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लालच
लालच
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© Sunita Sharma Khatri

Drama Inspirational

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"भाभी पर झूठा आरोप लगा कर चैन न पायेगी ...उसको मौत के मुँह में पहुँचाने वाले तुम लोग हो। मैं बीमा क्या पड़ा तुम्हारी मौज आ गयी।

तुम नहीं जानते, मैं सब देखता था...कैसे तुम उसे परेशान करते रहे। मैं कुछ न कर पाया इसीलिए मैंने झुठा नाटक किया कि गैर औरत को बुला लेता हूँ अपनी देखभाल के लिए ताकि वो मुझसे नफरत कर यहाँ से चली जाये लेकिन वह न जाने किस मिट्टी की बनी थी। कहीं नहीं गयी। मुझे जीवन-दान दे खुद मौत के मुँह में चली गयी।

लालचियों तुम लोगों ने मेरा सब छीन लिया। मेरा घर मेरी बीवी-बच्चों को मुझसे अलग कर दिया। अरे, तू कैसी बहन है तेरा लालच इतना बढ़ गया कि मेरे परिवार को खत्म कर डाला। मेरे मन में उनके लिए इतनी नफरत पैदा कर दी कि मुझे सच दिखायी ही न दिया।"

अालोक जोर-जोर से रो रहा था। सामने बीवी की लाश पड़ी थी।

"अब बोल लालची औरत किस आदमी से चक्कर चल रहा था उसका अगर वह ऐसी थी तो इस घर में दम क्यों तोड़ दिया, क्यों न गयी यहाँ से ...तुझे नरक में जगह न मिलेगी। ले जमीन-जायदाद, मेरा सब कुछ ले ले पर मुझे इतना चाहने वाली पत्नी को लौटा दे।"

"ठहरो ! अालोक चुप हो जाओ मत रोओ।"

अालोक की बुआ आ पहँची थी, "तुम्हारी पत्नी जिन्दा है मरी नही है। यह केवल बेहोश है। हमारा नाटक था यह। तुम्हारी आँखे खोलने के लिए। हमने देखा था, तुम कैसे बहु पर अत्याचार करते थे। फिर भी वह सहती रही। इसलिए नहीं कि वह यहाँ बच्चों के लिए रह रही थी बल्कि इसलिए कि वह तुमसे सच्चा प्यार करती थी।"

रितिका उठो ...अब और नाटक करने की जरूरत नहीं, देखों आलोक की कैसी हालत हो गयी है।

रितिका उठ कर बैठ गयी...रितिका आलोक चीख कर उससे लिपट गया, "फिर कभी ऐसा न करना मुझे माफ कर दो। मैं बीमारी के दौरान सब समझ गया। मैंने नाहक ही तुम पर शक किया। इन लोगों ने मेरे दिमाग में जहर भर दिया था तुम्हारे प्रति, मेरा कोई वास्ता नहीं इनसे।"

"नहीं आलोक, ऐसे न कहो, यह भी हमारे अपने हैं बस यह भटक गये हैं। इन्हें सही रास्ता दिखाओ रितिका ने अपने पति को समझाया।"

रितिका सही कह रही है बेटा।" बुआ बोल पड़ी।

मेरे कहने पर ही इसने यह सब किया ताकि पूरा परिवार सही रास्ते पर चलने लगे। जब मैं पिछली बार यहाँ आयी थी तो बहुत कुछ देखा सुना। फिर रितिका को कहा उसे क्या करना है।"

सभी बुआ का चेहरा देख रहे थे अपने छोटे भाई के परिवार को बिखरता देख घर की प्रताड़ित बहू ने और बुआ ने सबकी आँखे खोल दी। सब बुआ के पैरों में गिर पड़े- हमें माफ कर दो।

बहू नाटक बेहोश

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