।कभी सोचा ना था कि इतनी छोटी सी उम्र में आरोही यह सब देख लेगी। बस अब उसके सामने केवल एक ही सोच थी कि किस तरह अपने बच्चों का पालन पोषण किया जाए, कैसे घर चलाया जाए क्योंकि अब वो अपने माता पिता को और तंग व उनपर बोझ नहीं बनना चाहती थी इसीलिए उसने नौकरी करने का फैसला कर लिया था। सुबह बच्चों को उनके नाना नानी के पास छोड़कर वो नौकरी पर जाती व शाम को वापिस अपने घर ले आती। अकेले जिम्मेदारियों के बोझ तले फंस दिक्कतें तो बहुत आती पर समय निकलता जाता।

साल बीतते गए आज दोनो बच्चे बड़े समझदार हो गये हैं स्कूल जाने लगे हैं। कई बार पूछते है कि” माँ हमारे पापा कहा चले गए, क्या हुआ था उन्हें” परंतु आरोही उनके सवालों का जवाब देने मे असमर्थ है। वो खुद नही जानती थी कि उसका एक गलत फैसला उसका पूरा जीवन खराब कर देगा। कितनी नाजुकता से पली बढ़ी थी वो परन्तु किस मोड़ पर उसकी किस्मत ने उसे लाकर खड़ा कर दिया। शिकायत करती भी तो किससे आखिर अपने जीवन का फैसला उसने खुद ही तो लिया था, जिसे सपनों का राजकुमार समझ हाथ थामा था वो तो कुछ और ही निकला, समझ गयी थी कि ये कोई रील लाइफ नहीं बल्कि रियल लाइफ थी जिसमे कुछ भी इतना आसान नहीं था और वह कभी नहीं जानती थी कि ऐसा ग्रहण उसके भाग्य पर लगेगा जो कि उसके जीवन को ही रंगहीन कर देगा।

रिश्ते ज़िद बेरंग

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