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एक दीप पाँच चेहरे
एक दीप पाँच चेहरे
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© Tulsi Tiwari

Drama Inspirational Romance

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आज पूरे एक वर्ष हो गये बेदू को गये, पक्का वह क्वार चतुर्थी का दिन था, अबकी बार जैसा सुहाना मौसम तो नहीं था पहले के तीन माह अच्छी बारिश हुई थी, और इस समय तक आसमान पर बादल का कहीं नामों निशान नहीं था। दिन में तेज़ गर्मी तो रात में गुनगुनी ठंड। पितर पक्ष में बनने वाले बड़ों की खुशबू अब तक फ़िजां में बसी हुई थी। झूठे बरतनों में बहुत सारे टुकड़े छूटे रहते थे। मालकिने कभी दो पूड़ी दो बड़े कागज़ में लपेट कर हाथ में रख देतीं थीं परन्तु सबके सामने हबर-हबर खाना उसे ही पसंद नहीं था। घर लेकर आती तो बच्चों की छीना झपटी में बड़ा पूड़ी उनका और सुगंध उसकी हो जाती थी।

सास देखने में तो हट्टी-कट्ठी थी किन्तु अब दूसरों के घर का झेल नहीं झेल पाती थी। उसे भी यह गवारा न था कि दूसरे उसकी सास को दस बातें सुनाए । वह घर में ही रहती थी, कुछ करे न करे उसके रहने से उसे बच्चों की चिंता तो नहीं रहती थी?

बेदू का कोई ठिकाना नहीं, सुबह का गया गई रात को वापस आ जाय तो भी बड़ी बात । एक लाल रंग का कपड़े का टुकड़ा रखे रहता था उसमें ही कुछ डालकर मुँह से, नाक से उसकी बास लिया करता था। आँखें हमेशा आधी बंद जैसे आधी नींद में हो । आने पर उसकी माँ चाहे हजार गालियाँ दे चाहे वह रद-बद बकती रहे कभी न नाराज़ होता न ही कोई सफाई देता। वह हक से उसकी जेब की तलाशी लेती थी कभी दस-बीस रूपये रहे तो निकाल लेती नहीं तो हाथ मल कर रह जाती। बड़ी बेटी का नाम सरकारी स्कूल में लिखवा दिया था उसने । वह तो दोनो वक्त के बदले वहीं से खाकर आ जाती थी। बाकी दो लड़कियाँ और सबसे छोटा लड़का सेत, उनके लिए अम्मा पेज पसिया का इंतज़ाम कर देती थी। लड़के का हाल देख कर खून के आँसू रोया करती थी ’’ जा रे कुभारज कोन नक्षत्र म तें मोर कोंख म आये जम्मों मान् मरजाद ला मेंट दिये। तेखर ले तो तैं कोंखे म मर जाय रइते।’ उसके रोने बिसूरने का उस पर कभी कोई असर न हुआ।

