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आग और पानी
आग और पानी
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© Ramkumar Singh

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1 एक नींद थी, दो आदमी

 

बिरजू के पिता सवाई सिंह इन दिनों किसी भी वक्‍त जोर से खांसने लगते थे। वे खांसते थे तो यूं लगता था कि वे अब मर जाएंगे। जब वे मर जाएंगे तो बिरजू अनाथ हो जाएगा। अनाथ होने के बाद गुरुजी स्‍कूल से उसे निकाल देंगे। स्‍कूल से निकलने के बाद वह आजाद हो जाएगा। अपनी मर्जी से वह खेलने कूदने लगेगा, जो कि अकसर पिताजी उसे मना किया करते थे। बिरजू मां तो वैसे भी कहती ही रहती है कि वह चैन की जिंदगी उसी दिन से जीना शुरू करेगी, जिस दिन उसका पिता मर जाएगा। आखिर वह ऐसा आदमी है जो उस तरह से सोचता है जैसे गांव के लोग नहीं सोचते। वह एक खब्ती आदमी है और ऐसे खब्ती के जीने से किसी को कोई फायदा नहीं था या वे उनके जिंदा होने से दिखने वाले फायदे को कोई समझ नहीं पा रहा था। पिताजी के मरने से किसी को नुकसान नहीं था या उनके मरने से होने वाले नुकसान को कोई देख नहीं पा रहा था। बात मगर सच थी कि सवाई सिंह इतना जोर से खांसते थे कि आमतौर पर पूरे मोहल्‍ले की नींद हराम हो जाती थी। आस पड़ोस के लोग आ जाते थे। कोई गरम पानी पीने को कहता था, कोई काली मिर्च, अजवायन, सौंठ, हल्‍दी, चाय, धनिया, नमक, लौंग, मैथी समेत गांव के उस मोहल्‍ले में उपलब्‍ध सारी जड़ी बूटियां और सब्जी दाल के मसाले उबालकर ले आते थे और उन्‍हें पिलाते थे। सवाई सिंह फिर भी खांसता रहता था। खांसते खांसते वो बेहाल हो जाता था। उसकी सांस फूल जाती थी। वो छाती के नीचे तकिया लगाकर उल्टा लेट जाता था। अपना मुंह जमीन की तरफ कर लेता था। धरती के गुरुत्वाकर्षण के कारण उनकी गर्दन जमीन की तरफ लटकी रहती थी। जैसे चुंबक को लोहे से रगड़ने के कारण उसमें भी कुछ देर के लिए चुंबकीय असर आ जाता है उसी तरह लगातार गुरुत्वाकर्षण के सीधे संपर्क में रहने के कारण सवाई सिंह के सिर और आंखों वाले हिस्‍से में शायद गुरुत्‍वीय ताकत पैदा हो जाती थी। भोर के समय उधर से यदि किसी की नींद गुजर रही होती थी तो वह गुरुत्वाकर्षण के कारण तेजी से खिंचती हुई सवाई सिंह की आंखों में आ जाती थी। बिरजू हमेशा यह अनुमान लगाने की कोशिश करता था कि जब पूरी रात पिताजी जाग सकते हैं तो उन्‍हें इतनी सुबह नींद क्‍यों आ जाती है? उसका शक मंदिर के पुजारी की नींद पर था। इधर, पिताजी को नींद आती थी और उधर उसके घर के सामने ही माता रानी मंदिर के माइक में सुबह की आरतियां बजनी शुरू हो जाती थी। होता यूं होगा कि पुजारी की नींद जब सुबह सुबह पुजारी को छोड़कर लौट रही होती होगी, उसी समय पिताजी के गुरुत्वाकर्षण की चपेट में आ जाती होगी। पुजारी रात को सोता भी विलंब से था और उसकी आंख भी जल्‍दी खुल जाती थी। पिताजी सोते जल्‍दी सुबह थे और उठने में उनको काफी विलंब हो जाता था। होता यूं होगा कि नींद पिताजी की आंखों से निकलकर अपने घर पहुंचती होगी तो उसके घरवाले उसे सुबह देर से घर पहुंचने के कारण रात को जल्‍दी वापस नहीं आने देते होंगे। नींद अकेली थी। उसका उपभोग मंदिर का पुजारी और मेरे पिताजी बारी बारी करते थे। यह बात पूरे गांव में‍ सिर्फ बिरजू जानता था। क्‍योंकि उसके पिताजी जब खांसते थे तो पूरे मोहल्‍ले की आंख खुल जाती थी लेकिन पुजारी सोता रहता था। जब मंदिर का माइक बजता था, तो पूरा मोहल्ला जाग जाता था और पिताजी सोते ही रहते थे।

लोग कहते थे, बिरजू के पिता नास्तिक हैं। ईश्‍वर की माया में भरोसा नहीं करते थे। इसीलिए वे मर जाएंगे। लोग यह कभी नहीं कहते थे कि उनके पिता आस्तिक हैं, वे ईश्‍वर और उसकी माया में भरोसा करते हैं, लेकिन फिर भी जिंदा बचेंगे नहीं। लोग वो सब कुछ कहते थे जो वो कहना चाहते थे। लोग ऐसा कुछ नहीं कहते थे जो बिरजू सुनना चाहता था।

 

2 मंदिर छोटे से बड़ा हो गया था

 

इतिहास की दीवार से झांकने पर वह एक थाना नजर आता था। जब देश गुलाम था तो इस गांव में अंग्रेजों की एक चौकी थी। वह यहीं थी। इसमें लोग कैद रहा करते थे। जब देश आजाद हो गया था तो गांववालों ने कहा कि अब उन्‍हें थाने की जरूरत नहीं है। सवाई सिंह कहने लगा कि अब पूरा देश ही थाना हो गया है। पहले देश गुलाम था तो एक उम्‍मीद थी कि एक दिन आजाद हो जाएंगे। अब गुलामी खत्‍म हो गई तो उम्‍मीद भी खत्‍म हो गई कि हम एक दिन आजाद हो जाएंगे। पूरे देश के थाना बन जाने के बाद अब यह गांव उसमें बनी एक कोठरी है। गांव वालों ने कहा, अब उनके पास छुपाने को कुछ बचा नहीं इसलिए थाना हटा लिया जाना चाहिए। अब उनकी अपराध करने की इच्‍छा भी मर चुकी है, इसलिए थाना हटा लिया जाना चाहिए। थाना हटा लिया गया था। कोई वहां घर बनाने को तैयार नहीं हुआ। वह उजाड़ सा हो गया था। लोगों को लगता था गांव के बीचोंबीच कुछ उजाड़ नहीं होना चाहिए। उजाड़ होने से बच्‍चे डर जाएंगे। बच्‍चे डर जाएंगे तो भूत प्रेतों को मौका मिलेगा। गांव के बीचोंबीच ऐसी मौके की जमीन की तलाश में भूत प्रेत भी रहते ही होंगे। इन दिनों गांव में बेमौसम बरसात हो जाया करती थी। बेमौसम तक ठीक था लेकिन जब एक तरफ बारिश हो रही होती थी तो दूसरी तरफ सूरज चमाचम चमक रहा होता था। पुजारी ने कह ही दिया था कि जब भी बारिश के साथ सूरज भी आसमान में चमक रहा है तो समझ लो भूतों के सावों के दिन हैं। भूत भूतनियां शादी कर रहे हैं। वे शादी कर रहे हैं तो उनकी संतानें भी होंगी। संतानें होंगी तो गांव में उनका आवागमन बढ़ जाएगा। गांव में उनके लिए कोई जगह सूनी तो छोड़नी ही नहीं चाहिए। पता नहीं कब कोई भूत उसी थाने की इमारत में अपने बेटे बहू को शादी के बाद अलग से बसा दे। सवाइ सिंह पुजारी का इस बात के लिए हमेशा मजाक बनाता था कि यह पुजारी एक दिन इस गांव को उल्‍लू बनाएगा। इस पुजारी से इस गांव को बचाया जाना चाहिए। हालांकि दोनों एक ही नींद बारी बारी से लिया करते थे लेकिन उनके खयालों में यह अंतर चौंकाने वाला होता था। पुजारी कहता था कि यह दमे की बीमारी उसे परमात्मा ने सजा के तौर पर दी है। पुजारी के पास लंबा व्‍याख्‍या होता था कि जैसे भोजन के बिना हम तीन महीने जी सकते हैं, पानी के बिना तीन दिन लेकिन सांस के बिना तो तीन मिनट भी जीना नामुमकिन हो जाएगा। उसने कहना शुरू किया कि सवाई सिंह को ठीक से सांस नहीं लेने देने की सजा परमात्मा ने दी है।

