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ज़िंदगी एक सफर
ज़िंदगी एक सफर
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© dr vandna Sharma

Drama

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आउटिंग पर जाने का भी अपना मज़ा है। वो भी दोस्तों के साथ। डॉ .विदुषी, डॉ. सविता मिश्रा, डॉ. रश्मि, डॉ. जकिया, मंजू अरोरा और मैं कुल छह दोस्त कॉलेज की सचिव से मिलने प्रातः ६ बजे निकले।

ज़िंदगी को सरस व सरल ढंग से कैसे जिया जाये, ये हमारे ग्रुप से जानिए। मैं मम्मी के साथ डॉ. सविता के घर लगभग साढ़े पाँच बजे पहुँची।

पहली बार उनके पापा से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। बहुत तारीफ सुनी थी उनकी, आज मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इतने सहज, सरल, मिलनसार, ऐसा लगा ही नहीं कि उनसे पहली मुलाकात है। यह उनका बड़प्पन ही था, इतनी सुबह हमारा स्वागत करना, बिस्तर से उठकर गर्मजोशी से मिलना, मार्गदर्शन करना और जाते समय हमे गेट तक छोड़ने आना। बहुत ही ज़िंदादिल व गरिमामय व्यक्तित्व है उनका। कहीं जाने से पहले मन की अजीब स्थिति होती है। मम्मी के बिना मन दुःखी होता है तो कुछ नया सीखने की जिज्ञासा भी रहती है। जरा सा भी टेंशन लेने से मेरी तबियत खराब हो जाती है।

मुझे खिड़की के पास बैठने में ही सुविधा होती है। सफर में खिड़की से बाहर देखना, ऊँची-ऊँची बिल्डिंग, मंदिर, शॉपिंग मॉल, पार्क, ऊँचे-ऊँचे पेड़,लाल गुलमोहर, खिले हुए डहेलिया, कभी नहर, कभी स्मारक सब कुछ आँखों के सामने से गुजर रहा था और मैं मंत्रमुग्ध सी उनमे खोयी, एकटक उन्हें निहार रही थी। करीब नौ बजे एक रेस्टोरेंट में रुककर नाश्ता किया। गर्म पकोड़े, चाय के साथ ने ताजगी से भर दिया। करीब साढ़े ग्यारह बजे हम गंगाराम हॉस्पिटल पहुँचे।

इंटीरियर बहुत सुंदर था। प्रवेश करते ही गॉर्ड ने रोका कि मिलने का समय सांय ५ से ७ है। तभी डॉ. ज़किया ने अपने भाई को फोन मिलाया और कहा- हर मर्ज़ का इलाज है इनके पास।

उन्हें हम सबके आने की सूचना दी। उनके भाई उसी हॉस्पिटल में सीनियर डॉ. है। वो भी बहुत सज्जन इंसान थे सारा काम छोड़कर खुद आये हमे रिसीव करने और हमें सचिव के रूम तक ले गए। वहाँ की व्यवस्था अच्छी थी। सचिव हम सबको देखकर बहुत ख़ुश हुई।

महिला सशक्तिकरण पर चर्चा चल रही थी। डॉ. विदुषी की एक बात दिल को छू गयी। 'स्वन्त्रता का तो अपना ही आनंद है। 'सही अर्थो में महिला सशक्तिकरण का सबसे बढ़िया उदहारण डॉ सविता है। क्योंकि वो स्वतंत्र है अपना निर्णय लेने के लिए, अपने विचार प्रकट करने के लिए। खुद भी सशक्त है और दूसरों को भी प्रेरणा देती रहती है।

कभी-कभी ये सोचना भी कितना अच्छा लगता है कि आज हम स्वंतत्र है कुछ भी करने के लिए। कुछ भी सोचने के लिए ,.उनसे विदा लेते समय दुःख हो रहा था पर उनकी मुस्कान दिल के तार झंकृत कर गयी। उधर से लौटते समय वास्तुकला के सामान की शॉपिंग की। डॉ. विदुषी बहुत ही सरस सरल व ममतामयी है। उन्होंने मेरा पूरा ध्यान रखा। यादें भी कितनी अजीब होती है न। पल में मन कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है। हमारी ज़िंदगी एक सफर ही है और हम सब सहयात्री।

हॉस्पीटल आउटिंग सौभाग्य

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