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आदिमानव
आदिमानव
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© Ravidutt Mohta

Drama

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कहानी

आदिमानव

-ुनवजयहम कहां से आये हैं बाबा ?-ुनवजय

उसने दर्द भरे स्वर से उस फकीर से पूछा। रात बहुत अंधेरी थी। और रात से

भी Ûहरे अंधेरे से भरा था। उसका प्र-रु39यन! आका-रु39या में तारे यूं चमक रहे थे

मानो वे उस अज्ञात ब्रहमा.ड के पहले आंसू हो-- -- -- -- और सदियों से धरती पर

टपकना चाहते हैं-- -- -- -- पर टपक नहीं पा रहे -- -- -- -- -- आका-रु39या में कहीं अटक Ûये है--

-- --

उसको लÛा कि जैसे आज तो यह अजन्मा ब्रहमा.ड रो ही देÛा-- -- -- -- -- -

-ुनवजयमु-हजये नहीं मालूम बेटा कि हम यहाॅं कहां से आते हैं-ुनवजय हां-- -- -- -- --

इतना जरूर पता है कि हम सभी -रु39याम-रु39याान ?ााट जाते हैं-- -- -- ---ुनवजय फकीर ने अपनी आॅंखें

आसमान में बिखेरते हु, कहा।

-ुनवजयपर बाबा-- -- -- -जब -रु39याम-रु39याान ?ााट ही जाते हैं तो यहाॅं इस ?ााट आते ही

क्यों है?-ुनवजय

उसने फिर ,क मासूम प्र-रु39यन पूछ लिया-- -- -पर इस बार फकीर ने अपनी अंÛुली उस वन

में स्थित ,क -हजयौंपड़ी की तरफ उठाते हु, कहा-ंउचय

-ुनवजयवत्स-- -- -कुछ प्र-रु39यन ई-रु39यवर के Ûर्भ से जन्म लेते हैं-- -- -- -- तेरा यह प्र-रु39यन कि हम

आते कहां से हैं? ई-रु39यवर के Ûर्भ से पैदा हुआ है-- -- -- -- उस -हजयौंपड़ी में ,क

साधिका रहती है-- -- - इस प्र-रु39यन का उत्तर वही दे सकती है बेटा!-ुनवजय

और वह फकीर जोर से ,क ठहाका मार कर वहाॅं से चला Ûया-- -- -- -- --

आदिमानव सहम Ûया। उसके सहम जाने का भी ,क कार.ा था। उसके निर्दो-ुनवजया

जीवन में उसे आज तक किसी भी युवती का सच्चा प्यार नहीं मिला था। वह तो सच्चे प्यार

की तला-रु39या में संसार की भीड़ भरी सड़कों से कब इस सुनसान वन की विधवा

पÛड.िडयों पर आ खडा हुआ था-ंउचययह वह खुद भी नहीं जान पाया था-- -- -- -- --

-ुनवजयतो क्या मैं इस प्राचीन प्र-रु39यन का उत्तर फिर ,क युवती से पूछू? उस औरत से

जोकि मु-हजये आज तक सच्चे प्यार का भावार्थ नहीं सम-हजयाा सकी-- -- प्यार करना तो बहुत

दूर की बात रही-- -- -- -प्यार करके दिखला भी न सकी-- ---ुनवजय उसकी आंखे छलछला आयी।

-ुनवजयपुछना पडे़Ûा वत्स-- -- -- -उस साधिकासे ही पूछना पडे़Ûा तुम्हें। वह मु-हजये

-रु39यतेरा-रु39य उत्तर देने के लि, ही तो इस धरती पर आयी है-- -- -- --ुनवजय उसके अंदर बैठे उस

प्राचीन अपरिचित सत्ता ने मानो दखल करते हु, कहा।

-ुनवजय तो क्या मैं -हजयौंपड़ी का दरवाजा खटखटा दूं?-ुनवजय उसने ,क उदास पेड़ से

पूछा। प्रत्युत्तर में पेड़ पर बैठी ,क कोयल -ुनवजयकुहू-- -- -- -- -- -- कुहू--ुनवजय बोलने लÛी।

