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बेचैनी
बेचैनी
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© Dipak Mashal

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दोनों परिवारों में दोस्ती बहुत पुरानी या गहरी तो नहीं थी लेकिन वक़्त बीतने के साथ-साथ बढ़ती जा रही थी। महीने में कम से कम एक बार डिनर के बहाने मिलने के लिए एक दूसरे को अपने-अपने घर आमंत्रित कर ही लेते थे, इस बार दूसरे वाले ने किया था। 
सुरक्षा के उद्देश्य से दोनों की ही बिल्डिंग में इस तरह का सिस्टम था कि जब तक मेज़बान खुद बाहर निकल कर नीचे मुख्य द्वार तक लेने ना आये तब तक कोई मेहमान भीतर नहीं आ सकता था। पहले दोस्त ने परिवार सहित बिल्डिंग के नीचे पहुँच कर फोन किया। 
- हैलो! हाँ जी, पहुँच गए हैं गेट पर। 
- जी अभी दो मिनट में नीचे आता हूँ।  
- जी ठीक है। 

मेज़बान मित्र निकलने को चप्पल पहन ही रहा था कि पत्नी ने टोका। 
- आपको क्या जल्दी पड़ी रहती है भागकर तुरंत जाने की, याद नहीं जब भी उनके घर आते हैं दो मिनट का कह कर दस मिनट में दरवाज़े पर आते हैं। आज थोड़ी देर उन्हें भी इंतज़ार करने दीजिये, आराम से जाइये। 

चप्पलें उतार वो सोफे में धँस गया, लेकिन फिर एक मिनट भी न गुजरा होगा कि उठकर चहलकदमी करने लगा। बेचैनी बढ़ती जा रही थी, किसी तरह पत्नी से बोला 
- मैं सोच रहा था कि वो जान-बूझकर थोड़े करते होंगे, और फिर करते भी हों तो हम उनके जैसे क्यों..... 
बात ख़त्म भी ना हुई थी कि पत्नी बोल पड़ी। 
- जी, वही मुझे लगा कि फिर उनका छोटा बच्चा भी तो बाहर सर्दी में खड़ा होगा, आप जल्दी जाइये। 


और दोनों मुस्कुरा दिए।

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