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मज़बूरी
मज़बूरी
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© Dr Aditi Goyal

Drama Tragedy

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करीब 10 साल की रही होगी तब का एक वाकया याद आ रहा है। हम एक छोटे से कस्बे में रहते थे। एक दिन सुबह-सुबह आकर कामवाली बोली, "अम्माजी क्या बताऊँ, गजब हो गया ! छोटी सी जगह में भी यह सब काम होने लगे हैं। अम्मा ने कहा, "अब आगे भी कुछ बोलेगी या यूँ ही बड़बड़ाती रहेगी बस !" " क्या बताऊँ कल रात गावँ में एक 13 साल के एक लड़के ने 5 साल की लड़की को खराब कर दिया, अम्मजी जमाना बहुत खराब आ गया है, लड़के ने लड़की के लोहे की सलाख डाल कर ये सब किया", दादी और माँ के तो रोगंटे खड़े हो गए।

मैं इत्ती छोटी भी ना थी पर कुछ समझ न पाती थी, उस दिन के बाद से मेरा पार्क में देर शाम तक अकेले खेलने जाना बंद करा दिया गया। मेरे लाख समझने के बाद भी कोई सुनने को तैयार न था। आज इन सब बातों का मतलब समझ पाई हूँ तो लगता है की लड़की चाहे दो माह की हो चाहे सत्तर साल की हो उसे हर जगह ऊपभोग की वस्तु के रूप में ही देखा जाता है। कहीं पिता समान रक्षक ही पुत्री का बलात्कार कर रहे हैं , कहीं माँ बाप पेट पालने के लिए अपनी बच्चों को बाजार में बेच रहे हैं, ये इंसान की कैसी मज़बूरी है।

कहानी बचपन मजबूरी ज़िन्दगी इंसान

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