 

पुजारी अब तक पुजारी नहीं था। वह एक आम आदमी था। लेकिन अपने घर के एक कोने में उसने माता रानी का एक छोटा मंदिर बनाया था। पूजा पाठ करते रहने के कारण उसका नाम पुजारी हो गया था। असल में उसका नाम हेमराज था लेकिन अब सब लोग उसे पुजारी ही कहने लगे थे। उसके एक बीवी थी, जिसे वह प्‍यार कम करता था, उस पर चिल्लाता ज्‍यादा था। हालांकि वह जब चिल्लाकर थक जाता था तो उसे पता चल जाता था कि वह बेवजह चिल्‍ला रहा था। उसके चिल्लाने से उसकी बीवी पर रत्ती भर भी असर नहीं होता था। बल्कि वह तो खुश ही दिखती थी। शायद वह मान चुकी थी, एक दिन ज्‍यादा चिल्लाने से उसके पति की मृत्‍यु हो जाएगी और तब वो आगे की जिंदगी सुकून से बिता पाएगी। लेकिन एक दिन पुजारी ने अपनी पत्‍नी पर चिल्लाना छोड़ दिया था। उसकी बीवी को यह समझ नहीं आया। वह पूछने की हिम्‍मत भी नहीं कर पाई। बहुत लोगों ने बाद में यह अनुमान लगाया था कि किसी दिन उसने एक सपना देख लिया था। सपने में उसे माता रानी ने कोई धमकी दे दी थी। उस दिन से वह सुबह शाम अपनी बीवी से बड़े प्रेम से बात करने लगा। इसी प्रेम के कारण उनको एक बेटा हो गया था और दिन महीने बरस बीतने पर वह बड़ा हो गया था।

बड़े होते बेटे पर पुजारी को कई तरह के शक थे। जैसे वह उसकी जेब से बिना पूछे पैसे चुरा लेता है। जैसे वह स्‍कूल में ना जाकर अपने दोस्‍तों के साथ इधर उधर ही खेलता रहता है। एक शक यह भी था कि उनका बेटा बीड़ी पीता है। उसने मोहल्‍ले के बच्‍चों को बात करते हुए सुना था कि एक मात्र दुर्गादत्‍त ही है जो बीड़ी पीकर बिना खांसी लिए नाक से धुआं निकाल सकता है। मन ही मन अपने बेटे की इस खूबी पर पुजारी खुश हुआ था। उसने हरबंस की दुकान से एक बीड़ी खरीदी और घर आकर चुपके से सुलगाकर धुआं अंदर निगलकर मुंह बंद करके नाक से वापस हवा निकालने लगा लेकिन इससे पहले ही जोर से खांसी आ गई। दो तीन बार उसने ऐसा किया लेकिन हर बार धुंए के साथ खांसी भी आ जाती थी।

बेटा बड़ा था और उसे कहना बेकार था कि बीड़ी पीने से नुकसान हो जाता है। बात यह नहीं थी। उसके कहने से भी बेटा उसका कहना मान जाएगा इसमें शक था। अच्‍छा यही है कि वह यह मान रहा है कि पुजारी उसका बाप है।

सर्दियों की रात थी। पुजारी को नींद नहीं आ रही थी। उस दिन सवाई सिंह को खांसी नहीं आ रही थी। उनको नींद आ गई थी। थोड़ी देर बाद पुजारी ऊंघ रहा था और सवाई सिंह कुनमुना रहा था। नींद शायद दोनों के बीच कहीं उलझ गई थी। वह थोड़ी देर पुजारी की तरफ जाती थी ओर थोड़ी देर में भाग कर सवाई सिंह की तरफ। पुजारी दिन में बीड़ी पी चुका था इसलिए उसे बीच बीच में खांसी भी आ जाती थी। सवाई सिंह ने आज वक्‍त पर दवाई ले ली थी तो खांसी नहीं आ रही थी। नींद शायद ऐसा चाहती थी कि सवाई सिंह को खांसी शुरू हो जाए और वह पुजारी के यहां चली जाए। उस दिन नींद सवाई और पुजारी के बीच दौड़ते हुए हांफ गई थी। सवाई सिंह ने दवाई के साथ बकरी का दूध थोड़ा ज्‍यादा पी लिया था। उसका पेशाब करने का मन हो रहा था, लेकिन नींद के कारण उठने का मन नहीं हो रहा था। वह हल्के से होश में आता और उनका मन पेशाब को उठने का होता। फिर नींद आ जाती, उसे लगता था कि वह सोते हुए ही पेशाब कर दे तो अच्‍छा होगा। उठना नहीं पड़ेगा। पुजारी खांसी के थमने का इंतजार कर रहा था। वह चाहता था, नींद आ जाए। नींद को पता चल गया कि सवाई को पेशाब जोर से लगी है। वह तुरंत उसकी आंखों से निकलकर पुजारी के यहां चली गई। नींद के कूदने की वजह से सवाई की आंख खुली ही रह गई। पेशाब की थैली उफनने वाली थी कि वह घर के पीछे की तरफ पेशाब करने चले गया।

पुजारी की खांसी थम गई थी। नींद आ गई थी।

सवाई वापस लौटा तब तक हल्की खांसी शुरू हो गई थी। वह सोने की कोशिश कर रहा था। नींद को लगा अब सवाई की तरफ आना चाहिए। पुजारी चौंक कर उठा। वह जोर जोर से दुर्गादत्‍त के कमरे का दरवाजा खटखटा रहा था। पूरे कमरे में धुआं भर गया था। सवाई ने पुजारी की आवाज सुनी तो उसके घर की तरफ दौड़ा। पहला मौका था जब पुजारी और सवाई एक साथ रात को जाग रहे थे। दुर्गादत्‍त के कमरे में आग लग गई थी।

सवाई और पुजारी आग बुझाने में लगे। शोर शराबे में दुर्गादत्‍त की मां भी जाग गई। दूसरे लोग भी आ गए।

हुआ क्‍या था? सवाल था। हुआ यह था कि रात को छुपकर दुर्गादत्‍त बीड़ी पी रहा था। अचानक उसे नींद आ गई। उसे पता नहीं चला कि एक छोटी सी चिनगारी उसकी रजाई में गिर गई थी। उसने धीरे धीरे सुलगकर आग पकड़ ली। कमरे में धुंए और नींद की वजह से दुर्गादत्‍त को पता ही नहीं चला। वह मदद को चिल्लाया भी नहीं। उसे जरूरत ही महसूस नहीं हुई।

