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हिम स्पर्श - 2
हिम स्पर्श - 2
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© Vrajesh Dave

Drama

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फरवरी का महीना कुछ क्षण पहले ही विदा ले चुका था। अंधेरी रात ने मार्च का स्वागत हिम की वर्षा से किया। वह ग्रीष्म के आगमन की दस्तक का महीना था, किन्तु तेज हिम वर्षा हो रही थी।

एक युवती अपने कक्ष में थी। पर्वत सुंदरी थी वह। आयु चौबीस वर्ष के आसपास। पाँच फीट छ: इंच की ऊंचाई, पतली सी, पारंपरिक पहाड़ी मुस्लिम लड़की के वस्त्र में थी वह।

उसकी पीठ दिख रही थी। पीठ पर लंबे, काले, घने, खुले और सीधे बाल लहरा रहे थे। खुले बाल उड़ते थे और बार बार उसकी आँखों के सामने आ जाते थे, वह उसे पीछे धकेलती रहती थी। किन्तु बाल जो थे नटखट, बार बार आँखों के सामने आ जाते थे। फिर भी उस लड़की की अपने उड़ते बालों को बांधने की इच्छा नहीं थी और ना ही उसने ऐसी कोई चेष्टा की। उसे खुले बाल पसंद थे। मुझे भी खुले बालों में वह पसंद थी। आपको भी ?

सहसा वह घूम गई।

उसका मुख दिखने लगा। यही मनसा थी ना आप की ?

पहाड़ी घाटी की भांति गहन और तेज उसकी दो आँखें। सौन्दर्य की भांति सुंदर थी वह। चुस्त काले कपड़ों में सज्ज थी वह। उस के शरीर के प्रत्येक घुमाव सौन्दर्य से पूर्ण थे, लावण्य से भरे थे।

उसके अधरों पर मीठा सा स्मित था, कोई गीत था। उस के अधर, सहज ही गुलाबी थे। नहीं, उसने कभी लिपस्टिक का प्रयोग नहीं किया था। वह सदैव सभी शृंगार प्रसाधनों से दूर ही रहती थी। वह जन्मी ही सुंदर थी और बड़ी भी सुंदर ही हुई थी। उसने अपने सौन्दर्य को अखंडित रखा था। वह अभी भी सुंदर थी।

उस के शरीर का रंग बहते रक्त के कारण लाल, अपितु गुलाबी सा लगता था। उसके गाल गुलाबी थे। कोई चिंता उसके मुख पर दिख रही थी जो उस मुख को और भी लाल बनाती थी, उसके सौन्दर्य में अभिवृध्धी करती थी।

वफ़ाई नाम था उस यौवना का।

वह अपना सामान जुटाने में व्यस्त थी। कल उसे दो हजार किलो मीटर से अधिक दूरी की यात्रा पर निकलना था। वफ़ाई को वह यात्रा जीप से करनी थी, स्वयं गाड़ी चलाकर।

कुछ दिनों के लिए वह अपना सब कुछ- अपना गाँव, अपना पहाड़, पति बशीर, बॉस मनोज दास, साथी सहयोगी--- सब को भूलकर कहीं एकांत में रहना चाहती थी अथवा कुछ समय स्वयं के साथ व्यतीत करना चाहती थी ? जो भी हो, वफ़ाई ने इस पूरे लंबे मार्ग पर स्वयं ही जीप चलाकर यात्रा करने का साहसी निश्चय कर लिया था।

घड़ी में आधी रात के साढ़े बारह बज चुके थे। वफ़ाई की यात्रा की तैयारी अभी भी अधूरी थी। वफ़ाई सब काम शीघ्रता से कर रही थी किन्तु समय वफ़ाई से अधिक गतिमान था।

घर के अंदर ठंड थी तो घर के बाहर ठंडी हवाएँ चल रही थी। किन्तु वफ़ाई ने भी ठंडी हवाओं का कड़ा सामना किया। अंतत: अपनी तैयारी पूर्ण कर ली।