’’ पहले जब महुए वाली पीता था तब भले ही लड़ता-झगड़ता था किन्तु उसे भूख लगती थी जो कुछ मिले खा लेता था पसंद न आने पर मार-पीट फिर मान-मनौवल , लगता था जैसे बेदू भी रहता है इस घर में । एक-एक साल के अन्तर से चारों बच्चे हो गये । यह सुलेसन मूआ तो उसके सारे रिश्तों से दूर ले गया उसे। वह तो न विधवा हुई न सधवा। लगभग साल भर हो गये थे शायद वह भूल ही गया था कि उस घर में जो औरत रहती है वह भी हाड़-मांस की बनी हुई है उसे भी भूख-प्यास लगती है उसे भी अपने पति के प्रेम पूर्ण साहचर्य की आवश्यकता है। वह अन्दर ही अन्दर गीली लकड़ी की भाँति सुलग रही थी। मन होता अपने जी का कुछ कर डाले ,पड़ा रहे डिड़वा राम। रहने पर जब इज़्ज़त नहीं करता तो न रहने का मज़ा भी ले ले। फिर सोचती चार-चार बच्चे हैं उसके, वह तो मुक्त हो जायेगी , इनका क्या होगा? बाप तो वैसे ही न के बराबर है माँ न रही तो तीनों लड़कियाँ न जाने किस कोठे में शरण लें? इतने दुलार का लड़का पता नहीं कहाँ जायेगा। हो सकता है भीख मंगवाने वाले इसके हाथ-पाँव काट कर या आँख फोड़ कर भीख मंगवाने लगें। सोचते-सोचते वह सिहर उठती। काम पर जाने से पहले नहा-धोकर कंघी-चोटी करती तब सिंदूर लगाने के लिए आईना देखती, रंग उसका सांवला अवश्य है किन्तु उस पर लुनाई है। जैसे हरे रंग में ज़रा सा नीला रंग मिला दिया गया हो। आँखें जैसे कच्चे आम की फांकी, सीधे पल्ले की साड़ी में उसका सौंदर्य खिल उठता था, क्या करे? पेट के लिए सब करना पड़ता है । बाइयाँ कहतीं हैं ’’ रात में सब कुछ करती हो तुम लोग, बिना नहाये बर्तन छूने कैसे दे सकते हैं ? अब कौन प्रमाण देता फिरे ? ले भाई इसी बहाने एक बार औरत जैसी दिख तो जाती है। सात भाई की एक बहन है झुमकी, अच्छी खेती-बाड़ी है मायके में , लेकिन अब उसके किस काम का ? उसने ही तो बेदू के लिए सबको छोड़ा था, बाप गाँव का सरपंच, सभी भाई सरकारी नौकरी में, वह गाँव के स्कूल में पढ़ती थी । ऐ बात अलग है कि उसका मन पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लगता था वह तो स्कूल के कार्यक्रमों में नाचने के लिए स्कूल जाती थी जैसे । नृत्य की कुशलता देखकर ही सब उस पर मुग्ध थे । बस उसी के सहारे पाँचवी पास हो गई। बेदू से मुलाकात एक नृत्य के कार्य क्रम में ही हुई थी। जन्माष्टमी महोत्सव बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है उसके गाँव में । गोपी नृत्य में वह मुख्यगोपी बनी थी। बेदू मंच व्यवस्था में लगा था। उसने उसके बहुत सारे फोटो लिए थे अपने मोबाइल में। सारे चित्र उसके मोबाइल में भेज दिये थे उसने । फोन ने उन्हें पास लाने में बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अठारह की हुई नहीं कि भाग आई बिलासपुर बेदू के साथ । आर्य समाज में शादी करके रहने लगी उसके साथ। बेदू की माँ ने अपनी जाति बिरादरी की परवाह न करते हुए अपने बहू बेटे को अपनाया।

झोपड़पट्टी का वातावरण ही ऐसा थ कि आदमी या तो उसी में ढल जाए या एकदम अकेला हो जाए। अकेला होने से कैसे चल सकता है आदमी का काम ? जिसने मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी कहा वह कोई मूर्ख तो नहीं था। दारू की आदत बढ़ती गई, कुछ कहो तो मार-पीट -’’ बता तो कोई ऐसा आदमी इस मोहल्ले में जो दारू नहीं पीता ? हमारा काम ही इतनी मेहनत का है कि बिना पिये जी नहीं सकते । दिन भर में सिमेंट की कितनी बोरियाँ उतारते चढ़ाते है कितनी देर रांपा गैंती या हथौड़ा चलाते हैं इसकी कोई गिनती है क्या? घर की पोताई का काम मिला तो लगातार बारह से पन्द्रह घंटे पेंट-पाॅलिस की गंध और लगातार चलता ब्रस । दूसरे दिन फिर उठ कर वही काम करना है । घर- गृहस्थी की जिम्मेदारियों की कोई गिनती ही नहीं। ’’ उसकी बातें झूठ भी नहीं थीं झुमकी ने स्वयं चार घर धर लिए । यहाँ कौन सा संकोच है सभी तो जाती हैं काम करने ।

धीरे-धीरे बदलाव आया बेदू में। उसने उससे अधिक बोलना छोड़ दिया। उसे लगा शायद बेदू की जिन्दगी में कोई और आ गई है । उनके मोहल्ले में यह तो बहुत सहज है जब तब बनता है साथ रहते हैं नही तो बस तुम्हारा रास्ता अलग हमारा अलग। लेकिन उसका संदेह निर्मूल निकला । बेदू उसी से नहीं सारी दुनिया से दूर होता जा रहा था। वह सुलेसन सूंघने लगा था । वह बहुत रोई-गिड़गिड़ाई, बच्चों का वास्ता दिया लेकिन वह वापस न लौट सका।

’’ क्या सोचने बैठ गई झुमकी? कुछ खाने के लिए बनाया या ऐसे ही पड़ी है ?’’शिवा आ गया था अपने काम से वह किसी प्राइवेट अस्पताल में सिक्यूरिटी गार्ड था। रात की ड्यूटी करके आया था। दूसरा दिन होता तो घर की साफ-सफाई करके नहा-धोकर उसका रास्ता देखती होती । सुबह की चाय दोनो साथ ही पीते थे। उसके बाद शिवा सो जाता था। एक छोटा सा घर किराये से ले लिया था झुमकी ने। अब न तो उसकी हिम्मत है कहीं काम करने की और न ही जरूरत। कुछ परछाइयाँ हैं जो उसे चैन से जीने नहीं देतीं । खाया-पिया अंग नहीं लगता, दवाइयाँ खानी पड़ती हैं। शिवा कुछ पढ़ा-लिखा समझदार आदमी है उसने झुमकी को आड़े समय में सहारा दिया, उसके आँसू की कद्र की । सारी झंझटों से उबार कर यहाँ ले आया, न तो यहाँ उसका विगत कोई जानता है न ही आगत से किसी को कोई मतलब है। बड़ा शहर है भुवनेश्वर , उड़ीसा की राजधानी। यहाँ की भाषा उसकी समझ में नहीं आती बस शिवा ही है उसके मन प्राण का सहारा ।