पता कैसे चला? जैसा कि पुजारी ने बताया, पता ऐसे चला कि सपना आया था। सपने में माता रानी आई और पुजारी से कहा कि तेरा बेटा जल रहा है। बीड़ी पीते हुए जल रहा है। वह चौंक कर उठा और उठा तो उसने पाया कि बात सच थी।

नींद को लगता था अब सुबह तक इन दोनों को सोने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वह चुपचाप अपने घर की तरफ निकल ली। रात भर लोग इसे दुर्गादत्‍त के बचने को चमत्कार की तरह लेते रहे और सुबह होने तक माता रानी का आसन थाने वाली जमीन पर लगा दिया गया। उसी दिन से वहां माइक लग गया था और आरतियां गूंजने लगी थी, जय माता की। सवाई सिंह ने कहा, यह पुजारी ने छोटे मंदिर को बड़ा मंदिर करने बनाने के लिए पूरी कहानी बनाई है लेकिन गांव के ज्‍यादातर लोग धीरे धीरे पुजारी की तरफ होने लगे। मंदिर के लिए चंदे की उगाही होने लगी।

 

3 कुत्‍ता कहीं का, आया था एक दिन

कुत्‍ता काटने के लिए पुजारी के पीछे दौड़ा था। पुजारी को पता था कि अंतत: कुत्‍ता उसे काट ही लेगा लेकिन फिर भी वह दौड़ता रहा। शायद वह यह देखना चाहता था कि वह कितना दौड़ सकता है। कुत्‍ता भी जानता था कि पुजारी में कितना दम है। वह अंतत: पुजारी को काट ही लेगा। दौड़ते हुए पुजारी हांफ गया। हांफने के बाद वह थम गया। कुत्‍ता भी हांफ गया था। पुजारी डर गया था। कुत्‍ता गुस्‍से से लाल हो रहा था। उसे गुस्सा इसलिए भी ज्‍यादा आया कि सब कुछ जानते बूझते पुजारी ने उसे नाहक दौड़ाया। अगर पुजारी सीधे सीधे रुक जाता तो वह सिर्फ एक जगह से काटकर उसे छोड़ सकता था, लेकिन अब चूंकि कुत्‍ता बहुत भाग चुका था। अब वह विजेता था तो उसने पहले पुजारी को एक पिंडली में काटा। पुजारी तो समर्पण कर ही चुका था। कुत्‍ते ने कोई दया दिखाए बिना दूसरी पिंडली पर भी अपने दांत गड़ा दिए और फिर चला गया। वह बोल पाता तो पुजारी से कहता कि अगर तुम भागते नहीं तो सिर्फ एक ही पिंडली पर कटवाने से काम चल जाता।

पुजारी की पिंडलियों में लाल मिर्च भर दी गई। जैसा कि लोग मानते थे कि लाल मिर्च भरने की वजह से घाव जल्‍द ठीक हो ना हो, कुत्‍ते के काटने से होने वाली पागलपन की बीमारी ठीक हो जाती है। पुजारी को जो पीड़ा कुत्‍ते के काटने से नहीं हुई,उससे कई गुना ज्‍यादा तकलीफ लाल मिर्च ने दी।

पुजारी बच गया था, उसे पागलपन जैसी बीमारी नहीं हुई, वरना वह कहीं का नहीं रहता। शायद यह बात ऐसे भी सच है कि पागलपन की बीमारी पुजारी के लगने से बच गई था, वरना पुजारी के लगने के बाद वह उस तरह की पागलपन की बीमारी नहीं रहती जिस तरह की बीमारी वह पुजारी के लगने से पहले थी।

जरूरी नहीं कि जो आदमी पूजा करता है, उसे झूठ बोलना नहीं आता हो। या जो झूठ बोलता हो उसे पूजा करनी नहीं आती। पुजारी के साथ ऐसा ही था। उसने कहा था कि ये कुत्‍ता जरूर कोई बुरी आत्‍मा वंशज रहा होगा। जिनकी जमीन पर कब्‍जा करके उसने मंदिर बनाने की पहल की थी, वो अपना घर छिनने से परेशान रही हो और उस आत्‍मा ने उससे बदला लिया हो। वरना पूरे गांव में उसने पुजारी को ही क्‍यों काटा ?

जरूरी नहीं कि पूजा करने से हर आदमी का मन पवित्र हो जाता हो। या जिसका मन पूरी तरह पवित्र हो उसमें बदला लेने की भावना नहीं आती हो। पुजारी के मन में कुत्‍ते के प्रति बदला लेने की भावना आ गई।

बदला लेने की भावना के बाद पुजारी को नींद कम आने लगी, वह रात को बदला लेने के भाव से खांसता रहता था। इसका सीधा फायदा सवाई सिंह को हुआ, उसको खांसी कम आने लगी और नींद ज्‍यादा।

7 और जब सब ठीक चल रहा था तो गांव में शिकारी आ गए।

 

होली के दिन रहे होंगे जब उस बरस मंगेज का डेरा गांव के नजदीक आया था। इन गांवों में ये अद्भुत मस्‍ती के दिन हुआ करते हैं। होली से पहले ही कई दिनों तक नाचते रहने का अपना सुख होता है। सर्दियों के बाद कुनमुनाते से बसंत के दिन आते हैं। पेड़ों पर फूल खिलते हैं। खेजडि़यों पर मिमझर, सरेस के फूल और आस पास कोई पेड़ ऐसा नहीं जिसकी कोपलें ना फूट रही हों। उसकी महक सबको मदहोश कर देने वाली होती थी और फिर झाड़ी की जड़ों से निकाली गई देसी मदिरा का नशा। नगाड़े की थाप। इतने सारे जुनून और जहर एक साथ मिलते थे कि बसंत के इन महीनों में वे नहीं रहते जो वे हुआ करते थे।

वो शाम ऐसी ही थी। वो जो परदेसी थे, कमाने गए थे, घर लौट आए थे। वो जो कुछ सैनिक थे ओर सरहदों पर थे, अपनी पत्नियों के पास आ गए थे। शाम की गींदड़ थी जिसमें आपको भेस बदलना था जिसे स्‍वांग कहते थे। सबसे कामयाब स्‍वांग वही था जिसे कोई दूसरा लाख कोशिश करने के बाद भी पहचान ना पाए। इसके लिए स्‍वांग अपनी पत्नियों के कपड़े पहन लिया करते थे। कोई मूंछ लगा लिया करता था। कुछ पगड़ी लगाके मुंह पर सफेदी पोत लिया करते थे। कोई लुहार बन जाता था। कोई कुम्‍हार बना होता था। कुछ गांव वाले तो अपनी आवाज तक बदल लेते थे। यह पहचानना मुश्किल होता था कि असल में जो लुहार है, वह लुहार है भी नहीं। जो हकीम दिख रहा है, वह हकीम है भी नहीं। हां, लेकिन कई पुरुष औरतों के भेस में इसलिए पकड़े जाते थे कि उनकी मूंछें होती थी। लेकिन सवाई को पकड़ना बहुत मुश्किल होता था। वह उस खेल में तुरुप का पता होता था। वह रूप बदलने में माहिर था। गांव के मनचलों को पकड़वाने वाला तुरुप का पत्ता। वह जंगल में बंधे उस बकरे की तरह था, जिसके भरम में शेर यह भूल जाता था कि सामने मचान पर शिकारी उस पर बंदूक ताने बैठा है। बिरजू ही होता था जो हर बार ऐसी नवयौवना का भेस बदल कर गांव के मनचलों को निमंत्रण देती अभिसारिका बन जाता था। ज्योंही मनचले उस पर लपकते थे, वे चारों तरफ से घिर जाते थे और उनका मजाक उड़ाया जाता था। गांव के युवाओं का मनोबल इतना गिरा हुआ था कि कभी कोई लड़की भी यदि कोई इशारा कर रही होती थी तो उनकी हिम्‍मत नहीं होती थी कि वे जाकर हाथ थाम लें। क्‍या पता उस इश्किया नकाब के पीछे सवाई ही निकले? उस रात गांव के पंचायत भवन की पास अंधेरे में सवाई के फैलाए जाल में अमरा राम फंस गया था। गांव के लोगों ने उसे चारों तरफ से घेर ही लिया था कि अचानक दूर से गोली चलने की आवाज आई- धांय! एक अधूरी सी चीख, जो गांव के लिए एकदम नई थी लेकिन बुजुर्गों ने अंदाजा लगाना शुरू किया। सबके चेहरे की हवाइयां उड़ने लगी। गोली शिकारियों के डेरे की तरफ से चली थी। बुजुर्गों ने उस आवाज से अनुमान लगाया कि हो न हो किसी मोर का शिकार हुआ है। इतना सुनना था कि जश्‍न की वह रात मातम में बदली। मातम से कहीं ज्‍यादा गुस्सा और आक्रोश। गांव के लोग लाठियां लेकर गोली की आवाज की दिशा में दौड़ पड़े। मोरों का चिल्लाना बढ़ गया था। जवानों को पहुंचते देर ना लगी। सवाई था तो लड़की के भेस में लेकिन सबसे आगे। उसने देखा कि गांव के बाहर पीपल के नीचे दो तीन लोग अपनी झोली में कुछ डाल रहे हैं। हाथ की लालटेन से देखा तो मंगेज सिंह का चेहरा नजर आया। उसके हाथ में बंदूक थी।

