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खामोशियों का रंग नीला
खामोशियों का रंग नीला
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© Tasnim Khan

Inspirational

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'लो साब, आपकी चॉकलेट।'

'अरे कुटियाल साहब आइए, क्या लाए हैं। आज बड़ी देर लगा दी।'

प्रभात की बात पूरी होने से पहले ही उसने दोनों चॉकलेट उस पर फेंक दी। 'एक तो आप ये मुझे कुटियाल साब मत कहा करो।' उसने होंठों को बाहर निकालते हुए मुंह बना लिया। प्रभात ने उसका हाथ पकड़ खींचते हुए पास बैठाया। कंधे पर हाथ रख अपने से सटाते हुए कहा- 'तो क्या कहूँ कुटियाल साहब। हा!हा!हा! '

प्रभात का हँसना उसे और भी नाराज कर गया।

'अच्छा, तो अब नहीं कहूँगा, पक्का। लेकिन फिर तुम मुझे साब क्यों कहते हो?'

उसके चेहरे पर मुस्कराहट दौड़ गई, फिर भी उसने अपने आपको गंभीर दिखाने के अंदाज में कहा- 'आप तो हो ही साब।'

'क्यों ये साब की जिंदगी तुम्हें इतनी अच्छी लगती है।'

इस बार उसने हाँ में बस गर्दन हिला दी।

प्रभात का फौजी होना उसे खूब आकर्षित करता। एक तो उसके चेहरे का रौब, दूसरा उसके लम्बे कद और गठीले शरीर पर फौजी वर्दी खूब फबती। चेहरा रेगिस्तान के थार से ज्यादा सुनहरा और उस पर सूरज सा तेज। वो उसे देर तक देखा करता और कहता- 'आप हीरो क्यूं नहीं बन जाते।'

इस पर प्रभात बस हँस देता।

रोशन करीब आठ साल का होगा। रंग भूरा और बाल भी। उसके गालों पर लाल निशान हमेशा पड़े रहते। कभी-कभी तो इतने फट जाते कि खून साफ दिखाई देने लगता लेकिन वो इन सबसे बेफिक्र अपने छोटे भालू से दिखाई देने वाले झबरे बालों वाले कुत्ते को चिपकाए घूमता रहता। इसे वो अपनी भाषा में कुक्कुर कहता।

वो कहीं भी रहे लेकिन दिन के ११ बजते-बजते काली नदी के किनारे आ जाता।

उसे पता होता कि प्रभात यहीं उसका इंतजार कर रहा होगा। एक २८-२९ साल के युवा और ८ साल के बच्चे की दोस्ती थी भी इतनी गहरी कि वे सारा काम छोड़ इस समय एक-दूसरे से बातें करने आते।

उम्र की तरह दोनों की बातें भी जुदा होती, लगभग अलग-अलग दुनिया की।

रोशन की बातें पर्वत के नीचे की जिंदगी से इस ऊंची बर्फ की चोटी तक होती तो प्रभात के खयाल थार के रेगिस्तान से इस बर्फ की ऊँचाई तक का सफर किया करते।

प्रभात ने एक चॉकलेट उसके हाथ में थमा दी। अब दोनों खामोश थे और चॉकलेट खाने में मगन। बस नदी की कलकल लगातार उनकी खामोशियों को तोड़ रही थी। प्रभात के दिल में फिर हूक सी उठी- 'ये नदी ना होती तो शायद यह द्वीप सी लगने वाली बर्फ की चोटी भी अकेली ही होती। कोई आवाज नहीं, बस खामोशी ही खामोशी पसरी होती, पर प्रकृति ने इसके साथ नाइंसाफी नहीं की और इसे आवाज से गुलजार रखा। तभी तो गूंजी के दोनों ओर नदियां बह रही हैं। काली और कुट्टी।'

