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बेटी
बेटी
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© Devendraa Kumar

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शहर के सबसे बड़े अस्पताल में इस समय हड़कंप मचा हुआ था। अस्पताल की विशाल इमारत के सामने राजनैतिक दल, महिला मोर्चा और अस्पताल में भर्ती धनाड्य और समाज में अच्छी रसूख रखने वाले परिवार की बहू को डिलेवरी के लिए भर्ती किया गया था। सो बहू के मायके और ससुराल पक्ष के सभी लोग अस्पताल स्टाफ से बहस कर रहे थे। बहस धीरे-धीरे झगड़े का रुप लेने लगी थी। अस्पताल बहुत ही महंगा था। सभी रोगों के विशेषज्ञ इस अस्पताल में कार्यरत थे। अस्पताल के प्रबन्धक, मालिक के सामने सेठ हरदयाल क्रोधित मुद्रा में खड़े चीख रहे थे।

''कहां है हमारे खानदान का वारिस? किसे बेच दिया? कहाँ गायब कर दिया। मैं आपके इस चिकित्सीय व्यापार को बन्द करवा दूंगा। आप जानते नहीं मुझे।''

अस्पताल के मालिक, प्रबन्धक, प्रधान डॉक्टर सर्वेश सक्सेना ने करोड़ो की लागत से चिकित्सा का व्यवसाय शुरू किया था। उनके इस विशाल एयरकंडीशन अस्पताल में पहले भी कई तरह की अफवाहें उड़ चुकी थी। लेकिन वे सारी अफवाहें हवा होकर इसलिए रफा-दफा हो गई क्योंकि दूसरे नर्सिंग होम्स और सरकारी अस्पताल से गरीब मध्यम वर्ग की किडनी, आँखे निकालकर यहाँ लाई गई थी और बड़े लोगों के शरीर में लगाई गई थी करोड़ों लेकर। लेकिन इस दफा मामला दूसरा था। इस निजी अस्पताल में कोई गरीब और मध्यम वर्गीय आदमी तो आने की हिम्मत ही नहीं कर सकता था। सब धनकुबेर, व्यापारी, राजनैतिक, प्रशासनिक क्षेत्र के उच्चतम लोग ही आते थे। इस बार सेठ हरदयाल की बहू को लड़का हुआ था और थी लड़की।

सर्वेश सक्सेना ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा – ''सेठ साहब आप लोगों के लिए हम क्या-क्या नहीं करते। क्या आपके साथ धोखा करेगें। यकीन मानिये लड़की ही हुई थी। नर्स ने गलती से फार्म में लड़का लिख दिया है।"

''मैं कुछ नहीं सुनना चाहता। मेरे खानदान में आज तक लड़की पैदा नहीं हुई। मेरे चारों लड़कों के यहाँ दो-दो लड़के हुए हैं। खुद मेरे पिता के चार लड़के थे। क्या आप हमारी वंश परम्परा को झुठला देंगे। लड़के होना हमारे खानदान के जीन में है। हमें हमारा बच्चा वापिस करो और जिसकी लड़की है, उसे वापिस करो।''

''मैं अभी नर्स को बुलवाता हूँ।" सर्वेश सक्सेना के पास रखी घंटी बजाई। चपरासी दौड़कर अन्दर आया। उसे देखकर सर्वेश सक्सेना ने कहा- ''कौन सी नर्स थी डिलेवरी वार्ड में। तुरन्त भेजो," पल भर में नर्स प्रगट हुई। डरी-सहमी घबराई सी।

''तुमनें डिलेवरी करवाई थी।''

''यस सर''

''क्या हुआ था?''

''जी, बेटी''

''फिर फार्म में बेटा क्यों लिखा?''

