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बेटी बनी सिपाही
बेटी बनी सिपाही
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© Sanjeev Singh Sagar

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ठंढ़ का मौसम है ।सुबह के पाँच बज रहे हैं ,१३ साल की बच्ची  पूनम बर्तन मांजे जा रही है ,कोई उसके दर्द को समझता ही नहीं है ,पापा सप्ताह में एक दिन घर आते हैं ।जब तक वे घर पर रहते हैं, पूनम को चैन रहता है ।उनके जाते ही दुःखों का पहाड़  पूनम पर टूटने लगता है ।आज गणतंत्र दिवस है ।भोलू नई पोशाक पहनकर स्कूल चला गया ।बेचारी पूनम मोटे - मोटे कपड़े पत्थर पर पटक रही है ।माँ आई और लगी सुनाने "महारानी जी और भी काम है ।इतने से  कपड़े में ही सारा दिन मत बिता देना ।" पूनम अपना काम करती रही माँ अंदर चली गई ,पुनः वापस आकर - "ये भोलू के कुछ कपड़े हैं, इसे  भी साफ कर दे ,कल उसके ट्यूशन के लिए बात करने जाना है ।" माँ की ये बातें पूनम को दुःखी कर गई ।आखिर क्यों इतनी बैमनष्यता  मेरे साथ कर रही है? मैं बेटी हूँ इसलिए न? वह मन ही मन हजार बातें सोच रही है और काम किए जा रही है ।जब पूरी तरह थक गई तो दिवार से लग कर, सड़क  पर जाते हुए हम -उम्र बच्चों को देखने लगी ।उसकी आँखें बरस रही है और दिल हजार सवालों का जबाव मांग रहा है "क्या तू इंकलाब का नारा लगाकर जानेवाले बच्चों से अलग है ?तू किस जुर्म की सजा काट रही है ? कहाँ गुम हो गई है तुम्हारी आजादी? तुम्हारी आजादी के लिए कौन सत्याग्रह करेगा?" उसका ध्यान टूटा और सारी बातें पल में भूलकर काम में लग गई ,व अपनी बेइज्जती की डर से तेजी से काम करने लगी ,माँ पड़ोसन  के घर गई है ।पूनम अपना सारा काम खत्म कर के बैठ गई , परंतु माँ अभी तक नहीं आई  ।वह नहा धोकर बरामदे पर बैठी  है ,उसे याद आया कि कल पापा फोन पर बता रहे थे, इस  बार चमेली की सुगंधवाली तेल लाए थे ।"तू लगाना, फिर तेरे बाल परियों के जैसे हो जाएंगे ।"पापा बहुत प्यार करते हैं ,माँ के हिस्से का प्यार भी वही देते हैं ।वह उठकर अलमारी  से तेल का बोतल लेकर, थोड़ा  सा तेल अपने बाल में लगा ली ।इसी बीच माँ आई और पूनम को इस  तरह से तेल लगाए देखकर - "आज बड़ी  बन ठन के बैठी हो , कोई चक्कर है क्या? किसी से मिलने जाना है क्या?" माँ की इस  तरह की फजीहत से आहत होकर, वह अपने कमरे में जाकर बंद हो गई ।कुछ देर बाद पापा के आने की खबर सुनकर, वह बाहर आई ।पापा एक पल पूनम को देखने के बाद - "तेरा चेहरा उतरा सा क्यों है? माँ ने कुछ कहा है क्या?" सारे सवालों के जबाव में पूनम ना में सर हिला दिया  ।माँ के खिलाफ शिकायत करने से उसकी तकलीफें दूर नहीं होती और बढ़ जाती है , क्योंकि पापा तो मेहमान बनकर घर आते हैं और रहना तो माँ के साथ ही है ।वह पापा के  जूते और कमीज नियत जगह पर रख दी ।कुछ देर बाद पापा ने  आवाज लगाया  - "पूनम बिटीया, जरा यहाँ आना ।" वह अपने कमरे से भागकर पापा के पास आ गई ।पापा प्यार से पास में बैठा कर, बालों पर हाथ फेरते हुए -"तुमने हिन्दी की किताबें पढ़ना पूरी तरह से सीख ली न? "पूनम बड़ी  तेजी से एक कविता और एक कहानी पढ़कर  उन्हें सुना दी ।वे अपने अलमारी  से कुछ नई किताबें और एक काली जैकेट निकालकर लाए -" ये जैकेट ठंढ़ से बचने के लिए और ये किताबें तुझे अँग्रेजी मेम बनाने के लिए ।"वह एकाएक पापा के गले से लिपट कर रोने लगी ,पापा सारी बातें समझते हैं, पर किसके खिलाफ जाएंगे? माँ तो मोम दिलवाली, सुन्दर स्वभावा  वाली होती है, परंतु पूनम की माँ में वैसा कुछ भी नहीं है ,पूनम रात में पापा के पास ही सो गई ।