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न्यूटन का चौथा सिद्धांत
न्यूटन का चौथा सिद्धांत
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© Saket Shubham

Romance

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कोटा के एक होस्टल में रविवार के इम्तिहान के बाद हम तीन ज़िंदादिल लोग अब हफ्ते भर के ऑक्सीजन का इंतज़ाम कर रहे थे। ऑक्सीजन यहाँ रोज़ के पढ़ाई के बाद एक घंटे की बातचीत से भी मिल जाती थी। शतरंज में दूसरी हार के बाद मैंने खेलने से इनकार कर दिया था। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद मिर्ज़ा ने अविराज की तरफ देखा और बोला, “आज आप बता ही दें! हम दोनों को वो अफ़साना सुना ही दें!”

अविराज ने थोड़ी आवाज़ भारी की और अपने चिरपरिचित अंदाज़ में कहा, “किस अफ़साने की बात कर रहे हैं आप?”

मैंने बोला, “वही जिसके लिए आज भी अविराज उपेंद्र यादव का दिल धड़कता है और जिसकी तस्वीर आज आप मिर्ज़ा के इंस्टाग्राम से देख रहे थे।”

अविराज ने हँसते हुए बोला, “आज पंडित दो बार हारा है। आज सुना ही देता हूँ।”

अविराज ने मिर्ज़ा से पूछा, “आज तारीख़ क्या है?”

मिर्ज़ा ने टेस्ट पेपर को देख कर बताया, “11 दिसंबर 2016”

अविराज ने कुछ देर बाद बोलना शूरू किया, “आज से लगभग एक साल पहले की बात है जब उससे पहली बार बात हुई थी। साउथ एक्स में हमारी क्लास चलती थी और पूरी दिल्ली में उस समय सर्द हवा चल रही थी। क्लास के बंद कमरे में ठंड तो नहीं लगती थी फिर भी बाहर से आने के बाद शरीर को गर्म होने में थोड़ा वक्त तो लगता ही था। अब पता नहीं ये सिर्फ मुझे लगता था या क्लास के बाकी लोगो को भी की जब भी वो क्लास के अंदर आती तो कमरे का तापमान मुझे निश्चित रूप से बढ़ा हुआ महसूस होने लगता था। असम के किसी बिज़नेसमेन की बेटी को मेडिकल की तैयारी क्यों करनी थी ये बात उस वक़्त समझ नहीं आती थी। क्योंकि मैं खुद के लिए तो ये जीवन नहीं चुनता। गोल चेहरा, बड़ी आँखे और हल्का गुलाबी रंग जैसा हमारे क्लास के कमरे का था और बदन ऐसा मानो जैसे किसी ने व्हिस्की और वोडका एक साथ मिला दी हो। दिल्ली के मॉडल जैसे दिखने वाले 2 लड़कों ने उससे बात करने की कोशिश भी की थी लेकिन उसने कभी रुचि नही दिखलाई। वो बहुत कम ही लोगों से बात करती थी। मेरी उससे बात करने की तब तक हिम्मत ही नहीं हुई।"

मिर्ज़ा ने बीच में टोका, “लेकिन अविराज भाई, आप भी कम क्यूट थोड़े न हैं।"

अविराज ने हँसते हुए दुबारा बोलना शुरू किया, “मैं छपरा जिले के एक छोटे से गांव से आया हुआ लड़का था। जो अपने कमीज के ऊपर के दो बटन खोल के रखता और नीचे पैरों में हवाई चप्पल पहन क्लास आता था। एक ही चीज़ मेरी उससे बेहतर थी वो थी फिजिक्स जो मेरी उस कक्षा में शायद सबसे बेहतर थी। बोर्ड पर लिखे फिजिक्स के सवाल मैं जल्दी बना लेता और उसे देखने लगता था। वो सवाल देख अपनी कलम के पीछे वाले हिस्से को कभी होठों से रगड़ती और कभी अपनी कॉपी पर दे मारती। एक दिन मेरे पास आई और बोली, 'कैन यू हेल्प मी विथ थिस?'