’’क्या हुआ आज तबियत तो ठीक है नऽ बात का जवाब भी नहीं मिल रहा है।’’ शिवा पास आ गया। उसके शरीर पर नीले रंग की वर्दी बहुत अच्छी लग रही थी। बैठ कर खाने वाला नहीं है शिवा, रात भर जागता है चार पैसे बनाने के लिए।

’’ कुछ नहीं जी! खाली रहो तो कुछ न कुछ याद आतौ ही रहता है अकेले समय भी नहीं कटता, अपने शहर की याद आ रही है। आज कितनी धूम होगी नवरात्र की ? क्या हम लोग वहाँ नहीं जा सकते कुछ दिनो के लिए?’’ उसने बड़ी उम्मीद से शिवा को देखा और उठ गई उसके लिए चाय बनाने के लिए।

’’ जा क्यों नहीं सकते ? लेकिन अभी नई नौकरी है, कहीं निकाल न दें, इतने दिन खोजने के बाद तो मिली है। आखिर कब तक खिलाओगी बैठा कर ? फिर वहाँ से भागे हैं हम परिस्थितियों से हार कर। मुझे तो लग रहा था कि वहाँ तुम्हारा जी सकना बड़ा ही मुश्किल है। जीने की चाह ने ही तुम में साहस जगाया वहाँ से निकल भागने का। अब कौन सा मुँह लेकर जायेंगे अपनों के बीच?’’उसका गंभीर स्वर सुनकर उसके आगे सब कुछ नाच उठा जिसे छोड़कर वे भागे थे।

