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 एक अजनबी और बारिश
एक अजनबी और बारिश
★★★★★

© Sushant Mukhi

Abstract Inspirational Romance

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शाम पाँच बजे का वक्त था | रोजाना की तरह आज भी मै छोटु के ढाबे मे चाए पीने के लिए आकर बैठा हुआ था | अभी मुझे यहां बैठे कुछ ही पल बिता था कि बाहर बारिश शुरु हो गई | मुझे बादलो पर पहले से ही शक था कि आज वो बरसेंगे ही इसलिए वापस आते वक्त मुझे भीगना न पड़े ये सोचकर अपने साथ एक छतरी लेता आया था | यूं तो बारिश मे भीगना मज़ेदार होता है मगर मै खुद को भीगाना नही चाहता था क्योकि मुझे हल्कि ज़ुकाम की शिकायत थी |

“अरे छोटू एक कप गर्मागरम ईलाइची वाली मेरी पसंदीदा चाए ला यार….” | मैने रोजाना की तरह अपने अन्दाज मे ओडर दे दिया | उधर से छोटू के कटरी अवाज़ मे जवाब आया, “अभी लाया विजय भईया.. तनिक इंतजार कीजिए..| चाए आने तक, मै बाहर बारिश की बूंदो को गिरते हुए, सड़क पर बिखरते हुए, बहते हुए देखने लगा | सड़क के किनारे बारिश का पानी धीरे-धीरे एक छोटे से नदी के आकार मे बहता हुआ दिख रहा था | जिसे देख मै अपने बचपन को याद करने लगा कि किस तरह मै अपने घर के आंगन मे बारिश मे बने ऐसे ही नदी लहर के छोटे से स्वरुप मे अपने कागज़ी नाऊ को रख देता था और नाऊ पानी के बहाव मे लहराती बल्खाती कुछ दूरी तय कर लेती थी | मैदान मे दोस्तो के संग बारिश मे भीग भीग कर फ़ूटबोल खेलना, कपडो का किचड मे लत पत हो जाना मुझे याद आने लगा था | अपने चेहरे मे एक हल्की मुस्कान लिए मै इन खट्टी मीठी यादो मे खोया हुआ सा था कि अचानक मुझे इन यादो से बाहर निकालता हुआ कोई सामने से सरपट ढाबे की ओर आ घुसा | मैने अपने खयालो से निकलकर सामने नजर डाला तो सफ़ेद सूट पहने एक लडकी खडी नज़र आई | उसने बाए कंधे पर एक काले रंग की बैग टांग रखी थी और सिर को  दुपट्टे से ओढ रखा था | “लगता है बारिश से बचते हुए यहां घुस आई है.. शायद.. इसके पास छतरी नही है..” मै उसे देखते हुए अपने मन मे बडबडाया | वो अपने दुपट्टे के एक सिरे को निछोड़ कर फ़िर उससे अपने हाथ और चेहरे को पोछ् रही थी और मै खामोश पीछे से उसकी हरकतो को देख रहा था | साफ़ मालूम पड रहा था कि वो आधी भीग चुकी थी | थोडी देर बाद वो अंदर की ओर आई और एक सुरक्षित स्थान तलाशने लगी | फ़िर मेरे सामने वाले बैंच जो की मुझसे चार कदम की दूरी पर था उसपर बैठ गई | दो पल इधर उधर देखने के बाद उसने चाय के लिए आर्डर दे दिया | “जी मेडम, बस दो मिनट मे हाजिर है..” छोटू ने अंदर से चाय पे चीनी डालते जबाब दिया | ढाबे पे दो-चार लोग और भी मौज़ूद थे जो दूसरी तरफ़ पीछे वाले बैंचो पर बैठे हुए अपने आप मे वयस्त थे | और इधर मै इस अनजान लड़की को निहारने मे वयस्त था | भीगने की वजह से शायद उसे शर्द महसूस हो रही थी इसलिए चाए के इंतजार इधर उधर देखते हुए अपने हथेलियो को आपस मे रगड़ रही थी ताकि थोडी गरमाहट महसूस कर सके | उसकी जुल्फ़े उसके कंधे तक गिरी हुई थी जो हल्के गीले प्रतीत हो रहे थे, उसके माथे पर अब भी बारिश की एक दो छोटी बूंदे थी जो लालटेन और चूल्हे की रोशनी मे चमक रहे थे | उसके सुरमई नैन, पतले होंठ और हल्के से गीले मासूम चेहरे मे मै कुछ बेसूध सा था.. कि छोटू की कटरी आवाज़ ने मुझे अचानक से जगा दिया | “विजय भईया.. ये लो आपकी मलाईदार ईलाईची वाली चाय हाजिर है..” छोटू ने कप को टेबल पर रखते हुए मुस्कुराकर कहा | मेरा ध्यान टूटा और “हाँ, शुक्रिया..” कहकर चाय के कप को धीरे से अपने तरफ़ खिसका लिया | “और कुछ चाहिए विजय भईया..? पकौडे भी तल रहा हूँ बोलो तो दूं..”  छोटू ने आदर से पूछा | “नही फ़िलहाल चाय ही काफ़ी है..”  मैने जबाब देते हुए कहा और छोटू जी ठीक है कह कर बाकी ग्राहको के पास चला गया | अब एक कप चाय सामने वाली टेबल पर भी आ चुकी थी और वो अब चाय के प्याले को अपने लबो से स्पर्श कर हर घूंट का आनंद लेती हुई बाहर बारिश की ओर देख उसके थमने का इंतजार कर रही थी | इधर मै भी चाय का आनंद लेते हुए उसे खामोशी से निहार रहा था | इस बीच जब अचानक उसकी नजर मुझ पर पडती तो मै हक-बका कर अपनी चोरी छिपाते हुए अपनी नज़रे कभी चाय के कप पर टिका देता तो कभी बाहर की ओर झांकता | मै उसे देखकर कंही खोने लगा था | उसका चेहरा, उसकी आँखे बेहद खुबसूरत थी या फ़िर शायद बारिश मे भीग कर और खुबसूरत हो गई थी |  कानो मे गोल गोल रिंग, दाहिने कलाई पे घडी और साथ मे एक बैग ये ज़ाहिर कर रहा था मानो वो कोई कामकाजी लड़की थी, जो शायद ओफ़िस से घर लौट रही थी लेकिन बारिश की वजह से यंहा फ़स गई थी | मै इन सब खयालो की उधेड़बून मे था..कि अचानक उसके बैग मे रखा मोबाईल जोर से बजने लगा | उसने चाय के कप को बगल मे रखा और बेग का चेन खोल उसमे झांकते हुए हाथ डालकर मोबाईल को निकाला और रिसिव किया | “हल्लो.. हें माँ.. आस्छी आस्छी.. जोल पोड़छे .. हामी फ़ांसे गे छी..| छाता लिते भुले गे छे.. ओए जोन्ने हामी एक्टा ढाबाए रुके गे छे..| हें.. तुमी चिंता कोरो नाई हामी आसे जाबो.. हे.. हें.. ठीक आछे..” कहकर फ़ोन रख दिया | मै तब से अब तक उसे एक टक देखता ही रहा था | उसकी बंगाली बोली किसी मधूर ध्वनि की तरह प्रतीत हो रही थी उसपे उसके चेहरे के भाव खुबसूरती को बयान कर रहे थे |

