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मौसम और पहली तारीख
मौसम और पहली तारीख
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© Zeba Rasheed

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सात के घण्टे बजने लगे उसकी नींद उड़ गई। वह उठकर बैठ गई। सुबह के सात बज गए लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे अभी भोर नहीं हुई है बादल छाए हुए है। आकाश में सूरज कहीं छिपा हुआ हैल रात बरसात के साथ ओले गिरे थे इसलिए सर्दी बढ़ गई। बिखरे केशों को हाथ से ठीक करते हुए सरला बिस्तर से बाहर निकली। पलंग के पास खड़ी होकर अपनी साड़ी ठीक करते बच्चों को आवाज लगाई।

 

''अरे मुन्नी...पप्पूडा...उठौ।..झट तैयार हो जाओ...स्कूल ने मोड़ौ हो जावैला।'' हाथ मुंह धोती हुए उसने फिर आवाज लगाई। ''अरे आप भी उठौ कनी...टाबरां ने तैयार कराओ...आज स्कूल छोड़कर आना पड़ेगा आज तो बहुत देर हो गई है।'' “क्या है घड़ी भर शांति से सोने भी नहीं देती।'' वह उठकर पलंग पर बैठ आंखें मसलते हुए बोला। आकाश में काले बादल इधर-उधर दौड़ रहे थे।'' अरे उठौ कनी...बैठा ई रेवौला कांई...मुन्नी,पप्पूड़ा... सुत्ता ई रैवौला कांई।" रसोई में जाते हुए उसने बच्चों को फिर आवाज लगाई। मुन्नी भाई बहन को लेकर रसोई में आ गई।'' म्हारौ मुंडौ कांई देखो हो झट तैयार हो जावो...जितने मैं पराठे सेंकती हूं ...''

 

उसने आलू छौंकते हुए कहा। सामने छत पर उसकी दृष्टि गई। बांस पर बंधा एन्टिना हवा के झौंके के साथ धीरे-धीरे हिल रहा था इसे वापस बांधना है सोचती हुई काम करती रही। रसोई री प्लास्टर उघड़ी और धुएं से काली हुई दीवारें रसोई में अंधेरा बढ़ा रही थी। सरला ने तेल के डिब्बे का ढक्कन खोल कर देखा। तेल तो पेंदे में है सरला अंगुलियों पर दिन गिनने लगी। अभी तो वेतन आने के बीच में चार दिन बाकी हैं एक तारीख को वेतन मिलेगा। एक-एक दिन का हिसाब करती। वह पूरे तीस दिन का हिसाब अंगुलियों पर रखती है।

 

वेतन तो पहली तारीख को आता है लेकिन बीच में खर्चा बहुत हो जाता है। बीस तारीख के बाद तो घर में एक सन्नाटा सा छा जाता है। दोनों के पास कहने सुनने के लिए कुछ नहीं होता। वे दोनों जानते हैं कि खाने-पीने का सामान समाप्त होने वाला है और दूसरे खर्चे भी खींचतान कर निकालने होते हैं।

 

एक तारीख जैसे घर में उत्सव होता है उस दिन वह धुली हुई साड़ी पहन दर्पण के सामने बैठकर चोटी बनाती है। घर का काम करते हुए दिन में कई बार फिल्मी गाने गुनगुनाती रहती है। शाम पति के घर आने पर वेतन हाथ में ले पति के साथ बाजार जा कर महीने भर का किराणे का सामान लाती है। बच्चों को टाफियां दिलाती है।

 

चपरासी पूनाराम को तो छुट्टी के दिन से दूसरे दिन अधिक अच्छे लगते हैं। बाबूओं के बीच फाइलें इधर-उधर करते हुए उनकी हँसी मजाक में शामिल होता। रघुआ के कैन्टिन की गर्म-गर्म भाप निकलती चाय पीता। बाबू लोगों से सिगरेट मांग कर सुट्टे लगाता। दफतर में दिन कब बीत जाता उसे ज्ञात ही नहीं होता। वो बाबूओं के आस-पास चक्कर लगाता उनके बीच होने वाली हँसी मजाक का मजा लेता। शाम पांच बजते ही दफतर बंद कर ताला लगा कर पिता से वसीयत में मिली साइकिल पर सड़कों का चक्कर लगाता घर पहुंचता।

 

''हेल...क्या दाल के पकोड़े बना रही हो.... नहीं सुमन मैं अभी घर नहीं आ सकता...तुम अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक पर जाओ ...मेरी तो अभी जरूरी मीटिंग...।'' बात पूरी करते हुए साहब ने फोन रख दिया।

 