गांव वालों के पहुंचते ही मंगेज सिंह अपने दोनों सा‍‍थियों के साथ घिर गया था।

गांव वालों को देखकर उसने बंदूक तान दी थी।

‘कोई भी आगे बढा तो मैं गोली चला दूंगा।’ मंगेज सिंह चिल्लाया।

‘एक तो चोरी और ऊपर से सीना जोरी’ सवाई सिंह दहाड़ते हुए मंगेजसिंह की बंदूक की परवाह किए बगैर लपके ही था कि दो गांव वालों ने उन्‍हें थाम लिया। लेकिन वे कहां रुकने वाले थे। वे मानते थे कि हिम्‍मत की कीमत होती है। हमेशा की तरह उन्‍होंने लाठी उठाई और मंगेज सिंह के सामने अड़ गए। बात यह थी कि पहला वार कौन करे। मंगेज सिंह शातिर शिकारी था। वह जानता था कि यदि यहां उसने गोली चलाई तो गांव वाले उसे जिंदा नहीं छोड़ेंगे और बंदूक के बूते पर उनको डरा धमका कर भाग भी जाए तो शायद कानून उसे पकड़ लेगा। बंदूकों में भी डर तब तक ही रहता है, जब लोग उसे बंदूक समझते हैं। बंदूक होने और बंदूक को इस्‍तेमाल करने के फर्क को लोग समझने लग जाते हैं तो बंदूक बस एक लोहे का डंडा भर रह जाती है। सवाई सिंह के लिए बंदूक इस समय लोहे का डंडा भर थी। उन्‍होंने चुनौती दी,

‘मंगेज, दम है तो चलाओ गोली।’

‘पहले तुम लाठी चलाओ, मेरी गोली तुम्‍हारा सीना चीर देगी’

तमाशा बड़ा हो गया था। मोर की लाश पड़ी थी। पहला वार कौन करे इस पर ही बहस हो गई थी। गांव वाले सन्न थे। मंगेज के पास बंदूक थी और गांव वालों के पास सिर्फ लाठियां। आखिरकार सवाई सिंह ने मंगेज सिंह को मोर की हत्‍या का अपराधी मानते हुए पहला वार किया। इस वार ने गांव वालों के समूह को हिम्‍मत दी। इससे पहले कि मंगेज सिंह अपनी दुनाली का घोड़ा दबाता, गांव वाले जान की परवाह किए बिना उस पर टूट पड़े। उसे बंदी बनाया। उसकी बंदूक छीन ली। जिसके हाथ में बंदूक आई उसने उन्माद में हवा की तरह बंदूक की नाली की और बची हुई एक गोली दाग दी।

‘धांय’ जोर से एक और आवाज हुई और यही संकेत शिकारियों के डेरे को अनिष्ट की सूचना के लिए पर्याप्त था। मंगेज के कबीले के लोग जानते थे कि इतने कम अंतर से आज तक मंगेज को गोली चलाने की जरूरत नहीं पड़ी थी। वह गोलियों का इस्‍तेमाल किफायत और हुनर के साथ करता था। आज तक वह निशाना नहीं चूका था।

पहले ही निशाने में शिकार उसके कदमों में होता था। इसलिए ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि उसने लगातार एक ही रात में दो शिकार किए हों।

लगातार दो गोलियों को मतलब उनकी नजर में अनहोनी ही होना था। शिकारियों के डेरे से मंगेज सिंह की पत्‍नी, उसका बेटा चंगेज और देवर मूल सिंह के साथ डेरे के सब लोग गोली चलने की दिशा में दौड़ पड़े।

जहां होली के जश्‍न का नाच चल रहा था, वहां अब ढोल की जगह मंगेज को बिठा दिया गया।

‘इसने मोर की हत्‍या की है। निरीह निर्दोष जानवर की।’ भीड़ में कुछ ने कहा ‘इसे तब तक पीटा जाना चाहिए कि जब तक कि यह मर नहीं जाए।’

भीड़ के सुर में सुर मिलते देर नहीं लगती। मंगेज सिंह इस उन्मादी भीड़ को देखकर कांप गया था। उसे लगने लगा कि उसे उसी समय गोली चलाकर गांव वालों को डराकर भाग लेना चाहिए था।

बिरजू ने देखा कि जब गांव वाले यह तय कर चुके थे कि मंगेज को पीटते हुए मारना चाहिए उसी समय उसके पिता सवाई सिंह सामने आए थे और उन्‍होंने कहा था, 'यह गलत होगा। देवता हमसे हमसे नाराज होंगे। मंगेज को उसके पाप की सजा समय देगा। हम नहीं। इसे गांव छोड़कर चले जाना चाहिए और कभी लौटकर नहीं आना चाहिए।'

ये समय वो था जब गांव में बुजुर्गों की राय को कभी अनसुना नहीं किया जा सकता था। सब लोग जानते थे इस गांव को बसने से लेकर यहां तक ले आने में यही लोग हैं जो अपने अनुभवों से जीवन के व्याकरण के नियम बना रहे हैं। यही लोग थे जिन्‍होंने गांव से थाने को हटवा दिया था वरना आज गांव में पुलिस होती और मंगेज को मारने या रिहा करने का फैसला वे लोग नहीं कर सकते थे।

शिकारियों के डेरे के लोग तब तक वहां पहुंच चुके थे। उन्‍होंने मंगेज की हालत देखी तो सहम गए। वह बुलंद शिकारी‍ जिसके हाथ में बंदूक होती थी तो सब कांपते थे आज गांव वालों से घिरा हुआ असहाय बैठा था। उसके चेहरे पर खौफ था। उसने यह मान लिया था कि आज गांव वाले उसको जान से मार देंगे लेकिन ज्योंही उसने अपने डेरे के लोगों को देखा उसकी हिम्‍मत लौट आई।