'ये भी तो रेगिस्तान ही है बर्फ का, उसने मन ही मन कहा। 'दूर-दूर तक कोई हरियाली नहीं। बस बर्फ के बीच से झांकती इक्की-दुक्की सी झाड़ी। वैसे ही जैसे औसियां के मिट्टी के टीले। जहां बमुश्किल ही कोई कंटीला पौधा भी मिला करता। होता तो भी मिट्टी के कई फुट ऊंचे टीलों में से उसका ऊपरी सिर झांकता मिलता।'

'अपनी जिंदगी भी तो रेगिस्तान होती जा रही है। रेत की तरह तपता मन और सर्द बर्फ की तरह जमती रिश्तों की गरमाहट।'

प्रभात ने एक लंबी सांस ली और अपनी चॉकलेट खत्म करते, करते कहा- 'जानता है आज किस खुशी में चॉकलेट खा रहे हैं।'

'हाँ, होगा आज पत्नी जी का जन्मदिन या चेली का या ईजा का या फिर बाज्यू का- रोशन ने कई सारे नाम गिना दिए।'

'नहीं, इससे भी बड़ी बात कि आज मैं चाचू बन गया।'

'वो तो पहले ही थे, चीनू के।'

'हाँ, यही तो ना, चीनू का छोटा भाई हुआ है। तुम क्या कहते हो उसे...,

हाँ- दाज्यू हुआ है।'

'अच्छा...'

'हाँ, आज सुबह ही सेटेलाइट फोन पर कविता से बात हुई। उसी ने बताया। पता है मैं तो खुशी के मारे उछल पड़ा। इसके बाद से तो मन ही नहीं लगा। बस सोच ही रहा था कि कब तुम आओ और तुमसे खुशी बांटूं।'

'अच्छा बस पत्नी जी से बात की। ईजा (मां) और बाज्यू (पिता) से नहीं।'

'तुझे बताया तो था ना कि वो भी यूएस गए हैं। भैया-भाभी के पास। अब तो उनसे भी बात नहीं कर सकता। उसने फिर एक लंबी सांस ली।

गूंजी वैसे भी समुद्रतल से १०५५० फुट ऊंचाई पर है। हाई एल्टीट्यूड की वजह से यहां आक्सीजन कम होती है, इसीलिए लम्बी सांस लेना यहां के लोगों के जीवन के लिए जरूरी है। प्रभात और उसके जैसे लोगों के लिए भी जो यहां के जीवन के अभ्यस्त नहीं होते।

'पता है, यह बर्फीली चोटियाँ जितनी खूबसूरत हैं ना, उससे ज्यादा मुश्किल यहां की जिंदगियां।' प्रभात ने रोशन से कहा।

'अच्छा, तो आपके रेगिस्तान में कैसे बीतती हैं जिंदगियां? पता नहीं कैसे रहते हैं वहां लोग? बाध्य एक दिन बता रहा था कि कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए राजस्थान से लोग आए थे, वे तो जैसे पगला गए बर्फ देखकर।'

प्रभात हँस दिया, कहा- 'कुटियाल साहब आप तो बुरा मान गए। मैं गूंजी की बुराई नहीं कर रहा। बस इतना जानता हूँ कि यहां की जिंदगी मुझ पर बहुत भारी है।'

'अरे, इतने जवान हो, इस पर फौज में साब, फिर भी मुश्किल कहते हो, आपसे तो अच्छा मैं ही। देखना अगले महीने जब हम नीचे जाएंगे तब मैं बाध्य और ईजा से आगे रहूंगा। पैदल रास्ता मैं ही पहले पार करता हूं। पूरा ६० कोस पड़ता होगा कोई। देखा है ना कितना कठिन रास्ता होता है। छोटी-बड़ी पहाड़ियों से रास्ता कभी ऐसे जाता है, कभी ऐसे।’ उसने हाथों को लहराते हुए बताया।

'अब बताओ क्या मुश्किल है?' उसने फिर सवाल किया।

'मुश्किल तो है। यहां आने के बाद मैं तो जिंदगी से कट सा गया। ना कोई रिश्ता और ना कोई दोस्त। अब देख ना, घर में नया मेहमान आया है तो भी मैं भैया-भाभी, मम्मी-पापा को मुबारकबाद तक नहीं दे पाया।'