यानि कहने लÛी-- -- -- --ुनवजयपूछ कर तो देख-- -- -- -पूछकर तो देख-- -- -- --ुनवजय

आदिमानव के पैर -हजयौंपड़ी की तरफ व-सजय़ Ûये-- -- -- -- उसे अपना धड़कता हुआ

सीना ,ेसे लÛ रहा था मानो उस -हजयौपडी में महाकाली बैठी है और न जाने कौन

उसके सीने की धड़कनों में ?ाुसकर जोर-ंउचयजोर से नÛाडे़ बजा रहा है-- -- -- -

महाकाली की आरती उतार रहा हे-- -- -- -- --

-ुनवजयक्या मैं अंदर आ सकता हूॅं?-ुनवजय वह बिना -हजयौंपड़ी का दरवाजा खटखटाये

जोर से बोला

-ुनवजय अभी नहीं कुवर-- -- -- -अभी तो मैं इंतजार कर रही हूॅं-- -- -- -- -- -- ---ुनवजय

-ुनवजयकिसका इंतजार कर रही हो देवी ?-ुनवजय

-ुनवजयतुम्हारा !-ुनवजय

-ुनवजय मैं जो आ Ûया हूॅं नॅं ?-ुनवजय

-ुनवजय पर मैं अभी कुछ देर और इंतजार करना चाहती हूॅं-- -- -- --ुनवजय

-ुनवजय किसका?-ुनवजय

-ुनवजयतुम्हारा ही।-ुनवजय

-ुनवजयक्यों?-ुनवजय

-ुनवजयकुंवर तुम अभी सम-हजयोÛे नहीं-- -- -- -बस मु-हजये पांच-ंउचयदस मिनट और इंतजार

करने दो-- -- -- --ुनवजय

-ुनवजयअच्छा-ुनवजय

और वह अपने बिखरे बालों में छुपा, बे-रु39याुमार दर्द के साथ ,क निर्दो-ुनवजया

अपराधी की तरह -हजयौपड़ी के दरवाजे पर यूं खडा़ हो Ûया मानो आज फिर ,क युवती

)ारा उसे छला जाना तय है-- -- -

)ार पर खडे-ंउचयखडे वह अजनबी आदिमानव ,क रहस्यमयी दर्द भरी मुस्कान का दामन

थामे कुछ देर उस विराट आका-रु39या में कोई अपने जैसा सहारा -सजयु-सजयंता रहा-- -- -- -- -- पर हर

बार की तरह इस बार भी आका-रु39या उसे ,क प्यासे पंछी की तरह दिखाइ्र्र दिया जोकि खुद

उसके कुधे पर बैठकर अपनी थकान मिटाना चाहता था। उसे अपनी आप बीती सुनाकर जी

हल्का करना चाहता था।

और अचानक बड़ी तेजी से आसमान का सीना चीर कर ,क चील उड़ती हुई उसके

कंधे पर आकर बैठ Ûयी। चील की हांफती चोंच खुली हुई थी। उसके मुख से

Ûर्म-ंउचयÛर्म सांसें उसके Ûालों से टकराकर कुछ कहना चाहती थी।

-ुनवजयक्या बात है आका-रु39यादूत-- -- -- - आज क्या नया समाचार लाये हो मेरे पिता का ?-ुनवजय

-ुनवजय समाचार तो तब लाउं हे आदि पुरू-ुनवजया-- -- -- -- जब वहाॅं कोई हो-- -- -- -- -- -?-ुनवजय

-ुनवजयअच्छा-- -- -- -- -- आज यह मनु-ुनवजयय की भा-ुनवजयाा क्यों बोलने लÛा है-- -- -- -- -- -िरु39याकायत

क्यों करने लÛा है?-ुनवजय

-ुनवजयहे आत्मपुरू-ुनवजया यह -िरु39याकायत नहीं है। हकीकत है।-ुनवजय चील ने कहा।

-ुनवजयमै सम-हजया नहीं।-ुनवजय उसने उस चील के सिर पर हाथ फेरते हु, कहा।-ुनवजय मैं भी

नहीं सम-हजयी हे आदिमानव?-ुनवजय तब अदिमानव ने कहा-ंउचयचील ने अपने पंख फड़फड़ाकर

कहा।

-ुनवजयहे आध्यात्मिक पंछी-- -- -- -- -- तु-हजयमें और मु-हजयमें मा= इतना ही अंतर है कि

तूं मेरे पिता के आस-ंउचयपास रहता है और मैं -रु39यआदिमानव-रु39य इस धरती पर आका-रु39या की बातें