’’ पिछले साल नवरात्रि के समय बेदू ने कमल के फूल बेचने का काम शुरू किया था उनके मोहल्ले में एक बड़ा सा तालाब था जिसे लोगों ने कचरा पोलिथिन आदि डालकर पाट दिया था। कचरे की सड़ांध के कारण उधर से गुजरने वालों को नाक पर रूमाल रखना पड़ता था। कई घरों के सीवर पाइप उसमें गिरते थे। त्यौहारों के समय मूर्ति विसर्जन होता था तब उसी गंदे पानी में बच्चे कूद-कूद कर नहाते थे। जलकुंभी के प्रसार के कारण पानी तो पूरा सूख गया दलदल में मच्छरों का सम्मेलन होने लगा। लोग मलेरिया से बीमार पड़ने लगे तब जाकर लोगों ने इसे पाटने के लिए आवाज़ उठाना शुरू किया। दो-तीन साल पहले रोज़गार गारंटी योजना के तहत इस तालाब की सफाई गहरीकरण सौंदर्यीकरण का काम प्रारंभ हुआ। सभी को सौ दिन का रोज़गार मिला। बेदू और उसने स्वयं उस तालाब की सफाई में काम किया। वे तो करने ही लायक थे जिनके हाथ- पाँव हिलते भी नहीं थे उन्होने भी सौ दिन की मजदूरी कमाई । सरकारी योजना है भाई नाम लिखने में क्या जाता है किसी का? आधा अपना लो आधा अगले को दो! बहरहाल तालाब की शक्ल सूरत पूरी तरह बदल गई। गहरी करण हो गया। चारों ओर सीढ़ीदार पक्के घाट बन गये। किनारे से लेकर बीच तक एक पुल बना दिया गया जिस पर बैठ कर अराम से तालाब में उछलती मछलियों को देखो या ठंडी हवा का लुत्फ उठाओ। उस तालाब में मछलियों के बीज डाले गये और साथ ही लाल कमल न जाने किस तरह से आ गये? नवरात्र के समय पूरे तालाब की शोभा देखने लायक हो जाती थी, बीच-बीच में बडे़-बड़े पुरइन के पत्ते और ढेर सारे खिले अधखिले लाल कमल! जो किनारे तक फैले थे । मोहल्ले के बच्चे फूल तोड़कर लोगों को बेच कर पैसे बनाने लगे थे। बेदू को यह काम बहुत पसंद आ रहा था। बस धंटे दो घंटे मेहनत और सौ डेढ़ सौ जेब में। कुछ-कुछ सामान भी लाने लगा था बेदू, वह खुश थी आज इतना समझा तो कल और समझ जायेगा। वह खुशी-खुशी उससे बातें करती, आगे दीपावली थी बच्चों के तन पर चिथड़े ही रह गये थे। सास ने भी कभी बेटे बहू का सुख न जाना। हो सका तो इस साल उसके लिए भी एक साड़ी ले आयेगी। वैसे बाई लोगों की उतरन वह मुँह खोल कर मांग लेती है। हाँ भई चोरी में लाज है मांगने में क्या लाज? पहनने लायक मिल ही जातीं हैं साड़ियाँ । उसी में से एकाध सास को भी दे देती है। एक परेशानी आजकल और बढ़ने लगी है, मालकिने नये जमाने के कपड़े पहनने लगीं हैं, स्लीबलेस कमीज और चुस्त लेगिस। बाँह है भी तो यहाँ-वहाँ से कटी रहतीं हैं डिजाइन के नाम पर। रंग गोरा हो तो अच्छा दिखता है । सभी को हक है अच्छा दिखने का । कोई जिंस टी शर्ट पहनतीं हैं तो कोई सड़क बुहारती परी ड्रेस। मांगने पर साड़ी कहाँ से दें? और उनके दिये कपड़े पहन कर काम करने जाओ तो वे बेचैन नजर आने लगतीं हैं, उनके पतियों की चोर निगाहें जो काम वाली के बदन से चिपकी रहती हैं, उसे कैसे हटाये? काम वाली को ही किसी न किसी बहाने छुट्टी मिल जाती है। वा सोने को जारिये जासों टूटत कान’ किसी ने ठीक ही सलाह दी है। मालकिन नौकरानी का फर्क कपड़ों से ही तो ज्ञात होता है। झुमकी इस बात का ख्याल रखती थी, क्यों न रखे भई? उसे अपने बच्चे पालने हैं या किसी की नजर अपने बदन से चिपकाना है? वैसे जो होना रहता है वह हो कर ही रहता है शिवा के मामले में कहाँ उसे समझ में आया कि साधारण सी जान-पहचान उन्हें एक दिन एक छत के नीचे ले आयेगी। रोज़गार गारंटी योजना में जब वह काम करती थी तब वहाँ यह मेठ था, अपने गाँव से कुछ मज़दूर लेकर आया था। वहीं पहचान हुई । वह घरेलू काम तो छोड़ नहीं सकती थी, यह तो चार दिन की चाँदनी है और वह बारहमासी फल। उसे कभी-कभी थोड़ी देर हो जाया करती थी। मुंशी हाजिरी काट देता था। शिवा मज़दूरों का शुभ चिंतक माना जाता था इसीलिए उससे कहा उसने। मुंशी से लड़-झगड़ कर शिवा ने हाजिरी भरवाया था और यह जो आज वह घर में बैठ कर गरम-गरम भात खा रही है वह भी शिवा के कारण ही तो! ऐसे कहाँ किसी ग़रीब के लिए किसी के हाथ से धेला भी छुटता है। उसने तो उसे अपनी साईकिल के पीछे बैठा कर आकाश-पाताल एक कर दिया। अस्पताल, बैंक, बीमा आँफिस,अखबार , टी.वी. कभी पक्ष तो कभी विपक्ष के नेता, किस जगह को उसने अपने पाँव तले नहीं रौंदा? विधान सभा चुनाव थे एक माह बाद सभी बसना चाहते थे, जनता की निगाहों में, जितना मिल सकता था शहद की तरह सभी को निचोड़ा उसने ताकि झुमकी का भविष्य संवर सके। किसी के हाथ में है क्या किसी का भविष्य संवारना ? क्या संवर गया भविष्य उसका ? दिन रात तंदूर धधक रहा है हृदय में । चार छोटे-छोटे बच्चे और एक बूढ़ी औरत , जिसे स्वयं ही किसी के सहारे की जरूरत है, कैसे पाल रही होगी उन्हें? उसने तो अपना भविष्य देखा, शिवा के कंधे का मजबूत सहारा पाकर वह जैसे सब कुछ भूल गई ।

बेदू ने भी तो विश्वास जगाया था उसके मन में अपने प्यार का उस रात, कस कस कर गले लगाया था कहने लगा ‘मैं बड़ा पापी हूँ झुमकी ! कैसी थी तू कैसी हो गई! कितना अच्छा नाचती थी? मैं ही क्या सभी दर्शक सुध-बुध खो देते थे। अब क्या बन गई? घर-घर बर्तन मांजने वाली नौकरानी ! मेरी गलत आदतों के कारण तेरी ये दशा हो गई ।’’ वह रो रहा था। झुमकी का दिल उसकी वफ़ादारी पर मुग्ध हो गया। सारे दुःख भूल गई वह। उसकी आँखों से निकले आँसू से बेदू का कंधा भींगने लगा।