 'अरे साब, इतूक मोट-मोट फोन किले धन छा (फिर इतना मोटा-मोटा फोन क्यों रखते हो) बात करो ना उनसे।' उसने पास पड़े वॉकी-टॉकी ५ वॉट के वीएचएफ मोटोरोला सेट की ओर इशारा किया।

'कुटियाल साहब कितनी बार कह चुका कि इस फोन से आवाज मेरे अपनों तक नहीं पहुंच पाती।'

'यहाँ बस एक सेटेलाइट फोन है, जिससे घर बात हो जाती है, लेकिन विदेश बात नहीं हो सकती। फौज में नौकरी की अपनी सीमाएं हैं। इस पर गूंजी में मोबाइल या दूसरी फोन सेवा भी तो नहीं है। इंटरनेट के बारे में तो यहां सोचा भी नहीं जा सकता। नहीं तो कितने ऑप्शन हैं विदेश बात करने के। सोच रहा हूँ कि अपना ये बेकार पड़ा मोबाइल बर्फ के नीचे ही कहीं दफन कर दूं।'

रोशन बोला- 'इतनी बुरी लगती है यह जगह।'

प्रभात ने कहा- 'जगह नहीं, यहां का अकेलापन बुरा है। यहां आकर मम्मी-पापा का स्नेह, पत्नी का सत्कार, बिटिया रानी के कोमल हाथों का स्पर्श, भाई-भाभी का प्यार, दोस्तों की टोली और उनकी गालियां, सब छूट गया। बहुत अकेला हूं यहां।'

'अकेले कैसे हुए? आपके पास तो इतने सारे फौजी घूमते रहते हैं। जी साब, जी साब करते हुए। कोई पचास तो होंगे ही ना।' उसने अंगुलियों पर जैसे गिनते हुए कहा।

'और देखो हमारे घर में तो हम तीन ही हैं। मैं, बाज्यू और ईजा। फिर भी मैं कभी नहीं कहता कि मैं अकेला हूं।'

'जानते हो रोशन, जब इंसान भीड़ से घिरा हो तो वो सबसे ज्यादा अकेला होता है।'

'रही फौज की बात तो तुम साहब बनोगे तो समझोगे कि फौज में डेकोरम बनाए रखना भी अपने साथ क्रूरता बरतना है। अफसर को जवानों से एक दूरी बनाए रखनी होती है, रौब दिखाना जरूरी सा होता है। चाहकर भी उनसे ज्यादा घुल-मिल नहीं सकता। उनसे अपने दिल की बात नहीं कर सकता, दोस्ती नहीं कर सकता। और ऐसे तो बिलकुल नहीं बात कर सकता जैसे मैं तुमसे बात करता हूँ। उनसे कभी नहीं कह सकता कि मुझे परिवार की याद आती है।'

इस बार प्रभात को लगा कि उसकी आवाज कुछ भर्रा गई, वो चुप हो गया। दाएं और मुँह फेर लिया। सामने ही ओम पर्वत की ऊँची-ऊँची बर्फ की चोटियां दिखाई दे रही थीं। जो नीले आसमान को चूम रही थीं। धूप जैसे-जैसे उन पर तेज पड़ती, वो सफेद से नीली पड़ती जाती। आभासी नीली। वो जितनी चमकती उतना ही आसमान का नीला रंग उनमें उतरता जाता। जैसे शिव विष पीकर नीले पड़ रहे हों।

उसने सोचा- 'भगवान शिव ने भी तो यहीं तपस्या की थी, तभी से शायद यह हर किसी के लिए तप स्थल हो गया होगा। जो हमेशा खामोशियों से घिरा रहता है।'

'ओम परबत तो आप रोज ही देखते हैं, आज ऐसा क्या है कि देखे जा रहे हैं।

भगवान शिव दिखे क्या?'  रोशन ने ठिठोली की।

प्रभात भी हँस दिया, भर्राता हुआ गला इस हँसी से खुल गया।

'रोशन... इसे देख पहली बार जाना है कि खामोशियां नीले रंग की होती हैं।

'अच्छा। ऐसा भी होता है क्या?'