मैंने कुछ बोला नहीं बस सवाल हल किया और उसे दिखा दिया। फिर उसने बोला, 'अपना नंबर दो! अच्छा छोड़ो मोबाइल दो'

मैंने बिना सवाल उसे मोबाइल थमा दिया और बस उसने अपने नंबर पर कॉल करके काट दिया और अपने मोबाइल में मेरा नंबर सेव करते हुए पूछा, 'अविराज ना?'

मैंने हाँ में सर हिलाया और फिर उसने हाथ मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोला, 'मेरा नाम रानिता है, रानिता दत्ता।'

मैंने भी हाथ मिलाते हुए जवाब दिया, 'अविराज, अविराज उपेंद्र यादव'

"उस दिन से मुझे भौतिकी में एक गज़ब का विश्वास आ गया था और न्यूटन भाई के सिद्धातों में एक और सिद्धांत मेरे लिए जुड़ गया था कि, ‘एक खूबसूरत लड़की के द्वारा की गई क्रिया और आपकी प्रतिक्रिया कतई बराबर नहीं होती। प्रतिक्रिया कई गुना ज्यादा होती है।’ इस बात को साबित आप उस वक़्त मेरे दिल की धड़कन और धमनियों में दौड़ते लाल बूंदों की गति से कर सकते हैं।

उस दिन के बाद लगभग रोज़ उसका कॉल आता और महीने के आखिर तक उसके भौतिकी के सवाल निजी सवालों में बदलने लगे और भी बहुत सारी चीज़ें बदलने लगी जैसे, अब उसका एक दोस्त था, अब हम क्लास में साथ बैठते और क्लास के बाद पास के गुमटी में ही साथ बैठ दो चाय और एक सिगरेट पीते थे और हर रविवार मयख़ाना, अंग्रेजी में कहते हैं ना बार वही जहाँ उसने हर तरह की शराब मुझे पिलाई थी। चाय, सुट्टा और शराब साथ पीने वाली इस लड़की से अब प्यार हो गया था।"

मिर्ज़ा ने टोका, “भाई इन सब में ख़र्च तो बहुत होता होगा।”

अविराज ने कहा, “नहीं! कभी नहीं, उसने कभी करने ही नहीं दिया। चाय के पैसे कभी-कभी मैं दे दिया करता था। चाय से याद आया कि जब से वो साथ बैठने लगी थी मैं हमेशा तरोताज़ा महसूस करता था। उसके बदन की खुशबू मुझे बेहद पसंद थी, जैसे चाय की।”

अविराज ने आगे बोलना शुरू किया, “जनवरी का आखिरी सप्ताह था। उसने रात को कॉल किया और रोने लगी। बचपन से लड़की होने के वजह से परिवार से वो प्यार नहीं मिल पाया और उसके अस्तित्व पर जब भी सवाल होता वो परेशान हो जाती। मैंने समझाया उसको और 3 घंटे की बातचीत के बाद और कॉल काटने से पहले उसने कहा, 'अविराज कभी तुम्हारे जैसा कोई नहीं मिला। कल मिलना क्लास में बात करनी है। गुड नाईट।'

अगले दिन क्लास में उसने ज्यादा बात नहीं की और पढ़ाई में कुछ ज्यादा ही रुचि ले रही थी। उस रात मैंने मैसेज से पूछा भी की सब ठीक है ना तो उसने बोला हाँ सब ठीक। अब अगले दिन मैंने एक मैसेज लिखा,

'पसंद करता हूँ तुम्हें! तुम मेरी आदत बनती जा रही हो। तुम्हारा ये नशा मैं उतारना नहीं चाहता।' "

मिर्ज़ा ने पूछा, “तो रानिता भाभी ने जवाब दिया।”

अविराज ने फिर बोला, “काश दे देती। लेकिन मैंने जवाब माँगा ही नहीं था। मैंने तो एक दोस्त का साथ माँगा था जैसा मैं देता था जब भी वो परेशान होती थी। उसने कभी उस मैसेज का ज़िक्र भी नहीं किया। क्लास भी अब खत्म हो गयी थी।