आज सुबह में उसे थोड़ी राहत मिली  है ,माँ स्वयं ही सारा काम निपटा चुकी है ।पूनम उठी और नहा धोकर पापा के साथ ही खाने बैठ गई ,भोलू दौड़ते  हुए कहीं से आया और पापा के सामने खड़ा हो गया ।पापा उसे प्यार से - "आ तू भी बगल में बैठ जा ।" वह गुस्से से देखते हुए - "मैं वहाँ बैठूँगा ।" पूनम की ओर इशारा  करके बोला ।पापा समझ गए कि ये द्वेश,  माँ की दी हुई है  ,पूनम वहाँ से हट गई और भाई को बैठने के लिए जगह  दे दी ।पापा एकटक से पूनम को देखते ही रह गये ।पापा आज अपने काम पर वापस जा रहे हैं ,इसबार माँ को  समझा दिए हैं कि पूनम को अब रोज स्कूल भेजना है ।माँ कहाँ बदलने वाली है ,जब तक घर का सारा काम करवा नहीं लेती, स्कूल जाने नहीं देती ।हर  दिन मास्टर साहब फटकार लगाते हैं, फिर भी वह सारा काम खत्म करके ही स्कूल पहुँचती ।भोलू को स्कूल बस लेने आती है ।पूनम को एक कोस पैदल जाना पड़ता है  ।अब मास्टर साहब भी पूनम की मजबूरी को समझ गये हैं ।भोलू नई जैकेट को लेकर माँ के पास आया - "माँ, मैं ये पहनुंगा ।" पूनम जैकेट देखते ही हाथ से ले ली ।वह रोने लगा और हाथ से छीनने लगा ,माँ गुस्से से पास आकर - "छोड़ दे! इसके बाप ने दिया हैं ।तुझे जो है, वही पहन ले ।" भोलू  मानने को तैयार नहीं है ,वह खुद ही गिर गया और बहन पर आरोप लगा दिया ।माँ गुस्से में दो थप्पड़  पूनम को लगाकर जैकेट लेकर बेटे  को दे दी ।भोलू  के पास  पहले से ही दो स्वेटर, दो जैकेट और दो टोपियाँ हैं ,पूनम के अंदर से एक आवाज आई - "बेटी, वीर सिपाही मुश्किलों से डरते नहीं हैं, आगे बढ़ते हैं ।ये ठण्ड  कल ही ख़त्म हो जाएगी , फिर ये जैकेट किस काम की होगी?" वह अपने को कठोर बना मन ही मन निर्णय कर स्कूल चल दी ।एक पुराना स्वेटर और सर पर एक रूमाल बंधा है ।इतने कम  कपड़े  में कोई और बाहर नहीं निकलता ।लोग पूनम को ही देख रहे हैं ,कैसी  लड़की  है? एक वीर सिपाही की तरह ठंढ़ को चीरते हुए अपनी मंजिल की ओर आगे बढ़ रही है ।वह स्कूल के खाली वक्त में खेलने के वजाए, अपनी माँ के बारे में सोचते रहती है ।वह मेरे प्रति ऐसा क्यों करती है? क्या उन्होंने  मुझ जन्म नहीं दिया  ? लगता है, उन्होंने मुझे अपना दूध पिलाने में भी दो रिती की होगी? आखिर मैं बच कैसे गई? इसी  तरह के बहुत सारे सवाल सोचते रहती है ।पापा आज पूनम को स्कूल से आते देखकर फूले न समाए ।वे घर के गेट पर खड़े  होकर देख रहे हैं ।वह ज्यों ही पास आई - "मेरी बेटी जरूर एक दिन वीर सिपाही बनेगी ।" वह पापा के हाथ पकङ कर अंदर आ गई ।माँ देखते ही बुद बुदाने लगी - "अब तो इसके  भाव दो किलो बढ़ जायेगा ।" आज पापा के लिए खीर बनी है, परंतु किसी के यहाँ से जरूरी बुलावा आया और वे चले गये,पूनम पढ़ रही है ।भोलू उठा और रसोई में चला गया ,माँ अपने कमरे में कुछ कर रही हैं ।वह चिल्लाकर - "मुझे भूख लगी है!" माँ तेजी से आई और खाना लगा दी ,वह भर पेट भोजन कर माँ के साड़ी  से अपना हाथ पोंछते हुए - "थोङा सुबह के लिए भी रख देना ।" माँ ने  हां में सहमति जता दी ।पूनम खाने बैठी ,जितना भूमि देवता खीर चढ़ता है, उसे खीर मिला और दो दिनवाली रोटी तथा एक ताजी रोटी सामने मिली ।वह प्रेम से खा ली और सोने के लिए उपर जाने लगी ।उपर चढ़ने के लिए बांस की सीढ़ी थी ,भोलू भागकर बाहर निकला और सीढ़ी को हिलाते हुए-"पहले मैं चढ़ूँगा ।"पूनम कह  ही रही थी कि रुक जा मैं नीचे आ जाती हूँ, वह इस  बार जोर से सीढ़ी हिलाया और पूनम धड़ाम  से ज़मीन पर आ गिरी ।माँ  ने ध्यान नहीं दिया  ,उसके सर से खून निकल रहे हैं ।