'अब सोच रहा हूँ कि इस पर संन्यास की तैयारी कर लूं।'

रोशन ने प्रभात को नीचे से ऊपर तक घूरा- 'आप कैसे बनोगे संन्यासी। वो ऐसे नहीं होते। वो तो कपड़े भी इतने नहीं पहनते। ना जूते। रोशन ने उसके स्नो बूट पर नजर डालते हुए कहा।

प्रभात की हँसी वादियों में गूंजने लगी। कहा- 'यही तो, मैं वर्दी वाला संन्यासी बनूंगा। अब देख ना यह संन्यास ही तो है। अपने गृहस्थ जीवन से तो निकल ही आया। कोई जिम्मेदारी नहीं निभा सकता। अपनों के करीब नहीं रह सकता। और तो और कहीं किसी को देख आहें नहीं भर सकता, तो क्यों ना धर्म ही निभा लूं। हां, यह सही रहेगा। ओम पर्वत की ओर चल देता हूँ।'

'अरे नहीं नहीं, वहाँ बर्फ पिघलती है। बाज्यू कहता है, वहाँ बहुत खतरा है।’ रोशन ने डरते हुए प्रभात का हाथ पकड़ते हुए कहा।

'खतरा तो यहां भी है रोशन। एसएसबी कैम्पस के चारों ओर घिरे बर्फ के पहाड़ों से ग्लेशियर पिघलने का खतरा हर वक्त हम पर मंडरा रहा होता है। इस पर बैरक इतनी दूर-दूर हैं कि कभी किसी को कुछ हो जाए तो आवाज भी नहीं दी जा सके। और सबसे बड़ी बात कि यहाँ कोई देखने को भी नहीं मिलता। यानी कोई हरियाली।'

रोशन ने बाल खुजलाते हुए कहा- 'हरियाली??'

'हाँ हरियाली। तुम नहीं समझोगे। लेकिन कहीं देखने को ही मिल जाए तो हमारा मन तो लगा रहे ना। और कहीं पोस्टिंग होती तो बाजार ही निकल जाते, वहां तो इतनी सारी हरियाली देखने को मिलती कि आँखें तृप्त हो ही जाती। जीवन जीने के लिए उमंगें जरूरी हैं और उमंगों के लिए हरियाली।'

'आप ये उलझी-उलझी बातें मुझसे मत किया करो। बाल खुजलाते-खुजलाते परेशान हो जाता हूँ।' रोशन ने परेशान होते हुए कहा।

'सच कहता हूँ रोशन, हरियाली के बिना तो हम नीरस हैं। तुझे पता है, हम रेगिस्तान वाले तो जवानी में बर्फ पर फिसलने के ही ख्वाब देखा करते हैं। मैंने भी यही सोचा था कि कभी बर्फ की हसीं वादियों में घूमने जाऊंगा और अपनी प्रेमिका या पत्नी के हाथ में हाथ डाले कोई गीत गा रहा होऊंगा। नदी के कलकल करते पानी में दोनों रंगे पैर बैठे होंगे और वादियों में खो जाएंगे।'

'अब देख ना मैं इन खूबसूरत वादियों में बैठा भी हूँ तो अकेला। नितांत अकेला। और तो और यहाँ आने के बाद दोस्त भी एक ही बचा है और वो तुम हो।'

रोशन की खुशी होंठों से होती हुई गालों की ऊँचाई तक जा पहुँची। फटे गालों का खिंचाव बढ़ गया।

बोला- 'सच्ची।'

'सच रोशन। यहाँ आने के बाद तो बचपन के दोस्त पीछे छूट गए। वो समझते हैं कि असिस्टेंट कमांडेंट बनकर मैं अपने आपको ऊँचा समझने लगा हूँ, इसीलिए उनसे बातचीत नहीं रखता।'

'उन्हें कौन समझाए कि ऊंचाई पर इंसान हमेशा अकेला होता है, जैसे मैं।'