’’ अभी कुछ नहीं बिगड़ा है बेदू, तुम्हारे प्रेम के आगे मैंने अपना सब कुछ पल भर में त्याग दिया था याद है कि नहीं? हम दोनो मिलकर मेहनत करेंगे अपने बच्चों को पढ़ायेंगे उन्हें एक अच्छा जीवन देंगे। तुम पछताओ मत! ग़लती आदमी से ही होती है, बस नशे की आदत छोड़ दो!’’वह उसे सान्त्वना देती रही जब तक वह जगा रहा।

मन दौड़ रहा था। सैकड़ो किलो मीटर दूरऽ ! भटक रहा था । हाथ यंत्रचालित की तरह चाय बना रहे थे। जब वह दो कप चाय लेकर कमरे में आई तो शिवा को झपकी आ रही थी।

’’ ये लो पहले पी लो ! फिर सो लेना।’’ उसने चाय का मग उसे पकड़ाया और खुद भी बैठ कर चाय के घूंट भरने लगी।

’’ नवरात्रि चल रही है सोचता हूँ कल चलें देवी माता के मंदिर में दर्शन करने, हमें लगभग एक साल साथ रहते हो गया अब तो अपने रिश्ते को एक अच्छा सा नाम दे दिया जाए। जब भी जान-पहचान वाले पूछते हैं तो अपने को पति-पत्नि बताना पड़ता है। हर बार लगता है जैसे झूठ बोल रहा हूँं, क्यों न हम इसे सच कर दें झुमकी?’’

’’ रिश्ते को नाम तो मिल ही गया है शिवा, भगोड़ा , हम अपना अपना घर परिवार छोड़कर एक दूसरे के साथ भाग आये हैं, अपने दायित्व से मुँह मोड़ कर। मैंने अपने चार बच्चों और बूढ़ी सास को छोड़ा है, और तुमने अपनी जवान बीवी के साथ एक छोटी सी बच्ची को धोखा दिया है, अपने सुख में हम किसी को भागीदार बनाना नहीं चाहते थे। लेकिन बच भी कहाँ पाये हैं कभी ? हर पल वे हमारे साथ हैं अपने वजूद का एहसास कराते हुए ।’’ उसकी आवाज़ अंतस की गहराई से आ रही थी।

’’ जो हो गया उसे बदला तो नहीं जा सकता, वह परिस्थिति ही वैसी थी , नहीं भागते तो शायद तुम जीवित न बचती! कैसे सब लोग जंजीर लेकर खड़े थे तुम्हें फांसने के लिए ? कोई कहता जिसके नाम से पैसे मिले हैं उसी के नाम पर खर्च भी कर दो, नारायण बलि कराओ नहीं तो यहाँ रहना मुश्किल कर देगा बेदू, कोई कहता दान-पुन करो ताकि उसकी आत्मा को शांति मिले, अपने लिए और बच्चों के लिए अच्छे-अच्छे कपड़े बनवा लो!दो चार गहने ले लो कहते हैं गहने संपत के सिंगार और बिपत के आहार होते हैं , अब कहाँ से तुम्हें पैसे मिलेंगे आगे ? कोई कहता बेदू की माँ का भी तो अधिकार है पैसों पर? बेचारी !रात दिन रो रही है, तुम्हारा हाथ उठता नहीं था पैसे छूने के लिए। तुम्हारा वह आर्तस्वर अभी तक गूँज रहा है मेरे कानों में ’’ मुझे यहाँ से निकाल ले चलो शिवा वर्ना मैं जिंदा नहीं बचूंगी। मेरा सिर फट जायेगा!’’ मैं क्या कर सकता था उस समय तो तुम्हें बचाना ही सबसे जरूरी लगा था मुझे।’’

’’ मैं तो पागल हो गई थी अपने साथ तुम्हें भी कहीं का न छोड़ा,काश कि हम वहीं रह कर परिस्थिति का सामना किये होते ! कम से कम हमारे अपने तो हमारे साथ होते! झुमकी के मुँह से एक निःश्वास ख़ारिज हुई ।

’’ जो हो गया उसे बदला नहीं जा सकता झुमकी , अब आगे के लिए कुछ सोचना आवश्यक है, हम मुँह चुरा कर जीने के लिए अपना शहर छोड़कर नहीं निकले, पहले भी तुमने दुःख ही झेले हैं अब बची हुई जिन्दगी संवारने की कोशिश करने में क्या हर्ज है, तुम्हारी सूनी मांग सजा देना चाहता हूँ झुमकी, तुम्हारे होठों पर फिर से सच्ची हँसी सजा देना चाहता हूँ, उसने भावुकता में बह कर झुमकी का हाथ अपने हाथ में ले लिया। जिसे छुड़ाने की कोशिश उसने नहीं की।