करता फिरता हूं-- -- -- -तू आका-रु39या में उडता है-- -- -- -- मेरे दर्द मेरे पिता को कहता

है-- -- -- -- और मैं मेरे पिता का दर्द धरती पर Ûाता हूॅं-- -- -- -पर देख तो हमारा

दुर्भाग्य-- -- -- -- -- -- तू आका-रु39या का पालतू है और मैं धरती का फालतू हूॅं-- -- -- -

-- ---ुनवजय

अचानक उस चील ने अपने पंख फड़फड़ा, और बोली-ंउचय

-ुनवजयहे आदिमानव तुम क्यों आसमान को खोदने का प्रयास कर रहे हो-- -- -- -

देखो-- -- -- -सादियों पूर्व हम प{िायों ने उसे खोदना आरम्भ किया था-- -- -- -- -- पर

खोदते-ंउचयखोदते सदियाॅं बीत Ûयी-- -- -- -हमें वहां कुछ नहीं मिला। आका-रु39या में

कौन रहता है? कहां रहता है? हम -सजयूं-सजय नहीं पाये।-- -- -- -- -- देखो -- -- -- -- आका-रु39या

को खोदते खोदते हमारे मुूंह में से यह नुकीली चोंच निकल आयी है-- -- -- -- पर

हमें कुछ नही मिला-- -- -- -हे आत्मपुरू-ुनवजया-- -- - तुम क्यों हमारे जैसे चोंच वाले

होना चाहते हो ?-ुनवजय

इतना कहकर वह चील उसके कंधे से उड़कर ,क पेड की डाल पर जा बैठी।

वहाॅं बैठे-ंउचयबैठे उसे ,ेसे देखने लÛी-ंउचयमानो वह आदिमानव उस चील की नन्हीं

संतान हो-- -- -- -और वो माता चील उसकी र{ाार्थ उस पर इसलि, नजर रखे हु, थी कि

कोई आदमखोर -रु39यआदमी-रु39य उसका -िरु39याकार ना कर ले?

-ुनवजयदरवाजा कब खुलेÛा?-ुनवजय वह -हजयौपडी की तरफ देखकर फुसफुसाया।

अचानक दरवाजा खुला। -हजयौपड़ी का वह रहस्यमयी दरवाजा खुला। उसने देखा कि

,क सुन्दरी )ार पर सोने के Ûहनों से लदी ,ेसे खड़ी थी मानो अभी वह दरवाजा

तो खोले हु, है पर -हजयौपड़ी में आदिमानव का प्रवे-रु39या अभी भी नि-ुनवजयोध है-- -- --

-- -- -- -- -

-ुनवजयकहो कुंवर-- -- -- -- क्या चाहते हो ?-ुनवजय

-ुनवजयमैं तो कुछ नहीं चाहता देवी-- -- -- -!-ुनवजय

-ुनवजय तो फिर मेरे )ार पर क्यों आये हो ?-ुनवजय

-ुनवजयदरवाजा खटखटाने-- -- -- ---ुनवजय

-ुनवजयलेकिन तुमने दरवाजा तो खटखटाया ही नहीं ?-ुनवजय

इस बाद सुन्दरी ने कठोर स्वर में कहा। और वह आदिपुरू-ुनवजया अपनी आसमानी

भा-ुनवजयाा के कार.ा ,क बार फिर Ûलत सम-हजय लिया Ûया-- -- -- -परंतु फिर चेहरे पर मानव स्वभाव की

मुस्कान लाते हु, वह बोला-ंउचय-ुनवजयदेवी-- -- - ,क फकीर ने कहा था कि तुम ही मेरे ,क प्र-रु39यन

का उत्तर दे सकती हो-- -- -- --ुनवजय उसने पुनरू ठुकरा, जाने की सिरहल के साथ डरते हु, कहा--

-- -- -- -- -

-ुनवजयपूछो कुंवर-- -- -- -क्या पुछना चाहते हो?-ुनवजय उस देवी ने साडी़ का पल्लू

अपने सिर पर रखकर कहा।

-ुनवजयहम कहा से आते हैं देवी ?-ुनवजय

-ुनवजयहमसे आपका क्या मतलब है कुंवर ?-ुनवजय

-ुनवजयहम मतलब-- -- -- -- हम पृथ्वी के सभी जीव-ंउचयजंतु-ुनवजय

-ुनवजयकंुवर-- -- -- -- -- तुम मेरे )ार पर पिछले दस मिनट से खड़े हो-- -- -इससे पहले तुम