मैंने 1 अप्रैल को एक संदेश भेजा, 'तुम्हें वो दिन याद है जब तुमने कहा था कि प्यार तुम्हें बस मुझसे मिला है! खैर छोड़ो तुम तब भी नशे में थी। ये याद है कि कब तुमने मेरी कोई परेशानी सुनी हो। शायद लगा होगा तुम्हें की अविराज को क्या समस्या होगी। एक तो निश्चित रूप से हुई थी और मैंने बताया भी था लेकिन शायद तुमने अनदेखा कर दिया। शायद तुमने बात करने भर के लायक मुझे समझा यही बहुत था। तुम्हें प्रेयसी बनाने का सोचा था, लेकिन सच कहूँ तो तुम दोस्ती के लायक भी नहीं। माफ कर देना मुझे, तुम्हें देखने लिए, तुम्हें छूने के लिए, तुम्हारे करीब आने के लिए, तुम्हारे आँसू पोछने के लिए, तुम्हें आज ये मैसेज भेजने के लिए और तुमसे मोहब्बत करने के लिए।'

कुछ दिनों बाद एक मैसेज आया , 'मैं जा रही हूँ। इंडिया से बाहर शायद नहीं आऊँ जल्दी। मेरे घर से कोई नहीं आ रहा छोड़ने। तुम आओगे तो मुझे अच्छा लगेगा।'

3 मई को परीक्षा थी और 4 को उसकी फ्लाइट।

मैंने कैब बुक किया, उसके लिए एक गुलाब और एक फोटोफ्रेम लिया जिसमें हम दोनों की तस्वीर थी। उसके घर से एयरपोर्ट तक उसने एक शब्द नहीं बोला। बस अपना सर मेरे कंधे पर डाले, अपने दाये हाथ से मेरे बाये हाथ को जकड़े लेटी रही।

जाने से पहले वो मेरे क़रीब आयी और कहा, 'शायद हम एक दूसरे के लिए नहीं हैं। हमारे सपने अलग हैं अविराज, मुझे दुनिया घूमनी है। मुझे दुनिया की हलचल आकर्षित करती है। मैं जानती हूँ कि तुम मुझसे बहुत प्यार करते हो। जितना प्रभाव तुमने मेरे जीवन में डाला है उतना शायद ही कोई और डाल पाए लेकिन मैं तुम्हे ये प्यार नहीं दे सकती।' फिर कुछ बोल नहीं पाई।

हम टर्मिनल 3 के पास खड़े थे और हमारे बीच इतनी कम दूरी थी कि हवा भी गुज़र नहीं सकती थी। हम एक दूसरे के साँसों को महसूस कर पा रहे थे। फिर उसने अपने लबो को मेरे लबो से मिला दिया और हम कुछ पल के लिए एक दूसरे में खो गए।

फिर वो पलटी और चली गयी। न उसने अलविदा कहा न मैंने। शायद हमारे लब अपना काम कर चुके थे।"

मिर्ज़ा ने पूछा, "तो क्या अविराज भाई सब खत्म?"

अविराज ने पास में रखी पानी की बोतल से दो घूंट पानी पिया और फिर जवाब दिया,

"पता नहीं इसका क्या जवाब है लेकिन बस इतना कहूँगा कि वाकई हमारे सपने अलग-अलग थे। वो दुनिया घूमना चाहती थी और मैं उसको अपनी दुनिया बनाना चाहता था। उसको दुनिया की हलचल पसंद थी और मुझे वो जगह वो वक़्त जहाँ बस हम दोनों हो। वो जानती थी कि मैं उससे प्यार करता हूँ और मैं भी जानता था कि मैं उचक के चाँद नहीं छू सकता। वैसे ये सही है कि मैं प्रभावशाली शख्स था लेकिन उसके सामने ऐसा लगता था मानो की वो मंज़िल हो और मैं रास्तों की ज़द्दोज़हद।"

फिर अविराज ने थोड़ा रुक कर कहा, "ये अफ़साना उस डोर के तरह है जिसके दोनो सिरे जोड़ दिए गए हों।"

कॉलेज दोस्त प्रेयसी

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