’’ अभी भी तो सुखी हैं हम, क्या कमी है? हमारी जिन्दगी में? मुझसे कोई नहीं पूछता कि तुम अपने पति के साथ रहती हो फिर भी सिंदूर टीका क्यों नहीं लगाती? सब, सोचते हैं आजकल फैशन में है इस तरह रहना। बड़े शहर में इतना कोई किसी के बारे में नहीं सोचता। ऐसे ही कट जायेगी जिंदगी, अभी तक क्या तुमने मेरे लिए कुछ कम किया है? मैं तुम्हारे उपकार का बदला सात जन्म में भी नहीं चुका सकती।’’

’’ जिन्दगी किसी तरह काटने के लिए नहीे मिली झुमकी! हमने जो कुछ खोया है उसे फिर से पाने का एक अवसर है हमारे पास। ऐसे कैसे कट जायेगी? यहाँ छिपकर कब तक रहेंगे? यदि तुम्हारे दिल में मेरे लिए कोई जगह न हो तो और बात है।’’ शिवा की आवाज़ उदासी में डूबी हुई थी।

’’ अच्छा अभी तुम थोड़ा सो लो फिर हम दोपहर को आराम से बातें करेंगे इतना विश्वास रखो होगा वही जो तुम चाहोगे।’’ उसने अपने हाथ से उसे सुला दिया और वहाँ से हट कर नहाने की तैयारी करने लगी। यह पहली बार नहीं था जब उसे शिवा के प्रस्ताव का सामना करना पड़ा था , पहले भी वह टाल चुकी थी ऐसी परिस्थिति को।

नल में पानी आने लगा था, लगभग सात बज चुके थे ठंड के आने का हल्का-हल्का सा आभास होने लगा था। पड़ोस के घर में एक उड़िया परिवार रहता था उनके यहाँ इस समय पूजा हो रही थी, शंखध्वनि आ रही । धूप की सुगंध आ रही थी। आँगन में नल था जहाँ वह कपड़े धो रही थी। सुबह की प्यारी सी धूप उसके शरीर का स्पर्श कर रही थी। उसे अच्छा लगा सब कुछ। दरवाज़े के सामने एक पीपल का विशाल वृक्ष था, उसकी मोटी-मोटी शाखों पर बंदरों का झुंड अठखेलियाँ कर रहा था। एक बंदरिया अपने नन्हें से बच्चे को सीने से चिपकाये उसके सिर पर हाथ फेर रही थीं । बच्चे ने अपने छोटे-छोटे हाथों से उसकी कमर थाम रखा था । वह जल्दी-जल्दी मुँह चलाती कुछ खा रही थी, मोहल्ले के बच्चे उन्हें छेड़ रहे थे। कुत्ते भौंक रहे थे, बंदर सब ओर बेपरवाह अपने क्रियाकलापों में मग्न थे। उसने सुना था बंदरिया अपने बच्चे को मरने के बाद भी अपने से अलग नहीं करती, और वह ? वह तो अपने बच्चों को बेवजह छोड़ आई है। तीन साल का सेत उसकी छाती से लग कर सोता था, अभी तक उसका दूध पीता था । न जाने किस हालत में होगा ? कहीं मेरा सेत गलत हाथों में न पड़ गया हो? हे ! देवी माँ मेरे बच्चे की रक्षा करना! बेटियाँ कितनी सुंदर- सुंदर हैं जैसे रबर की गुड़िया रोज़ ही तो समाचार आते हैं कहीं वे किसी खूनी भेड़िये के शिकंजे में न फंस जायें। उनकी दादी कहाँ-कहाँ देखेगी? काम ज्यादा हो नहीं पाता, कहीं भीख न मांगने लगी हो! हे भगवान् ! बेदू की आत्मा मुझे कैसे माफ़ करेगी?’’ उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे जो धूले कपडा़ें में समा रहे थे।

उस दिन भी वह नहा कर कपड़े धो रही थी कि उसने तालाब की ओर से उठता शोर सुना था- बेदू तालाब में डूब गया ...बेदू तालाब में डूब गया... । मोहल्ले के बच्चे जो बेदू की तरह कमल का फूल तोड़ने जाते थे, शोर मचा रहे थे। सभी लोग तालाब की ओर भागे जा रहे थे, कुछ देर तक तो उसे कुछ समझ में ही नहीं आया कि किस बात का हल्ला मचा है । जब समझ में आया तो गिरती-पड़ती दौड़ी तालाब की ओर। वहाँ पहुँचने पर कई औरतों ने संभाल लिया था उसे । कुछ लोग मछली पकड़ने वाला जाल डाल रहे थे । पुलिस आ गई थी, गोता खोर गोता लगा कर उसे ढ़ूढ़ रहे थे।

