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पाँच रुपये
पाँच रुपये
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© Shyam Kunvar Bharti

Drama

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रामधन के चारों लड़कों को जब नौकरी मिल गई तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। आज के जमानसे में अगर चार-पाँच हज़ार रूपय की नौकरी मिल जाए तो ज्यादा है क्योंकि डिग्री और डिप्लोमा गले में टाँगकर चिराग लेकर कोई अच्छी सी नौकरी खोजी जाए तो शायद ही कहीं पैरवी और घूँस के नौकरी मिल जाए।

सबसे बसे बेटे सुभाष को कलकत्ता में जूट मिल में, उससे तीनों छोटे भाइयों को गाँव के ही निकटतम शहर में ऑपरेटर-दरवान और सबसे छोटे भाई लल्लन जी ड्राइवरि की नौकरी मिल गई।

बड़ा भाई शुभाष अपनी सारी तंख्वाह घर भेज देता। उसने बड़ी धूम-धाम से अपने तीनों छोटे भाइयों की शादी भी करा दी। अपनी शादी के बारे में उसने कहा पहले खेती-बारी खरीद लूँ और एक अच्छा सा घर बनवा लूँ तब शादी के बारे में सोचुंगा। शहर में शुभाष एक गंदी गली में छोटे से मकान में किराए पर रहता था। अपना खयाल बिलकुल नहीं रखता था। चाहता तो जितनी तंख्वाह वह पाता था उससे अच्छे-अच्छे कपड़े पहन सकता था। अच्छे से मकान में रह सकता था और अच्छा-अच्छा भोजन कर सकता था। लेकिन वहीं उसे तो अपने गाँव के भाइयों और परिवार की चिंता रहती थी। इधर उसके भाई बिरजू, सरजू और लल्लन अपनी सारी कमाई बैंक में अपने-अपने नाम से जमा कर रहे थे। उनका विचार था जब बड़ा भाई हर महीने पैसे भेज ही दे रहा है तो क्या जरूरत पड़ी है अपना रुपया बर्बाद करने की। फिर जब अलग-अलग होंगे तो अपनी ही कमाई के हिस्से लेंगे। वे भी अपनी ही तरह शुभाष के बारे में भी सोच रहे थे कि, हम लोगों का बड़ा भाई भी पैसे बैंक में जमा कर रहा है। सिर्फ दिखावे के लिए हर महीने पैसे भेज देता है। जब उसके पास काफी बैंक-बैलेन्स हो जाएगा तो हम लोगों से किनारा कर लेगा। किसी बड़े घर कि बेटी से शादी कर मौज करेगा। उन्होने अपने मद्दे विचार पिता रामधन के कानों में दिया। पिता भी उनके विचारों से सहमत हो गए। अब उन सब की नजर शुभाष के प्रति बिलकुल ही बदल गई। वह जब भी गाँव आता, कोई भी भाई सलीके से बात नहीं करता। पिता बात-बात पर हिसाब मांगता, कहता फलाना-फलाना कमा कर इतना रूपय भेजते हो। एक तुम हो की महीने में चार-पाँच हज़ार रूपय थमा देते हो। खेत-बारी लेनी है, घर बनवानी है और तुम्हारी शादी भी करवानी है। घर के सबसे बड़े तुम ही हो।

शुभाष सोचता उसके पिता और भाई उसे कितना मानते हैं। घर की सारी ज़िम्मेदारी उस पर ही डाल दिये हैं। अब वह दुगने उत्साह से काम करने लगा, उल्टा ओवरटाइम भी मिलता वो भी करता। उसे बस यह ही चिंता रहती थी कि, ज्यादा से ज्यादा रुपया घर पर भेज सकूँ ताकि मेरे परिवार को किसी बात कि तकलीफ न हो। मगर इसका बुरा असर उसके स्वास्थ्य पर पड़ा। दिनों-दिन करके उसका स्वास्थ्य और बिगड़ता गया। इस तरह उसने एक दिन बिस्तर ही पकड़ लिया। अपनी बीमारी कि खबर उसने अपने पिता और भाइयों को भेज दी। मगर उधर से कोई जवाब नहीं आया। शुभाष कि हालत जब बिलकुल ही बिगड़ गई, तो उसके पड़ोसियों ने उसे उठाकर अस्पताल पहुंचाया। चिकित्सक ने उसका परीक्षण करने के बाद बताया, इसे तो आंत टीबी हो गया है। जल्द ही ऑपरेशन कि जरूरत है। वरना इसका बचना मुश्किल है। ऑपरेशन में काफी खर्च पड़ेगा। फौरन इसके परिवार वालों को बुलाया जाए। पड़ोसियों ने शुभाष से उसने परिवार का पता लेकर पिता और भाइयों को खबर दी कि, यहाँ शुभाष काफी नाजुक है। जल्द से जल्द आकर इसका इलाज कराएं। मगर उसके भाई मन ही मन सोचे की चलो अच्छा है जल्दी ही मर जाए तो उसकी सारी रकम ले लेंगे।