कुछ देर बीत चुका था, मेरी चाय कब की खत्म हो चुकी थी और मै अब अपने घर जा सकता था | मगर मुझे तो इस अनजान सफ़ेद सूट वाली भीगी भागी लड़की के खुबसूरत चहरे ने अब तक रोक रखा था | बारिश अब भी इतनी तेज़ थी कि उसके लिए निकलना मुस्किल था, अगर उसके पास छ्तरी होती तो जा पाती मगर उसके पास न छतरी थी न कोई बरसाती | इधर मुझे ढाबे मे रुकने का बाहाना चाहिए था | मैने छोटू को अवाज़ दे कर कुछ पकौडे और एक कप चाय मंगा ली | मै इस बात से वाकिफ़ था कि अगर उस लड़की ने या किसी और ने भी मुझ पर गोर किया होगा तो मेरे दुबारा चाय मंगाने पर आश्चर्य किया होगा, मगर क्या करे वक्त अजीबो गरीब हरकते कराता है | कुछ ही पल मे छोटू एक शरारती मुस्कुराहट के साथ चाय और पकौड़े से सज़ी एक प्लेट ले आया | छोटू को यूं मुस्कुराता देख मुझे अंदाजा हो रहा था कि शायद वो मेरे रुकने की और दुबारा कुछ मंगाने की वज़ह जान चुका था | पर छोटू ने मुझसे कुछ कहा नही बस मंगाई गई चाय-पकौडो को मेरे टेबल पर परोस कर एक शरारती निगाहों से देखता हुआ चलता बना और अपने काम मे लग गया | इधर मै चाय की चुस्की के साथ अब पकौडो का लुफ़्त भी ऊठाने लगा और उधर मुझसे चार कदम दूर टेबल पर बैठी ये अंजान लड़की अब भी बाहर की ओर नज़रे जमाए बैठी थी कि कब बारिश थमेगी और कब वो जा सकेगी | जो भी हो बारिश, चाय-पकौडे, और एक खुबसूरत चहरा का लुफ़्त उठाने मै मेरा दिल लगा हुआ था | अगर बारिश पुरी रात नही थमे तो भी मुझे कोई अपत्ती नही होती, इस खुबसूरत चहरे को निहारता हुआ रात गुजार देता |

