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संस्मरण
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© Nisha Mishra

Crime Others

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१५ अगस्त लोकल ट्रेन से सुबह की यात्रा

आज १४ अगस्त रात से मेरी तैयारी चल रही थी कि कल सफेद पंजाबी सूट पहनना है और देशभक्ति की भावना रोज से ज्यादा आज लोगों के मन में होगी। टी. वी पर, फेसबुक पर, वाट सप्प पर लोगों के मन में बहुत उमड़ेगी। तो चलो मैं भी इस रंग में रंग जाऊं। सुबह ५:३० मिनट पर उठी और कालेज जाने की तैयारी में लग गई। पति जी और बच्चों को छुट्टी मिली सो वे सो रहे थे। खैर तैयार होकर मैं घर से मैे 6:१५ मिनट पर निकली रास्ते में एक या दो व्यक्ति दिखाई दे रहे थे।

स्टेशन पहुंच ही थी की लोकल ट्रेन प्लेटफार्म पर आ गई और अपने आप को संभालते हुए मैं ट्रेन पकडी सभी महिलाओं ने अपने आपको देशभक्ति के रंग में पूरी तरह से रंग लिया था। चेहरे पर खुशी काम पर जाने की उत्सुकता कुछ अलग दिखाई मुझे दे रही थी और लड़कियां कालेज जाकर समूह गीत गाने के बोल गुनगुना रही थी और कालेज में जाकर दादर वापस आकर अभिनय करना है यह उनकी बात -चीत आपस में हो रही थी। और भी बहुत कुछ अलग - अलग तरीके से बातें औरते आपस में कर रही थी घर से जल्दी निकले की शिकायत, बच्चें आज सुबह का नाश्ता क्या करेंगे ? जल्दी आकर सारा काम घर में करना है वगैरे बातें उनकी हो रही थी। मैं सब सुन रही थी मुस्कान भी थी घर से बाहर निकले पर भी हम औरतों केवल अपने घर और बच्चों के बारें में सोचती है। बस यूँ ही हम पति महाशय जी को कहते कि तुम लोगों से मैं परेशान हो गई हूँ मन कर रहा है कि तुम लोगों को छोड़कर कही चली जाऊँगी। हा हा.. हंसी मेरे सोच में थी।

केवल एक बूढ़ी औरत जो लोकल ट्रेन के दरवाजे के तरफ खड़ी होकर सोच रही थी। और मैं उसके पीछे खड़ी थी। कुर्ला स्टेशन आया ही था कि अचानक से पीछे मुडी ओर बोली "ये साले मर्द लोग बहुत हरामी होते हैं। "मैं सन्न सी हो गई। मुझे लगा ये अभी तक तो ठीक थी। अचानक से क्या हो गया ? मैं मौन थी। फिर बोली "क्यूँ री तेरा मर्द भी तेर को पीटता है क्या ?" मैने जवाब दिया, ''नही आंटी क्या हुआ। आप सुबह -सुबह ऐसा क्यों बोल रही हैं।" उपर गर्दन की तरफ सूट को खोलकर दिखा रही थी । "देख जरा मेरे बदन में चमड़े के पट्टे की निशानी साला मेरा मर्द परसों रात को शराब पीकर आया और मेरे साथ इस बुढ़ापे में भी जबरदस्ती की और मेरे इंकार करने पर मेरी जवान बेटी और बहु के सामने साले ने मुझे पट्टे से मारा।" मैने पूछा आंटी आपके बेटे ने कुछ नही बोला। बोली कि "साला वो भी हरामी है।" मैंने कहा आंटी पुलिस में शिकायत दर्ज नही कराई बोली कि "गई थी रे लेकिन साले पुलिस वाले भी मिले रहते बोला घर की समस्या घर पर देखो। औरत की जात ही बेकार है। कमाती है। अपना पेट भरने के लिए तो साला मेरी कमाई भी ले लेता है। सब कहते है सुहाग अमर रहे। ऐसे सुहाग का क्या फायदा।"

मैं सारी बातें उस बूढ़ी औरत की सुन रही थी। और सोच रही थी कि आज आजादी के जश्न को पूरा देश मना रहा है। वही आज इस बूढी औरत की व्यथा सुन यह सोच रही थी क्या ? आज भी औरत आजाद है ? तिरंगा फहराने हम जा रहे हैं जय हिंद के नारे से देश गूँज उठा है हर स्टेशन पर देशभक्ति के गाने की गूंज रहे है क्या ? सच मैं देश आजाद है ? यह प्रश्न समुद्र के उफान की तरह मेरे मन में कई तरह के हिलोरे ले रही थी। दादर स्टेशन आया और आंटी ट्रेन के धीमे होने पर उतर गई जाते-जाते बोली "खुश रहने का तू चल बाय करती हुई सीढियों पर तेजी से चढते हुए भागी और मुझे भी सांताक्रूज जाना था तो और मैं पहले से लेट हो गई थी सो मैं भी तुरंत सीढ़ी पर अपने पैर जमाते कई सोच को मन में लिए चलने लगी ।

कहानी औरत लोकल ट्रेन मारपीट आजादी शराब पुलिस

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