इधर सुभाष के भाई और पिता जब इलाज के लिए उसके पास नहीं पहुंचे तब उसके पड़ोसियों ने किसी तरह आपस में चंदा करके उसे शहर के सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया और फिर उसके गाँव उसके पिता के पास टार भेजकर खबर किया कि, जल्दी आ जाइए सुभाष अस्पताल में भर्ती है और काफी गंभीर हालत में है। गाँव में जब उसके भाई और पिता को सुभाष के हालत की खबर मिली तब उसके भाइयों ने सोचा चलो अच्छा है, हमारा बड़ा भाई तो अब अस्पताल में अपनी अंतिम साँसे गिन ही रहा है। चलो चलकर उसके घर से सारा रुपया और सामान ले आते हैं। लेकिन उसके पिता रामधन को अपने पुत्र की ऐसी खबर पाकर काफी दुःख हुआ, क्योंकि कोई भी पिता कितना भी लालची और कठोर क्यों न हो, अपने पुत्रों को मरते हुए नहीं देख सकता। उसने अपने तीनों पुत्रों को ज़ोर से डांटा और कहा, "नालायकों, अब तक तुमलोग अपने बड़े भाई के ही पैसों पर ऐश-मौज करते रहे और जब उसकी बीमारी की खबर मिली तो तुमलोग उसके मरने की दुआ कर रहे हो। लानत है तुमलोग जैसे बेटों पर।" फिर रामधन अपने तीनों बेटों को लेकर कलकत्ता चला गया। वहाँ जाकर उसके टूटे-फूटे मकान को देखकर वह अचंभित होकर रह गया। उसे काफी आत्मग्लानि हो रही थी, कि हमलोग समझते थे कि, सुभाष बड़े सुख और ऐशो-आराम से रह रहा होगा, लेकिन यहाँ तो मेरा बाते बड़ी ही बुरी हालत में रह रहा है। लेकिन उसके तीनों बेटों की गिद्द दृष्टि सुभास के सामानों पर पड़ी हुई थी। चारो तरह गंदगी पड़ी थी। कमरे में कही कोई कीमती चीज नजर नहीं आ रहा था। सिर्फ एक टूटी चारपाई के अलावा, घर के एक कोने में एक छोटा से ताला लटका हुआ एक स्टील का बक्सा नजर आया। उसके भाइयों को लगा, उसके भाई ने सारा पैसा इसी बक्से में छुपा के रखा होगा। चलो ताला तोड़कर सारा पैसा निकाल लेते हैं। तीनों लपक कर बक्से के पास पहुंचे और बगल में पड़े हथौड़े से मार कर एक ही चोट में ताले को तोड़ दिया। बक्सा खोलते हुए तीनों ने गिद्द दृष्टि के खंगालना शुरू किया। मगर उसमे सिर्फ फटे-पुराने कपड़े और चारों भाइयों और माता-पिता के साथ बचपन का एक फोटो मिला। तभी उनकी नजर एक पाँच रूपाय के नोट पर पड़ी। एक ने झपट कर उस रूपय को उठा लिया। बाकी ने सारा बक्सा ही खाली कर दिया। मगर उसमे कुछ नहीं मिला, सिवा उस पाँच रूपय के नोट के। पिता अंधन ने अपने बेटों से उस पाँच रूपाय के नोट को लिए और कभी उस नोट को तो अपने परिवार के फोटो को देख रहा था। उनकी आँखों में झर-झर आँसू बह रहे थे। उसकी छाती दर्द से फटी जा रही थी। उसकी हालत खराब हो गई थी। मानो कोई बुआई तरह लूट चुका हो। उसकी बोलती बंद हो गई थी। उसकी नजरें फोटो और पाँच रूपय के नोट से हट ही नहीं रहे थे।

उसे ऐसी हालत को देखकर उसके तीनों बेटे घबड़ा गए और अपने पिता को हिलाने-डुलने लगे। "बाबूजी, अचानक क्या हो गया आपको ? कुछ तो बोलिए।" तभी रंधन का ध्यान टूटा और माथा पकड़ कर फुर-फुर कर रोने लगा। "नालयकों अपने देवता समान भाई के इस हालत के तुम सब ही ज़िम्मेवार हो। मेरा बेटा भूखा-पासा और तंगी की हालत में रहकर भी हम सबकी खुशी के लिए अपनी कमाई का सारा रूपय गाँव भेजता रहा है और तुमलोग धूर्त और लालची भाई, उसके मरने की दुआ कर रहे थे।"