गांव वालों ने तय किया कि मंगेज को छोड़ा दिया जाए। उसकी बंदूक भी उसे लौटाई जाए। वादा लिया जाए कि वह कभी मोर की हत्‍या नहीं करेगा। मंगेज अपनी जान बचाने के लिए उनकी हर शर्त मानने को राजी था, हालांकि भीतर ही भीतर वह गांव वालों के हाथों हुए अपमान को भूल नहीं पा रहा था। बदला लेना चाहता था। खासकर सवाई सिंह को वह नहीं भूल रहा था जिसकी वजह से उसे गांव छोड़ना पड़ रहा था। उसने तय कर लिया था किए दिन सवाई सिंह को वह इसी तरह अपमानित कर गांव से निकलवाएगा तभी उसका बदला पूरा होगा।

 

6 शिकारी लौटकर भी वापस नहीं लौटता। मुंह पर लगा खून टपकता है और अपने निशान छोड़ता हुआ चलता है। वह शिकारी को लौटने को रास्‍ता बताता है।

गांव के जानवर इन दिनों खेतों में सुरक्षित नहीं थे। खासकर बकरियां और भेड़ें अकसर जख्मी होकर घर आती थी। कुछ तो अपने जान से हाथ धो बैठी थीं। कुत्‍तों को एक बुरी लत लग गई थी कि वे निरीह और कमजोर दिखती बकरी या भेड़ पर हमला कर देते थे। हुआ यह होगा कि पुजारी की पिंडली चखने के बाद उसे कुत्‍ते ने अपनी बिरादरी में बताया होगा कि खून में एक अजीब नशा होता है। ऐसा नशा जो आपको अपनी ताकत का अहसास दिलाता है। हुआ यह होगा कि उस एक कुत्‍ते की बातों में आकर बहुत से और कुत्‍ते बहक गए होंगे। बहके हुए कुत्‍ते इंसान से भी ज्‍यादा खतरनाक हो जाते हैं। बहके हुए इंसान कुत्‍तों से भी ज्‍यादा गए गुजरे हो जाते हैं।

गांव के जानवरों को बचाना जरूरी था। अब गांव के लोगों को कुत्‍तों के मरवाने के अलावा कोई चारा नहीं दिखता था।

यूं तो यह प्राकृतिक न्‍याय सा दिखता था जिसका हवाला देकर कहा जाने लगा था कि एक बड़े पेड़ के गिरने से हलचल होती है। उससे आस पास के प्राणियों की शामत आनी ही होती है। यह भी कहा जाने लगा था कि क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। जानवरों में और आदमियों में भेद खत्‍म होने जैसा आभास होने लगा था।

मंगेज सिंह का काफिला गांव से गुजर रहा था। आठ दस गधे, उन पर लदे बोरों में भरा घर और तंबू का सामान, उस पर रखी चारपाइयां। गांव के पास आते आते गोचर जमीन के एक टीले पर उसने डेरे का अड्डा तय किया। सब थम गए थे। आठ दस लोगों की टोली, दस बारह औरतें और जवान लड़कियां, पांच सात किशोर और चार पांच शिशु। गधों से बोरे उतार लिए गए थे। गांव की हवा में एक अजीब सा सन्नाटा था। पुश पक्षी ही नहीं गांव के बच्‍चे अकसर उन यायावर शिकारी जातियों से डरते थे जो कभी कभार गांव के पड़ोस में सूनी पड़ी गोचर जमीन पर अपने डेरे लगा लिया करते थे। वे अलग से लोग होते थे। गांव के लोगों से लंबे। हाथों में बांस की लंबी लाठी के अगले हिस्‍से में एक लोहे की एक नुकीला सा औजार फंसा होता था, जिससे वह लाठी लगभग एक भाले का काम करने लगती थी। कुछ लोगों के पास धनुष बाण होता था जिसे वे खुद ही तैयार करते थे। पेड़ पर बैठे परिंदे को निशाना साधकर शिकार कर लेना उनका प्रिय शगल था उनकी धोती घुटनों से ऊपर होती थी। उनके पैरों की नसें तनी हुई सी दिखती थीं। उनके कान छिदे हुए और लगातार धूप में घूमते रहने की वजह से उनका रंग भी काला होता था। इनके छोटे बच्‍चे भी उनके साथ उनके ही भेस में शिकार करने घूमते थे। उनकी आवाज गांव के लोगों के थोड़ी अलग होती थी लेकिन गांव वाले उनकी आवाज को पहचान लेते थे। उनकी शिकार करने की अदा को लेकर पूरे गांव में एक चर्चा अकसर रहती थी। यह कहा जाता था कि मोर इनका सबसे प्रिय शिकार है। वे बड़े चाव से इसे खाते थे। गांव वाले यह मानते थे कि मोर को भी यह पता है कि वो इन शिकारियों की नजर में हैं। एक बार उनकी छाया अगर शिकार पर पड़ गई तो वह निढाल हो जाता था। उसमें इतना भी साहस नहीं होता था कि वह हिल डुलकर अपनी जान बचाने का उपक्रम कर सके। माना जाता था कि उनके गले में एक डोरी होती थी। डोरी में एक मूर्ति लटकी होती थी। वह माता की मूर्ति होती थी। यह शिकारियों की कुलदेवी थीं। शिकारियों को इसी माता का वरदान है कि वे अपना पेट पालने के लिए शिकार करें। इसी माता के प्रताप से यह मुमकिन था कि चाहे जानवर चाहे कितना ही खूंखार हो, जिस पर उनकी छाया पड़ जाती थी, वह शक्ति विहीन हो जाता था। इस ताकत को हवाला देने के लिए उनके पास वानर राज बाली का उदाहरण उनके सामने था कि जो भी योद्धा उसके सामने युद्ध करने को ललकारता था, उसके सामने आते ही उसका आधा बल बाली में आ जाता था। बाली को हराना नामुमकिन था। इसीलिए बाली को मारने के लिए भगवान राम को शिकारी की तरह पेड़ की ओट से उसे मारना पड़ा और इस तरह शिकारी कई बार खुद को धनुर्धारी राम की तरह भी मानने लगते थे।

शिकारी जिस गांव में डेरा लगाते थे, मोर बोलना भूल जाते थे। वे डर से थर कांपते थे। वे उड़ना भूल जाते थे। मोर ही क्‍यों, लगभग सारे ही परिंदे इस आतंक के साये में होते थे। तोते सुबह की सैर टाल देते थे। कबूतर दुबक जाते थे। बस कौवे थे कि बेखौफ उड़ते थे। शिकारी कौवे का शिकार नहीं करते थे।

बरसों बाद गांव में एक बार फिर शिकारी आ गए थे। इस बार शिकारियों का आना अनायास नहीं था। मंगेज सिंह को बाकायदा न्‍यौता देकर बुलाया गया था। उसके पास बंदूक थी और तगड़ा निशानेबाज शिकारी था। कोई पांच साल पहले उसे गांव से मारपीट कर निकाला गया था। उसके बाद उसने कसम खाई थी कि वह कभी दुबारा उस गांव में नहीं लौटेगा। मोर को मारे जाने की घटना के बाद वह गांव में फिर बुला लिया गया था। सब कुछ उसकी मर्जी के मुताबिक होने लगा था। इस बार वह बदला लेने आया था।

 

