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पूर्णविराम
पूर्णविराम
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© Shivani Kohli

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पूर्णविराम

 

बारिश की बूंदों को कैद कर इन मदमस्त हवाओं को आँचल में उम्र भर के लिए समेट लेती हूँ. सुकून देने वाले इन तरानों को कानों में चिरकाल तक सहेज कर रख लेती हूँ. मिट्टी की सोंधी खुशबू नस-नस में भरकर इनका आलिंगन कर लेती हूँ. कोहिनूर से भी सुरूप और तेज़ इन बूंदों को आँखों में भर लेती हूँ. फूलों का ये यौवन मैंने पहले कभी नहीं देखा. प्रकृति के प्रत्येक कण में ये बूँदें अपना घरौंदा बनाये बैठी हैं. प्रतीत हो रहा है कि बारिश आज खुद भीगने का लुत्फ उठा रही है. प्रकृति को पूर्ण समर्पित भाव से खुद को सौंपने जा ही रही थी कि बादलों के पार की दुनिया से आए पैगाम को बीच में ही तोड़ते हुए माँ ने पुकारा.

 

‘कहाँ हो?’

‘क्या माँ... अर्जी पहुँचने से पहले ही नामंजूरी की मोहर लगा दी.’

‘क्या?’

‘कुछ नहीं. क्या बात है? क्यों पुकारा?’                                    

‘तेरे बाबा बुला रहे हैं. तुझे तो सुनाई नहीं दिया पर मोहल्ले भर को खबर पड़ गयी.’

‘बाबा?’

‘आती हूँ.’

 

बाबा के बुलाने का अर्थ मैं समझती हूँ. समाज के नए ढकोसलों का आगमन. वैसे तो माँ भी समाज के पल्लू से बंधी हुई रहती है पर कभी मेरे लिए पल्लू छुड़ाना पड़े तो थोडा-सा झटक देती है. पर बाबा तो समाज और उसके बनाये हुए दकियानूसी रिवाजों के पुजारी हैं. दुनिया इधर की उधर हो जाए पर बाबा अपने समाज को नहीं छोड़ सकते. छोटी ने मजाक में उन्हें पंडित हो जाने की बात कह दी थी. गुस्सा गए थे. बोले...

‘हम क्षत्रिय हैं. अपनी आन, बान और शान को एक रूतबे में रखना पसंद करते हैं. क्षत्रिय कुल में जन्मी हो तुम. अभिमान करो इस बात पर.’

कुलों से थोडा परहेज़ ही रखती हूँ. कुल में ही यदि सब समाहित है तो अगला जन्म इंसानों के कुल में मांगती हूँ. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र इनके अतिरिक्त कई हजारों कुल हैं, शायद लाखों... पर इंसानों के कुल का कोई ठौर ठिकाना है ही नहीं. भारतीय संस्कृति में कई और हजारों संस्कृतियाँ हैं, जिनके कई ठेकेदार और वारिस हैं. इन्हीं के एक ठेकेदार मेरे बाबा भी हैं. समाज के प्रति दायित्वों को कभी नहीं भूलते. भूलते हैं तो बस एक ही बात कि ‘उनका परिवार भी है और उस परिवार के पास एक दिल भी है’. 

 ‘अगर तेरे ख्याली पुलाव पक गए हों  तो दर्शन दे आ बाबा को.’ छोटी ने मेरे बेलगाम भागते ख्यालों के घोड़ों की लगाम खींचते हुआ कहा.

 

बरामदे में एक बड़ा दीवान उस पर नीले शनील की भारी कढ़ाई वाली चादर और दो गोल तकिये जो चादर वाले कपड़े के बने हुए हैं. दीवान के ठीक सामने दो कतारों में कुछ दस-बारह कुर्सियाँ और बीच में एक लम्बा मेज़ जिस पर कई प्रकार के व्यंजन रखे जाते हैं. दीवान के बायीं तरफ एक बांस का मूडा जिस पर चार-पाँच मोटी जिल्द वाले बहीखाते रखे जाते हैं. हमारे गाँव की सारी जमीनों का हिसाब बाबा के इन बहीखातों में जमा है. जमीनों की सलाह के लिए सुबह से ही लोगों का ताँता लग जाता है और आज के दिन की शुभ शुरुआत मेरी पेशी से हुई.

‘इतने समय से कहाँ थी? कबका संदेसा भेजा हुआ है.’ बायीं कुहनी को गोल सिरहाने पर टिकाया और दायें हाथ से लाल जिल्द वाले बहीखाते के पन्नों को पलटते हुए पूछने लगे...