"कमबख्तों, अपने देवता समान भाई की पूरा करने के बजाय तुमलोग उसके मरने की दुआ कर रहे थे। चुल्लू भर पानी में दस मारो सब। तुम लोगों के लिए ही उसने शादी नहीं की। खबर मिलने के बार भी तुमलोग उसे देखने नहीं आए न मुझे आने दिया। भगवान हमलोगों को कभी माफ नहीं करेगा। मेरी भी तुमलोगों ने माती भ्रस्ट कर दिया था।"

अपने पिता को पश्चाताप के आँसू रोता देखकर तीनों भाइयों को भी आँख से आँसू बहने लगे थे। मानो सारा स्वार्थ, लालच और बेईमानी पानी बनकर तन-मन से निकालने लगे थे।

अचानक रामधन उठ खड़ा हुआ। पाँच रूपय के नोट और फोटो को उसने बड़े इज्जत से अपनी कुर्ते की जेब में रखा और कहा, "अब देर मत करो वरना तुम लोग अपने भाई को जिंदा नहीं देख पाओगे। चलो जल्दी अस्पताल। हमलोगों की किसी भी कीमत पर उसे बचना है।"

रामधन ने सुभाष के एक पड़ोसर की साथ लिया औ किराए की कार द्वारा अस्पताल पहुंचे। सबलोग बेतहाशा दौड़ते हुए सुभाष के बेड के पास पहुंचे। उसकी हालत देखर रामधन और उसके बेटों की छाती फटने लगी थी। सुभाष मात्र एक हड्डियों का ढांचा बनकर रह गया था। आँख, गाल सब अंदर घुस गए थे। अपने पिता और अपने तीनों भाइयों को देख कर उसकी आँखें खुशी से चमकने लगी। उसकी आंखे भी आँसुओ से भरकर उसके चेहरे ही भिगोती हुई सफ़ेद चादर की गीली कर रही थी। उसने बोलने की काफी कोशिश की, लेकिन आवाज ही नहीं निकल सकी।

"तुम कुछ मत बोलो मेरे बेटे, मेरे जिगर के टुकड़े ! तुम चिंता मत करो। अब हमलोग आ गए हैं बेटे, तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे।" रामधन अपने बेटों के साथ सुभाष का इलाज कर रहे डॉक्टर के पास जाकर उसके बारे में जानकारी लेने लगे। डॉक्टर ने उन्हे डांटते हुए कहा, "कैसे बाप और भाई हैं आपलोग ? वो इतने दिनों से यहाँ अस्पताल में पड़ा हुआ है और आप लोगों को आज समय मिला है।" रामधन ने डॉक्टर का पैर पकड़ लिया और रो-रोकर कहने लगा, "जितना डांटना है डॉक्टर दांत लीजिये, मगर मेरे बेटे को बचा लीजिये।" "हाँ डॉक्टर साहब, हमारे बड़े भैया को किसी न किसी तरह से ठीक कर दीजिये।"

उनकी दस देखकर डॉक्टर का भी दिल पसीज गया। उसने रंधन के कंधों पर हाथ रखकर उसे उठाते हुए कहा, "तुमलोग चिंता मत काटो, मैं पूरी कोशिश करूंगा। मगर काफी देर हो चुकी है। कुछ कहा नहीं जा सकता। इलाज में भी काफी खर्चा होगा।"

"ऐसा मत बोलोइए डॉक्टर साहब, मेरे बेटे को कुछ नहीं होने चाहिए। पैसे की चिंता मत कीजिये। जरूरत पड़ी तो अपना सारा जमीन, मकान और खेत बेच दूंगा, लेकिन उसे बचा लीजिये डॉक्टर।"

"हाँ डॉक्टर साहब ! आप पैसों की चिंता मत कीजिये। हमलोग अपनी सारी जमा पूंजी देने को तैयार हैं। लेकिन इनको आपको बचाना ही होगा। आखिर, हमलोगों के पास जो भी है, सब कुछ भैया का ही दिया हुआ है।"

"ठीक-ठीक। तुमलोग चिंता मत करो। मैं पूरी कोशिश करता हूँ मैं दवाइयाँ लिखर देता हूँ। तुम लोग फौरन उसे लाकर अस्पताल में नर्स के पास जमा करो। उसे प्रतिदिन फल-फूल, दूध की जरूरत पड़ेगी। अभी सिर्फ फल का जूस ही चलेगा। बाद में धीरे-धीरे सब शुरू होगा।"