कमरे के बाहर स्टूल पर बैठा पूनाराम ने अधिकारी और उनकी पत्नी की बातें सुनी। दाल के पकोड़े। बड़े लोगों की बड़ी बातें...साहब तो नहीं जा सकते...लेकिन मैं तो जा सकता हूं। दाल के पकोड़े। वह मन ही मन मुस्कराया। आज तो मैं सरला के साथ पिकनिक पर जाऊंगा।

 

''साहब मेरी पत्नी के नानाजी का देहान्त हो गया है'' हलाहल झूठ बोलकर छुट्टी ले ली।

 

मौसम वास्तव में बड़ा सुहावना था काले बादलों की चादर आकाश को दूर तक ढके हुए थी। हवा इतनी ठंडी थी कि बस...उसका दिल खुशी से झूम गया। कुदरत की सुन्दरता और मन मोहक दृश्‍य... देखकर मन मयूर नाच उठा। पेड़-पौधे बरसात के पानी में नहाकर ताजा हो गए थे। शीतल हवा का झौंका उसके चेहरे से टकराया ...वह भाव विभोर हो गया अजीब सी गुदगुदी अनुभव हुई।

 

पत्नी के साथ सर्दी की रेशमी धूप में बगीचे में बैठकर पकोड़े खाना कितना अच्छा लगेगा। उमंग से भरा पूनाराम तेजी से साइकिल के पैडल चलाता जा रहा था उसकी आंखों के सामने पिछले दिन फिल्म की तरह घूम रहे थे।

 

दुबली-पतली तीखे नाक नक्‍शवाली, सांवली रंगत की सरला कितनी अच्छी लगती थी। अब तो घर की परेशानियों में उलझ कर कितने वर्ष हो गए कभी दो घड़ी बैठकर प्यार के दो बोल भी दोनों नहीं बोल पाते हैं... जिन्दगी की तनातनी मैं वह घर का काम करने में लगी रहती और पूनाराम साइकिल से दफतर और घर के बीच छः किलोमीटर की दूरी तय कर थक कर घर आता। पैसों की कमी और कई कारणों से दोनों के बीच एक सन्नाटा सा पसरा रहता।

 

अब नहीं तो प्यार करने वाला वो पूनाराम ही रहा और ना ही वह चुलबुली सरला। बस एक घेरे में चलती जिंदगी है, जिसमें दोनों अपनी-अपनी भूमिका में बंधे हुए जी रहे है। उसने हाथ पर बंधी घड़ी देखी। अभी एक नहीं बजा है। घर के समीप पहुंचते हुए उसका दिल ने चाहा सरला को जोर से आवाज दूं और वह दौड़ती हुई आकर मेरे सीने से लग जाए। उसका मन हुआ शीघ्रता से घर पहुंच कर सरला को बांहों में लेकर प्यार से उसका तन-मन भिगो दूं। वह साइकिल पर जैसे उड़ कर घर पहुंचा।

 

दूसरे ही पल उसने सोचा ऐसे अचानक घर आने से सरलता किसी विपदा की आशंका से घबराकर देवताओं को प्रसाद बोलने लगेगी। वह सोचेगी कि यूं बेवक्त घर आना जरूर कुछ गम्भीर मामला है। यह सब सोचते हुए उसने घंटी के बटन पर अंगुली रख दी घंटी की आवाज सुनकर सरला ने दरवाजा खोलते ही पति को दरवाजे पर खड़ा देख घबरा कर पूछा'' कांई हुयौ...? वापस कैसे आ गए?'' “अरे कुछ नहीं यूं ही आ गया। बस मन में तेरी याद आई और मैं तेरे पास आ गया”उसने मुस्कराते हुए कहा” “मजाक मत करो...तबियत तो ठीक है ना।'' उसे वास्तव में चिन्ता हो गई। “बात मत बनाओ जी'' वह उतावली होकर पति के चेहरे पर हथेली रखकर ताप मान देखने लगी। ”बुखार तो नहीं है ...सिर में दर्द है क्या?'' “अरे भई मैं बिलकुल ठीक हूं। यूं ही छुट्टी ले ली बस” उसने हंसते हुए कहा” हटो मुझे हकनाक डरा दिया। मैं अच्छी भली बर्तन मांज रही थी।” अपने राख से भरे हाथ दिखाते व पति के चेहरे पर लगी राख देख मुस्कराती हुई बोली। “अरे यह बर्तन भांडे का किस्सा छोड़। इधर आ मेरे पास बैठ, कोई प्रोग्राम बनाते हैं।'' वह पलंग पर पसरते हुए बोला। सरला आश्चर्यचकित सी उसे देखने लगी।

 

''थोड़ी चाय तो बना ला...और साथ में थोड़ी गर्मा-गर्म दाल की पकोड़ी भी।''वह बड़ी मौज से बोला

 

''ये अचानक क्या सूझा है आपको?'' वह एक बार फिर पूछकर चाय बनाने चली गई।

''यार पूनिया लगता है यह सब मूड चौपट कर देगी।” उसने स्वयं से कहा।

''तूने तेरे लिए नहीं बनाई?'' चाय का एक प्याला देखकर उसने पूछा”घड़ी-घड़ी चाय पीवूंगी तो शक्कर कितने दिन चलेगी?''