‘वो... मैं... आ ही रही थी.’  मैं शब्द ढूँढ़ने लगी.

‘समय के पाबंद हैं हम. जानती हो न?’

‘मैंने हाँ में सिर हिलाया.’

‘तुम कल छत पर क्या करने गयी थी?’

‘जी... वो... छत से अनाज... का थाल लाने गयी थी.’

‘वो तो राउजी भी ला सकता था. तुम्हीं क्यों गयी?’

क्या बताऊँ बाबा को कि मैं छत पर डूबता हुआ सूरज देखने गयी थी और उसे भी. नहीं नहीं... जिंदा जमीन में गाड़ देंगे अभी के अभी.

‘क्या करने गयी थी? बोलो, दिल दहला देने वाली भयावह आवाज़.

‘डूबता सूरज देखने गयी थी.’

 

बहीखाते को बंद करते हुए बाबा ने मखमली चादर के नीचे से नीम की एक बेंत निकाली और मुझे हाथ आगे करने का इशारा किया. गलती की है तो सजा लाज़मी है. उँगलियों की सूजन ने शरीर में एक कम्पन भर दी. हाथ काफी समय तक लाल रंग से जूझता रहा. मुझे जाने को कहा गया. पूर्णविराम को सँभालते हुए कमरे में आई. वहाँ छोटी पहले से ही मेरा मज़ा लेने के लिए बैठी थी.

‘कहा था मैंने, पर तू मेरी कहाँ सुनती है. अब ले डूबते सूरज का मज़ा उसकी लालिमा सहित.’ एक व्यंग्यात्मक वाक्य.

माँ कमरे में दाखिल हुई.

‘तू क्यों नहीं सुनती हमारी बात. मैंने कहा था न कि सपने, सपने होते हैं. उन्हें हकीकत में नहीं बदला जा सकता.’ हल्दी का लेप लगाते-लगाते माँ की आंखें भर आयीं.

“परन्तु, ‘सन्नाटे कहाँ शांत होते हैं.’ “

‘मैं ये तो नहीं जानती माँ कि मैं इन्हें कभी हकीकत रूप दे पाऊँगी कि नहीं, परन्तु इस डर से मैं सपने देखना छोड़ तो नहीं सकती. कम से कम किसी एक पर से तो पूर्णविराम हट ही जाएगा.

‘अगर तेरा सूरज निकल आया हो, तो हम कुछ खा-पी लें.’ छोटी हर बार मुझे और माँ को भावुकता के कुएँ में जाने से रोक लेती. उदास चेहरों पर हल्की मुस्कान आई और दर्द के आलम से निज़ात पायी. हम तीनों की दुनिया खूब मज़े की दुनिया है. माँ तो जैसे पाबंदियों वाली चूनर कहीं फेंक आती हैं. सपनों के आसमान में हम अपनी उड़ान भर रहे होते और हर बार बाबा की आवाज़ हम सबकी उड़ान को रोक देती. हम फिर उसी धरा के छोटे-मोटे सिपाही हो जाते.’

बातों ही बातों में माँ ने बताया कि शाम को गाड़ी बाज़ार जाएगी. हर माह के पहले रविवार गाड़ी बाज़ार जाती है और महीने भर का सारा राशन कोठरी में भर दिया जाता है. राउजी काका इन सब की देख रेख करते हैं. हम तीनों को घर से बाहर जाने की इजाज़त नहीं है. इसलिए माँ से कहकर राउजी काका से कुछ चटपटा मंगवा लेते हैं. बाबा के अनुसार औरतों और लड़कियों को घर में ही रहना चाहिए. मेरा पहला और आखिरी सवाल बाबा को यही था कि ‘हम बाज़ार क्यों नहीं जा सकते?’ इसके उत्तर में बाबा ने दीवार पर टंगे फ्रेम का उदाहरण देते हुए कहा था कि ‘तुम लोग वो तस्वीरें हो जो फ्रेम के अन्दर और दीवार पर टंगी हुई ही अच्छी लगती हैं.’ बाबा के इस उत्तर ने मेरे हर प्रश्न को ख़ारिज कर दिया. माँ तो कभी अपने मायके भी नहीं जाती. वर्ष में एक बार मामा मिलने आते हैं, वो भी कुछ मिनटों के लिए.

माँ के लेप ने मेरे हाथों की ऊपरी सूजन को तो कम कर दिया परन्तु अन्दर की जलन का क्या? मैं सपनों में जीती और मरती हूँ परन्तु वो कहीं गिरवी पड़े हैं. ख्वाब तो पूरा ज़रूर करुँगी भले एक ही सही. पाबंदियों को तोड़ने का ख्वाब, इस दहलीज़ को लांघने का ख्वाब, खुले आसमान में पंख फैलाये उड़ने का ख्वाब, बारिश में भीगने का ख्वाब, फ्रेम से बहार निकलने का ख्वाब...