रामधन के दो बेटों ने मेडिकल हॉल से सारी दवाइयाँ लाकर नर्स को दे दिया। नर्स ने कहा, "आपलोग अपना ब्लड टेस्ट करवा लें। मरीज को ग्लूकोज चढ़ने के बाद ब्लड भी चढ़ेगा। अगर आपलोगों का ब्लड ग्रुप नहीं मिलेगा, तो बाहर से खून की बोतल मंगानी पड़ेगी।"

"ठीक है नर्स, हमलोग तैयार हैं।" रामधन का ब्लड ग्रुप शुभाष से मिल गया। उसने दो यूनिट अपना खून दे दिया।

अब शुभाष का काफी बेहतर इलाज शुरू हो चुका था। रामधन वहीं अस्पताल में रुक गया और अपने दो बेटों को गाँव भेज दिया। सबसे छोटे बेटे लललन को अपने पास रख लिया। उसने दूसरे देते को गाँव में खेती-बाड़ी और घर देखने की जिम्मेवारी दे दिया और शुभाष से छोटे वाले लड़की को गाँव से पैसा लाने को कहा।

इधर रामधन और लललन ने बड़े लगन से देखभाल किया। बेहतर इलाज और देखभाल से शुभाष के स्वस्थ्य में काफी सुधार आने लगा।

"बाबूजी !" शुभाष से मुंह से निकला। शुभाष के मुंह से बाबूजी सुनकर रामधन का दिल खिल गया। "हाँ बोलो बेटा" रामधन ने शुभाष का सिर अपनी गोद में रखा। रामधन ने अपने हाथ शुभाष के सिर पर रखा। शुभाष ने कहा, "मैंने तो आप लोगों से मिलने की उम्मेद ही छोड़ दी थी बाबूजी ! जरूर जरूर मुझमे ही कोई कमी रह गई होगी बाबूजी।" "नहीं-नहीं बेटा, ऐसा मत बोलो। तू तो बेटा नहीं देवता है। भगवान तेरे जैसा बेटा हर किसी को दे।" रामधन बोलते हुए रो पड़ा। बेटा हम सब लोग तुम्हारी अपराधी हैं, जो तुम्हें समझ नहीं पाये। हो सके तो हम सबको माफ कर देना।" रामधन ने शुभाष के सामने दोनों हाथ जोड़ लिया।

"नहीं नहीं बाबूजी, आप हाथ जोड़कर और क्षमा मांग कर मुझे पाप का भागी मत बनाइये।" शुभाष की भी आंखे गीली हो चुकी थीं। सामने खड़ा उसका भाई भी आँसू बहाये जा रहा था। उसने लपक कर अपने भाई के सामने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। "भैया हमे माफ कर दो। तुम्हारी इस हालत के मलोग ही ज़िम्मेवार हैं।"

तभी वहाँ डॉक्टर आ जाते हैं। "अरे ! अरे ! आपलोग रो क्यों रहे हैं। मरीज के सामने रोने से मरीज पर इसका बुरा असर पड़ेगा।" डॉक्टर ने डांटते हुए कहा। "और हाँ रामधन जी आप सात दिन बाद अपने बेटे को छुट्टी कराकर ले जा सकते हैं। लेकिन ध्यान रहे, इसका पूरा खयाल रखना है। समय-समय पर दावा देते रहना है। भरी काम नहीं करने देना है। फल-फूल, दूध और पौष्टिक आहार देते रहना है। हर महीने वहाँ के नजदीकी अस्पताल में इसकी जांच कराते रहना है। मुझे भी काफी खुशी हो रही है। आप आपका बेटा खतरे से बाहर आ गया है। और ये जल्दी ही ठीक हो जाएगा।" डॉक्टर ने रामधन को समझाते हुए कहा। "हमलोग आपके जिंदगी भर कर्जदार रहेंगे डॉक्टर साहब। आपने हमारे बेटे की जिंदगी बचा ली।" रामधन ने हाथ जोड़ते हुए कहा।

"और नहीं-नहीं, ये तो हमारा फर्ज है।" डॉक्टर ने कहा। तभी वहाँ रामधन का एक और बेटा गाँव से वहाँ आ गया। एक सप्ताह बाद सबलोग शुभाष को लेकर गाँव चले गए और शुभाष भी जल्द ही थीक हो गया। उसके तीनों भाई और पिता उसे कुछ करने नहीं देते थे। एक साल बाद सुभाष ने खेती का जिम्मा ले लिया और पिता की जगह खुद हल चलाने लगा। वह खूब मन लगाकर फसल पैदा करने लगा। रामधन ने एक सुंदर लड़की से शुभाष का विवाह करा दिया।

Sacrifice Brothers Family

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