7 बाहर से वे गुफाएं दिखती थीं लेकिन उनमें घर थे। गांव के बच्‍चे इन्‍हें घूरे कहते थे। घूरों में कुत्‍तों के नन्हें बच्‍चे पलते थे। बिरजू और उसके दोस्‍त इन्‍हीं घूरों में दिनभर पड़े रहते थे। नई ब्‍याई हुई कुति‍याएं खतरनाक होती थीं लेकिन बिरजू ने उनके साथ दोस्‍ती कर ली थी। कुति‍याओं के लगने लगा कि‍ बच्‍चे उनके लिए खतरनाक नहीं है तो उन्‍होंने भी उन्‍हें घूरों तक आने की छूट दी वे अपने पिल्लों को बिरजू और उसके दोस्‍तों के साथ खेलने देती। लेकिन एक दिन कोहराम मचा। कुत्‍तों के कबीले में मोरों के झुंड से खबर आई थी कि‍ गांव में मंगेज सिंह लौट आया है और उसके हाथ में वहीं हत्यारी बंदूक है। उसके गले में वही माता की मूर्ति है जिसके पहनने के बाद शिकारी की छाया पड़ते ही शिकार असहाय हो जाता है और मंगेज उसे मार देता है।

गांव वालों ने मनुहार के बाद मंगेज को बुलाया था कि वहीं उन्‍हें बचा सकता है। उसको पैसा देना तय हुआ था। मंगेज की चाल कामयाब हुई थी। गांव की मर चुकी बकरियां अब गवाही नहीं दे सकती थीं और घायल बकरियों ने अपनी बिरादरी में साफ साफ कह दिया था कि उन पर खेतों पर जो हमले हो रहे हैं, वे कुत्‍ते अपने गांव के हैं ही नहीं। हमारे गांव के कुत्‍तों को ऐसी जरूरत ही नहीं है कि हम पर हमला करें बल्कि एकाध बार तो ऐसा हुआ है कि हमारे कुत्‍तों ने हमें बचाने की कोशिश की है। असल में वे सब मंगेज के डेरे के छोड़े गए शिकारी कुत्‍ते थे। जानवरों की बस्ती तो सचेत थी कि गांव में अनर्थ की शुरूआत हो चुकी है। शिकारी अपने मकसद में कामयाब हो चुका है। जुबान की

अपनी सीमाएं होती हैं। गांव के मवेशी अपने मालिकों से बात नहीं कर सकते थे लेकिन वे समझ रहे थे कि इंसानों के भीतर जानवरों से बदला लेने की भावना आ चुकी थी और जानवरों ने यह तय किया था कि मंगेज सिंह को हराया जाए, हालांकि वे जानते थे कि जिसके हाथ में बंदूक हो और आप एकदम निहत्थे तो नतीजा लड़ाई से पहले ही दिख जाता है।

मंगेज सिंह अगली सुबह गांव के बाहरी हिस्‍से में बनी पाठशाला की छत पर बैठा, वहां से कुएं की खेळी नजर आती थी। गर्मियों के दिन थे। स्‍कूल की छुट्टियां शुरू हो चुकीं थी। मंगेज सिंह घात लगाकर बैठा था। कोई आधे घंटे के इंतजार के बाद उसे एक कुतिया और कुत्‍ता आते हुए दिखाई दिए। वे सचेत थे लेकिन मंगेज सिंह के छुपे होने की जगह उन्‍हें दिखी नहीं। वे पानी पीने आए थे। दोनों ने ही अपने अगले पंजे खेळी के ऊपर लगाए और जीभ निकालकर पर लपड़ लपड़ पानी खींचना शुरू किया। मंगेज सिंह ने निशाना साधा और आवाज आई- धांय।

कुत्‍ता वहीं रह गया उसका मुंह पानी में डूबा रह गया। दूसरी कुतिया थी उसने खतरा तुरंत भांपा। पानी पीना बीच में छोड़कर भागना शुरू किया अपनी पूरी ताकत के साथ। उसके पैर चीते की तरह हो गए थे। आगे के पैर बहुत आगे तक और पीछे के पैर अपने पूरे उठान के साथ। वह जमीन से कोई तीन फुट ऊपर उठती हुई दौड़ रही थी। उसे यकीन था कि बस एक और लंबी कूद उसे दीवार की ओट में ले जाएगी और वह मंगेज सिंह को चकमा दे देगी।

लेकिन उसी वक्‍त दूसरी आवाज आई- धांय। गोली पेट में जाकर लगी थी। कुतिया

तीन फुट ऊपर हवा में थी। अगर एक सैकंड की चूक होती तो वह दीवार की ओट में होती लेकिन वह हवा से ही लड़खड़ाकर गिरी और दम तोड़ दिया।

बिरजू अपनी बकरियों को पानी पिलाने निकला था और उसने यह दृश्‍य देख लिया। वह वहीं बेहोश होकर गिर गया। उसे सदमा बंदूक की गोली चलने से लगा था लेकिन उससे बड़ी बात यह थी कि इनमें वह कुतिया भी थी जिसने अभी अभी बच्‍चे जन्मे थे। उसके पिल्लों के साथ वह कल शाम ही खेलकर आया था। हां, यह वही थी। भूरी कुतिया और उसका दोस्‍त यह चितकबरा कुत्‍ता। इसे क्‍यों मार दिया? इतना सोचने से पहले ही बिरजू वहीं गिर गया।

किसी ने बिरजू को उठाया। उसे घर ले जाया गया। उसके मुंह पर पानी के छींटे मारे गए। सवाई सिंह ने देखा कि उनका बेटा बुखार से तप रहा है। बिरजू बड़बड़ा रहा था कि अब कोई नहीं बचेगा। सब मरेंगे। एक एक करके सब मरेंगे। सवाई सिंह समझ गया कि गांव में बुरे दिन शुरु हो चुके हैं। उस रात से सवाई सिंह की नींद उड़ गई। पुजारी को अब बेखौफ नींद आने लगी थी। वह खुश था कि गांव में अब कोई कुत्‍ता बचेगा नहीं।

पूरे गांव में चर्चा शुरू हो गई थी कि मंगेज सिंह ने कुत्‍तों को मारने को अपना काम शुरु कर दिया है। गांव ने बुजुर्गों की सुननी बंद कर दी थी। युवा और अधेड़ गृहस्‍थों ने तय ही सारे फैसले लिए थे और उस रात बुजुर्गों ने ऐलान किया था कि वे कुत्‍तों की हत्‍या के अभियान के खिलाफ हैं। वह कुत्‍ता ही तो था जो महाभारत की पूरी मार काट के बाद धर्मराज युधिष्ठिर के पीछे पीछे चला गया था। वह प्रतीक था, गांव में धर्म के बचे रहने का। इंसानियत के बचे रहने का। जब कुत्‍ता ही नहीं है तो इंसान और जानवर के बीच भेद करने की परंपरा ही खत्‍म हो जाएगी। बुजुर्गों ने कह दिया था कि इसके नतीजे अच्‍छे नहीं होंगे।

सवाई सिंह बुजुर्गों के इस धड़े की तरफ था और वह एकमात्र अधेड़ था जो गांव में कुत्‍तों की हत्‍या के खिलाफ खड़ा हो गया था। बुजुर्गों ने उसे अपने दल का नेता बना लिया था और दूसरी तरफ पुजारी था जिसने सुनियोजित तरीके से कुत्‍तों की हत्‍या का षड्यंत्र रचा था और पैसा इकट्ठा कर मंगेज सिंह को देना तय किया था। उसने यह भी तय किया था कि जब गांव से पूरी तरफ कुत्‍तों का सफाया हो जाएगा जो एक बड़ा हवन किया जाएगा। माता रानी की पूजा की जाएगी। माता रानी का आभार व्‍यक्‍त किया जाएगा कि उसने बुरी आत्माओं से इस गांव को बचा लिया है।