''सर गलती से''

हरदयाल चीख पड़े। "गलती से नहीं हुआ कुछ भी। तुमनें सही लिखा है फार्म में। ये बताओ कितने रुपये मिले तुम्हें बच्चे को दूसरे को देकर लड़की रखने के लिए। मैं तुम्हारी नौकरी खा जाऊँगा। तुम्हारा कैरियर चौपट कर दूंगा। जेल भिजवा दूंगा। सच-सच बताओ। कहाँ है हमारा पोता।''

''सर, लड़की ही हुई थी। मेरा विश्वास कीजिये। गलती से लिख गया जल्दी-जल्दी"

''तुम ऐसे नहीं मानेगी।'' हरदयाल चीखे। फिर पलटकर डॉक्टर सर्वेश से बोले- ''मैं आपको चन्द घंटो की मोहलत देता हूँ। अपनी गलती सुधार लीजिए। वरना परिणाम भुगतने को तैयार रहिये।" गुस्से में लाला हरदयाल बाहर निकल गये। जिस कक्ष में उनकी बहू भर्ती थी। उसके बाहर उनका परिवार खड़ा था। उन्होंने कहा – ''यहाँ रुकने की किसी को जरुरत नहीं। सब घर जाओ। मैं अपना पोता लेकिर ही वापस आऊँगा। यहाँ सिर्फ हरपाल रुकेगा।'' उन्होंने हरपाल से कहा – ''जाओ, बहू को दिलासा दो। मैं तब तक पुलिस, मीडिया से बात करता हूँ। हरदयाल बाहर निकल गये। हरपाल ने कमरे में प्रवेश किया।

अपनी पत्नी के सिर पर प्यार से हाथ रखते हुए कहा- ''चिन्ता मत करो। हमें हमारा बेटा मिल जायेगा।''

हरपाल की पत्नी पार्वती ने कहा – ''अब इसी बच्ची को अपनी किस्मत समझकर स्वीकार कर लीजिए।''

हरपाल की आँखों में खून उतर आया। वह चीख पड़ा। ''क्या कह रही हो। हमारा बेटा हुआ था। हमें दूसरे का पाप नहीं चाहिए। हमारे खानदान में सिर्फ बेटे पैदा होते हैं। अगर बेटी मेरी भी होती तो भी नहीं अपनाता। क्या मुँह दिखाऊंगा अपने खानदान को। अपने पिता के सामने क्या कहूँगा? ये कि बाबूजी मैं लड़की का बाप बन गया। क्या इज्जत रह जायेगी मेरी अपने भाईयों के बीच। कभी बंटवारा हुआ तो क्या मिलेगा बाबूजी से। कानी-कोड़ी भी नहीं।''

पार्वती ने उदास स्वर में कहा – ''यदि लड़की पैदा होती तो क्या आप मार डालते?''

हरपाल ने गुस्से में कहा- ''यदि नहीं भी मारता तो तब तक तुझसे बच्चे जनवाता जब तक कि लड़का नहीं हो जाता।''

''मैं क्या बच्चा जनने वाली मशीन हूँ।''

''मैं व्यर्थ बहस नहीं करना चाहता। नर्स की गलती लिखित रुप में पकड़ी गई है। हमारा बेटा बदल गया है। हमारे साथ धोखा हुआ है।''

पति का रौद्र रुप देखकर पार्वती अन्दर तक सिहर गई। उसने चुप रहना ही उचित समझा। हरपाल के बाहर निकलते ही वह नन्ही-मुन्नी बिटिया से दुलार करने लगी। बड़े लोगों की बातें तेजी से फैलती है। मामला सेठ हरदयाल और शहर के सबसे नामी-गिरामी अस्पताल का था। सो मीडिया ने भी जोर-शोर से प्रचार करना शुरू कर दिया। ''अस्पताल में बदला गया बच्चा।'' सेठ हरदयाल मीडिया वालों से, राजनैतिक दलों, स्वयंसेवी संगठनों, महिला मोर्चा वालों से मुखातिब थे। वे उदास होकर भरे गले से अपने पोते की चोरी का इल्जाम अस्पताल प्रबन्धक पर लगा रहे थे। दल, संगठन, मोर्चा के लोग अस्पताल प्रबंधक मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे। राजनीतिक दल बड़ी कार्यवाही की मांग कर रहे थे। मीडिया वाले अन्दर पहुँच गये। उन्होंने डिलेवरी करवाने वाली महिला डॉक्टर और नर्स पर प्रश्नों की बौछार कर दी।

''बच्चा कब हुआ था?''