'लाख कोशिश कर भी उन्हें समझा नहीं पाता कि मेरी जिंदगी में वो कितने अहम हैं। उनकी भी कविता की तरह एक ही शिकायत कि मैं उन्हें फोन या मैसेज नहीं करता। इसी का मतलब निकाल लेते हैं कि उन्हें प्यार नहीं करता।'

प्रभात के दिल जम सा गया।

उसने घड़ी की ओर देखा, दोपहर का एक बजा रही थी। बटमैन दूर से ही आवाज लगाता आ रहा था। प्रभात समझ गया कि दोपहर के खाने का वक्त हो चला है।

उसने रोशन की ओर देखा- वो तो पहले ही अपनी जगह से उठ चुका था। प्रभात पास गया और उसके हाथ में २० रुपए रख दिए। रोशन २० रुपए लेते हुए बोला- 'मेरा खर्चा क्यों करते हो। मैं तो वैसे भी बाज्यू को पगलाकर उनकी दुकान से रोजाना दो चॉकलेट तो खा ही लेता हूँ।' वह आँख मारते हुए बोला।

'बस इस बहाने तुमसे कुछ देर बातें हो जाती हैं।'

'अरे वाह। मेरा बाज्यू दस रुपए छोड़ो, मुझ पर एक भी खर्च न करे। दस-दस रुपए बचाकर वे जाने कौन सा परबत खरीद लेंगे।'

'वो परबत खरीद लेंगे तो भी देखना, वहाँ जीना मुश्किल होगा। पांव बार-बार नीचे की जमीन ही तलाशेंगे।'

यह कहते हुए प्रभात एसएसबी कैम्पस की ओर चल दिया।

रात ९ बजते-बजते ठंडी हवाएँ और तेज हो गई। बरसात के बाद बर्फबारी शुरू हो गई। अपने इस लकड़ी के बने आफिसर्स मेस के कमरे में प्रभात बिस्तर में अपने आप को समेटे बैठा रहा। एक ओर बनी मिट्टी के तेल की सिगड़ी में आग जल रही थी। ये ठंडे इलाकों के हर घर में हुआ करती है, जिसे स्थानीय भाषा में तंदूर या भुखारी कहा जाता। उसी के सहारे मौसम इतना खराब होने के बाद भी सर्दी में कुछ कमी थी।

गूंजी उत्तराखंड के कमाऊँ क्षेत्र में पिथौरागढ़ जिले की एक ऊँची चोटी पर स्थित गांव है। जो चीन के शासित तिब्बत, नेपाल व भारत की त्रिकोणीय सीमा पर मौजूद है। पूरे साल यहाँ बर्फ रहती है, ऐसे में आम लोगों का यहाँ रहना मुश्किलों भरा है। तभी तो सीमा पर चौकसी के लिए तैनात सशस्त्र सीमा बल व इंडो-तिब्बत बार्डर पुलिस के जवानों के अलावा आम जन-जीवन नहीं के बराबर है। हैं भी तो बस कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान यहाँ आने वाले यात्री व आसपास से आजीविका कमाने के लिए आने वाले। वे भी बर्फ गिरने के समय अक्टूबर आखिर तक निचले इलाकों में लौट जाते। एक स्टेट बैंक का छोटा सा ऑफिस और एक पुलिस चौकी। वो हर साल एक नवंबर से यहां बंद हो जाती। फिर अगले साल मई तक यहाँ सिर्फ खामोशियां ही बसती।

 

प्रभात को गूंजी आए दो महीने से ज्यादा समय बीत चुका था। बड़े दिनों बाद उसने अपनी डायरी खोली और उसमें अपना सफर दर्ज करना शुरू कर दिया। अपने दिल की बातें डायरी को बताने लगा।

