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पाती प्यार भरी
पाती प्यार भरी
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© Shradha Pandey

Romance

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सौम्या दादी के पास बैठ कर पालक साफ कर रही थी। हर थोड़ी देर में उसका फोन टी॰ टी॰ कर बता दे रहा था कि संदेश आया है। हर बार दादी आँखों में गुस्सा दिखाते हुए उसे देख लिया करती थीं। कई बार उसका मन किया कि न देखे पर मन फोन में ही लगा था। कल ही तो सागर गया था। पूरी रात सागर को याद करते हुए जागती रही। सुबह थोड़ी सी नींद आई़। उठते ही उसने फोन देखा कि सागर का कोई संदेश तो नहीं है फिर उसे याद आया कि सागर तो अभी सो रहा होगा। उसे देर से उठने की आदत है। अब जब सागर उठा और फोन पर संदेश भेज रहा है तो वह कैसे न देखे ? उसके उचटे हुए मन पर सागर के ‘लव यू’ या ‘मिस यू’ लिखे हुए संदेश मरहम का काम कर रहे थे।

बार-बार की टी॰ टी॰ से परेशान होकर दादी ने कहा-क्या ज़माना आ गया है। अभी कल गया और आज सुबह उठते ही टी॰ टी॰ शुरू हो गया। जरा भी चैन नहीं आजकल के बच्चों को। एक हमारा ज़माना था पति की चिट्ठी की प्रतीक्षा में दिन सप्ताह कैसे बीतते थे ? उस इंतज़ार में जो प्यार था वह आजकल के बच्चों को क्या पता ? आजकल तो लव यू, किस यू, मिस यू का ज़माना आ गया है। संदेश भी लिखते हैं तो भी आधे अघूरे। एक तरफ लव यू कहते रहते हैं दूसरी तरफ छोटी-छोटी बातों पर लड़ते रहते हैं।

-ऐसा नहीं है दादी।

-मुझे न समझा, जितनी तेरी उम्र नहीं उससे ज़्यादा मेरा अनुभव है। जा जाकर सागर से बात कर ले। उसे भी चैन मिल जाए और तुझे भी।

अगले महीने आॅफिस के किसी काम के बहाने सागर दिल्ली से कानपुर आ गया। लगभग एक सप्ताह रह कर जब सागर जाने लगा तो सौम्या ने उसके कंधे पर सिर रखते हुए कहा-सागर ! तुम दिल्ली पहुँच कर मुझे चिट्ठी लिखोगे ?

-तुम्हारा दिमाग तो ठीक है न। इस नेट के ज़माने में कौन चिट्ठियाँ लिखता है ? और फिर मैं क्यों यह जहमत पालूँ ?

-मेरे लिए प्लीज़। मैं इंतजा़र के पलों कों जीना चाहती हूँ। लोग कहते हैं कि चिट्ठियों में जुड़ाव होता था। कई-कई बार पढ़ने के बाद भी जी नहीं भरता था। मैं वह सब कुछ अनुभव करना चाहती हूँ। और चिट्ठी को बार-बार पढ़ कर तुम्हारी दूरी को कम करना चाहती हूँ।

नई-नवेली दुल्हन की माँग को ठुकरा पाना सागर क्या, किसी के वश में नहीं होता है अतः सागर ने हामी भरी और पीछा छुड़ा कर सामान रखने लगा। सामान जब गाड़ी में रखा जा चुका तो पानी के बहाने वह अंदर आया और गिलास लेते हुए सौम्या का हाथ धीरे से दबा दिया। सौम्या शरमा गई। पानी पी कर जाते-जाते सागर ने शरारत भरे अंदाज़ में अपनी एक आँख दबा दी तो सौम्या ने भी इशारे ही इशारे में चिट्ठी लिखने की बात कह दी।

