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मुंबई से बनारस
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© Rasbihari Pandey

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भविष्यनिधि कार्यालय वाराणसी में कार्यरत रंजीत का ट्रांसफर जब मुंबई के लिए हुआ तो उसकी ख़ुशी का पारावार न रहा। उसने मन ही मन भगवान को धन्यवाद दिया कि अच्छा हुआ उसका ट्रांसफर चेन्नई, कोलकाता या किसी दूसरे शहर में नहीं हुआ वर्ना स्वप्ननगरी, मुंबई आने की वर्षों की इच्छा कुछ सालों के लिऐ फिर दबी रह जाती। ऑफिस से छुट्टी लेकर कहीं जाना तो तीर्थ करने जैसा ही होता है, दो चार दिन घूमे फिर लौट आए। घर आकर जब उसने यह सूचना अपनी पत्नी और दोनों बच्चों को दी तो वे ख़ुशी से चहक उठे।छो टे ने तुतलाकर कहा- पापा मुंबई जाने पर शाहरुख और अमिताभ से मिलवाओगे न..! तो रंजीत को बच्चे के भोलेपन पर हँसी आ गई।

अगले दिन वह वाराणसी रेलवे रिजर्वेशन कक्ष में था। पूछताछ करने पर पता चला कि मुंबई से वाराणसी जाने वाली सभी गाड़ियाँ अगले एक महीने तक फुल हैं। वेटिंग टिकट लेकर रिजर्वेशन वाले डब्बे में जा सकते हैं, हो सकता है टीसी ट्रेन में कुछ ले देकर कोई सीट एलॉट कर दे, लेकिन ऐसा न होने पर परिवार के साथ उसे पूरे 26 घंटे का सफ़र नीचे बैठकर काटना होगा। सोचकर ही रूह काँप गई- कैसे हर रोज लाखों लोग रिजर्वेशन का पूरा पैसा देकर भी ट्रेन के डब्बों में फर्श पर बैठकर 24 से 50 घंटे तक की यात्रा करते हैं। नहीं, उससे तो ऐसा नहीं होगा। ग्राहक की तलाश में वहाँ घूम रहे एक टिकट दलाल ने स्थिति भाँप ली और पास आकर पूछा- कहाँ का टिकट चाहिए, भाई साहब?

मुंबई का...

तो चिंता काहे करते हैं, थोड़ा खर्चा-पानी करिए ...ई तो अपना रोज का काम है।

कितना  टिकट चाहिए? पति, पत्नी और दो बच्चे।

चार लोग हैं तो दो हजार एक्स्ट्रा दे दीजिए बाक़ी जो टिकट पर लिखा रहेगा सो.....

हर टिकट पर पाँच सौ! इससे तो अच्छा है, मैं तत्काल सेवा में दो सौ एक्स्ट्रा देकर चला जाऊँगा। रंजीत ने अँधेरे में एक तीर मारा, हालाँकि उसे मालूम था कि तत्काल सेवा में भी कन्फर्म टिकट मिलना मुश्किल है।

किस दुनिया में हैं, भाई साहब? तत्काल सेवा की खिड़की खुलती है और पाँच मिनट में फुल। आप जैसे लोग लाइन में ही खड़े रह जाते हैं, टिकट मिल भी गया तो कन्फर्म नहीं होता। इस दो हज़ार में हम अकेले थोड़े हैं- तीन हिस्से लगेंगे महँगाई के इस ज़माने में...बहुत ज्यादा नहीं मिलेगा मुझको।

रंजीत ने अब ज्यादा जिरह करना उचित नहीं समझा। पैसे देते ही किसी चमत्कार की तरह उसके पास दस मिनट के भीतर टिकट हाज़िर था।