 कुछ कदमों के फासले पर पाठशाला हुआ करती थी. रूढियों के पुजारी मेरे बाबा, लड़कियों की शिक्षा के पक्ष में नहीं थे और इस राजीनामे पर बाबा के हस्ताक्षर का श्रेय राउजी काका को जाता है. बाबा के लिए वो जितना काम करते थे उससे कई ज्यादा वो हमें समझते थे और बाबा को समझाने के लिए राज़ी भी हो गए. समाज में अपना रुतबा बरकरार रखने के लिए बाबा ने मंज़ूरी दी. दसवीं तक की शिक्षा वहीं से ली. ‘घर ही सँभालने हैं’ का हवाला देते हुए बाबा ने आगे की पढ़ाई पर रोक लगा दी. माँ से मिन्नतें की, नाक तक रगड़ा पर माँ अपने पत्नी धर्म को सर का ताज बनाये बैठी थी. हालाँकि मैंने दसवीं में पहला दर्जा हासिल किया था. ‘करना तो चूल्हा चौका ही है न तो क्या करेगी पढाई का.’ इस वाक्य को सभी ने रट्टा मार रखा था. सभी विषयों में अच्छी तो थी परन्तु मेरा मन साहित्य में अधिक रमता था. मैं साहित्य समझती थी या साहित्य मुझे  पता नहीं. जिन सवालों के जवाब कहीं न मिलते वो साहित्य के पन्नों में मिल जाते. मेरे ख्वाबों की दुनिया भी यही है.

राउजी काका से कबाड़ी वाले को बुलाने के लिए कहा गया. और मेरे ख्वाबों को रद्दी के भाव में बेच दिया गया. ‘अब कौन सा पढ़ना है तो इनका क्या काम. पड़े-पड़े सीलन लग जाएगी. जगह लेगा सो अलग’ एक और पूर्णविराम वाला उत्तर.

“साहित्य से मुलाकात हुई भी और नहीं भी पर जितनी भी हुई रूह में बस गयी. जीवन के व्याकरण में पूर्णविराम से गहरा नाता जोड़ते हुए बाकी चिन्ह धुआं कर दिए गए.”

माँ से बात की तो उसने भी जीवन की इसी व्याकरण का पता बताते हुए मेरी शादी की बात की.

‘शादी? नहीं माँ अभी मैं केवल बीस की हूँ और...’

‘शादी का उम्र से क्या वास्ता. मेरी शादी 17 में कर दी गयी थी. संभाला ही है सब कुछ मैंने भी. तू तो फिर 20 की है. आज शाम को बाबा ने लड़के वालों को बुलाया है.’

‘पर माँ, मैं किसी और को पसंद करती हूँ.’

चटाक... चटाक... मुंह पर ज़ोरदार दो रसीदें कस दी गयीं...

  

‘शाम को तेरे ससुराल से लोग आ रहे हैं और मुझे कोई तमाशा नहीं चाहिए.’

लड़के वाले आए और एक लम्बे से घूंघट में मुझे सबके सामने नुमाईश के तौर पर बैठा दिया गया. लेन-देन की सभी बातें की गयीं, रिश्ते-नातों की बातें की गयीं, बस मेरी ही बात नहीं की गयी. पंडित को बुला कर शादी के मुहूर्त की विधि भी समपन्न कर दी गयी और मेरे भविष्य का सब कुछ तय कर दिया गया. एक माह के भीतर ही शादी का योग बताया गया और मुझे एक अनजान घर में स्थानान्तरण करने के निर्णय पर मोहर लगा दी गयी. अजनबियों के बीच का सफ़र मेरे लिए एक नयी चुनौती का आगमन था.

ससुर क्षत्रिय कुल के ठेकेदारों में से ही थे. यहाँ भी स्त्रियों को गूंगा रखने में शान समझी जाती थी. सास ने पहले ही दिन पूरे कायदों की घुट्टी पिला दी थी. शादी को तीन दिन बीत गए पर पति ने अभी तक नज़र तक नहीं मिलायी. रहते तो हैं एक कमरे में पर पल भर देखने की फुर्सत नहीं है. मैंने भी बात नहीं की. माँ और छोटी की बड़ी याद आ रही है. मैं तो वहां जा नहीं सकती और बाबा उन्हें यहाँ आने नहीं देंगे. दिन-त्यौहार पर ही मुलाकात हो सकेगी. दिन कैसे बीतते जा रहे हैं खबर ही नहीं पड़ती. सारा दिन चूल्हे में खप जाता और रात नींद की बेहोशी में. बरामदे में यहाँ भी दीवान पर बैठक होती और हर महीने एक गाड़ी भी जाती. रसोई से कमरा और कमरे से रसोई  यही फासला तय करती रोज़.

