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प्यार का एक अनोखा रंग ....
प्यार का एक अनोखा रंग ....
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© Vibha Rani Shrivastav

Romance

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"वैलेंटाइन डे" आने वाला है .... बसंत भी समझो आ गया ..... 

प्यार का मौसम .....

देशी हो या विदेशी ..... प्यार सब करते हैं .....

प्यार पहचान लेना ....

प्यार समझ लेना ....

प्यार पा लेना ....

क्या सच में सहज होता है .... ??

नौवीं-दसवीं कक्षा में रही होगी वो पुष्पा .... !! एक दिन घर में, किताब-कॉपी, बक्सा-पेटी, पलंग-बिस्तर सब को उलट-पलट कर युद्धस्तर पर खोज अभियान चला तब उसे पता लगा कि कोई उसे चाहता भी था ....

जिस घर में वो रहती थी, उस घर के सामने और दाहिने तरफ पक्की सड़क थी .... दोनों तरफ के सड़क जहां कॉर्नर बनाते थे वहीं पर एक तरफ के घर में वो रहती थी दूसरी तरफ एक डॉ. दंपति रहते थे .... उन के साथ डॉ. साहब का छोटा भाई रहने आया था .... पुष्पा सुबह से रात तक जब भी घर से बाहर होती, उसे सामने पाती .... सुबह ब्रश करते-करते बाहर आती तो भी सामने वो बारामदे में खड़ा होता .... स्कूल जाने के लिए घर से निकलती तो भी वह उसके पीछे-पीछे स्कूल तक जाता .... दोपहर में लंच के लिए स्कूल से निकलती, तो वह स्कूल के गेट पर खड़ा मिलता .... घर आती खाना खाती .... स्कूल के लिए जाती, स्कूल में शाम को छुट्टी होती तो गेट पर होता, घर तक पीछे-पीछे आता .... शाम को घर से बाहर निकलती तो वह अपने घर के गेट पर या बारामदे में होता .... किसी के साथ भी होता तो उसका चेहरा पुष्पा की तरफ ही होता .... रात को खाना खाने बाद भी पुष्पा अपने परिवार वालों के साथ बाहर निकलती तो वह बाहर ही होता .... बाज़ार जाती किसी काम से तो भी वह एक दूरी पर उसे ज़रूर देखती .... कभी परिवार वालों के साथ सिनेमा देखने सिनेमा हॉल जाती तो इंटरवल में देखती कि वो भी हॉल में कहीं न कहीं है .....

एक बार पुष्पा को बुखार लग गया कुछ दिन तक वो बाहर नहीं निकल सकी .... तो उसकी सखियां उससे मिलने उसके घर आईं .... उन्होंने बताया कि पुष्पा के स्कूल नहीं जाने की वजह से कुछ लड़के उन्हें छेड़ते हैं .... पुष्पा को कोई लड़का छेड़ने की हिम्मत नहीं कर पाता था, क्योंकि उसके बड़े भाइयों का दबदबा था .... जब पुष्पा की तबीयत ठीक हो गई और वो अपनी सहेलियों के साथ स्कूल जाने लगी तो फिर पहले की तरह कुछ लड़के, लड़कियों को छेड़ने की नियत से सामने से आते नज़र आए लेकिन चुकि पुष्पा सब लड़कियों के पीछे चल रही थी इसलिए उन लड़कों को दूर से वो दिखाई नहीं दी .... सब लड़के साइकिल पर थे .... लड़के, सभी लड़कियों के चारों तरफ गोल घेरा बना हँस-हँस के परेशान किया करते थे .... उस दिन भी उन लड़कों का वही इरादा रहा होगा .... लेकिन पुष्पा पर नज़र पड़ते ही सब भाग गए .... लेकिन एक दूरी बना कर वो डॉ. साहब का भाई अपनी रोज़ की रूटीन फॉलो करता रहा .... कुछ दिनों-महीनों में पुष्पा की नज़र भी उसे ढूँढने लगीं ....

कभी-कभी ऐसा हुआ कि पुष्पा किसी वजह से सुबह से रात तक घर से बाहर नहीं निकल पाई तो दूसरे दिन उसके बाहर आने पर वो लड़का अपने चेहरे पर गहरी उदासी लिए हल्की सी मुस्कान चेहरे पर लाता और सामने पड़े गमले को उठा कर ज़ोर से पटक देता .... दो-चार बार ऐसा होने पर पुष्पा को मज़ा आने लगा .... वो जानबूझ कर बाहर नहीं आती और छुप कर उस लड़के को परेशान होता देखती .... लड़का बैचैनी से टहलता नज़र आता .... साइकिल से पुष्पा के घर के सामने वाली सड़क पर चक्कर लगाता, साइकिल की घंटी बेवजह बजाता .... लड़का अपने घर के ग्राउंड-गेट की ग्रिल को ज़ोर-ज़ोर से बजाता .... रात होने पर टॉर्च को जलाता-बुझाता .... पुष्पा को खिलखिला कर हँसने का मन करता .... लेकिन मुस्कुराते हुए वो सो जाती .... न जाने वो लड़का सोता या रोता ..... खाना खाता या नहीं खाता .... पुष्पा को कुछ पता नहीं चलता .... पुष्पा उस लड़के को जानबूझ कर तंग कर रही है, ये लड़के को भी कभी नहीं पता चला होगा .... जिस दिन भी पुष्पा ऐसा करती, दूसरे दिन उसके दीदार होने पर वो लड़का उठा-पटक .... धूम-धड़ाम ज़रूर करता .... कभी गमला फूटता .... कभी मेज-कुर्सी ज़ोर से पटकता .... कभी तो साइकिल ही .... एक आदत बन जाती है न ....

लेकिन पुष्पा और उस लड़के के बीच में कभी भी एक शब्द भी बात नहीं हुई .... लड़के का नाम तक नहीं जान पाई .... क्यों वो घर को छोड़ कर चला गया, कहां गया, पुष्पा को कभी भी पता नहीं चला .... आज भी उसे एक सवाल के जबाब का इंतज़ार है कि अगर वह प्यार करता था तो कभी लिख कर, बोल कर उससे प्यार का इज़हार क्यों नहीं किया .... लेकिन वह करता भी तो कैसे .... पुष्पा कभी अकेली कहां होती थी .... घर वाले जो ढूंढ रहे थे , 

वो मिलता भी तो कैसे ?

कोई निशानी ..... ??

प्यार का एक अनोखा रंग ....

मौसम बसंत प्यार

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