कुछ देर बाद उसके फोन की घंटी फ़िर से बजी | ये चौथी बार था जब उसकी फ़ोन की घंटी बजी थी | इस बार उसने फोन पर ज्यादा कुछ नही बोला बस हें..आस्छी..हें हें.. कह कर रख दिया | इसके बाद वो बैंच से ऊठी बाहर की ओर गई और फ़िर दुआर पर खडी होकर अपने एक हाथ को बाहर निकाल कर बारिश की तेजी का ज़ायज़ा लेने लगी | अब तक काफ़ी समय बीत चुका था, पिछ्ले 2 घंटे से बारिश लगातार बरश रही थी | मै अपने चाय और पकौड़ो को खत्म किए बिना ही ऊठा और उसके बगल मे आकर खडा हो गया | अपने एक हाथ को बाहर निकालकर मै बारिश की बूंदो के स्पर्श का मज़ा लेते हुए कहा, “आज बारिश नही रुकेगी शायद..”  और उसकी तरफ़ देखने लगा | असल मे मै उससे बात शुरु करने की कोशिश कर रहा था | उसने मेरी तरफ़ देखा मगर बिना कुछ कहे वो अंदर गई और अपने फ़ोन को बैग मे डाल दी, दुपट्टे से अपने सिर को पहले की तरह ढक ली, और बैग टांग कर जाने को तैयार हो गई | मै समझ चुका था कि वो भीग कर ही सही मगर जाने को तैयार है | हालाकि अब बारिश थोडी धीमी थी मगर फ़िर भी तन को पूरी तरह भीगाने लायक थी |

वो अब निकलने ही वाली थी कि मैने उसे पीछे से आवाज देते हुए कहा, “ अरे.. बारिश अभी भी तेज है आप भीग जाओगी.. ” | उसने मुड़ कर मेरी ओर देखा | मैने बात जारी रखते हुए कहा, “देखिए मै जानता हूँ कि आप काफ़ी देर से बारिश के थमने का इंतजार करती रहीं हैं और आपके पास कोई छतरी या बरसाती भी नही है| ऐसे मे आप भीग जाओगी और आपकी तबीयत खराब हो जाएगी” | मेरे बातो को सुन वो मुझे हैरानी भरी नगाहो से देखने लगी और बोली, “ जी, मुझे देर हो रही है मुझे घर जाना है बारिश रुकने का नाम नही ले रही ऐसे मे भीग कर ही जाना पडेगा.. आप को मेरी परवा करने की जरुरत नही.. मै चली जाऊगी..” | मैने फ़िर टोकटे हुए कहा, “ मै आपको घर जाने से नही रोक रहा.. मै तो बस ये कह रहा हूँ कि आप भीग कर ना जाए | देखिए मै जानता हूँ हम दोनो एक दूसरे को नही जानते, मगर किसी की मदद करना कोई गुनाह तो नही | आप को एतराज न हो तो मै आपकी मदद कर सकता हूँ ” | मेरी बातो ने उसे हैरान कर दिया था, वो अब भी मुझे हैरानी भरी निगाहों से देख रही थी और इसी तरह देखते हुए सिर्फ़ इतना पूछी , कैसे? | मै तुरंत अपने टेबल की ओर गया और वहां रखे अपने छ्तरी को ले आया और फ़िर चहरे पे हल्की मुस्कान के साथ अपनी छतरी को दिखाते हुए कहा, “मेरा छाता ले कर” | उसने अपने आएब्रो को सिमटा कर ताज्जूब होकर मेरी ओर देखा | मैने आगे कहा, “आप मेरा ये छाता ले जाओ, काफ़ी बडा है आप बारिश मे भीगने से बच जओगी..” | वो दो पल छाते को देखने लगी फ़िर मेरी ओर देखते हुए बोली, “अगर मै आप का छाता ले जाऊंगी तो फ़िर आप अपने घर कैसे जाओगे..? और फ़िर मै आपको जानती तक नही फ़िर ये छाता आपको वापस कैसे करूंगी..?” | मैने सरलता से इसका जवाब देते हुए कहा, “ अरे इसमे कोई दिक्क्त नही है मै तो यहां पास मे ही रहता हूँ थोडी देर से जाऊ तो भी चलेगा और रही छाते को वापस लौटाने की बात तो आप बस इतना करना कि जब कभी इस रस्ते से गुजरो तो इसी ढाबे मे छोटू के हाथो मे छाता दे देना | मै उससे ले लूंगा ”| मेरी बातो को सुन वो कुछ पल खामोश किसी सोच मे डूब गई | उसके पलके मेरी नजरो मे समाने लगे | कुछ सवाल से मुझे उन निगाहो मे नजर आने लगे थे | जिनमे से शायद एक सवाल ये रहा होगा कि आखिर एक अजनबी पे इतनी मेहरबानी क्यों | लेकिन मै खुद इस सवाल का जवाब नही जानता था कि आखिर क्यो मै इस अजनबी के लिए इतना मेहेरबान हो गया था | क्या इन चंद लम्हो मे वो मुझे भा गई थी या उसने अपने खुबसूरत चहरे से मुझे मोह लिया था , जो अपनी परवाह किए बिना मै इसके लिए चिंतित हो गया था.. जबकी मुझे खुद को ज़ुकाम था और बिना छाते के मेरा भीगकर जाना मेरे सेहत पर असर डाल सकता था | जो भी था मुझे उसकी मदद करने की इच्छा ज्यादा थी ताकि वो सही सलामत अपने घर पहुच जाए |