‘आज तुम्हारे मायके वाले करवाचौथ देने आ रहे हैं. खाने में कुछ उनकी पसंद का भी बना लेना.’

मन अतिविभोर होकर बरसात में नाचते मोर जैसा हो उठा. रसोई में जाकर शाम के खाने की तैयारी करने लगी. माँ के लिए सफ़ेद चने और इमली की चटनी, छोटी के लिए दही-बड़े. बाबा नहीं आयेंगे, लड़की के घर का अन्न-जल खाना, क्षत्रियों के मान में नहीं आता. शाम को माँ और छोटी आयेंगी तो खूब बातें करुँगी उनसे.’

संध्या के इंतजार में दोपहर का खाना भूल गयी. मायके से गाड़ी आयी और उसमें से राउजी काका बाहर निकले. उन्होंने व्रत का सारा सामान आँगन में रखा और चले गए. सास ने सारा सामान कोठरी में पहुंचवा दिया. एक डिब्बा मेरे हाथों में थमाते हुए बोलीं ‘ तुम्हारे मायके से आया है. व्रत वाले दिन पहन लेना. डिब्बे में कपड़े, ज़ेवर और श्रृंगार का सामान था.’ माँ नहीं आयीं. समझ सकती हूँ क्या हुआ होगा. उन बेड़ियों ने फिर से माँ को जकड़ लिया होगा. ‘चिंता मत करो माँ मैं ठीक हूँ.’ मेरी लड़खड़ाती जुबान ने माँ तक इस एहसास को पहुँचाने का प्रयास किया.

‘कल सुबह व्रत है और तुम्हें सुबह तारों की छांव में खाना खाने के लिए आना है. सही समय पर उठकर नीचे आ जाना.’

‘जी.’

सुबह के इंतजार में मैं रात भर सो नहीं पायी. सुबह हुई तो उठ नहीं पाई. तारों की छांव चली गयी और पूरा दिन मैं भूखी प्यासी चाँद की राह में बैठी रही. आधी रात के बीत जाने पर चाँद निकला. पति को मेरी कोई सुध नहीं. सास के कहने पर मेरा पति वहां लाया गया. व्रत तुड़वाया और पानी के एक घूँट से मुझे जीवन दान दिया गया.

फिर एक दिन इस अधमरे जीवन से निजात पाने के लिए पति से बात करना बेहतर समझा. शादी को एक बरस होने को है और पति ने कभी आँख उठाकर भी नहीं देखा. ऐसे जीवन का क्या करूँ? आज इनसे बात करती हूँ.

जैसे ही पति ने कमरे में कदम रखा. मैं खीजते हुए बोली...

‘आप मुझसे बात क्यों नहीं करते. शादी को एक बरस होने को है और आपने कभी मेरी तरफ देखा तक नहीं, प्यार तो दूर की बात है.’

पति के मुड़ने के अंदाज़ से मैं घबरा गयी. उसने कुछ नहीं कहा और सोने चला गया. दिल थामे मैं बगल में लेट गयी. कई दिनों तक हिम्मत नहीं जुटा पाई कुछ और कहने की. किससे बात करूँ? मन तो चीखने-चिल्लाने को हो रहा है. बहुत दिनों से खुद की ही आवाज़ नहीं सुनी. मंदबुद्धि की तरह आईने में खुद से कभी बात करती तो पागल होने के पूरे लक्षण नज़र आते. आईने से बात करना अब मेरी आदत हो गयी है. घंटों उसके सामने बैठती और खुद को देखती. इंतजार करती कि कोई तो पुकारेगा मुझे. पर कोई आवाज़ मुझे नहीं पुकारती. उस घर में सबके नाम लिए जाते बस मुझे पुकारना सब भूल जाते. अब तो खुद की आवाज़ भी सुनने का मन नहीं होता.

जवानी से बुढ़ापे के इस सफ़र में दिन, महीने, साल बीतते गए और उम्र के साथ-साथ मेरी आवाज़ भी बूढ़ी होती चली गयी. फिर एक दिन जीवन के आईने ने भी पूर्णविराम लगाने में देरी नहीं की. ये मेरे जीवन का आखिरी पूर्णविराम था. 

औरत ज़िंदगी पूर्णविराम

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