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छिन्नमस्ता
छिन्नमस्ता
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© Sandhya Tiwari

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मेरा इकलौता कमरा जो दिन में ड्राइंग रूम और पूजा गृह बन जाता है रात में बेड रूम मे तब्दील हो जाता है। सामने की दीवार पर छिन्नमस्ता माता का एक चित्र जो पलंग के सामने की दीवार पर लगा है और मैं उसे प्रतिदिन देखती हूँ। उस चित्र में देवी अपना ही सिर काट कर अपना ही रक्त पीतीं है मुझे हमेशा अचम्भित और सशंकित करता ।देवी माँ के और रूपों की तरह मैं कभी उसे आत्मसात नहीं कर पाती।
>>     चौथा महीना पूरा होने को है, आज मुझे अल्ट्रा साउण्ड कराने जाना है, मन बहुत बैचैन और भारी है, शंकाओ के नाग फूत्कार रहे हैं, कहीं पिछली बार की तरह न हो, भगवान ।
>> चार महीने देवी देवता मनाना, शिवलिंगी के बीज खाना ,सिद्ध स्थानो पर मनौती मानना, पीर फकीरों के द्वार माथा रगड़ना।  एक झटके में सोनोग्राफी मशीन निश्फल कर देती है। हे प्रभु! इस बार ऐसा न करना। अन्दर से जी अकुला रहा है जैसे बाघ सामने देख बकरे का हाल होता है ठीक वैसा ही हाल अल्ट्रा साउण्ड कक्ष में जाते मेरा हो रहा था। सास ननद पति किसी को मुझ पर तरस नही आ रहा। सब गर्भस्थ शिशु नर है की ध्वनि श्रवण को उत्सुक मुझ बेचारी के हाल से सर्वथा अनभिज्ञ अथवा अनभिज्ञता का ढोंग कर रहे थे।मुझे ठीक से पता नहीं।
>>       और बस अभी-अभी अजन्मे पर दूसरी अजन्मी को वार कर वापस आयी हूँ।                      
>>       आज पहली बार दीवार पर टंगी छिन्नमस्ता की तस्वीर को देख कर बहुत कुछ उमड़ पड़ा।
>>          मैं भी तो बार-बार आपने ही हाथों अपना सिर काट कर अपना रक्तपान कर रही हूँ।
>>           कहीं गहरे तक छिन्नमस्ता मुझ में समा गयीं।

rakht sapna jeevan

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