घरन्यौता

घरन्यौता

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बारह की धूप की तेज़ी जितना आँखों को चकाचौन्ध कर रही थी उसका मुख उतना ही विवर्ण होता जा रहा था, और विचारों के घोड़े भुवनभास्कर के घोड़ों से प्रतिस्पर्धा कर रहे थे।

उसने कानों को यथाशक्ति चौड़ा कर लिया। बैंड की थाप हवा की साँय सायँ के साथ महसूस हो रही थी। अब तो वहाँ द्वारचार निपट गया होगा।

ब्याह वाले घर की रौनक ही कुछ और रहती है। और फिर क्या कमी छोड़ी मालिक ने, शहनाई वाले लखनऊ से बुलाये गए थे, सजावट वाले दिल्ली के, और महाराज तो खास...

ऊँहहह ! फिर विचार उधर ही चले गए, जिधर से हटाना था। उसने करवट बदली। खाट चूँ से बोली और पेट भी।

इसी पापी पेट की खातिर आज तक मान अपमान सब सहे। परिवार को जैसे-तैसे रूखी-सूखी नसीब हो जाये बस। वो तो खास मौके पर ही...

आज भी तो खास मौका ही है। कल ही तो लड्डू के टोकरे, मिठाई के थाल, सब्जियों के गट्ठर उसने इधर-उधर किये थे। पन्द्रह दिन से हाड़ तोड़ मेहनत की, खुशी-खुशी।

और इतने ही दिनों से सारे पकवानों का विवरण घर आकर पत्नी और बच्चों को सुनाता रहा।

मिठाइयाँ तो ऐसी-ऐसी की उसे नाम भी नहीं पता उनके। मुनिया पूछती तो मनगढंत नाम बनाकर बता देता।बच्चों के रूखे चेहरे पर ऐसी चमक आ जाती जैसे जेठ की तपती धरती पर फुहार पड़ी हो और अब..... वो तपिश अरमानों का वाष्पीकरण कर रही है।

घरन्यौते की उम्मीद जो उसने जगा रखी थी। पिछले पंद्रह दिन से बच्चों के मन में उसे टूटते देखकर वो भागकर अमराई में आ पड़ा था, चौकीदारी का बहाना करके।

भूख से नहीं डरता वो, बिलखते बच्चों को कई बार देखा है, अब तो पानी मर गया आँख का। बस, उम्मीद टूटने की पीड़ा नहीं देख पायेगा और जो उलाहना होगा उनकी आँखों में 'दद्दा तुम झूठे हो।' बेटा तो ना बोलेगा, बड़ा समझदार है, गमखोर भी। पिछले चैत के मेले में मोटर को कैसे टुकुर टुकुर देख रहा था। पूछा तो बोला 'रहने दो दद्दा पचास की है'। फिर कई दिनों तक घर के कबाड़ से मोटर बनाने की जुगत करता रहा। उसके नेत्रों में कुछ तैर गया नम सा।' वो खुद भी तो उमर से पहले बड़ा हो गया था, बाबू गए तब कितने बरस का था वो दस..बारह...'

'क्या फर्क पड़ता है,बरस से। समझ और बरस का क्या नाता, नाता तो हालत से है।....पर मुनिया ! कल कोयले से धरती पर लड्डू का फोटू बना रही थी...!'

उसे हँसी आ गई, 'कैसे गोल-गोल फोटू बनाये थे, काले-काले।'

क्षण भर में ही विषाद फिर आ घेरा। बहुत सोच समझ कर ही संचारी भाव बताये गए हैं। एक जाता नहीं दूसरा आ जाता है। 'कल से रोटी न देखी बच्चों ने। मालिक ने व्यस्तता में हिसाब भी तो नहीं किया।'

उसने आसमान की तरफ देखकर हिसाब लगाया, दो शनिवार बीत गए। मतलब तीन हफ्ते से सौदा सल्फा नहीं है घर में। 'पता नहीं ये मुनिया की माँ कैसे घर चलाती है।

साक्षात लछमी है।'

उसे लगा कोई पुकार रहा है, उठकर चारों तरफ़ देखा। कोई नहीं है भ्रम है। हवा का झोंका अक्सर हमें हमारे नाम की प्रतिध्वनि करता लगता है, खासकर तब जब हम अकेले हों।

उसे लगा कि झोंके में मसालेदार दम आलू और कढ़ी की खुशबू भी घुली है। कुछ भी हो कढ़ी मुनिया की माँ जैसी कोई नहीं बना सकता। पत्नी को याद करते ही बरबस मुस्कान आ गई चेहरे पर।

सूखते होठों को उसने जीभ से गीला किया।' मुझसे ज्यादा समझदार तो वो है, परसों रात बच्चों के सो जाने के बाद कितने अच्छे से समझा रही थी की बच्चों को ऐसे सपने न दिखाओ जो पूरे ना हो।

मैंने ही उसे झिड़क दिया था 'हम मालिक के रात दिन के साथी हैं, अरे हमें घरन्यौता देंगे वो। तू भी चलना,और खूब जी भरके खाना। 'उसकी आँखें सजल हो गईं। क्या वास्तव में उसे सपने देखने का अधिकार नहीं। क्या सपना देखा उसने, केवल भरपेट भोजन का, केवल पकवानों का। वो रोज़ ही देखता की हवेली से जूठे बर्तन जब धोने कर लिए बाहर निकाले जाते तो थालियों में इतना खाना होता जितने में उसका औऱ उसके परिवार का पेट भर सकता था।

उसके हाथ स्वत्: जुड़ गए 'हे ईश्वर ! मैंने तुमसे कोई अमूल्य धन तो नहीं मांगा था। सिर्फ अपने परिवार के चेहरे पर एक दिन की तृप्ति देखना चाहता था। मालिक ने बरसों की सेवा को याद नहीं रखा, तो तुम भी....'हमारे सुख में ईश्वर जितना धन्यवाद का पात्र होता है उतना ही दुःख में उलाहना का। संचित रोष, क्षुधा और अपमान को अब वह जब्त न कर सका और फफक कर रो पड़ा।

अचानक पीठ पर जोरदार धक्का लगने से वो खाट से नीचे गिर पड़ा, सम्हलकर खड़ा होता उससे पहले ही कारकुन दहाड़ा "साsssssले, ईहाँ लम्बी तानकर सोत है। उहाँ काम कौन करही, तोहरा बाप। जल्दी चल हवेली, आऊर हां, तोर लुगाई बच्चा को भी रख ले, ढेर कारज धरा उन्हां।"

कारकुन बड़बड़ाता चला गया। वह हकबक सा खड़ा था, जीवन में पहला अवसर था जब वह कामना को फलीभूत होते देख रहा था। उसके हाथ पुनः कृतज्ञता में उठ गए।


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