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वनवास का गरल
वनवास का गरल
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© Kavi Vijay Kumar Vidrohi

Tragedy

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“वनवास का गरल” 


चलो भरें हुंकार कहें , हम जंगल के रहवासी हैं । 
काननसुत इस भूमि के,हम कहलाते वनवासी हैं । 
प्रकृति की गोदी में पलते,हम जीवन धन्य बनाते हैं । 
आदिकाल से हम संरक्षक, आदिवासी कहलाते है । 
यहाँ गर्भ में बेटी-बहनें , नहीं मिटाई जाती हैं । 
दौलत के लालच में बहुऐं ,नहीं जलाई जाती हैं । 
हम ही शबरीवंशज,जिसघर वो रघुनंदन आऐ थे ।
छुआछूत,सब भेद मिटाकर, झूठे फल भी खाऐ थे।
भूल गये आजादी के हित, इक विद्रोह हमारा था ।
शब्द भी मुंडा बिरसा का ,हमको प्राणों से प्यारा था ।
भूले अल्बर्ट एक्का अबतक,अपनी शान बढ़ाता है ।
देश पे न्योछावर हो कर के,परम वीर कहलाता है । 
धान्य विहीन भले रहते,पर स्वार्थ नहीं दिखलाते हम । 
मजहब के ठेकेदार बने , आतंक नहीं फैलाते हम । 
अधिकारों की जंग लड़ें, इस कारण शायद ज़िंदा हैं । 
हालत देख हमारी पावन, “उलगुलान” शर्मिंदा है । 
ये दौर नहीं है महुये का विज्ञान, धरे मँडराने का । 
ये दौर नहीं है जातिवाद के, दंशों से डर जाने का । 
जो छबि बनाई लोगों ने,वो छबि बदलना बाक़ी है । 
फिर “धरती-बाबा” के, पदचिन्हों पे चलना बाक़ी है । 
त्याग सकल दुष्कर्मों को,नवपीढ़ी का कल्याण करो । 
या समाज का दंश सहो,चुल्लु भर जल में डूब मरो । 
- ओजकवि विजय कुमार विद्रोही 
उलगुलान - भगवान बिरसा मुंडा के नेतृत्व में एक विद्रोह 
धरती बाबा – झारखंड के लोगों द्वारा बिरसा मुंडा को दिया गया नाम 
महुआ – एक फल जिससे शराब बनाई जाती है 
अल्बर्ट एक्का -परमवीरचक्र विजेता

आदिवासी वनवासी ओज विद्रोही विजय

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