 

चाय का घूंट लेते हुए पूनाराम का मुँह कसैला हो गया।

''कितना जताती है कि एक कप चाय अधिक बन गई तो शक्कर का टोटा पड़ जायेगा। वह स्वयं को संयत कर चुपचाप चाय पीता रहा।

''अच्छा थोड़ी देर बैठ तो सही कहीं जाने का प्रोग्राम बनाते हैं।''

''अभी नल बंद हो जायेगा...कपड़े अभी नहीं धुले तो कल तक सूखेंगे भी नहीं... बच्चे कल क्या पहन कर स्कूल जायेंगे।''सरला के चेहरे पर मजबूरी साफ झलक रही थी। वह बर्तन साफ करके कपड़े धोने बैठ गई।

 

''अच्छा काम जल्दी निपटा ले, फिर घूमने चलेंगे।” उसको तो जैसे आज धुन चढ़ी हुई थी।”अरे आप बैठा-ठाला ने कीं न कीं सूझे। अजीब -अजीब बातां सूझ रैयी है। दो बजे बच्चे घर आयेंगे...और आते ही रोटी मांगते है। आप जाइए कहीं घूम फिर आईए। मुझे तो मरने की भी फुरसत नहीं है।'' ” और मैं तेरे खातिर आया जो?” वह चिढ़कर बोला।

 

''तो मैं क्या करूं। आप बे टैम आए ही क्यों?” वह हँसती हुई बोली।

''तुझे पूछकर आना था गलती हो गई बस। अच्छा काम निपटा कर थोड़ी दाल की पकोड़ी तो बना लेना...'' ”देखो जी, अभी दाल के पकौड़े बनाऊंगी तो पूरे चार समय का तेल समाप्त हो जायेगा। 'सरला की भवों में सल पड़ गए। वह भुन-भुन करती काम करती रही।

 

''अरी भागवान, आज तो पकौड़े खिला देती कल की कल सोचेंगे देख मौसम कैसा अच्छा है।'' वह ढीठ होकर बोला।

 

सर्दी की कुनकुनाती धूप आंगन में पसरने लगी। ठंड से ठिठुरते पंछी घोंसलों से बाहर निकल गए थे मोहल्ले के नंग-धड़ंग रहने वाले बच्चे भी सर्दी के कारण फटे-पुराने कपड़े पहन कर घर के सामने पिचपिच करती गीली मिट्टी में खेल रहे थे।

 

''मैं कितने चाव से घर आया था लेकिन इसे तो कोई परवाह ही नहीं है। अन्दर ही अन्दर उसकी खुशी दम तोड़ने लगी वह पलंग पर लेट गया। लेटा-लेटा सोच रहा था बगीचे की हरी कोमल दूब पर बैठ सरला के साथ पकौड़े खाना और पति-पत्नी बैठ कर प्यार भरी मीठी-मीठी बातें करते मैं भी तो रंगीन सुहावने सपनों पर चर्चा करना चाहता हूं। मगर इन श्रीमती जी को तो किसी बात से कोई मतलब ही नहीं।

 

बरसात का मौसम तो जैसे सरला का शत्रु है। जूतों के साथ कीचड़ घर में आता है तब इसे क्रोध आता है। कपड़े नहीं सूखते हैं तो.....और वर्षा आती है तब आंगन गीला होने की परेशानी। गीला आंगन इसे नहीं सुहाता। सर्दी में ओढ़ने-पहनने की परेशानी तो गर्मी में बिजली पानी की कटौती का दुःख। सभी मौसम जैसे इसकी जान के दुश्मन है।

 

धूप के झीने पर्दे से पेड़ की छाया सामने की दीवार पर पड़ रही थी। थोड़ी- थोड़ी देर से पेड़ हिलता तो छांव भी हिल रही थी। उसने आस-पास के घरों की ओर दृष्टि डाली। हर घर का सन्नाटा कह रहा था कि बच्चे घर नहीं है तो का खामोशी छाई है।

 

उसने पहले भी कभी कोई फरमाइश की तब भी यह नहीं मानती।

''सरला आज सिनेमा चले”

''आज नहीं आज मेरे बहुत काम है आप जाओ। आदमी अकेला बाहर घूम कर आ सकता है”

 

