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© Lady Gibran

Drama Inspirational Others

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रात भर खयालों की कश्मकश के बाद अभी अभी उसकी आँख लगी थी। अलार्म की कर्कश आवाज ने उसको फिर जगा दिया। आज कॉलेज नहीं जाना था। पर उठना तो पड़ेगा ही, उसने सोचा !

कल ही डॉक्टर आन्टी माँ को देखकर गयी थी। उनके  पापा से कहे कुछ शब्द उसके कान भी पड़े थे। "ज्यादा से ज्यादा १-२ दिन, आप किसी को बुलाना चाहे तो बुला लीजिये।"

सत्रह साल की उम्र में वह इस बात का शाब्दिक अर्थ समझने के काबिल तो थी। पर उनकी गहराइयो को नहीं। वह उठकर घर के काम में लग गयी।

माँ को देखने के लिए रिश्तेदार का आना और व्यर्थ की चिंता बढ़ाना, तो अब आम बात हो गयी थी। सब को अपने अपने काम पर जाने की फ़िक्र थी। पर फिर माँ की तबियत और अस्वस्थ लगने लगी। व्यवहारिक विचार विमर्श के बाद सब अपने अपने काम में लग गए।उसने जल्दी जल्दी में कुकर लगाया। रसोई के काम उसको कहाँ आते थे! अभी अभी तो कॉलेज में दाखिला हुआ था।

हर लड़की की उम्र में एक समय आता है जब वह अपनी माँ से सांसारिक और घरेलु काम सीखती है। पर समय ने उसके जीवन में वो समय ही नहीं लिखा था!

वह स्कूल से निकले उसके पहले ही माँ की जानलेवा बीमारी हो गयी थी । पुरे २ साल लगे थे उसे इस बात की गंभीरता को समझने में। पर अब बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टर भी जवाब दे चुके थे।

उससे माँ की तकलीफ देखी भी नहीं जाती थी। वह सिर्फ इतना चाहती थी की बस बिना किसी तकलीफ के उनके प्राण निकले। उसे क्या पता की माँ के प्राण निकलने पर एक बेटी का क्या हाल होता है!!

समय जब तक हमें समझ देता है....तब तक एक पूरा जीवन बीत जाता है।
माँ को भी शायद अंत का अंदाजा लग गया था। उसने नानी से कहा "मुझे स्नान करा दो।"

"माँ नहीं सुधेरेगी !" उसने मन ही मन सोचा! उसकी माँ एक बहुत ही शुद्धात्मा थी। प्रभु भक्ति, संयमित जीवन , सुशिक्षित पर नम्र!! ऐसे इंसान भगवान भी कभी कभी ही बनाते है।
नानी ने और उसने माँ के हाड को स्नान करके पलंग पे लेटा दिया।वह फिर रसोई में लग गयी। एक बजने वाला था, नानी ने कहा "सब लोग खाना खा लो मुझे भूख नहीं।"

एक तरफ एक बेटी और एक तरफ एक माँ, दोनों ही जानते थे के एक माँ और एक बेटी का आखरी वक़्त चल रहा है!! सिर्फ समय की गंभीरता को समझने की शक्ति अलग अलग थी।

भूख और प्यास प्राणी की एक ऐसी जरुरत है, जो उसके आपे से बाहर है...वरना शमशान  से आये हुए बन्दे जो अभी अभी जीवन की वास्तविकता के साक्षी बने है...एक लाश जो कभी इंसान थी...उसको अपने हाथों से जलाने के पश्चात ..लौटकर सबसे पहले चाय-पानी को न्याय देते है।

एक आध निवाला मुंह में डाला ही था की ताईजी ने इशारे से पापा को बुलाया। सब ने थाली वही छोड़ दी। "बेटा दिया जलाओ और मम्मी के सर के पास बैठकर गीता पढ़ो", नानी ने आदेश दिया।
वह माँ के पास जा कर बेठी और पढ़ने की कोशिश करने लगी। उसकी नज़र माँ के चेहरे से नहीं हट रही थी। आँखे आधी खुली थी, और चेहरे पे कुछ अस्वस्थता थी। पापा सामने बैठकर लाचारी से सब देख रहे थे। नानी ने माँ के कान में कहा " तुम निश्चिन्त हो कर जाओ , वह अभी आता ही होगा। तुम अपने प्राण मत अटकाओ!"

भाई की बात हो रही थी। वह अभी हॉस्टल से आया नहीं था। माँ के प्राण उसमे अटके थे..शरीर ने तो कब का साथ छोड़ दिया था। पर फिर आत्मा भी संभल गयी।

एक पल में उसके सामने, माँ ने पूरी आँखे खोली, और खुली ही रह गयी! प्राण निकल गए, और सब कुछ एकदम शांत हो गया। उसके जीवन को अशांत करने वाली वह शान्ति थी।

आज बीस साल के बाद, जब वह खुद एक माँ थी उसको माँ की कमी बहुत ज्यादा महसूस हो रही थी। आज फिर वही तारीख थी। हर साल मानो वह इस दिन को फिर से जीती थी। जो आंसू तब न निकल पाए वो अब हर साल पल पल उसको याद करके बहते थे !!
सच ही है, एक माँ के अंत के साथ ही एक बेटी की भी मृत्यु हो जाती है, और बचती है एक नि:सहाय औरत!

मॉं ज़िंदगी हक़ीक़त दर्द ममता बेटी वास्तविक जीवन

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