’’उसके जिन्दा बचने की उम्मीद नहीं है लगभग दो घंटे हो गये डूबे, होनी को कौन टाल सकता है रोज़ तो किनारे से घूसता था तालाब में, पानी की थाह लेते हुए आगे बढ़ता था, आज न जाने क्या सूझा कि पुल पर जाकर बीच में कूद गया ! वहाँ पानी बहुत गहरा है पता नहीं कैसे जो डूबकी लगाया तो फिर ग़ायब ही हो गया।’’

कोई किसी से कह रहा था ।

’’ उसी समय हल्ला क्यों नहीं किये, अब बताकर क्या करोगे?’’ उसने रोते हुए पूछा था उस आदमी से ।

’’सैकड़ों फूल रोज तोड़ता था। वह तो इस काम में बहुत होशियार हो गया था। कुछ लोग और फूल तोड़ रहे थे, हम सबने हल्ला मचाया तभी तो इतनी जल्दी गोताखोर दल आ गया।’’

वह आदमी बेहद घबराया हुआ था जल्दी-जल्दी और जो-जोर से बोल रहा था। बड़ी मशक्कत के बाद शाम तक बेदू की लाश मिली पुरइन की जड़ों में फँस जाने के कारण वह ऊपर नहीं आ सका था। वह तो उसे देखते ही बेहोश हो गई थी। पता नहीं किसने उसे घर पहुँचाया, किसने बेदू की विदाई की सब तैयारी की । उसने सुना था कि दुर्घटना की सूचना पाकर कलेक्टर साहब आये थे क्रियाकर्म के लिए पचास हजार दे गये थे। शिवा आ गया था तब तक, उसने सारा काम संभाल लिया था । उसकी सास तो बस लड़के का नाम ले-ले कर रोती ही जा रही थीं, उसने उसी दिन मान लिया था कि उसका सब कुछ लुट गया।

सही थी सास क्यों न हो? उसने दुनिया जो देखी है।

बेदू ने प्रधान मंत्री स्वाथ्य सुरक्षा बीमा योजना में बारह रूपये सालाना जमा करना शुरू किया था उसी साल से। उसके दो लाख निकलवा लिए शिवा ने। पचास-पचास हजार कांग्रेस और भाजपा वाले दे गये। कुछ निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी दिये ये कहते हुए ’’भाइयों ! देखिये हम आपके सच्चे हमदर्द हैं, आप के अपने हैं, हमें वोट दीजिए ताकि हम आगे भी आपके काम आते रहें। साढ़े चार लाख थे उसके खाते में जिसे खर्च करने की सलाह हर ओर से आ रही थी। शिवा की राय थी कि अभी कुछ दिन शांत रहो जब सब शांत हो जाय तब कुछ रूपये निकाल कर कोई छोटी-मोटी दुकान कर लेना जिससे रोज़ का खर्च चलता जाय , बाकी जमा रहने देना, बाद में बच्चों के काम आयेंगे उसे यही सही और अंतिम सलाह लगी थी।

इसके बाद नई मुसीबतें शुरू हुईं।

लोग शिवा को लेकर चर्चा करने लगे, ’’झुमकी के तो पौ बारह हो गये। आग लगी है जमाने में, अभी चिता की राख भी ठंडी नहीं हुई आदमी के और लाज-शरम छोड़ कर दिन-रात पड़ी है शिवा के साथ, और वह मूआ अपनी जवान-जहील औरत छोड़ कर चार बच्चे की माँ के ऊपर जान दिये पड़ा है। ’’

’’पैसा सब कुछ कराता है भइया, मुफ्त का पैसा खर्च कैसे होगा? ’’

’’ अरे भइया अभी क्या देख रहे हो ? आगे देखना क्या होता है? ओ तो जैसे आता है वैसे ही जाता भी है अपने जाने का रास्ता खुद ही बनाते आता है।’’ लोग उसे सुना-सुना कर कहते थे । उस दिन वह अपनी तकदीर पर आँसू बहा रही थी कि शिवा आ गया। भावुकता में उसने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया। वह उसे सान्त्वना दे रहा था कि शिवा की पत्नि नीरा आँधी झक्कड़ की तरह वहाँ दाखिल हुई । पहले तो अपनी चप्पल उतार कर पाँच- दस चप्पल दोनों पर बरसाई । झुमकी की कमर से उसकी साड़ी खींच दी ।

’’ अरे रंडी! अपने आदमी को खा गई! अब मेरे आदमी पर डोरे डाल रही है, दिन-रात घुसाये रहती है , कभी समझ मे आया कि इसका भी घर-बार है बीवी बच्चे हैं , तू रांड क्या हुई लगता है मैं ही अकेली हो गई। आज दो माह हो गया काम छोड़ कर तेरी .... धो रहा है । तू चलायेगी मेरा घर बोल ! ’’ शिवा के डाँटने का कोई असर नहीं हुआ, वह चिल्लाने से बाज नहीं आई, लोग भीड़ लगा कर तमाशा देख रहे थे। शिवा से सहन न हुआ झुमकी का ऐसा अपमान। ,