'धारचूला से गूंजी तक यों तो दो दिनों में ५५ किमी की यात्रा हर किसी को पैदल ही पार करनी होती, लेकिन खुशनसीबी से चम्पावत से एकल रोटर हेलिकॉप्टर एमआई-२६ में आने का इंतजाम हो गया। यह अद्भुत और विशालकाय हेलिकॉप्टर था। अद्भुत यह भी है कि इसके सहारे ही ट्रक भी आसमान की उड़ान भर रहा था। और मात्र ३० मिनट में ही मैं गूंजी पहुँच गया। हैलीपेड पर उतरते ही बर्फ पर पड़ती धूप में आँखें चुंधियाने लगी। पहली बार बर्फ पर कदम जो रखा था। ऊँचे-ऊँचे बर्फ से ढके पहाड़, दो ओर से बहती नदियां स्वर्ग का सा अहसास कराने लगी। लेकिन शाम तक पता चल गया की स्वर्ग पा लेना इतना आसान नहीं। तप करना होता है। ना यहाँ मोबाइल नेटवर्क, ना बिजली, ना पर्याप्त पानी, इस पर हाई एल्टीट्यूड और शाम होते ही चलने वाली बर्फानी हवाएं। ऐसे में अपने आपको जिंदा रख लेना ही काफी था।'

डायरी लिखते-लिखते कब उसकी आँख लगी पता नहीं चला।

सुबह के आठ बजे संतरी ने दरवाजा खटखटाया तो प्रभात की आँख खुली। अभी उजाला होना बाकी था। तैयार होकर बाहर पहुँचा तो सूरज निकल गया था। गुनगुनी धूप में बर्फ से ढकी पहाड़ियों के बीच झाँकते ओम पर्वत की ओर कुछ देर शून्य में ताकते रहना उसका रूटीन का हिस्सा बन चुका था।

वह मैदान में सिर से पैर तक अपने को गर्म कपड़ों में ढके कम्पनी के जवानों के सामने खड़ा था। सभी के साथ सुबह की दौड़ और व्यायाम के बाद उसने जरूरी आदेश सुनाए (सैनिकों को दी जाने वाली ड्यूटी)। इसके बाद पैदल ही बार्डर तक चल दिया। लौटा तो साढ़े ग्यारह बज रहे थे। वो सीधा काली नदी पहुँचा। वो हाथ बांधे नदी किनारे कुछ देर खड़ा रहा लेकिन दूर तक ना रोशन था और ना ही उसका कुत्ता।

वॉकी-टॉकी बज उठा- 'माइटी कॉलिंग, माइटी कॉलिंग...।'

'या कॉलिंग

'साब दंडपाल साहब का हैली पहुँचने वाला ही है। आप कहाँ हैं?'

'आई विल बी देयर इन टेन मिनट।'

'यह कहते हुए प्रभात ने वॉकी-टॉकी अपनी बेल्ट पर टांग लिया और दौड़ते हुए एसएसबी कैम्पस का रास्ता पकड़ा।'

शाम को कैम्प फायर में पीने-पिलाने का दौरा चल रहा था। आग के चारों ओर बैठे सैनिक गीत गा रहे थे। दंडपाल महोदय दिनभर के गूंजी दौरे की थकान के बाद पैग ले रहे थे। सैनिकों के नाच-गाने में उनका साथ दे रहे थे, लेकिन प्रभात का मन वहाँ नहीं था। उस भीड़ के बीच का अकेलापन उसे साल रहा था।

उसकी आँखें इस भीड़ में किसी अपने को ढूंढने की नाकाम कोशिश करने लगी।

'इतने दिन कहाँ थे साब, रोशन हाथ में छड़ी लिए जमीन में कुछ टटोलते हुए बोला।'

'यार, दंडपाल आए थे दौरा करने। जरूरी था उनके साथ रहना। नाराज होकर जाते तो मुसीबत हो जाती।'

'डरते हो क्या उनसे?'

'नहीं, डरता तो बस अपनों से हूँ।'

'आप इतना उदास क्यूं हो, वो दंडपाल डांटा?'