वह जानता है यह सब पैसा बचाने के लिए ना करती है। यह मशीन की तरह पूरे दिन काम में लगी रहती है। एक-एक पैसे को दांत से पकड़ती है। मानों सब चिंता इसको ही है। मुझे तो जैसे कोई फिकर ही नहीं। घर- घर जैसे पूरी दुनिया में यह बेचारी ही घर का काम करती है दूसरी कोई औरत काम नहीं करती। दिमाग आसमान पर चढ़ गया है इसका।” वह मन नहीं मन ताव खाता पलंग पर बैठा बड़बड़ाता रहा। धीरे-धीरे उसकी चिढ़ बढ़ती गई। सरला के प्रति क्रोध बढ़ने लगा। वापस पलंग पर लेट गया। वह आवल-कावल सोचने लगा। उसका मन हुआ इसे रुई की तरह धुन दूं।

 

पलंग पर सोते-सोते एक बार फिर उसने सरला की ओर देखा। अक्सर जब भी वह रंगीन सुहावने सपनों की बातें करना चाहता, तब वह घर का रोना लेकर बैठ जाती। पति से पैसों को लेकर झगड़ा, बच्चों के स्कूल के कार्य कराने की परेशानी या महंगाई की बातें करती रहती। पूनाराम उसकी बातों से पूरी तरह परेशान हो जाता।

 

एक तो सरकारी नौकर और बाबू लोगों का साथ...करेला और नीम चढ़ा । सब बात का यह नतीजा कि किसी न किसी बात से वह सरला पर रोब रखता । स्वयं को किसी बाबू से कम नहीं समझता। सरला दिन रात घर की जिम्मेदारियों के कारण से दिन पर दिन घर से जुड़ती गई और स्वयं को हालात के हवाले कर दिया उन दोनों की सोच में सदियों का फासला होता गया। वह कम बोलती। अधिकतर चुप ही रहती। सरला ने काम करते हुए अचानक पति की ओर मुस्करा कर देखा। उसकी तिरछी नज़र पूनाराम की नजर से टकरा गई। पति का बेवक्त घर आना...प्यार भरी बातें...सुख लूटने का न्यौता...वह सब समझती है। वह अन्दर ही अन्दर खुश हुई उसके होंठों पर दबी मुस्कान थी। पास जाकर बैठूं या काम करूँ?

 

पति क्या सोच रहा है क्या ....ऐसी बात नहीं है कि वह समझ नहीं पा रही। पति की भवों पर पड़े बल देख कर वह थोड़ी परेशान हुई। काम छोड़कर पास जा खड़ी हो गई।

 

उसके कोमल हाथ पर मजबूती से अपना हाथ दबाते हुए उसने पूछा,''तेरा मन नहीं होता मेरे पास बैठने का?''

 

''तुम तो मेरे ही हो।... कहीं भाग रहे हो क्या?'' उसने हंसते हुए पूछा। उसकी इस प्रकार सरल हँसी के साथ पूछने पर पूनाराम को हँसी आ गई। वह हँसते हुए वापस जाकर काम करने लग गई उसके विचारों ने पलटा खाया। कितनी भोली है यह। पूरे घर का काम अकेली करती है इतने थोड़े पैसों से कितना सोच समझकर घर चलाना बहुत कठिन काम है कितना मुश्किल से घर का गाड़ा चलाती है। बेचारी रात दिन घर की चक्की में पीसती है। इसका क्या कसूर।

 

मन में विचार आते ही उसे सरला पर आया क्रोध हवा हो गया। उसके दिल में सरला के प्रति प्यार की गहरी लहर उठी। रुपये पैसों की कमी से कितने झगड़े उत्पन्न हो जाते हैं। जब परेशानियां उठानी पड़ती है, तो मन की उमंगें स्वयं ही समाप्त हो जाती है...सच्चाई तो यह है। सरला के प्रति प्यार से ओत-प्रोत प्यार भरी नज़रों से देखता अचानक उठकर उसके पास जा खड़ा हुआ।

 

''अब क्या हुआ?... क्या फिर कोई नई फरमाइश सूझी है आपको।'' वह मुस्कराती हुई बोली

''हां ...अबै तौ नवी टणांटण फरमाइश है... अपने गरीबी का दोस्त आलू।...बहुत सारी आलू की सब्जी बना ले और गर्म-गर्म रोटियां।... आज तो मैं चूल्हे के पास बैठ कर खूब मजे से खाऊंगा।...पहली तारीख तो अभी बहुत दूर है। ''वह मुस्कराते हुए बोला

''बरसात..... पहली तारीख देख कर नहीं आती है।” पति-पत्नी जोर से हंसने लगे।

 

 

#मौसम और पहली तारीख

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