’’तू जाती है कि नहीं घर ? आदमी किसी के दुःख में काम न आयेगा तो कौन आयेगा बोल ?’’ उसने उसे दो झापड़ मार दिया। इस पर कई लोग उसे गाली दे-दे कर मारने लगे।

उसी रात भागे थे दोनो सब कुछ छोड़-छाड़ कर ।

’’ ठीक है जैसा सब कह रहे हैं वही सही है। अब हम एक दूसरे के हो कर ही रहेंगे।’’ शिवा ने कह दिया था, सास अभी सदमें में ही थी, बच्चे जहाँ-तहाँ सो गये थे भूखे-प्यासे, उसे तो जैसे जहर चढ़ गया था, शिवा भी चोट खाये सांप की तरह बल खा रहा था, न उसने घर जाकर देखा कि क्या हाल है बीवी बच्ची का और न झुमकी ने कुछ सोचा, बस थोड़े से कपड़े ए.टी.एम. कार्ड बैंक की पासबुक, अपना आधार कार्ड जैसी कुछ आवश्यक वस्तुएं एक थैले में रखी और सब के सो जाने के बाद दोनों चुपचाप निकल लिए थे बिलासपुर से , तब मंज़िल अंजानी थी। संयोग से वे जिस गाड़ी पर चढ़े थे वह भुवनेश्वर जा रही थी। बस शिवा वहीं का टिकिट ले आया। यहाँ भी कौन से अपने समधी रहते थे जो गरम-गरम भात पकाकर खिलाते उन्हें ? भटकन ही थी ,परंतु एक नया काम , एक नया उद्देश्य मिल जाने से दुश्चिंताओं की ओर से मन हटा जरा सा। कुछ दिन धर्मशाले में रह कर घर खोजा उन्होंने । घर मिल जाने पर काम की तलाश में लग गया शिवा। अब वह चाहता है अपनी तपस्या का फल उसे गृहपति बनने की अदम्य कामना है। वह धैर्य से इंतजार कर रहा था लेकिन अब वह और नहीं रुकेगा ऐसा लगता है झुमकी को । उसकी भूख तन की नहीं मन की भी है स्वामित्व की है। समाज में मान-प्रतिष्ठा पाने की है, चार लोगों में अपना और झुमकी का सच्चा परिचय देने की हैं ।

नहा कर वह कमरे में आई तब तक दूध वाला आ गया था उसने उसे दो मिनट रुकने को कहा और जल्दी-जल्दी कपड़े पहनने लगी। दूध वाले के जाने के बाद उसने अपने लिए एक कप और चाय बनाई और सोचने लगी अब और अधिक इस विषय को टाला नहीं जा सकता । कोई ठोस निर्णय लेना ही होगा। जो कुछ भी हुआ उसमे किसी का दोष नहीं है परिस्थितियाँ ही ऐसी बनती गईं कि होनी को रोका नहीं जा सका। उसकी तकदीर खोटी न होती तो बाप की पगड़ी उछाल कर घर से भागती? तकदीर खोटी न होती तो बेदू उस तालाब में डूबता जिसे गहरा करने में उसने पसीना गिराया था? रह गई बात नीरा की तो वह पूरी तरह निर्दोष है जिसका पति घर बार भूल कर दूसरे की सेवा में लगा रहेगा उसकी पत्नि इतना भी न करेगी जितना उसने किया?

शिवा छोटा है उम्र में, उसके शरीर की मांग वह कैसे पूरी कर पायेगी? फिर वह केवल वही तो नहीं जो दिख रही है और भी पाँच लोग हैं जिन्हें वह असह्य दुःख दे आई है। जिन रूपयों को बचाने के चक्कर में उसने बिलासपुर छोड़ा था वे तो बहुत कुछ खर्च हो गये। शरीर की ताकत ही असली पूँजी है उनके जैसे लोगों के लिए । इसी से मेहनत करके जीवन जिया जा सकता है। वह नीरा के पैर में अपना सिर पटक कर उससे माफ़ी मांग लेगी । शिवा के सामने कभी न पड़ने की कसम खा लेगी । चाहे कोई कुछ भी कहे दीपावली तक अवश्य पहुँचेगी अपने बच्चों के पास । उसे शिवा की नफरत झेलनी होगी, सब के ताने सुनने होंगे जीवन भर। ’’ कोई बात नहीं जब बेदू का जाना सह गई तो बाकी बातें कितना छेदेंगी दिल?’’

उसने भगवान के सामने आरती का दीप जलाया, उसकी लौ में पाँच चेहरे झिलमिलाने लगे।

मेहनत समाज अपने

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