सवाई सिंह लगातार कह रहा था कि गांव में कुत्‍तों की हत्याएं हुईं तो बुरी आत्माएं लौट आएंगी। कुत्‍ते तो हमारे अपने हैं। बुरी आत्माएं इन शरीफ जानवरों की मौजूदगी से डरती हैं। रात को वे गांव के पहरेदार की तरह काम करते हैं। वे उन्‍हें देख सकते हैं। वे उन्‍हें देखकर भौंक सकते हैं। इनके भौंकने मात्र से बुरी आत्माओं की हिम्‍मत नहीं होती कि वे गांव में घुस पाएं। कोई नया देवता हमारे गांव को नहीं बचाएगा। हमें अपने कुत्‍तों की रक्षा करनी चाहिए, वरना गांव का देवता नाराज होगा। गांव पर कहर टूटेगा।

इस बहस के बावजूद मंगेज सिंह ने अपना काम जारी रखा। खेत में घूमते, गांव में टहलते, सोए हुए, जागते हुए किसी भी कुत्‍ते को उसने नहीं छोड़ा। चौपाल पर उसके निशानेबाज होने की चर्चाएं आम थीं। किसी तरह बैठे हुए कुत्‍ते को मारना उसे अच्‍छा नहीं लगता। वह शिकारी है और उसे चुनौती दिए बिना किसी की भी हत्‍या करना अच्‍छा नहीं लगता। कुत्‍ता दौड़ने लगे, अपनी जान बचाने के लिए और तेज दौड़ने लगे तो वह गोली चलाता था और गोली सीधे लगती थी।

गांव के सब कुत्‍ते मर चुके हैं, जब पंचायत ने यह ऐलान किया तो अपनी घूरी के भीतर छुपी एकमात्र बची कुतिया को राहत की सांस मिली। गांव के लच्‍छा कुम्‍हार के घर उसका आना जाना था ओर लच्‍छा की बीवी उसे खिलाती पिलाती थी लेकिन पूरा गांव एक कुत्‍तों के खून का प्यासा था तो लच्‍छा ने भी इशारा किया कि वह अपने लिए कोई सुरक्षित जगह देख ले। अगले दिन के बाद वह कुतिया गांव में नजर नहीं आई। लच्‍छा कुम्‍हार ने मान लिया कि वह गांव छोड़कर चली गई है।

 

मंगेज सिंह के डेरे पर जश्‍न था। पूरे गांव से अनाज की बोरियां भरकर वे लौट रहे थे। मंगेज सिंह की कुटिल मुस्कान यह साबित करने के लिए काफी थी कि उसने गांव की आत्‍मा पर हमला किया था। जिस अच्छाई की वजह से गांव वाले एक थे, उसी कड़ी को तोड़कर उसने पूरे गांव को कुत्‍तों की हत्‍या का अपराधी बना दिया था। खुद मंगेज सिंह को जरा भी अपराध बोध नहीं था। गांव वालों ने उसका अपमान किया था, उसने पूरे गांव को असहाय कर दिया था। उसने मान लिया था कि देवता अब उस गांव पर कभी खुश नहीं होंगे।

 

8

गर्मियों के दिन चरम पर थे। आसमान से सीधे आग बरस रही थी और अब उम्‍मीद की जा रही थी कि बारिश के देवता की मेहर हो तो राहत मिले। आषाढ़ लग गया था और आसमान में इक्के दुक्के सफेद बादल भी इतराते दिखते थे लेकिन कुछ ही पलों में गायब हो जाते थे। आषाढ़ बीतने तक जब आसमान में हर साल होने वाली हलचल शुरू नहीं हुई गांव के लोगों को चिंता हुई कि अगर मेह के देवता की मेहरबानी नहीं हुई तो सब कुछ तबाह हो जाएगा। खेत सूख जाएंगे। मिनख तो जैसे तैसे गुजारा कर लेंगे लेकिन जानवरों के खाने के का चारा क्‍या होगा? सवाई सिंह का तो पूरा दारोमदार ही खेती बाड़ी और बकरियों और भेड़ों के पालने पर टिका था।

सावन लग गया लेकिन गांव के आसमान में बादल नहीं आते। बुरा तो यह हो रहा था कि पड़ोस के गांवों में झमाझम बारिश हो रही थी। फसलें लहलहाने लगी थीं और इधर एक बूंद पानी नहीं और तब गांव के बुजुर्गों ने कहना शुरू किया कि गांव के बेगुनाह कुत्‍तों को मारने की सजा मेह का देवता दे रहा है। अब कभी इस गांव में पानी नहीं बरसेगा।

सवाई सिंह ने अपने पूरे कुनबे को तैयार किया और तय किया कि वे अगले तीन महीने के लिए गांव छोड़ जाएंगे। जिस गांव में इतने मूढ और अपने ही पुरखों की अनदेखी करने वाले लोग हैं, वहां बारिश का देवता कभी आएगा नहीं। ऐसा कोई कारण भी नहीं था कि वह गांव में ठहरता। जानवरों के चारे का कोठा खाली हो चला था। उसके पास यही उपाय था कि या तो कसाई के यहां जाकर अपनी भेड़ों और बकरियों का सौदा कर दे या फिर जैसे तैसे करके अकाल का यह बरस निकाल दे। सब जानते थे कि कोई बीसेक किलोमीटर दूर बीहड़ में जानवरों के लिए खासा हरा घास मिल जाएगा। अपनी मां के साथ ननिहाल जाते में अकसर वह उसी बीहड़ से गुजरता था। हां, जंगली जानवरों से मवेशियों को बचाए रखने के लिए ध्‍यान रखना पड़ता था। उसने तय कर लिया था कि वह अपने उन जानवरों को भूखों नहीं मरने देगा।

 

आसन्न अकाल देखकर पुजारी ने ऐलान किया कि माता रानी का आह्वान करना होगा ताकि गांव में बारिश हो। यज्ञ करना होगा। शुद्ध घी से हवन करना होगा। उसी से जो इस गांव की हवा शुद्ध होगी और इसी हवा को सूंघते हुए बारिश के देवता खुश हो जाएंगे। वे बादलों से कहेंगे कि हमारे गांव में आकर बरसें। मौसम बारिशों का है और मुमकिन है इसी दौरान आ जाए तो उसकी सत्ता और मंदिर पर उसका कब्‍जा दोनों और पुख्‍ता हो जाएंगे। वह अपने खिलाफ हर विरोध को कुचल देना चाहता था।

गांव में चंदा मांगने का काम शुरु हुआ। सवाई सिंह ने चंदा नहीं दिया। लोगों ने उसे म्‍लेच्‍छ कहा और कहा, ऐसे ही पापियों और ईश्‍वर से नहीं डरने वाले लोगों की वजह से ही गांव में ऐसे हालात पैदा हुए हैं। जब पूरा गांव चंदा दे रहा था और सवाई सिंह ने मना किया तो गांव वालों की पंचायत हुई और कहा गया कि यही एक आदमी है जिसकी वजह से हम पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है। इसे जात बाहर किया जाना चाहिए। इसे गांव में रहने दिया जाए लेकिन कोई इससे बात नहीं करेगा। कोई इसके खेत में काम नहीं करेगा। कोई इसे अपने घर शादी ब्‍याह में नहीं बुलाएगा।

तेज चलती आंधियां, बादलों के इक्के दुक्के सफेद चादरें आसमान में तैरते थे लेकिन पूरे गांव में एक अजीब सी मनहूसियत को निवास हो गया था। परिंदों तक ने धीरे धीरे गांव से पलायन किया और आस पड़ोस में बारिशों वाले खेतों के पेड़ों पर अपना डेरा जमाया।

जब अपने घर में निर्वासित सवाई सिंह को कोई दुख नहीं था लेकिन उस दिन उसे बेहद तकलीफ हुई जब मोहल्‍ले के बच्‍चों ने भी बिरजू के साथ खेलने से मना कर दिया। बिरजू की मां बेहद उदास थी। शाम को सवाई जब खाना खाने को बैठा तो बिरजू की मां ने उससे कहा, 'बिरजू भी अकेला पड़ गया है। वो बच्‍चा है, इतना नहीं समझता। वह पूछता है, बापू से क्‍या गलती हो गई?'