कुछ देर बाद भोलू ने  ही बताया तो वह बाहर आई ।कुछ पल तक देख कर  खुद को यकिन  दिला ली कि सच यह चोट गहरी नहीं है  , वह डॉक्टर के पास नहीं गई ।वह बेटे की इस  व्यवहार से एक बार भी परेशान नहीं हुई ,उसे कम से कम डांटना चाहिए, पर इतना  भी नहीं की । बस  पापा के डर से एक डॉक्टर को बुलवा कर दिखलाई ।डॉक्टर साहब हल्की  चोट बता कर केवल दर्द कम होने की दवा देकर चले गये ।पूनम रात भर दर्द से छटपट करती रही ।सुबह  जब पापा आए तो उन्हें यक़ीन  नहीं हो रहा था कि उनकी  बेटी बेहोश पड़ी है ।माँ ने लंबी चौड़ी  बनावटी कहानी सुना दी ,वे पूनम को शहर के बड़े अस्पताल में ले गये  ।यहाँ डॉक्टर ने एक पैर टूट जाने तथा सर में गहरी चोट होने की बात कही  ।पापा पूनम के सामने खङे होकर आंसू बहा रहे हैं ।उसकी आँखें खुली और पापा को एक गहरी निगाहों से देखते हुए_"पापा अब मैं आपके लिए कभी सिपाही नहीं बन पाऊँगी ।"वे पूनम के करीब आकर - "नहीं रे मेरी गुड़िआ तू एक दिन जरूर सिपाही बनेगी ।बस, तू हिम्मत बनाए रख ।" पूनम की आँखें भी बहने लगी ।बेटी की देख भाल के लिए, वे अब सप्ताह में तीन दिन घर आने लगे हैं ।वही समय पर खाना, दवा और पैरों पर खड़ा होना  सिखाते हैं ।माँ को ये सब थोड़ा भी अच्छा नहीं लगता ।अब वह पूरी तरह ठीक हो गई है, परंतु उसे एक नया साथी वैशाखी मिल गया  है ।वह उसी के सहारे स्कूल जाती है ।गाँव से पूरब, चंद्रभागा नदी के तट पर अयोध्या राम कुमारी उच्च विद्यालय है ।आस - पास के बच्चे यहीं पर दसवीं  तक की पढ़ाई करने आते हैं ।नदी में बाढ़ आई हुई थी, परंतु अब पानी शांत हो गया है ।२६ जनवरी, गणतंत्र दिवस का राषट्रीय पर्व आ गया है ।सभी बच्चे नदी पार कर स्कूल आ गये हैं ।एकाएक मास्टर साहब को किसी ने आकर बताया कि बच्चों से भरा एक नाव पानी में फंस गया है ।सभी नदी की ओर दौङे ।नदी किनारे आकर सभी शांत हो गये ।पानी बढ़ा हुआ देखकर, किसी की हिम्मत नहीं हो रही है कि कोई पानी में जाए  नाव को किनारे लेकर आये  ।इसी  बीच एक बच्चा चिल्लाया - "मास्टर साहब, नाव में पानी भर रहा है!" सभी बेचैन हो रहे हैं ,कोई आगे नहीं आ रहा है ।तभी एक अपाहिज लड़की ,अपनी बैसाखी  फेंक नदी में छलांग लगा दी ।सभी को आश्चर्य  हुआ कि एक अपाहिज लड़की  कैसे नाव को किनारे लाएगी? पूनम का मन कह रहा था कि यही तुम्हारी सिपाही बनने की परीक्षा है ।वह बिना  किसी से पूछे नदी में छलांग लगा दी ।एक वीर सिपाही की तरह, वह तैरते हुए नाव के पास पहुँच गई ।वह पीछे से नाव को धक्का दे कर किनारे लगा दी, परंतु पानी की एक तेज धारा  उसे अपने साथ बहुत दूर बहा ले गई  , इतनी  दूर की सरकार की तकनीक भी उसे ढूँढ नहीं पाई ।पापा नदी किनारे आकर आंसू बहाकर उसे बुला रहे हैं - "सिपाही बिटीया, तू बड़ी  महान थी रे! तूने वो कर दिखाया , जिस पर  दुनिया को विश्वास नहीं होगा ।तू सिपाही तो बन गई, परंतु मुझे अकेला छोड़ गई ।" सब  की आँखें नम है ।पूनम की माँ मायके  में है ,वह अपनी ही बेटी से जितनी  द्वेषता रखती थी, आज उतनी ही दूर चली गई ।मरणोपरांत  पूनम को वीरता का पुरूस्कार दिया गया ।स्कूल में पूनम की प्रतिमा स्थापित की गई है ।हर बर्ष गणतंत्र दिवस के मौके पर पूनम को भी याद किया जाता है ।पूनम की प्रतिमा, सभी बेटियों को अपने पर गर्व महसुस कराती है ।आज दुनिया  ने देख लिया कि एक बेटी ने बहुत सारे बेटों की जान , अपनी जान देकर बचा गई ।

 

सोच बदलो फिर कोई फर्क नजर नहीं आएगा ।बेटी है तभी तो बेटा होगा ।

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