अपने ऑफिस के चतुर्वेदी जी ने मुंबई के एक मराठी मित्र से कहकर दस हजार रुपये में एक महीने के लिऐ  बतौर पेइंग गेस्ट रहने की व्यव्स्था करा दी थी। दो कमरों का छोटा सा फ्लैट था। एक किचन के रूप में इस्तेमाल होता,एक बेडरूम के रूप में। रंजीत पत्नी और बच्चों के साथ किचन में सोता और वे पति पत्नी अपने बेडरूम में। बनारस में इतने खुले ढंग से रहने के बाद यहाँ एक संकुचित दायरे में रहने में बहुत अटपटा लगता लेकिन मुंबई के ग्लैमर और अपने नए आशियाने के बारे में सोचकर संतोष होता। चलो, एक महीने निकल जाएंगे किसी तरह। मुंबा देवी, महालक्ष्मी मंदिर, सिद्धिविनायक, हरे कृष्ण मंदिर, हैंगिंग गार्डेन, जुहू चौपाटी जैसी मशहूर जगहों पर घूमकर पत्नी और बच्चे फूले न समाते थे। उन्हें हाजी अली और अक्सा बीच पर शूटिंग देखने का भी मौका मिला। एक ही सीन के कई रीटेक और फिर अगले सीन की तैयारी के लिए लगनेवाले वक़्त से वे थोड़े बोर ज़रूर हुए लेकिन फिर उसे इस व्यवसाय का हिस्सा मानकर भूल गए ।  

ऑफिस के सहकर्मियों से उसने मकान दिलाने की बात की तो वे बोले- यार किसी इस्टेट एजेंट को पकड़ो, उसे ब्रोकरेज दो, मकान दिला देगा। छोटे शहरों की तरह बिना ब्रोकरेज और एग्रीमेंट के मकान नहीं मिलते यहाँ। वह इस्टेट एजेंट के पास पहुँचा तो पता चला कि बांद्रा और दादर जैसे इलाके में जहाँ से उसका ऑफिस नज़दीक है, फ्लैट का किराया कम से कम 35-40,000 है। डिपॉजिट मनी तीन चार लाख जो उसके बजट के बाहर है।एजेंट ने समझाया –आप मीरा रोड या भायंदर में कोशिश करिए, वहाँ 7-8 हजार में फ्लैट मिल जाएगा। जब वह मीरा रोड के एजेंट के पास पहुँचा तो एजेंट ने बताया कि -80,000 डिपॉजिट और 8 हज़ार भाड़े में फ्लैट मिल जाऐगा। एग्रीमेंट का दो हजार और दो महीने का भाड़ा सोलह हजार ब्रोकरेज अलग से देना होगा ।

रंजीत रुआँसा हो गया। तत्काल लगभग एक लाख की व्यवस्था कर पाना मुश्क़िल था। उसने एजेंट से पूछा- भाई साब हमारा बजट इतना नहीं है। 4-5 हजार भाड़े और 35-40 हज़ार डिपाजिट वाला कोई कमरा नहीं दिला सकते?

इस बजट में तो चाल में ही मिल पाएगा।

वहाँ कोई कठिनाई?

कठिनाई टॉयलेट की होती है। लेकिन आप जैसे और भी लाखों लोग जिनका फ्लैट का बजट नहीं होता, चालों में ही रहते हैं। ये कार्ड लीजिए और फोन कीजिए। मेरा दोस्त है उस इलाके में प्रापर्टी का काम देखता है। कांदिवली या दहिसर के किसी चाल में खोली दिला देगा।

रंजीत चौंका... खोली मतलब?