सवाई को बात समझ में आ रही थी। वह जानता था कि हर कातिल के हाथ पर खून के दाग नहीं होते। जो लोग इस समय एक पूरे गांव की हत्‍या की साजिश में शामिल हैं उन्‍हें नहीं पता कि वे खुद क्‍या कर रहे हैं। अपने ही गांव के जानवरों को मरवाते हुए, अब मंदिर बनाकर अपने प्रायश्चित से सारे पाप धो लेना चाहते हैं लेकिन इससे कुछ हासिल होने वाला नहीं है। उसकी नींद गायब हो गई थी। वह सोना चाहता था लेकिन नींद नहीं आती थी। जब कभी आंख लगती तो उसे डरावने ख्वाब बेचैन कर देते थे। चारों तरफ आग और उसके भीतर असहाय वह अपने परिवार के साथ। उसे लगता जैसे पूरा गांव ही शमशान में तब्‍दील हो गया है। उसने तय किया कि बिरजू के लिए वो गांव छोड़ देगा।

और एक दिन सवाई सिंह ने तय किया रात ढलने के साथ ही वह गांव छोड़ देगा। उसने दिन में अपनी ऊंट गाड़ी में अपना सामान बांध लिया था और बिरजू और उसकी मां रात को उसे रवाना होना था।

अंधेरा ढल रहा था। माता रानी के मंदिर में आरती की घंटियां बज रही थीं। परिंदे पेड़ों पर आखिरी चर्चाओं में मशगूल थे और उनका शोर आ रहा था। आमतौर पर ऐसा होता नहीं था कि रात को गांव छोड़ा जाए लेकिन सवाई सिंह गांव वालों की हिकारत और अपने पराजय बोध से बचना चाहता था। उसने अपने मवेशियों को आगे किया। मवेशी और ऊंट उस अजीब सी आधी काली और आधी चांदनी रात में मन मारकर आगे बढ रहे थे।

सवाई सिंह का घर गांव के एक सिरे पर था और उधर से सीधे निकलने में उसे बिना गांव को पार किए निकलने की सहूलियत थी। किसी को कानोंकान खबर नहीं हुई कि सवाई सिंह गांव छोड़कर जा रहा है।

सवाई सिंह के दिल पर चट्टान सा बोझ था। बिरजू और उसकी मां अमरी का तो मन भी नहीं था। अमरी तब से ही उसे कह रही थी जब सवाई ने पहली बार गांव छोड़कर जाने की बात की थी। अपने पुरखों की जमीन को ऐसी ही छोड़कर जाया जाता है। जो एक बार अपनी जमीन छूट गई, गांव छूट गया तो पता नहीं कब और कहां बसेरा हो। दूसरी जमीन पर अपने पैर जमाने में बरसों लग जात हैं।

पैर जैसे धंस रहे थे। ऊंट और मवेशी भी मन मारकर आगे बढ रहे थे। दुविधा तो सवाई सिंह के मन में भी थी लेकिन उसे पता था कि इस गांव में जब उसकी कोई सुनने वाला नहीं है, और तो और बिरजू के साथ खेलने वाले बच्‍चे नहीं हैं, तो अब यहां रहने का क्‍या फायदा ?

सवाई सिंह ने गांव की कांकड़ के जोहड़े में उसे कोई हलचल दिखाई दी। जोहड़े के बारे में कई किस्‍से थे कि जब मंदिर से भूतों को खदेड़ा गया था तो वे जोहड़ में आकर बस गए थे। इतनी रात को कौन आएगा? वो साया करीब आता गया। यूं आभास हुआ जैसे कोई औरत आ रही है।

सवाई सिंह चौंक गया। इतनी रात और अकेली औरत? ऐसा कभी होता नहीं गांव में कि इतनी रात अकेली औरत सुनसान खेतों में आए। हो न हो कोई टोने टोटके वाली गांव की महिला होगी। बिरजू अपनी मां अमरी की गोद में दुबक गया। उसकी इच्‍छा ही नहीं हो रही थी कि वह देखे।

साया और करीब हुआ तो तय हो गया कि वह कोई औरत है। सवाई बिना डरे उसके सामने जाकर खड़ा हो गया। वह कोई अनजान औरत थी। एकदम बुजुर्ग सी। उसके चेहरा भाव विहीन था। सवाई ने हिम्‍मत करके पूछा,

'कौण गांव से आई हो। कौण गांव जा री हो, रात बहोत है, डर नहीं लागै थानै।'

'थानै जद गांव छोड़ता डर नहीं लागै, तो म्‍हानै म्‍हारे गांव जांवता क्‍यों लागै।'

'थारो गांव? बिरा‍णियो थारो गांव तो कोनी।'

'मैं बिराणिया को पवितर करणै आई हूं, 'जान की खैर चावौ तो सीधा चालो। मन हो तो सुबह लौट के गांव आ जाणा, पण आज की रात कांकड़ पहुंचणे से पहले मुड़ के देखा तो सिर फट जाएगा तेरा। कांकड़ बाद मुड़ के देखेगा तो सिर में अकल आ जाएगी कि गांव म्‍हारो है कि थारो।'

यह कहते हुए औरत की आंखों में एक अजीब सा डरावना भाव सवाई ने देखा। वह समझ गया कि यह औरत मामूली नहीं है। पर है कौन यह उलझन बनी रही। औरत उसके अगले सवाल से पहले ही आगे बढ गई। सवाई ने बिरजू और अमरी को कह दिया कि कांकड़ से पहले मुड़कर नहीं देखें। कांकड़ तक पहुंचने में सवाई सोचता रहा कि यह कौन है, कोई प्रेत? इस गांव की भटकी आत्‍मा, माता रानी, वो गर्भवती कुतिया या कोई और? कौन होगी जिसका गांव बिराणिया है?

कांकड़ पहुंचकर सवाई सिंह गांव की ओर मुड़ा तो उसकी आंखें खुली की खुली रह गई। वह भीतर तक हिल गया।

गांव धू धू कर जल रहा था। लपटें आसमान छू रहीं थीं। कोहराम की आवाजें आने लगी थीं। सवाई सिर पकड़कर बैठ गया। उससे रुलाई नहीं फूट रही थी। वह अजीब सी बेहोशी के आलम में घिरणे लगा। डेरा वहीं थमा। बिरजू और अमरी भी बेहोशी में चले गए।

तीनों की आंख खुली तो आसमान में घनघोर बादल थे। झमाझम बारिश शुरू हो गई थी।

उसी बारिश में गांव के सब लोग भीग रहे थे। आग में सिर्फ घर जले थे। लोग बच गए थे। लच्‍छा कुम्‍हार के कच्चे घड़े उसी आग में पक गए थे और बारिश की टप टप के बीच उसे कुछ कूं कूं जैसी आवाजें सुनाईं दीं। उसने जाकर देखा। एक तपती हुई सी मटकी में पांच पिल्ले कुनमुना रहे थे। उसने सहलाकर बाहर निकाला।

सवाई सिंह अपने गांव की तरफ वापस लौट रहा था।

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