''कब बदला गया?''

''कितने रुपये में बेचा आपने अपना जमीर''

''डॉक्टर भगवान होता है। कितने रुपयों के लिए आप लोग हैवान बने।''

''बच्चा कहाँ गया?''

''सच आखिर सच होता है। इतनी बड़ी हेर-फेर के बाद भी नर्स की अन्तरआत्मा ने फार्म पर लिख दिया सच। ये बच्ची किसी चुराकर रख दी आप लोगों ने। दो-दो परिवारों की खुशियाँ छीनने वाले आप लोगों को जितनी सजा दी जाये। कम है। आखिर कब रुकेगें ये अपराध।''

डॉक्टर और नर्स जैसे ही जवाब देने के लिए मुँह खोलते। तुरन्त प्रश्नों की बौछार लगा देते मीडिया वाले। उन्हें अपनी बात रखने का मौका ही नहीं मिला। इस पर भी मीडिया ने टिप्पणी की। बच्चा बदलने वालों की बोलती बन्द। अस्पताल प्रबन्धक ने डॉक्टर और नर्स को बुलाकर कहा – ''आप लोगों की वजह से ये सब तमाशा हो रहा है।लोग थूक रहे हैं हम पर। हमारे अस्पताल पर।''

डॉक्टर लीना ने कहा- ''सर, आप विश्वास कीजिये। बेटी ही हुई है।''

''कौन मानेगा आपकी बात।'' सर्वेश सक्सेना ने गुस्से में कहा।

''सर नर्स से लिखने में गलती हो गई। इसका इतना बड़ा तमाशा बना रहे हैं ये लोग।'' डॉक्टर लीना ने कहा- ''मुझे तो लगता है कि इन्हें बेटी ही नहीं चाहिए।''

''देखिये डॉक्टर साहिबा, नर्स ने फार्म में लड़का पैदा होना लिखा है। लिखित बात ही सबूत होती है। फिर लाला हरदयाल इस बात को मानने को तैयार नहीं है। आप दोनों की नौकरी तो गई समझिए।''

''सर, आप बच्ची की माँ से पूछ लीजिए। नार्मल डिलेवरी हुई है। कोई सीजर नहीं हुआ है कि माँ बेहोश रहे। उसे भी मालूम है कि बेटी हुई है उसके गर्भ से''

''उसकी बात कौन मानेगा? क्या उसने अपने पति से कहा नहीं होगा। अपने माता-पिता से नहीं कहा होगा। अब बात बेटे की है। मुझे लोगों को दिखाने के लिए अस्पताल की इज्जत बचाने के लिए आप लोगों को नौकरी से निकालना होगा। आपको जो कहना हो पुलिस से कहिये। बड़े लोगों के मामले में गलती नहीं चलती। आप लोग जा सकते हैं।''

मीडिया वालों से बातचीत करते हुए डॉक्टर सर्वेश ने कहा ''अस्पताल का प्रमुख होने के नाते मैंने तुरन्त कार्यवाही करते हुए डॉक्टर लीना और नर्स को नौकरी से निकाल दिया है। हम अपने स्तर पर कार्यवाही कर रहे हैं। मैं उम्मीद करता हूँ कि जल्द ही लाला हरदयाल को उनका पोता मिल जायेगा।''

खबरें तेजी से प्रसारित हो रही थी। अस्पताल के बाहर लगी भीड़ मुर्दाबाद के नारे लगा रही थी। लाला हरदयाल ने फोन लगाकर डॉक्टर सर्वेश से कहा- ''हमें हमारे खानदान का चिराग जल्द नहीं मिला तो कल मामला पुलिस के पास पहुँच जाएगा।''