एजेंट हँसा- यहाँ चाल के कमरे को खोली बोलते हैं ।

अच्छा यह बात है, अच्छा हुआ आपने बता दिया। मैं याद कर लेता हूँ ।

महीना बीतते-बीतते रंजीत को चार हजार भाड़े और चालीस हजार डिपॉजिट में दहिसर के  चाल में एक खोली मिल गई। उसने चैन की साँस ली। चाल का परिवेश उसके संस्कारों से बिल्कुल मेल नहीं खाता था। यहाँ ज्यादातर लोगों का जीवन शारीरिक श्रम से जुड़ा था। कोई रिक्शा चलाने वाला था तो कोई सब्जी बेचने वाला, कोई ठेला लगाने वाला था तो कोई फेरी लगाने वाला। दिहाड़ी पर मजदूरी करनेवालों की भी अच्छी ख़ासी संख्या थी। ऐसे में रंजीत का असली दोस्त उसका टेलीविजन सेट ही था, जिसके जरिए वह अपना मन बहलाया करता था। हालाँकि सोमवार से शुक्रवार तक ऑफिस आने-जाने के क्रम में तीन घंटे तो ट्रेन और बस में ही निकल जाया करते थे। आठ घंटे ऑफिस में देने के बाद, बाक़ी जो समय बचता, उसमें अखबार पढ़ना, थोड़ा बहुत न्यूज देखना और घर के दूसरे काम निपटाने की जिम्मेवारी होती।

शनिवार,रविवार या छुट्टी के दिन में ही थोड़ा चैन मिलता।

चाल में रहते हुए सबसे बड़ी परेशानी थी शौचालय जाने की। सुबह चार साढ़े चार बजे तक उठ गए तो ठीक वर्ना बाद में इतनी लंबी लाइन लगती कि दिमाग ख़राब हो जाता। दस शौचालयों में हर एक के आगे 10-12 डब्बे लाइन से लग जाते, भीतर गऐ   अभी पाँच मिनट गुज़रा नहीं कि दूसरे दरवाजा खटखटाना शुरू कर देते- जल्दी कर, भाई दुबारा आ जाना। कोई कोई शरारत भी करता- भीतर जाके सो तो नहीं गए   यार। जल्दी कर काम पर जाने का है। एक और बड़ी परेशानी थी- सार्वजनिक नल से पानी लेने की। लाइन लगाकर देर तक इंतज़ार करने के बावजूद ज़रूरत के मुताबिक पूरा पानी नहीं मिल पाता था। लोकल लोगों की दबंगई का शिकार होना पड़ता और अक्सर भैया होने और मुंबई में भीड़ बढ़ाने के जुमलों से भी दो-चार होना पड़ता। पर मरता क्या न करता, आर्थिक अभाव में सब कुछ जहर के घूँट की तरह पीना पड़ता।

चाल में रहनेवाले बच्चों से लेकर बूढ़ों तक का बोलचाल कुछ अजीब किस्म का था, जिसे आमतौर पर मुंबईया भाषा कहा जाता है- मराठी और हिंदी का मिला जुला विकृत रूप।पड़ोसियों से सीखकर कुछ जुमले घर में बच्चे भी बोलने लगे थे- मेरे को तेरे को, आने का जाने का। यह भाषा हिंदी फिल्मों में उसे जितनी अच्छी लगती थी, व्यवहारिक जीवन में उतनी ही चुभनेवाली थी।