किसी Ûांव -रु39याहर या दे-रु39या से आये हो-- -- -- -- -- और इससे भी पहले तुम किसी Ûरिमामयी मां

के Ûर्भा-रु39यय से बाहर आये हो-- -- कुंवर-- -यह तो बहुत साधार.ा बात है कि हम कहां से

आते है ?-ुनवजय

उस सुन्दरी ने अपनी आंखों में लÛे काजल पर ,क अंÛुली रखते हु, नटखट

हंसी के साथ कहा। बिखरे हु, बालों वाले उस आदिमानव ने देखा कि सुन्दरी के

Ûालों से दो सुन्दर Ûड्डे उसकी हंसी में तारो का प्रका-रु39या भर रहे थे-- -- -

आदिमानव ने सुन्दरी की आॅंखो में अपने जाने-ंउचयपहचाने उस आका-रु39या की विराटता

देखी जिसे मा= वह स्वंय ही जानता था-- -- -- -

-ुनवजयपर देवी-- -- -मैं पूछना यह चाहता हूॅं कि माता के Ûर्भ में आने से पहले

हम कहां से आते है? हमारा चिर निवास स्थान कहां है ?-ुनवजय

-ुनवजयठहरो-- -- -- -- ---ुनवजय

अचानक उस सुन्दरी ने ,क कठोर आदे-रु39या सुना दिया। और पुनरू -हजयौपड़ी में

प्रवे-रु39या कर Ûयी। अब आदिमानव यह जान Ûया था कि आज फिर ,क औरत )ारा उसे बेइज्जत किया

जाना तय है-- -- -- --

कुछेक देर में वह सुन्दरी पुनरू -हजयौपड़ी के )ार पर चली आयी। इस बार उसके

हाथ में ,क वरमाला थी। उस चुप सुन्दरी की आॅंखो में काजल भरे प्यार के

आंसू थे-- -- -- -- -- -इस बार सुन्दरी की आवाज में राधा और मीरा जैसी प्यार भरी

मिठास थी।

-ुनवजयकुवरजी-- -- -- -मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रही थी-- -- -- -- -- मैं अपना स्वंयवर

इसी तरह इन Ûुप्त वनों में करना चाहती थी-- -- -- -- आपने मु-हजयसे पूछा है कि हम

कहां से आते है ? तो इसके उत्तर में मेरी यह प्रचीन वरमाला स्वीकार करो-- -- --ुनवजय

सुन्दरी ने बड़े अदब से वरमाला आदिमानव के Ûले में डाल दी। इधर

आदिमानव को पहली बार अपने प्राचीन प्र-रु39यन का सही उत्तर मिला था। उसकी आंखे भर

आयी-- -- -- -- वह लÛभÛ रो ही पडा़-- -- -- --

-ुनवजयकुवरजी-- -- -- -- -- मैं आपको यह बताना चाहती थी कि हम न तो आका-रु39या से आते

है और न ही आका-रु39या में जाते हैं। हम सभी यहाॅं धरती पर प्रेमव-रु39या जन्म लेते

हैं-- -- -- -- और प्रेम के व-रु39याीभूत ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं-- -- -- -- -- - हे

अजन्मे कुंवर-- -- -प्रेम ही इस सृ-िुनवजयट का Ûुप्त रहस्य है-- -- --ुनवजय

और वे दोनों महान आत्मा,ॅं चुपचाप उस वीरान वन की उस रहस्यमयी

-हजयौंपड़ी में प्रवे-रु39या कर Ûये-- -- -- -- कहते है तभी से धरती के सभी वन बिना किसान

की बुआई और सिंचाई के इसलि, हरे-ंउचयभरे हैं क्योकि वनों में श्रीहरि का प्र.ाय

अब भी इसी तरह बदस्तूर जारी है। इसीलि, धरती हरी-ंउचयभरी है।

रविदत्त मोहता

-रु39य-रु39यवेत कमल-रु39य

17ईध्461

चैपासनी हाउसिंÛ

बोर्ड,जोधपुर-ंउचय8

आदिमानव स्त्री प्रेम आदिमानव.

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