एक गहरी सांस ली और वफ़ाई ने वातायन से बाहर देखा। मार्ग किसी मृत शरीर की भांति शांत था। काली अंधेरी रात में किसी घर से आने वाले मंद प्रकाश की किरणों में कहीं कहीं हिम चमक रहा था। हिम अनराधार बरस रहा था। उसने अपनी दायीं हथेली खिड़की से बाहर धर दी। ठंडे हिम से उसकी हथेली भर गई। एक शीतल लहर शरीर में प्रवाहित हो गई। वह कंपित हो गई। वफ़ाई ने हथेली अंदर खींच ली, वातायन बंध कर दिया।

ठंडी रात बीत गई। वफ़ाई जाग चुकी थी, अपनी यात्रा के लिए तैयार थी। उसने द्वार खोला और गगन की तरफ देखा। कल रात की तुलना में वह स्वच्छ लग रहा था। हिम थक गया था अथवा गगन के पास धरती पर गिराने के लिए हिम बचा ही न थ।

गहरा नीला आकाश पूरी तरह से स्वच्छ नहीं था। बिखरे हुए खाली बादल गगन के मैदान पर दौड़ रहे थे। प्रकाश न तो तेज था न धुंधला था। पहाड़ों पर सूरज को उगने के लिए संघर्ष करवफ़ाई अपनी यात्रा के लिए तैयार थी, नई यात्रा को लेकर उत्तेजित भी थी, उत्साहित भी। वफ़ाई का शरीर कोई भिन्न ही भाषा बोल रहा था, कुछ भिन्न अनुभव कर रहा था। उस ने पारंपरिक वस्त्रों को त्याग दिया। जींस और टॉप पहन लिया। काले जींस पर मदिरा सा लाल रंग का टी शर्ट और खिलाड़ियों वाले जूते थे। उसने एक नयी उमंग और नया स्मित भी पहन लिया था।

उस ने अपना सामान संभाला और जीप में डाल दिया। अम्मा उस की सहायता कर रही थी। उस ने अम्मा की तरफ एक स्मित किया। अम्मा ने मौन, जवाबी स्मित दिया।

वफ़ाई ने अपने कक्ष को बंध किया, उसे एक मीठी नजर से देखा और मोहक स्मित दिया। द्वार से छुटकर हिम का एक टुकड़ा नीचे गिरा। वफ़ाई नीचे झुकी और हिम के उस टुकड़े को उठा लिया, उसे हथेली पर रख दिया। हिम पिघल गया, पानी में परिवर्तित हो गया, वफ़ाई के शरीर को ठंडी लहर दे गया। उसे वह मनभावन लगा। वह हंस पड़ी।

“तुम हंस क्यूँ रही हो?” अम्मा ने पूछा।

“समय भी इस हिम की भांति है, अम्मा। यह समय शीघ्र ही पिघल जाएगा और मैं लौट आऊँगी। इस प्यारी सी धरती के पास, इस ऊंचे पहाड़ों के पास मैं लौट आऊँगी। मैं शीघ्र ही लौट आऊँगी, मेरी प्रतीक्षा करना।“ वफ़ाई ने हथेली पर पिघल चुके हिम के पानी की कुछ बूंदें पी। वफ़ाई तृप्त हो गई।

वफ़ाई ने जीप चालू कर दी, हाथ हिलाकर, स्मित देकर अम्मा से विदाय ली। अम्मा स्थिर सी खड़ी रही, जाती हुई वफ़ाई को शून्य भाव से देखती रही।

वफ़ाई की कच्छ यात्रा प्रारम्भ हो गई।

सारा नगर शांत था, सो रहा था। मार्ग पर ना कोई पुरुष था न कोई स्त्री थी। कुछ पंखी थे जो गिरकर टूटे हुए हिम के साथ खेल रहे थे, मधुर ध्वनि रच रहे थे, गीत गा रहे थे। एक मधुर स्मित वफ़ाई के अधरों पर आ गया। मन और शरीर में आनंद व्याप्त हो गया।

वफ़ाई की जीप अपने मार्ग पर चलने लगी।

अम्मा, घर, गलियाँ, लोग, मकान और नगर धीरे धीरे पीछे छूटते जा रहे थे। जीप के दर्पण में वफ़ाई को यह सब कुछ दिखाई दे रहा था। वफ़ाई ने जीप रोक दी, चाबी घुमाई और जीप का इंजन शांत हो गया। समय भी रुक गया। वफ़ाई जीप से बाहर निकल आई।

जीप हिमपात पहाड़ी

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