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चींटियों का प्रेम
चींटियों का प्रेम
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© Deepak Tongad

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रेगिस्तान में पड़ती गर्मी से इंसान ही नहीं जीव - जन्तु , पक्षी किट - भक्षी भी परेशान हैं, बढ़ती गर्मी से और उन्हीं में से एक चीटी जो मैं इस समय महसूस कर रहा हूँ। मैं गर्मी के दिनों में छुट्टी बिताने रेगिस्तान गया था जो मैने वहाँ पर महसूस किया मैं वो ही लिख पाया।

मैने रेगिस्तान में रेतों के बिच एक चीटियों के झुंड को देखा जो गर्म रेत पर बिल्कुल भी नहीं चल पा रही थी, मैं उनके पास ही खड़ा था वो छाया व पानी के लिए तरस रही थी मैं वहाँ पर खड़ा ये सब महसूस कर रहा था मैं उनको और करीब से देखने के लिये

घुटने टेक के नीचे बैठ गया मेरा पूरा ध्यान सिर्फ उनकी तरफ था अब तो मैं उनकी बातों को सुन भी पा रहा था

वो आपस में बात कर रही थी। एक चींटी दूसरी चींटी से औरी चुटकी - जी मम्मी

तभी एक मोटी सी चींटी जोर से चिल्लाकर बोली हम सब को सावधान हो जाना चाहिए रेत बहुत गर्म हैं और ऊपर से धूप निकल रही हैं और तेजी से हवा भी चलने वाली है ये सारा गर्म रेत उड़कर हम सब के ऊपर आ जायेगा और गर्मी से भून जाएँगे।

कुछ चींटीया बोली - अब हमे क्या करना चाहिए

तभी वो चींटी बोली - अब तो बस हमे भगवान ही बचाये।

हमे आगे बढ़ता रहना चाहिए वो भी तेजी से।

सब चीटीयों ने एक सुर में आवाज लगाई - हाँ

तो देर किस काम की - चले

सभी चींटीया गर्म रेत पर चलने लगी वो भी तेजी से और मैं उनके पिछे - पिछे चल रहा था तेज गर्मी से व तेज गर्म हवाओं से मेरी भी हालत ख़राब थी जो मैं आप को बता नहीं सकता वो चींटियाँ तेजी से चली जा रही थी और मैं उनके पिछे - पिछे चल रहा था। तेज धूप व गर्म हवाओं ने मुझे परेशान कर दिया मैं किस तरह अपने मुंह को कपड़े से ढका था और ध्यान पूर्वक चीटियों को देखता और तेजी से चीटिया भी चली जा रही थी और मैं भी उनके पिछे - पीछे थोड़ी दूर चलने के बाद कुछ चीटियाँ गर्म रेत व गर्म हवाओं की वजह से टूट जाती हैं और थक जाती हैं अब उनको आगे चलना मुश्किल सा हो गया है वो अब चलने को बिल्कुल भी तैयार नहीं है मै देख पा रहा हूँ कि चीटियाँ अपना सर रेत में गाड़ लेती है अब वो बिल्कुल भी राजी नहीं हैं आगे चलने के लिए मैं ये सब अपनी आँखों से देख पा रहा हूँ कुछ चीटियाँ उनके पास आती हैं और संभालने की कोशिश करती हैं। पर वो पूरी तरह टूट चुकी हैं उन चीटियों में से आवाज आती हैं कि हम सब अब यही मरेंगें

ये सब देखकर मूझे रहा नहीं जाता मेरी आँखें भर गई थी मैने तेजी से अपना बैग उतारता हूँ बैग की चैन खोल कर उसमे से कुछ बिस्कुट को तोड़कर उनके समीप गिरा दिये बिस्कुट का चुरा कर के जैसे ही चींटियों को पता चलता है कि इसे हम खा सकते हैं तो सभी चींटियो में अफरा - तफरी मच जाती है बिस्कुट खाने में जूट जाती है कुछ चींटिया बिस्कुट को बहुत मजे से खाती हैं मैं उनको बड़े गौर से देख व सून रहा था तभी मुझे आवाज़ आती है बस अब पानी और मिल जाये तो मजे आ जायें। पर रेगिस्तान में पानी कहाँ से मैंने ये सुनते ही अपने बैग से बोतल निकाली चीटियों के ऊपर पानी का छिड़काव किया वो बिस्कुट के साथ गीली ज़मीन पर पानी की बुंदों के ऊपर मुंह गाड़ लेती थी और बड़े मजे से पानी पीती हैं और सारी चींटियाँ राहत की साँस लेती है। राहत की सांस लेकर आगे बढ़ती हैं जैसे ही वो एक झील के किनारे पहुंचती है जिसमें पानी बह रहा था अब वो उसे कैसे पार करे ये सोच रही थी। मैं ये सब देख पा रहा था ये सारी चींटियाँ परेशान हो जाती हैं और एक सूखे पत्ते पर इकठ्ठा हो जाती है हार थक कर बैठ जाती हैं। मैं ये सब बड़े ध्यानपूर्वक देख रहा था।

तभी मेरे दिमाग मे एक सुझाव आया क्यों ना इस गिरे हुये पेड़ को उस नदी के आर पार रास्ता बना दूँ मैंने कड़ी मेहनत करने के बाद उस पेड़ को नदी के आर पार लगा देता हूँ और अब उस पार करने के लिए रास्ता बन जाता है छोटे जीव जन्तु उस पर चलकर जा सकते हैं

पर चींटियाँ उस पेड़ से थोड़ी दूर थी वो बिल्कुल उस नदी के किनारे पर ही एक पत्ते पर बैठी थी जैसे ही मैं उस पत्ते को उठाता हूँ सभी चींटियाँ विचलित हो जाती है इधर - उधर भागने लगती हैं कुछ चींटियाँ पत्ते पर ही बैठी रहती हैं वो ये सोचने की कोशिश करती है आखिर ये हो क्या रहा हैं मैं उस पेड़ पर ले जाकर उस पत्ते को रख देता हूँ धीरे - धीरे चींटियाँ उस पत्ते से उतर कर पेड़ के तने पर आ जाती हैं जो उस नदी के आर पार लगा था सभी चींटिया इधर - उधर मँड़राती हैं और समझ जाता हूँ कि अब वो सब कुछ समझ चुकी हैं सभी चींटियाँ मुंह उठाकर मेरी तरफ देखती हैं और मैं उनकी तरफ मैं समझ जाता हूँ वो क्या कहना चाहती हैं मैं खुद से मुस्कराता हूँ और वो चींटियाँ भी अपनी मंजिल की तरफ बड़ जाती हैं और मैं अपना बैग उठाता हूँ और मैं भी अपनी मंजिल की तरफ चल पड़ता हूँ।

गर्मी रेत रेगिस्तान

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