डिलवरी कक्ष में अचानक मीडिया वाले पहुँच गये। कैमरे के फ्लैश चमकने लगे पार्वती पर। अस्पताल कर्मचारियों के लाख समझाने मना करने पर भी मीडिया वाले नहीं माने। उन्होंने अस्पताल कर्मचारियों से कहा यदि आप भी पाप के इस खेल में शामिल नहीं है तो हट जाइये सामने से। सत्य को सामने आने दीजिए। अन्यथा इस खबर में आपको भी खलनायक बनाकर पेश किया जायेगा।'' कर्मचारी मुँह को हाथों से छिपाकर एक तरफ हो गये।

''पार्वती जी, आप घबराइये नहीं।'' न्यूज रिपोर्टर ने कहा – ''हम आपके साथ हैं।''

हम आपको इंसाफ दिलाकर रहेंगे। आप ही इकलौती चश्मदीद गवाह भी है और पीड़िता के रूप में पार्वती के बयान मसाला लगा-लगाकर पेश किये।

डॉक्टर सर्वेश परेशान थे। उन्हें अपना करोबार डूबता दिखाई दे रहा था। कुछ देर वे आँखे बन्द किये व्हील चेयर पर पड़े रहे। फिर उन्होंने सरकारी अस्पताल में पदस्थ अपने डॉक्टर मित्र को फोन लगाकर पूछा ''किसी महिला की डिलेवरी हुई है दो – चार घंटे पहले। लड़का?'' किसी को दूसरी तरफ से आवाज आई ''हाँ, हुआ तो है। एक औरत

का सीजर हुआ है। अभी भी बेहोश है। बच्चा पहुँचा दूंगा। लेकिन मामला बड़ा है। रुपया अच्छा मिलना चाहिए।''

सर्वेश सक्सेना के चेहरे पर कुछ राहत के भाव आये। ''सुनो किसी को कानोकान खबर न हो। बच्चा दे जाओ और बच्ची ले जाओ।''

दूसरी तरफ से फिर आवाज आई ''अभी तक उसके घर के लोग नहीं आये हैं। जल्दी करना। मैं बच्चे को भिजवा रहा हूँ अपने विश्वसनीय आदमी के हाथों।''

''ओ.के. थैंक्स डॉक्टर।''

पार्वती नन्ही बिटिया को दूध पिला रही थी। तभी डॉक्टर सर्वेश, लाला हरदयाल

का पूरा परिवार और पीछे-पीछे मीडिया पार्वती को बधाई देते हुए बोला- ''मुबारक हो आपका बेटा मिल गया। नर्स ने बदल दिया था। हमनें सख्ती बरती तो उसनें मुँह खोल दिया। ये रहा आपका बेटा।'' डॉ. सर्वेश ने बेटे को पार्वती के पास रख दिया। लाला हरदयाल और उनका परिवार खुशी से झूम उठा।

''मिल गया माँ का लाल'' मीडिया ने ब्रेकिंग न्यूज शुरू कर दी। जैसे ही पार्वती के हाथों से उसकी नवजात बिटिया को लिया गया। वह बिफर पड़ी। माँ थी वह बेटी की।

पार्वती क्रोध में चंडी बन चीख पड़ी। ''खबरदार, जो मेरी बेटी को हाथ लगाया। मैंने बेटी पैदा की है। कोई गुनाह नहीं किया। जिन्हें बेटा चाहिए वे तलाक लेकर अपने बेटे की दूसरी शादी कर दें। ये मेरा खून है। ये मेरी बेटी है। किस माँ की कोख उजाड़कर उसका बेटा ले आये। वापिस करके आइये।''

सेठ हरदयाल ने अपने को आसमान से गिरता महसूस किया। पार्वती का रौद्र रुप देखकर हरपाल की भी हिम्मत न हुई कुछ कहने की। अपनी बेटी को सीने से लगाये पार्वती रणचंडी की मुद्रा में थी। अस्पताल में सन्नाटा छा गया कुछ पल के लिए।

बेटी

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