तीसरे दिन आॅफिस में जाकर सौम्या ने मेल चेक किया। मेल में ज़्यादातर मेल सागर के ही थे जो वह पिछले एक महीने से भेज रहा था। उसने मेल अपने मोबाइल पर ही पढ़ लिया था अतः कोई पढ़ न ले यह सोच कर सभी को सलेक्ट करके डिलीट करने ही वाली थी कि हाथ रुक गए। एक-एक करके उसने सभी मेल दुबारा पढ़ा फिर सोचा इन्हें आॅफिस के मेल से अलग कर लूँगी ताकि किसी के हाथ में न पड़ जाएँ। पूरे दिन काम में ऐसी व्यस्त रही कि कुछ भी सोचने का समय ही नहीं मिला। घर जाते समय न जाने क्यों मन अनमना सा था। क्यों ? नहीं पता पर अनमना था। घर पहुँचते ही मन व्यग्र हो गया। उसे सागर पर गुस्सा आ रहा था, सोचा, यदि कल सागर ने पत्र कोरियर से भेज दिया होता तो आज जरूर मिल जाता पर ये सागर सच में बहुत ही लापरवाह है।

द्वार पर घंटी बजी, वह चैंक गई और तेज़ कदमों से यह सोच कर द्वार खोल दिया कि शायद कोरियर वाला देर से इधर आया हो। दरवाजे़ पर बगल वाली चाची जी को देख कर उसके मुँह से निकल गया-ओह आप ? नमस्ते चाची जी। आइए।

-क्यों, क्या तुझे किसी और का इंतजा़र था ?

-नहीं बस ऐसे ही-ऐसा कह कर वह अपनी सासू माँ को बुलाने चली गई।

दूसरे दिन वह जैसे ही घर पहुँची, टेबल पर लिफाफा देख कर खुश हो गई। खोला तो पता चला सोसायटी से आया था। झुँझला कर कमरे में कपड़े बदलने चली गई फिर आकर चाय बना कर दादी, मम्मी के साथ पी रही थी कि दरवाज़े पर घंटी बजी। वह उठना चाह कर भी नहीं उठी कि क्या पता फिर अगल-बगल से कोई आया हो।

मम्मी ने दरवाजा़ खोला। साइन किया फिर लिफाफे को देखकर शरारत भरे अंदाज़ में बोलीं-यह किसका पत्र आया है ? लिफाफा तो महक रहा है। सौम्या चैंक उठी। दौड़ कर मम्मी के हाथ से पत्र ले लिया और धड़कते दिल से अपने कमरे में चली गई। सचमुच उसने अपने दिल पर हाथ रखा तो अनुभव हुआ कि घड़कन तेज़ हो गई थी। जल्दी से पत्र खोला और पढ़ने बैठ गई-

मेरी जान सौम्या !

सौम्या के गाल लाल हो गए। ऐसा लगा कि सागर गए नहीं, वहीं हैं और कानों में धीरे से ‘जान’ कहा और वह शर्म से लाल-लाल हो गई।

लेट कर पत्र पढ़ने लगी-कल जब मैं घर से चला तो पूरे रास्ते मुझे तुम ही तुम याद आती रही। ऐसा लग रहा था कि तुम मेरे साथ ही हो। तुम्हें याद करते-करते लंबा सफर भी आसानी से कट गया। जानती हो परसों आधी रात को जब घर पहुँचा, सोचा अभी पत्र लिख कर कल सुबह ही कोरियर कर दूँगा ताकि तुम्हें शाम तक ही मिल जाए फिर सोचा कि अपनी जान को पत्र लिखना है तो पत्र भी सुंदर होना चाहिए। देखो कितना संुदर लेटर पैड लाया हूँ।

तुम्हें पत्र लिखते समय मुझे ऐसा लग रहा है कि तुम मुझसे दूर नहीं मेरे पास ही बैठी हो। मैं तुम्हें महसूस कर सकता हूँ। सच पत्र लिखना और मेल लिखना दो अलग-अलग अनुभव हैं। अच्छा हुआ तुमने मुझसे पत्र लिखने को कहा। अब हम जल्दी-जल्दी एक दूसरे को पत्र लिखा करेंगे चाहे दो लाइन लिखें या दो पेज़। यदि किसी कारण से किसी को पत्र मिलने में देरी हो जाए तो प्रतीक्षा करने की जगह यह सिलसिला बनाए रखेंगे। कल मुझे साइट पर जाना है अतः परसों पत्र लिखूँगा, ईश्वर ने चाहा तो तब तक तुम्हारा भी पत्र आ जाएगा।