उसने ऑफिस में अपने एक सहकर्मी से अपना दर्द बयान किया तो उसने सुझाव दिया कि कुछ लोग अपने नाम से एलॉट हुऐ सरकारी फ्लैट कम भाड़े पर दूसरों को देते हैं,अगर वह चाहे तो ऐसा कोई फ्लैट ढूँढने में वह उसकी मदद कर सकता है। जाँचदल वालों की पकड़ में आने पर मकान मालिक के रिश्तेदार के रूप में परिचय देना होगा। भरसक पकड़ में न आने का प्रयास करना होगा। रंजीत को मित्र का यह सुझाव पसंद आया। दो महीने की पड़ताल के बाद उसे एक ऐसा फ्लैट मिल गया। अंटाप हिल इलाके में आयकर विभाग में काम करनेवाले एक सज्जन ने अपने नाम से एलॉट फ्लैट भाड़े पर उसे दे दिया।मुंबई में पहली बार टॉयलेट बाथरूम वाले फ्लैट में आकर उसे बेइंतहा ख़ुशी हो रही थी। पत्नी और बच्चे भी ख़ुश थे लेकिन उनकी खुशी स्थायी रूप से टिकी नहीं रह सकी। अक्सर छापेमारी वाला दल चक्कर लगाने आ जाता। सरकारी फ्लैट में अवैध रुप से रहने का भय बराबर बना रहता। वह कभी निश्चिंत नहीं रह पाता था। इस दल के आने की ख़बर लगते ही पत्नी, बच्चों को खिड़की और लाइट बंद करने को कहकर फ्लैट में बाहर से ताला लगाकर कहीं बाहर निकल जाता। हर बार घर में ताला लगा देखकर हो जाँचदल वालों का शक पुख़्ता गया, ज़रूर कोई बाहरी आदमी रह रहा है। उन्होंने अगल बगल वालों से पूछताछ की तो उन्होंने बता दिया कि इस फ्लैट में कोई भाड़े से रह रहा है। फिर क्या था जाँच दल वाले एक दिन देर रात को आ धमके। रंजीत ने अपना परिचय उन्हें संबंधित व्यक्ति के रिश्तेदार के रूप में दिया और बताया कि फिलहाल वे गाँव गए हैं। विभाग ने कर्मचारी को तलब किया। कर्मचारी ने सफाई देते हुऐ कहा कि रंजीत उसके मौसेरे भाई का लड़का है। हाल ही में उसके मकान का एग्रीमेंट ख़त्म हुआ था और मुझे थोड़े दिन के लिए गाँव जाना था, इसलिऐ  फ्लैट में रख लिया। सोचा था तब तक वह अपने लिए नया घर भी ढ़ूँढ़ लेगा और मेरे फ्लैट की निगरानी भी हो जाएगी। आप लोग तो जानते हैं कि मुंबई के बंद मकानों में चोरियाँ कितनी बढ़ गई हैं। अब इसके लिए मुझे जो सजा दी जाए, मंज़ूर है।

55वर्षीय व्यक्ति की इस फरियाद पर दया बरतते हुए जाँच दल ने मामूली जुर्माना लगाकर आगे से ऐसा न करने की हिदायत के साथ छोड़ दिया। अब रंजीत के सामने एक बार पुनः घर की समस्या खड़ी हो गई। वह चाल के नारकीय जीवन में फिर से नहीं लौटना चाहता था और प्राइवेट फ्लैट का किराया दे पाना उसकी औक़ात से बाहर था। ऐसे में उसने पुनः उसी सहकर्मी के पास जाकर अपनी समस्या रखी। सहकर्मी ने सुझाया कि वह विरार चला जाए,वहाँ उसे कम किराये में फ्लैट मिल जाएगा। आने जाने में थोड़ी तक़लीफ तो होगी लेकिन समस्या का निदान हो जाऐगा। रंजीत ने तनिक विस्मय से पूछा- वही गोविंदा वाला विरार!