'नहीं।'

'फिर पत्नी।'

'हाँ, सप्ताह भर में कल ही समय मिला तो सेटेलाइट फोन से कविता के मोबाइल पर बात करने कोशिश की। उसने बात नहीं की। फोन काट दिया। वो इस बात से नाराज है कि मुझे उसकी याद नहीं आती इसीलिए फोन नहीं करता। रोने लगी कि पहले तो दिन में दो बार उससे बात करता था। अब मेरा प्यार कम हो गया, तो उससे दूरी बना रहा हूँ। तू ही बता सरकारी फोन से पूरे दिन अपने परिवार से कैसे बात की जा सकती है। लेकिन वो मेरी मजबूरियाँ नहीं समझती। समझती है कि मैं बहाने बना रहा हूँ।'

रोशन ने किसी बराबरी के दोस्त की तरह उसके कंधे पर हाथ रख दिया। कहा- 'मेरी बात कराना मैं बताऊंगा कि उनकी और हर्षिता की आपको कितनी याद आती है। फिर वो खुश हो जाएंगी।'

'हाँ, रोशन- हर वक्त हर्षिता और उसका खयाल रहता है। हर्षिता अब तीन साल की है, लेकिन पैदा होने से अब तक उसके साथ कोई छह महीने ही बिताए होंगे। उसे बस ख्यालों में ही बड़े होते देखता हूँ। उसकी खिलखिलाती हँसी मेरी बर्फ सी सफेद जिंदगी में भी रंग भर देती है। उसके छोटे-छोटे पैरों में पहने पायलों का छनकना अपने आसपास सुना करता हूँ। ख्यालों में ही सही उसके नर्म हाथ मेरे गालों को छू लेते हैं तो सारी थकन उतर जाती है।'

प्रभात की आँखों में बर्फ जमने सी लगी।

'आप भी रोते हैं, लेकिन आँसू तो अंदर ही रह गए।' रोशन ने भांप लिया शायद।

अपने नन्हे दोस्त का ये स्पर्श प्रभात को भीतर तक तर कर गया।

रोशन को अपने से सटा लिया।

कहा- 'पता है रोशन इतने अकेलेपन में माँ की याद हो आती है। वो मेरे हर हाल को बिन कहे समझ जाती हैं। उन्हें कभी कहना नहीं पड़ा कि मैं परेशान हूँ। बस वही हैं जो कभी नाराज नहीं होती।'

'अच्छा, मुझे तो अच्छा लगे कि ईज्या से दूर रहना पड़े।' रोशन ने अपने हाथों की मुट्ठी पर गालों को सटाते हुए कहा।

'तुम अभी नहीं जानते रोशन, कि ईज्या के सिवा कोई नहीं जिसकी जिंदगी बस तुम्हारे इर्द-गिर्द घूमती है। वो ही है जो तुम्हारे बाहर निकलते ही भगवान से प्रार्थना करने में लग जाती है। और तब तक करती है, जब तक तुम घर नहीं पहुँच जाते।'

'अच्छा, ऐसा होता है?'

'चल अब बाकी बातें फिर कभी। परसों कुछ मेहमान आ रहे हैं, वहाँ से फ्री हो जाऊं फिर आता हूँ।'

'ठीक है, साब।'

सातवें वेतन आयोग के अध्यक्ष, उनकी पत्नी और सदस्यों की खातिरदारी में उसका पूरा दिन बीत जाता और रात को भी आराम नहीं। ऑफिसर्स मेस में उसकी जगह मेहमानों ने ले रखी थी और अब वो एक जवान के कमरे में उसके साथ था। इस थोड़ी सी जगह में सोने की आदत नहीं थी।

ऑफिस में अपनी कुर्सी से टेका लगाए प्रभात के ख्याल फिर गूंजी से नीचे धारचूला जा पहुँचे।

'वहाँ तो कितना अच्छा था। इंटरनेट भी चलता था और फोन भी। दिन में कई बार कविता से वाट्सएप पर चैटिंग हो जाती तो आस्था भी स्काईपी पर दिखाई दे जाती। मन भर जाता था। माँ सुबह-शाम टोह ले लेती। भाई-भाभी भी यूएस में होकर दूर नहीं लगते थे। कविता, हर्षिता, मां, भाई और मैं... हम सभी तो खुश थे। टेक्नोलॉजी ने दूरियां मिटा दी थीं। अब तो अरसा बीता भाई और माँ से बात किए।'