“अगर आपको कोई ऐतराज है तो फ़िर कोई बात नही.. आप को जो सही लगे आप कर सकती हो |” मैने उसकी खामोशी को देखते हुए कहा | वो अब भी हां-ना के बीच मे फ़सी दिख रही थी | मै मुड़कर वापस अपने टेबल की ओर चलने लगा ये सोचकर कि शायद उसे मुझ अजनबी से मदद लेने मे ऐतराज है | मै अभी दो कदम चला ही था कि उसकी कोमल अवाज मेरी कानो तक आ पहुची, “ जरा रुकिए…” | मै उसकी अवाज सुन कर पीछे मुडा | “क्या मुझे आपका छाता मिलेगा..?” उसने एक खुबसूरत मुस्कान के साथ बेहद प्यार से पूछा | मेरा मन प्रसन्न हो उठा | मैने अपने चहरे पर एक मुस्कान बनाते हुए, छतरी को उसके तरफ़ बढा कर सिर्फ़ इतना कहा, “ जी.. जरूर.. ” | उसने छाते को लिया और कहा, “ मै कल शाम इसी ढाबे मे आकर छोटू को नही ब्लकि आपको ही आपका छाता लौटाऊंगी” | मै मन ही मन खुश हो गया कि चलो इसी बहाने एक बार फ़िर मुलाकात हो जाएगी | “जी जरूर.. मै कल शाम 5 बजे यहीं हाजिर रहूंगा.” मैने मुस्कुराते हुए कहा | “जी ठीक है, तो अब मै चलूं..” उसने बेहद प्यार से मुझसे ईज़ाजत मांगी | मन तो नही कर रहा था उसे जाने देने का मगर मन को मनाते हुए मैने कहा, “जी.. अच्छा.. फ़िर मिलेंगे..”|  वो छातरी को खोल खुद को उसमे छुपाकर जाने लगी | अभी चार कदम ही शायद चली थी वो कि फ़िर वापस मेरी ओर आने लगी | वापस आने पर मैने हैरान हो कर पूछा, “ क्या हुआ.. आपका कोई सामान छुट गया..? कुछ भूल गई क्या आप..?” | जबाब मे उसने एक बैचेनी भरे चेहरे के साथ कहा, “ हाँ मै कुछ भूल गई हूँ..” | मैने हैरान हो कर पूछा, क्या.. ? | तो एक प्यारी मुस्कान के साथ उसने कहा, “धन्यवाद …|  आपको धन्यवाद कहना भूल गई थी..” | मेरे चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कुराहट दौड़ गई | इतना कह कर वो वापस मुडी और जाने लगी | मै उसे तब तक देखता रहा जब तक वो मुझे नज़र आती रही | क्या कहे मोसम के दिलकश साज़िश की, कहानी इतनी सी थी उस एक अजनबी और बारिश की…|    

ek ajnabi baarish..

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