हाँ भाई हाँ, वहीं रहकर गोविंदा ने अपना फिल्मी स्ट्रगल शुरू किया था, कामयाब हो जाने के बाद जुहू रहने लगा लेकिन जब लोकसभा का चुनाव लड़ना हुआ तो फिर उसने उसी क्षेत्र का चुनाव किया। दूरी और लोकल ट्रेन की भीड़ को यादकर उसके तन बदन में कँपकँपी-सी होने लगी मगर कोई दूसरा चारा न देखकर उसने विरार रहने का मन बना लिया।एक एजेंट ने पचास हजार रुपए डिपॉजिट और पाँच हजार भाड़े पर विरार में फ्लैट दिला दिया। एग्रीमेंट 11 महीने के लिए था। 11 महीना ख़त्म होने के बाद उसी एजेंट ने दुबारा अपनी फीस लेकर दूसरा फ्लैट दिला दिया, फिर तीसरा फिर चौथा....मगर किसी मकान में व लगातार दो टर्म नहीं रह पाया। इसके पीछे एजेटों की मोनोपोली थी। किरायेदार और मकान मालिक दोनों से दलाली लेना और हर बार किराया कुछ बढ़ा देना उनकी पॉलिसी थी ताकि उन्हें मिलने वाले पैसे पहले से कुछ ज्यादे हों।रंजीत ने ख़ुद बहुत कोशिश कि बिना दलाली दिए कोई फ्लैट मिल जाए मगर इस कोशिश में उसे कामयाबी नहीं मिली। किराये पर फ्लैट देनेवाले अधिकांश मकान मालिक शहर के दूसरे हिस्सों में रहते थे।फ्लैट लेकर उन्होंने एक तरह का इन्वेस्टमेंट किया था।अगर कोई अगल-बगल का हुआ तो भी इस बात से डरता कि किरायेदार ने मकान में आने के बाद समय पर खाली करने में आनाकानी की तो कोर्ट कचहरी के लफड़े में कौन पड़ेगा। इस्टेट एजेंट तो पुलिसवालों और गुंडों दोनों से मिले होते हैं, सो चिंता की कोई बात नहीं होती। इसलिए कौन ख़ुद से किरायेदार को डील करे, एजेंटों को ही सौंप दो, अपने को पैसे से काम है- सो मिलेगा ही, एक दो महीने का कमीशन लेते हैं तो लेने दो,लफड़े से तो बचे रहेंगे।

किराये के मकानों में मकान मालिक जब तब आकर पच्चीस तरह की हिदायतें दे जाते थे, मसलन दरवाजा खिड़कियाँ सँभालकर खोलें बंद करें, प्लास्टर न उखड़ने पाए। मकान में कहीं कोई कील नहीं गड़नी चाहिए ।बच्चे दीवालों पर कहीं कुछ लिखें नहीं, नलों को ठीक से इस्तेमाल करें...वगैरह वगैरह। कभी ऐसा भी हुआ कि कोई मकान 6-7 महीने में ही खाली करना पड़ जाता क्योंकि मकान मालिक की अपनी ज़रूरत होती। किसी के घर में शादी पड़ गई तो किसी ने मकान ही बेच दिया, ऐसे में परेशानी उसे ही उठानी पड़ती। विरोध इसलिऐ नहीं किया जा सकता था कि एग्रीमेंट पेपर में यह शर्त लगी होती कि मकान  मालिक को ज़रूरत हुई तो एक महीने पहले नोटिस देकर मकान खाली कराया जा सकता है।

इन सारी समस्याओं से मुक्त होने के लिऐ उसने बैंक से लोन कराकर अपना फ्लैट खरीदने का निर्णय किया। उसने विरार में आसपास चल रहे कई बिल्डरों के प्रोजेक्ट देखे। एरिया और प्रोजेक्ट के अनुसार 4 से 6 हजार स्क्वायर फुट का भाव चल रहा था। उसने हिसाब लगाया कि 500 एरिया का फ्लैट बीस लाख में आ जाऐगा। बिल्डर ने कहा कि दो लाख टोकन मनी दे दें, बाक़ी पैसे प्रोजेक्ट पूरा होने तक कुछ लोन, कुछ कैश दे देंगे तो पजेसन मिल जाऐगा।