यह सोचते-सोचते उसने अपने हाथ में पकड़े कार्यालय आदेश के पन्ने को मुट्ठी  भींच लिया। छुट्टी की अर्जी फिर कमांडेंट ने खारिज कर दी थी।

पाँच महीनों में चार बार छुट्टी की अर्जी दे चुका था, लेकिन एक भी स्वीकार नहीं हुई। वो जानता था कि अब छुट्टी नहीं मिली तो अगले चार महीने और वह अपने घर की ओर जाने की नहीं सोच सकता। नवंबर से फरवरी तक इस चोटी पर बर्फबारी इतनी होती है कि यहाँ से नीचे उतरना खतरे से खाली नहीं होता। मूवमेंट पूरी तरह बंद रहता है। फिर आँख में पानी की जगह बर्फ जम आई।

करीब पंद्रह दिनों बाद वह काली नदी के किनारे बैठा था। नदी अपनी लय में बह रही थी और उसके ख्याल भी। अक्टूबर आधा बीत चुका था और सर्दी बढ़ गई थी। कई सारे गर्म कपड़े पहने, दोपहर की धूप में भी शरीर काँपने लगा। दोस्त का इंतजार करते-करते दोपहर के १२ बज गए।

'साब, साब...'

दूर से हाथ हिलाते, चिल्लाते हुए रोशन आ रहा था। बड़े दिनों बाद प्रभात दिल से मुस्कराया, जैसे कोई अपना उसके करीब आ रहा हो।

'कब से इंतजार कर रहा हूँ, कहाँ थे?'

'मैं तो यहाँ रोजाना इंतजार करके जाता। मुझे तो लगा कि अब नहीं मिल पाएंगे।'

'क्यों?'

'पता है ना कुछ दिनों में बर्फ आने वाली है। इसीलिए हमने सामान समेट लिया। मैं, बाज्यू और ईजा आज नीचे जा रहे हैं।'

प्रभात जानता था कि अक्टूबर आखिर में रोशन को जाना है, फिर भी ना जाने क्यों चौंक गया। वो नदी किनारे से उठकर अपने दोस्त के सामने घुटने टेककर बैठ गया।

'तुम भी चले जाओगे।'

'हाँ साब, अभी ही जाते हैं हम।'

'अच्छा..., कुछ देर बात भी नहीं करोगे।'

'साब, ईज्या ने कुछ देर के लिए ही भेजा है। वो पहाड़ी के छोर पर मेरा इंतजार करेंगे। यह कहते उसने एक कपड़े का छोटा सा थैला प्रभात के आगे कर दिया।

'इसमें क्या है?'

'बाल मिठाई, ईज्या ने रास्ते के लिए बनाई। आपके लिए दी है। वो कहती है कि लौटते समय किसी को मिठाई दें तो वो हमेशा याद रखता है।'

'हाँ, दोस्त। लेकिन पहले ही मेरे अपनों की यादें क्या कम थी कि तुम भी उनमें शामिल हो गए।'

'अच्छा, अपना ख्याल रखना।' इतना कहते हुए रोशन ने कदम बढ़ा दिए।

कुछ सोचकर फिर पलटा- 'और हाँ, संन्यासी बन परबत नहीं जाना, बाज्यू कहता है, वहाँ बहुत खतरा है।'

प्रभात ने रोशन को गले लगा लिया।

फिर उसे दूर तक जाते देखता रहा। शायद बर्फ जमने लगी थी, उसके पैरों को बर्फ ने वहीं जकड़ लिया। रोशन नजरों से ओझल हुआ तो पलटकर देखा, ओम पर्वत उसके साथ वहीं खड़ा था, उसी की तरह खामोश, अकेला। धूप के साथ-साथ उसका रंग नीला, और नीला पड़ गया।

प्रभात ने जैसे अपने आप से कहा- खामोशियों का रंग नीला ही होता है।

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