तुम्हारे पत्र की प्रतीक्षा में

तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा सागर

सौम्या ने पत्र को कई बार पढा। खाना बना कर खिला-पिला कर जब सोने गई तब फिर से पत्र निकाला और तब तक पढती रही जब तक उसे नींद नहीं आ गई। पहले सोचा पत्र लिखूँ फिर सोचा नहीं-नहीं मैं किसी साधारण पेज़ पर पत्र नहीं लिखूँगी। सागर क्या सोचेंगे। कल एक नया पैड खरीद कर उस पर ही लिखूँगी और देर से पत्र लिखने का कोई अच्छा सा बहाना बना दूँगी

सुबह उठी तो पत्र का असर वह अपने मन-मस्तिष्क पर महसूस कर रही थी। आॅफिस में भी कई बार चोरी-चोरी पत्र पढ़ा। हर बार पढ़ने पर अपने अंदर एक नई स्फूर्ति महसूस की।

शाम को खाना बनाने में मन नहीं लग रहा था। कई बार मम्मी ने टोका भी कि कहाँ है तेरा ध्यान ? हर बार वह हँस कर ‘कुछ नहीं’ कह कर टाल देती। रात होते ही बैठ गई पत्र लिखने-

मेरे सिर्फ मेरे सागर

मैंने अब तक अनगिनत बार तुम्हारा पत्र पढ़ डाला और हर बार ‘मेरी जान’ पढ़ कर ऐसे शरमाती हूँ जैसे पहली बार पढ़ रही हूँ। जिस दिन तुम गए, मैं पूरी रात सो नहीं पाई और अब तुम्हारा पत्र पढ़ कर उसे अपने तकिए के नीचे रख कर ऐसे सो जाती हूँ जैसे वह पत्र न हो, तुम्हारी बाँहेें हो और मैं उस पर सो रही हूँ। सच पत्र की प्रतीक्षा और उसके मिलने की खुशी की कोई बराबरी नहीं है। आॅफिस में भी जब समय मिलता है घीरे से पर्स में से चुपचाप पत्र निकाल कर पढ़ लेती हूँ फिर ऐसा जोश व उत्साह छा जाता है जैसे मैं तुमसे मिल कर आई हूँ।

मैं तो मम्मी पापा व दादी के साथ रह रही हूँ। सभी मेरा बहुत ख्याल रखते हैं पर तुम अकेले हो, अपना ख्याल रखना और यह सोच कर रखना कि तुम मेरे लिए हो। अपना ख्याल रख रहे हो मतलब मेरा ख्याल रख रहे हो। तुम्हें पता है रात के एक बज रहे हैं। पहले मैंने आॅफिस के लिए प्रजेन्टेशन बनाया और फिर पत्र लिखने बैठ गई। मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं पत्र नहीं लिख रही हूँ बल्कि तुमसे बातें कर रही हूँ। अब सोने जा रही हूँ-गुड नाइट।

तुम्हारी और सिर्फ तुम्हारी

सौम्या।

अगली बार जब सागर घर आया तो सारे पत्र लेता आया। दोनों ने एक दूसरे के पत्रों को दुबारा पढ़ा। सौम्या ने धीरे से सागर के कंधों पर अपना सिर रख दिया सागर ने उसके सिर को सहलाते हुए कहा-धन्यवाद सौम्या।

-किसलिए ?

-प्यार के ऐसे मीठे अहसास के लिए।

सौम्या ने सागर का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा-हम सारी जिंदगी ऐसे ही प्यार भरी पाती लिखते रहेंगे।

हाँ बिलकुल, ऐसा कह कर सागर ने सौम्या का माथा चूम लिया।

Love Couple Letters

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