प्रोजेक्ट पूरा होने तक रंजीत बिल्डर को तीन लाख रुपये कैश दे चुका था, बाक़ी बैंक से लोन हो गया था लेकिन अचानक बिल्डर ने पैंतरा बदल लिया और कहा कि फिलहाल हम सारे फ्लैट्स 6 हजार के रेट में बेच रहा है क्योंकि नया बजट आने  के बाद रेत, सीमेंट,ईंट, छड़ सबका दाम बढ़ गया है,अभी हम उसमें दो लिफ्ट भी लगा रहे हैं,चार लाख रुपये और देने होंगे। अगर वह दस दिनों के भीतर रुपयों की व्यवस्था कर सके तो ठीक वर्ना यह फ्लैट किसी दूसरे को बेच दिया जाएगा।रंजीत सकते में आ गया क्योंकि बिल्डर ने कोई कानूनी एग्रीमेंट तो किया नहीं था। पैसे की रसीद ज़रूर थी मगर कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए वह नाकाफ़ी थी। मरता क्या न करता, उसने पिछले 10 सालों से चली आ रही एल आइ सी का प्रीमैच्योर पेमेंट लिया,बच्चों के नाम बचत योजनाओं में डाले हुऐ पैसे निकाले,कुछ दोस्तों रिश्तेदारों से कर्ज़ लिया तब कहीं जाकर बाक़ी के चार लाख और अदा कर पाया। लेकिन समस्या यहीं खत्म नहीं हुई,फ्लैट में आने के बाद बिल्डर ने पचास हजार का बिल और थमा दिया।पूछने पर बताया गया कि सोसायटी और बिजली कनेक्शन के नाम पर हर फ्लैट ओनर से इतने पैसे लिऐ जाते हैं। उसे काटो तो ख़ून नहीं। पचास हजार और कहाँ से लाए? जहाँ से जितना हो सकता था, पहले ही खँगाल चुका था। दूसरा कोई उपाय न देखकर बिल्डर के ऑफिस में जाकर वह हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाया- मुझे दो-तीन महीने का टाइम दीजिए, इस पैसे पर चाहें तो ब्याज भी जोड़ लीजिए, फ्लैट के काग़जात भी अपने पास रखिए, मैं ये पैसे भी चुका दूँगा, लेकिन तत्काल मेरे पास फूटी कौड़ी नहीं है।पुराने पैसे चुकाने में ही बहुत सारा कर्ज़ हो गया है।बिल्डर फ्लैट के कागजात जमानत के रूप में रखने पर चुप हो गया।बोला-ठीक है, जितना जल्दी हो सके दे दीजिएगा, वर्ना ब्याज के पैसे बढ़ते जाएंगे।

थोड़े समय बाद उसे यह पता चला कि जिस फ्लैट में वह रह रहा है प्रति महीने उसका तीन हजार रुपये मेंटेनेंस भी देना है।बिजली का बिल बारह तेरह सौ आता ही है।फ्लैट खरीदने के बाद भी चैन नहीं। तीन बच्चों के स्कूल, ट्यूशन, किताब-कॉपी, ड्रेस से लेकर किचन और दोस्त,नाते रिश्तेदारी तक सब इसी तीस हजार के मासिक वेतन में करना है। दिन ब दिन महँगाई बढ़ती जा रही है। बच्चों के हायर एजुकेशन, शादी-ब्याह के लिए भी कुछ बचत करना ज़रूरी है। इस मकान में तो उसकी बाकी उम्र लोन की किस्त अदा करने में ही गुज़र जाएगी। गाँव की जिम्मेवारियों से मुँह बिल्कुल मोड़ लेना पड़ेगा। सपनों के जिस शहर में आने के लिए वह बेताब था,वहाँ की व्यवहारिक कठिनाइयों से जूझते जूझते उसका मन कसैला हो गया था। अब उसे अपना शहर बनारस बेसाख्ता याद आने लगा था। क्या ही अच्छा हो अगर फिर से बनारस ट्रांसफर हो जाए। न मकान का टेंशन न ट्रेन की खिचखिच, साइकिल से पंद्रह मिनट में दफ़्तर में हाजिर। अगले ही दिन वह अपने एक मित्र के साथ एक प्रभावशाली नेता के दरबार में था।उसका मित्र नेता जी से गुज़ारिश कर रहा था- सर! इन दिनों आपके पार्टी की सरकार है। आपके एक फोन पर इनका ट्रांसफर हो जाएगा। प्लीज सर! देखिए, गरीब का भला हो जाएगा।

 

रासबिहारी पाण्डेय मुंबई से बनारस

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