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क़द्र
क़द्र
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© Dipak Mashal

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प्रमुख रूप से चित्रकारी, मूर्तिकला और मीनाकारी वगैरह को समर्पित पेरिस स्थित ओर्सी अजायबघर में घूमते हुऐ उन महाशय ने अपने साथी को हमराज बनाते हुऐ बताया।
 
 
- यार मेरे तो घर वाले बहुत बेवकूफ हैं, तुम्हें मालूम है जब मैं छोटा था तो घर में कई सारी पुरातत्व महत्व की चीज़ें जमा थीं।
 
 
- रियली! लेकिन तुम्हारे घर में कहाँ से आईं।
 
 
मित्र आश्चर्यचकित था।
 
 
- हाँ, मैं एकदम पक्का तो नहीं जानता लेकिन शायद मेरे किसी दादा-परदादा को ऐसी चीज़ें सँजोने का शौक़ था। काफ़ी पुराना हाथी दाँत का नक्काशीदार बेंत, कई तरह के पुराने सिक्के, एक कोई पुरानी पेंटिंग और मूर्तियाँ वगैरह…… मैं उस वक़्त बहुत छोटा था और उन वस्तुओं का महत्व नहीं समझता था।
 
 
- हम्म… 
 
 
- फिर जब मैं अमरीका पढ़ने आया और ऐसे म्यूजियम देखे तब इनका महत्व समझा, सोचा कि अब की बार घर जाकर देखूँगा क्या-क्या जमा है। लेकिन जब छुट्टियों में घर गया तो पता चला कि किसी ने उन सामानों की क़दर न जानी, सब कौड़ियों के भाव बेच दिया।
 
 
- ओह! बुरा हुआ, उन्हें समझ नहीं रही होगी।
 
 
साथी ने सांत्वना का हाथ उसके कन्धे पर धरते हुऐ कहा। पहला वाला अपनी ही रौ में बोले जा रहा था। 
 
 
- अरे अच्छी क़ीमत मिलती अगर कहीं म्यूजियम वालों या इनके संग्रहकर्ता को बेचते या नीलाम करते। 
 
 
- आखिर तुम भी तो उसकी क़ीमत ही लगाते न दोस्त, क़द्र कहाँ करते!! गौर से एक ख़ूबसूरत कलाकृति देखते हुऐ दोस्त फुसफुसाया।  

क़द्र

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